Sunday, October 29, 2006

प्रस्तावना ... कालचक्र: सभ्यता की कहानी

कालचक्र: सभ्यता की कहानी
संक्षेप में

भारत में आपात-स्थिति के घने अंधकार में मेरी निरूद्धि के समय एक दिन पुत्री जया भेंट करने आयी। कहने लगी, ‘
’हमारे बचपन में आप हमको अपने छोटे बाबाजी द्वारा वर्णित प्रसंग कभी बताते थे। वे कहानियां हम सबको भाती थीं। आजकल वकालत के व्यस्त जीवन से कुछ छुट्टी मिली। अब वे कथायें लिख लें।‘’
इस प्रकार प्रारंभ हुई मानव के विचारों की, संस्कृति की यह गाथा, जो पुस्तकाकार में प्रस्तुत है। सामान्य पाठक के लिये यह कहानी के रूप में ( और इसलिए बहुत सी तिथियों एवं संदर्भो का उल्लेख न करते हुए) लिखी गई है।

मेरे छोटे बाबाजी, चौ. धनराज सिंहजी, इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्रतिष्ठापूर्वक स्नातक परीक्षा पास करने के बाद आगरा में उस विद्यालय के प्रथम प्रधानाचार्य बने, जो अब बलवंत राजपूत कालेज, आगरा के नाम से जाना जाता है। दो वर्ष के बाद उनकी सीधी नियुक्ति प्रांतीय प्रशासनिक सेवा में हो गई। पुरातत्व उनकी अभिरूचि का विषय था, उनका व्यासंग भी कह सकते हैं। जिस जिले में तैनाती हुई, वहां के पुरातत्व स्थल उन्होंने खोजे, उनकी कहानियां जानीं। सरकारी सेवा से अवकाश के बाद उनका पूरा समय इस अध्ययन में बीता। सभी पुराण, वेद, प्राचीन सभ्यताओं की दंतकथाएं एवं कहावतें, संसार के मानचित्र में फैले भारत का स्मरण दिलाते अवशिष्ट चिन्‍ह। आश्चर्य कि भाषा-शास्त्र के माध्‍यम से वे पुरातत्व के विद्यार्थी बने और अनेक देशों की पौराणिक आख्यायिकाओं और दंतकथाओं के अंदर ऐतिहासिक विषय-वस्तु खोजने का नियम निकाला और रामायण एवं महाभारत काल का एक ऐतिहासिक ढाँचा खड़ा करने का प्रयत्न किया। वे कहा करते थे कि इनमें अनेक स्थानों एवं घटनाओं का वर्णन बृहत्तर भारत ही नहीं, उसके बाहर का हो सकता है, इसलिए संसार के रंगमंच पर उनकी लीलास्थली खोजें।

उनके भाषा-विज्ञान और फिर पुरातत्व में धँसने का संदर्भ दूसरे अध्याय में है। उन्होंने कई सहस्त्र अंग्रेजी और हिन्दी अथवा ठेठ देहाती, एक ही ध्वनि के, पर्यायवाची शब्द खोज निकाले। उनके पास लगभग नब्बे वर्ष पुरानी जागतिक महायुद्ध के पहले की भू-चित्रावली (एटलस) थी। उसमें वर्णित स्थानों, नदियों, पर्वतों के संस्कृत नाम उन्होंने निकाले तथा वहां की किंवदंतियों और जनश्रुतियों से उन्हें प्रमाणित किया। उनकी दुर्लभ हस्तलिपियां कुछ शोधछात्र ले गए और दुर्भाग्यवश कालांतर में वे विलीन हो गईं। उनके साथ बृहत्तर भारत में छितरा महाभारत एवं रामायण काल के इतिहास का ढाँचा भी खो गया। जो उनके लिखे नोट, स्मरण-पत्रक आदि हैं, उनके आधार पर पुन: आज प्राचीन सभ्यताओं का इतिहास लिखने का कार्य कोई न कर सका।

