'तीन हजार शत्रु सैनिकों को मौत के घाट उतारा, कैसे बंदियों को जला दिया, अंग काट डाले, आँखे निकाल लीं और उनके सिरों को नकर में खंभों पर लटकाया तथा नगर के युवक-युवतियों को जला दिया।'
एक भित्तिचित्र में 'असुर' (उनका देवता) के सम्मुख शत्रुओं की बलि होते दिखाया गया है। इन नृशंस क्रूर अत्याचारों की विज्ञप्तियाँ, उनकी कथाएँ प्रचारित की गई कि राक्षसत्व भी लजा जाए। 'असुर' शब्द ही भयानक अत्याचारी का पर्याय बना।
अरब देश और संपूर्ण मध्य-पूर्व का जीवन इन विभीषिकाओं के भरा है। इतिहास अकथ्नीय अत्याचारों को वीरों की विजयगाथा कहकर, राक्षसत्व के पंक में डूबे इन साम्राज्यों की प्रशंसा करता है। इसी असीरियन सभ्यता में परदे की प्रथा का जन्म हुआ और पुरूष को चाहे जितनी पत्नियाँ रखने की छूट मिली। वहाँ मानव-मूल्य युद्घ के संघर्षों में खो गए और आई व्यक्तिगत जीवन में शान-शौकत की लालसा तथा नग्न वासना दर्शन। लोकतंत्र की कल्पना विलीन हो गयी। जनजीवन में सुमेर के समता भरे जीवन के स्थान पर विषमता आई और आई दास प्रथा की त्रासदी। मध्य-पूर्व की कथित सामी सभ्यताओं की लगभग यही कहानी है। पर इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि बाबुल (Babylon) का विलासिता में डूबा, इंद्रिय-सुख को सर्वस्व मानने वाला जीवन पश्चिमी जगत और अंततोगत्वा यूरोप को सुमेर के जीवन की, कुछ सामी रंग से रँगी, भारतीय झलकियाँ पहुँचा सका।
कालचक्र: सभ्यता की कहानी
भौतिक जगत और मानव
मानव का आदि देश
सभ्यता की प्रथम किरणें एवं दंतकथाऍं
अवतारों की कथा
स्मृतिकार और समाज रचना
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प्राचीन सभ्यताएँ और साम्राज्य
०९ - बैबिलोनिया१० - कस्सी व मितन्नी आर्य
११ - असुर जाति
1 comments:
आपका ब्लाग देखा, बहुत अच्छा लगा, इंडियन हिस्ट्री पर ऐसा ही काम होना चाहिए। हमारे मार्क्सवादी भाईयों ने हमारे धार्मिक और लौकिक साहित्य को केवल अर्थ के चश्मे से देखा तो यह काफी कुछ अधूरी तस्वीर रही। आपके जैसे संकल्पवान लोग इतिहास के अनूठे पहलुओं को हम तक पहुंचा रहे हैं।
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