'सिंधु सभ्यता को आर्य सभ्यता मानने पर भारत को आर्यों का आदि देश मानना आवश्यक हो जाएगा।'अनेक तर्क जो दिए जाते थे उनको आज सरस्वती नदी और उसके नगरों की खोज और इस नवीन शोध ने कि भारत मानव का आदि देश है, गलत सिद्ध किया है।
अभी तक की खोज में सारस्वत सभ्यता के नगर मिले हैं। सभी नगर पूर्व-नियोजित ज्यामितीय ढाँचे में आयताकार हैं। उस समय की दृष्टि से खूब चौड़ी उत्तर-दक्षिण एवं पूर्व-पश्चिम समकोणीय सड़कें, जिनमें दो पहिए की बैलगाड़ियाँ और चार पहिए वाले रथ चल सकते थे। अच्छी तरह पकाई ईंटों से निर्मित बड़े सभा भवन तथा दुमंजिले आवास, जिनमें आँगन, सीढ़ियां, कुएँ, स्नानागार एवं शौचालय की व्यवस्था थी और छत का पानी निकालने के लिए परनाले। गृह के द्वार तथा खिड़कियाँ सड़क की ओर न होकर गली की ओर थे, जो दो से तीन मीटर तक चौड़ी थीं। बाजार, जहाँ क्रय-विक्रय के लिए चबूतरे थे। पश्चिम की ओर दुर्गनुमा विशाल कोठार, उसके पास संभवतया अनाज दलने तथा पीसने के पर्याप्त बड़े गोल चबूतरे। वहीं श्रमिकों के आवास और धातु गलाने की भट्ठियाँ। सड़कों से नगर कई भागों में विभक्त थे और संभवतया प्रत्येक भाग में किसी विशिष्ट व्यवसाय, निर्माण अथवा उत्पादन में लगे कारीगर रहते होंगे, ऐसा पुरातत्वज्ञों का मत है। क्या यह उस समय की वर्ण-व्यवस्था का या कर्म अथवा व्यवसाय के अनुसार विभाजन का पर्याय था? जल-निकासी का समुचित प्रबंध; भलीभाँति पाटों से ढकी नालियां। छोटी नालियां सड़क के दोनों ओर की पक्की नालियों से जाकर मिलती थीं। नालियों के किनारे गढ़े मिले, जहाँ कूड़ा अथवा नालियों का कीचड़ इकट्ठा किया जाता होगा। इन नालियों में कहीं-कहीं जल शोषक गड्ठे (soak pit) भी थे। सड़कों की सफाई का प्रचुर ध्यान तथा व्यवस्था थी। सबसे बड़ा आश्चर्य एक विशाल जल-संरक्षण का साधन है, जिसे कुछ ने स्नानागार कहा। यह एक पक्के तालाब के रूप में है, जिसमें पानी भरने और निकालने की व्यवस्था है। उसके किनारे नहाने के लिए कोठरियां हैं। तालाब की ईंटों की परतों के बीच डामर भरा है।
आवास तथा भवन के लिए पकी ईंट का प्रयोग प्राचीन सभ्यताओं में अभिनव था। सुमेर में इसका प्रयोग स्नानागार एवं शौचालय तक सीमित रहा। मिश्र में पकी ईंट का प्रयोग रोमन युग में प्रारंभ हुआ। स्पष्ट है कि सारस्वत सभ्यता में वास्तुकला तथा नगर-नियोजन के विशेषज्ञ थे, जो आधुनिक नगर-नियोजक की भाँति नगर, यातायात, आवास, व्यापारिक संस्थान, जल-संरक्षण और निकासी, स्वच्छता, मल तथा कूड़े की व्यवस्था आदि का योजनापूर्वक निर्माण कर सके। ऎसा नियोजन संसार की किसी सभ्यता में विक्रम संवत् की उन्नीसवीं शताब्दी तक नहीं मिलता, जब आधुनिक नगर बनने प्रारंभ हुए।
