Saturday, September 05, 2009

ईरान और अलक्षेन्द्र (सिकंदर)

प्राचीन ईरान की ऐतिहासिक घटनाओं का उल्लेख आवश्यक है। दक्षिण ईरान में 'पर्सु' नामक प्रांत था, जहाँ हखामनीषी वंश के लोगों का शासन था। इसी 'पर्सु' (संस्कृत परशु) से अंग्रेजी में 'पर्शिया' (Persia)  नाम पड़ा। इस वंश की कीर्ति शिखर पर पहुँचाने का श्रेय 'कुरू' को है। विक्रम संवत् पूर्व छठी शताब्दी में उसने तातारियों से ईरान को स्वतंत्र कराया। तब बाबुल पर आक्रमण कर ईरानी साम्राज्य का भूमध्य सागर तक विस्तार किया। बाबुल में पड़े निर्वासित अथवा बंदी यहूदी परिवारों (जिनमें कहा जाता है कि उनके आदि पुरूष या नबी, अब्राहम भी थे) को पुन: फिलिस्तीन भेजकर बसाने की व्यवस्था की। उनके येरूसलम के मंदिर का अपने व्यय से पुनर्निर्माण कराया। इसी प्रकार जब लीडिया के राजा क्रोयम ने कुरू के हाथों पराजय होने पर स्वयं को चिमा में जलाकर आत्महत्या करनी चाही तब कुरू ने उसे बचाकर अपनी राजसभा में उचित स्थान दिया। ये व्यवहार उसकी संस्कृति के अनुरूप सबका हृदय जीतने वाले थे। आसपास की सामी सभ्यताओं की नृशंसता के विपरीत उदात्त आचरण ! इसी वंश में प्रसिद्घ प्रतापी सक्राट् 'दारा' हुआ, जिकी समाधि के लेख में उसे 'आर्यों में आर्य' कहा गया।

फ्रांस के एक संग्रहालय में रखी सिकंदर की अर्धप्रतिमा का  चित्र

हखामनीषी वंश के शासन में, यूनान के सिकंदर (अलक्षेंद्र : Alexander) ने विक्रम संवत् पूर्व तीसरी सदी में, विश्व-विजय के स्वप्न सँजोए, भयंकर लूटपाट का अपना आक्रमण अभियान आरंभ किया। वह मिस्त्र को तथा पश्चिमी प्रदेश को रौंदकर ईरान की राजधानी परसीपुलिस ( Persepolis : पर्सु की नगरी) जा पहुँचा। वहाँ के लोगों ने यह देखकर कि यूनान में लोहारों की नगरी मखदूनिया (Macedonia) का राजपुत्र नए अच्छे अस्त्र बनाकर लाया है, जिससे लोहा लेना कठिन होगा, एक अफवाह फैलायी कि उस नगरी को वरदान है कि जब तक उससे १५ मील दूर एक मंदिर में रखी गाँठ (Gordian knot) आक्रमणकारी खोल नहीं देता तब तक उस नगर का बाल भी बाँका न होगा। यह सुनकर सिंकदर की सेना ने आक्रमण करने से इनकार कर दिया। सिकंदर तब उस मंदिर में गया। देखा कि कोई छोर पकड़ पाना कठिन है; गाँठ खोलने में कई सप्ताह लगेंगे। परसीपुलिस को आशा थी कि तब तक भारत से आधुनिकतम अस्त्र-शस्त्र तथा सहायता आ पहुँचेगी। पर सिकंदर ने कटार से गाँठ के दो टुकड़े कर दिए और दोनों छोर अपनी सेना को दिखा दिए कि
'मैंने गाँठ खोल दी है, अब युद्घ करो।'  
सिकंदर गांठ को काटते हुऐ 
सिकंदर की सेना ने एकाएक हमला किया और वहाँ की ईंट से ईंट बजा दी। भयानक नर-संहार हुआ, जिसमें स्त्री-पुरूष सभी मारे गए। सारा नगर जला दिया गया। कहते हैं कि अकेले सुसा नगरी की लूट में सिकंदर को ७,३९० मन सोना और ३२,८४५ मन चाँदी मिली। सर्वत्र लूटपाट के बाद उसने ईरानी कला के बहुमूल्य नमूने भी नष्ट कर दिए। नगरों के भग्नावशेष आज भी भयंकर त्रासदी की याद दिलाते हैं। महानाश उपस्थित करने के बाद घोड़ों पर सवार सिकंदर की सेना द्रुत गति से भारत के दरवाजे पर दस्तक देने पहुँच गयी।

इस चिट्ठी के चित्र - विकिपीडिया के सौजन्य से

प्राचीन सभ्यताएँ और साम्राज्य

०१ - सभ्यताएँ और साम्राज्य
०२ - सभ्यता का आदि देश
०३ - सारस्वती नदी व प्राचीनतम सभ्यता
०४ - सारस्वत सभ्यता
०५ - सारस्वत सभ्यता का अवसान
०६ - सुमेर
०७ - सुमेर व भारत
०८ - अक्कादी
०९ - बैबिलोनिया
१० - कस्सी व मितन्नी आर्य
११ - असुर जाति
१२ -  आर्यान (ईरान)
१३ - ईरान और अलक्षेन्द्र (सिकन्दर)

1 comments:

मुनीश ( munish ) said...

very informative article indeed !

Post a Comment