मेरे विद्यार्थी जीवन में कभी-कभी वे दूर देशों की, प्राचीन सभ्यताओं की कहानियॉं सुनाते, पर हम सब सुनी-अनसुनी कर देते। हममें धैर्य कहॉं। एक बार ‘मत्स्यपुराण’ से उन्होंने बताना शुरू किया, जब माया नगरी ( हरिद्वार) में प्रभात होता है तो कुबेर की नगरी मेंदोपहर और सुषा नगरी में रात्रि का तीसरा प्रहर। फिर पूछा, क्या आधुनिक बीजिंग कुबेर की नगरी हो सकती है ? ईरान की सुषा नगरी की जानकारी हमें है, जिसके ध्वंसावशेष एक बड़े क्षेत्र में फैले हैं। उन्‍होंने संसार भर में पुराणों मेंउल्लिखित नगरों को खोजा। कितने ही ऐतिहासिक नगर पुरानी भू-चित्रावली में भारत के बाहर दिखाए।

बाद में जब मैं प्रयाग उच्च न्यायालय में वकालत करने आया, उसके कुछ वर्ष बाद एक दिन उन्होंने मुझसे कहा,
‘’देखो, मैंने एक बड़ी गलती की थी। एक बार विदेशी पुरातत्वशास्‍त्री (संभवतया वैदेल के कोई शिष्य) मिलने आए थे। वह अनेक बातें पूछते रहे। मैंने उन्हें यह सोचकर अपना शोधकार्य एवं उसके परिणाम नहीं बताए कि वे उसका कहीं दुरूपयोग न करें। परंतु यह ठीक न था। बाद में लगा, केवल विदेशी होने से शंका करना भारतीयत्व नहीं। मुझे बताना चाहिए था।‘’
भारतीय दृष्टि से संपूर्ण ज्ञान जनता की संपत्ति है।

जब बांदा में वकालत करता था तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आया। तब मुझे एक नई दृष्टि मिली। जो बाबाजी कहते थे और जिसमें कुछ को उनकी सनक समझता था, वह नए ढंग से समझ में आने लगा। और फिर सन १९३५ के संघशिक्षा वर्ग में एक प्रारंभिक विषय मुझे पकड़ा दिया गया । उसे उपयुक्त शीर्षक के अभाव में मैंने प्रारंभ किया-‘ भारत की यशोगाथा संसार के इतिहास ने गाई है।‘ इस पुस्तक की भूमि बाबाजी ने बनाई तो बीज उस बौद्धिक में निहित था।

आपात स्थिति की काली रात्रि समाप्त हुयी। पर जिस तरह के भाषण, घटनाऍं एवं दंगे देश-विभाजन के पहले थे, अब उन्हें पुन: उभरते देखता हूँ। यह अत्यंत क्लेशदायी है और जब राजनेता क्षुद्र स्वार्थो के लिए देश, धर्म एवं संस्कृति की बलि चढ़ाने को तैयार होते हैं, जनता को धोखा देते हैं तो मन और भी विषाद से भर जाता है। वे चार अध्याय लिखे रह गये। लेकिन अब एक बार पुन: मन में उसे पूरा करने का विचार उठा। साथ ही इतिहास का सही मूल्‍यांकन, जो मैंने सन १९३२ से लेकर १९५० के उतार-चढ़ाव और भारत के विभाजन की विभीषिका में देखा है, तथा भारतीय जनमानस पर उसका जो प्रभाव पड़ा उसे लिपिबद्ध करने की इच्छा हुई। पर स्वतंत्रता के सघर्ष में जो अर्थ हम अनेक शब्दों के समझते थे और जो आकांक्षाऍं थीं, वे आज तोड़-मरोड़कर बदली जा रही हैं। पुरानी पुस्तकों में जो लिखा था, कहीं-कहीं राजनीति से प्रेरित होकर उनके पाठ बदल दिए गए हैं। मेरे विद्यार्थी जीवन में, जिन पुस्तकों ने देश को दिशा दी,वे पुस्तकें आज लुप्त हो गई। उनका स्थान सप्रयोजन लिखी गई झूठी पुस्तकों ने ले लिया है। आज ‘धर्म’ को ‘मजहब’ के अर्थ में प्रयोग करते हैं और एक ‘छद्म पंथनिरपेक्षता’ का बोलबाला है। मजहब (पंथ) एवं संस्‍कृति जैसी भिन्न कल्पनाओं को जानबूझकर भ्रमित कर एकाकार करने का प्रयास! शब्दों का सही अर्थ पहचानना आज की महती आवश्यकता है।