इस नगर सभ्यता के संभरण-पोषण के लिए बड़े पैमाने पर कृषि की आवश्यकता थी। बदलती जलवायु के कारण यहाँ के जंगल (जिसकी लकड़ी तथा ईंधन से पकी ईंटें प्राप्त हुईं), कृषि-क्षेत्र एवं संलग्न ग्राम और नदी से निकली सिंचाई की नहरें आज लुप्त हो गयीं। पर इनका अस्तित्व असंदिग्ध है। उपयोगी मृदभांड तथा कांस्य के पात्र मिलते हैं। इन बरतनों पर पशु-पक्षियों, जंतुओं अथवा वृक्षों के सरल रेखाचित्र और मानव आकृतियाँ हैं। वैसी ही हैं मिट्टी, पाषाण तथा काँसे की मूर्तियाँ। लोग पलथी लगाए बैठे हैं। हीरे-जवाहरात से सजी, केश सँवारे स्त्री प्रतिमाएँ। परंतु पुरूष प्राय: उघारे बदन हैं, जिनमें शरीर का सौष्ठव दिखता है। और ढेर सारी सेलखड़ी से बनी मुद्राएँ हैं जिनमें पशु आकृति, साधारणतया बैल की थी। इनमें कुछ लिखा है। भारतीय जीवन में ऎसे आँगनयुक्त भवन, उसी प्रकार पुरूषों के लिए गरम स्थलों में उघारे बदन रहना स्वाभाविक है। एक सींगधारी पुरूष की मूर्ति भी पायी गयी, जिसे कुछ पुरातत्वज्ञ शिव की मूर्ति समझते हैं। दूसरे पुरूषों की दाढ़ी युक्त मूर्तियाँ भी हैं, जिनमें मूँछों के बाल नहीं हैं। मुसलमानों हाजियों की यह प्रथा, जैसा चक्रवर्ती सम्राट सगर के आख्यान से प्रकट है, पहले भी थी।
आज भी सारस्वत सभ्यता अनेक रहस्यों से घिरी है, उनमें सबसे जटिल उनकी 'कीलाक्षर लिपि' है। वह पूर्णरूपेण पढ़ी नहीं जा सकी। डा. फतेहबहादुर सिंह ने, जो जोधपुर संग्रहालय के अध्यक्ष थे, उसके पाठ का यत्न किया। श्री सुब्बाराव ने अब पर्याप्त कार्य किया है। वैसे वैदेल (Waddel) ने अपनी पुस्तक 'पुराण व इतिहास में सभ्यता के निर्माता' (The makers of Civilization in Race and History) में एक स्थान पर एक मुद्रा की भाषा का रोमन लिपि में ध्वनि रूपांतर (phonetic translation) सुझाया- 'DILIPT-PRT-JYNT-NR'; मेरे छोटे बाबा जी (चौ. धनराज सिंह) ने कहा था,
'कैसे पूर्वाग्रह ग्रसित हैं पाश्चात्य विद्वान! वे इसका अर्थ सामी अथवा आसुरी भाषा में खोजते हैं भारत की धरती में। अपने दोषपूर्ण आधार के कारण, कि यह आर्यों के पहले की कोई सभ्यता है। पढ़ो इसे संस्कृत में। मुद्रा कहती है-'दिल्लीपति-पार्थ-जयंत-नर'। ये सब अर्जुन के नाम हैं।'मैंने कहा,
'दिल्ली तो आधुनिक नाम है। तब कहाँ से आया?'हँसते हुए उन्होंने उत्तर दिया,
'पुराणों में राजा 'दिलीप' का वर्णन है न? वे दिल्ली के पालक थे, इसी से 'दिलीप' नाम पड़ा।'जैसा भी हो, लिपि देर से पढ़ी जाने के एक कारण दुराग्रह है। इससे सारस्वत सभ्यता के उदय, इतिहास, दर्शन, समाज-रचना तथा धार्मिक विचार पर पड़ा आवरण अब धीरे-धीरे हट रहा है।
कालचक्र: सभ्यता की कहानी
भौतिक जगत और मानव
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सभ्यता की प्रथम किरणें एवं दंतकथाऍं
अवतारों की कथा
स्मृतिकार और समाज रचना
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प्राचीन सभ्यताएँ और साम्राज्य
०१ - सभ्यताएँ और साम्राज्य
०२ - सभ्यता का आदि देश
०३ - सारस्वती नदी व प्राचीनतम सभ्यता
०४ - सारस्वत सभ्यता
3 comments:
पाश्चात्य विद्वानों का यह मात्र दुराग्रह ही नहीं है, दुर्भावना भी है। वे असल में यह सिद्ध करना चाहते थे कि भारत पर सदा विदेशियों का राज रहा है। आर्य भी विदेशी थे। इससे उनके यहां के अत्याचारों पर पर्दा पड़ता था। इसीलिए उन्होंने इस तरह के घातक विचार फैलाएं। उनके द्वारा फैलाए गए कुछ और भी ऐसे विचार हैं, जैसे यह विचार कि हिंदी और उर्दू अलग-अलग भाषाएं हैं, न कि एक ही भाषा की अलग-अलग शैलियां। इसका षडयंत्र फोर्ट विलियम कालेज में रचा गया था और ग्रियर्सन आदि भाषाविदों की इसमें मिली भगत थी। 1857 में हिंदू-मुसलमानों को कंधे से कंधा मिलाकर उनका सामना करते देखकर अंग्रेजों ने निश्चय किया कि इन दोनों में वैर के बीज बोने होंगे, अन्यथा हिंदुस्तान में हमारे पांव नहीं जम सकेंगे। इसे अंजाम देने के लिए ही उन्होंने हिंदी-उर्दू अलग भाषाएं है, यह प्रमाद फैलाया जो आगे चलकर भारत के विभाजन में फलीभूत हुआ।
खैर, आर्यों के सबंध में डा. रामविलास शर्मा ने अपनी पुस्तक "इतिहास दर्शन" में अनेक नए तथ्य और विचार दिए हैं, जो यह साबित करते हैं कि आर्य कहीं से यहां आए नहीं थे, बल्कि वे सरस्वती नदी के किनारे ही रहते थे। उनमें से जो दो तर्क मुझे इस समय याद आ रहे हैं, उनका संक्षिप्त विवरण यहां दे रह हूं -
1. केवल संस्कृत और उत्तर भारत की भाषाओं में महाप्राण, मूर्धन्य ध्वनियां (ख, ध, थ, आदि) हैं, दुनिया के किसी अन्य भाषा में नहीं। यदि आर्य मध्य यूरोप या जर्मनी से यहां आए हों, तो वहां से लेकर यहां तक की सब भाषाओं में इन ध्वनियों का अस्तित्व होना चाहिए। इसके उल्टा, मूर्धन्य महाप्राण ध्वनियां संस्कृत में खूब हैं, पर रूसी, स्लाव, जर्मन, ग्रीक आदि भाषाओं में एक दो शब्दों में ही इन ध्वनियों का विकृत रूप देखने में आता है, और यह आसानी से सिद्ध किया जा सकता है कि ये शब्द मूलतः संस्कृत के शब्द हैx। इससे डा. शर्मा यह निष्कर्ष निकालते हैं कि ये शब्द इन भाषाओं में संस्कृत भाषी सारस्वत आर्यों के संपर्क के कारण आए हैं।
2. डा. शर्मा जो दूसरा तर्क देते हैं, वह अरे वाले पहियों से युक्त रथ का है, जो ऋग्वैदिक आर्यों का आविष्कार है। इस तरह के रथ दुनिया के किसी भी अन्य भाग में उस समय नहीं मिलते थे। सुमेर आदि में भी पहिएवाली गाड़ियां थीं, पर उनके पहिए ठोस होते थे, न कि अरे वाले। ऋग्वेद में अरे वाले पहियों का खूब उल्लेख मिलता है। इतिहास में इस अरेवाले पहियों से युक्त गाड़ी के लगभग दो हजार वर्षों के दीर्घ काल में सरस्वती तट से पहले फारस, फिर यूनान और फिर यूरोप के अन्य भागों में पहुंचने के बहुत ही स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं। इससे भी यही सिद्ध होता है कि आर्य यहां के ही थे, और वे कहीं से यहां आए नहीं थे।
बहुत जानकारीप्रद आलेख .. सुंदर विश्लेषण के साथ लिखा आपने !!
सारस्वत सभ्यता पर सुन्दर आलेख. आभार.
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