ऐतिहासिक दृष्टि से इस संस्कृति के प्रवाह को देखें। आज वास्तव में जो मानव संस्‍कृति है, जिसने सभी प्राचीन संस्कृतियों को कुछ-न-कुछ दिया, उसे कुछ पंथ एवं नेता तिरस्कृत करने में जुटे हैं। यह मानवता के समक्ष खतरे की घंटी है। वैज्ञानिक सोच वैचारिक स्वतंत्रता के अंदर ही पनप सकता है। ऐसी वैचारिक स्वतंत्रता की आधारशिला है- सहिष्णुता, सहअस्तित्व की भावना, छोटे-से छोटे वर्ग या क्षेत्र की स्वायत्ता और विचारों का समादर करते हुए तर्क पर आधारित जीवन। इसी में श्रेष्ठ कला, विज्ञान और दर्शन का तथा इनसे परिपूरित जीवन का सृजन होता है। पर जो धर्मांन्तरित करने वाले पंथ हैं उनका दुराग्रह आज मानवता के लिए विपदा उत्पन्न करता है। परंतु आश्चर्य कि उलटा चोर कोतवाल को डांटे वाली कहावत ही चरितार्थ होती दिखती है।

जो मानवता के पुजारी हैं, उनको इतिहास के परिप्रेक्ष्य में यह बात समझनी चाहिए। युगाब्द ५१०० की नई शती में प्रवेश कर रही दुनिया को सत्य का, मानव संस्कृति का प्रकाश चाहिए। यह मेरे बस की बात नहीं। केवल मन की अभिलाषा है कि ऐसे अनेक जीवन-निर्माण हों, जो राक्षसी वृत्तियों पर विजय प्राप्त कर मानव को सच्ची राह दिखा सकें।

इसमें आए उद्धरणों को छोड़कर बाकी विचार मेरे हैं। उन्हें किसी संस्था, दल, आंदोलन या कार्य पर आरोपित न किया जाय, यही निवेदन है। छोटे कलेवर में बात संघनित करने के कारण सरलीकरण हुआ होगा, बहुत सी बातें छूट भी गई होंगी। उनके लिए क्षमाप्रार्थी हूं। यह जनभावनाओं की, समाज के विचारों की कहानी है, इतिहास नहीं।

ऊपर छोटे बाबाजी एवं बेटी जया का स्मरण किया है। पर उन सबका, जिनकी पुस्तकों और लेखों से उद्धरण लिये, किन शब्दों में कृतज्ञता प्रकट करूँ ? उससे भी बढ़कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अधिकारियों एवं अनगिनत कार्यकर्ताओं का किस प्रकार आभार व्यक्त करूँ, जिनसे खेल में, बातों में, बौद्धिक संवाद में और दिन-प्रतिदिन के कार्य में मानवता की और विज्ञान की दृष्टि पाई। अपने मित्रों एवं आलोचकों को भी प्रत्यक्ष धन्यवाद देता हूँ। दीनदयाल शोध संस्थान के अध्यक्ष मा. लक्ष्मण श्रीकृष्ण भिड़े के प्रोत्साहन और पथ-प्रदर्शन के बिना यह पुस्तक अपूर्ण रहती। प्रयाग उच्‍च न्‍यायालय के विस्तृत गलियारे का और वहां प्रतिदिन कंधे से कंधा मिलाकर मित्रों के परस्पर मिलन, जहां से विधि की अंतर्दृष्टि प्राप्त हुई, का योगदान भी सहर्ष स्वीकार करता हूँ। अपने कार्यालय के कर्मचारियों, विशेषकर काटा-कूटी से भरी पांडुलिपि का संगणक पर टंकन करने के लिए संगमलाल का भी आभारी हूँ।

भगवान करें, हमारे नवयुवकों में वह दृष्टि जागे, जो देश की संजीवनी है।

वीरेंद्रकुमार सिंह चौधरी
३७, ताशकंत मार्ग,
प्रयाग-२११००१

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