Saturday, August 30, 2008

बौद्ध धर्म का विकास

परिनिर्वाण के बाद शीघ्र ही राजगृह में बौद्घ 'संगीति' (शाब्दिक अर्थ जहां संगायन अर्थात् उपदेश गाए तथा बुद्घ-वचन दोहराए जाएं) बुलाई गई। इस संगीति में 'विनय' (बौद्घ विहार का अनुशासन) और 'सूत्र' में विचार संग्रह किए गए। द्वितीय संगीति सौ वर्ष बाद खान-पान के आपसी विवाद को सुलझाने के लिए बुलाई गई थी। पर इसमें अनेक मत-मतांतर हो गए। इन्हें सुलझाने के लिए सम्राट् अशोक के समय तीसरी संगीति पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना) में हुई। इसमें 'त्रिपिटक' (तीन पिटारी) (बुद्घ के उपदेशों के तीन संग्रह) अर्थात् नियमों का संग्रह लिखा गया। इसी में मोग्गलिपुत्त तिस्स ने 'अभिधर्म' (श्रेष्ठ धर्म) और 'कथावस्तु' (विवाद के बिंदु) पुस्तकें लिखीं, जिन्होंने 'स्थविरवाद' (थेरवाद) की स्थापना की। उसमें जिनका शील अथवा दृष्टि संशय में थी, उन भिक्षुओं का निष्कासन हुआ। अशोक ने बौद्घ मत के प्रचार के लिए अनेक विहार एवं स्तूप बनवाए। उसके बाद मोग्गलिपुत्त के नेतृत्व में एशिया के सभी देशों में प्रचारक भिजवाए। पश्चिम में यवन देश और कंधार से लेकर उत्तर, दक्षिण तथा पूर्व के सभी देशों तक। बहुत से इतिहासकार अशोक द्वारा प्रचारित मत को उस समय भारत में प्रचलित सभी मतों का सार मानते हैं। इसके बाद प्रथम शताब्दी में कनिष्क के शासन काल में चतुर्थ संगीति हुई। कश्मीर के कुंडलवन विहार में अथवा जालंधर में, जिसमें अधिकांश अर्हत् एवं बोधिसत्व पश्चिम के विहारों से आए। तृतीय संगीति ने स्थविरवाद को प्रतिष्ठित किया जो बुद्घ-वचन पर आधारित आदि मत कहा जाता है तो चतुर्थ संगीति ने सर्वास्तिवाद (सर्व अस्ति) को, जो अधिक व्यापक कल्पना है।
बौद्घ दर्शन में चित्त (मन) का सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक विश्लेषण है, जिससे सब भौतिक, मराभौतिक भाव एवं अवस्थाएं जानी जाती हैं। पहले भी इनमें कुछ भारतीय दार्शनिकों तथा सांख्य योगियों को ज्ञात थीं। उसी को एक आधुनिक, वैज्ञानिक और तर्कपूर्ण ढंग से रखकर आगे बढ़ाया। गृहस्थ और श्रमण—दोनों प्रकार के शिष्य बने। साधारण शिष्यों के लिए पांच शील का विधान था, पर नए भिक्षु के लिए दस शील और उत्तरोत्तर उससे अधिक का विधान। 'बुद्घं शरणं गच्छामि, धर्मं शरणं गच्छामि, संघं शरणं गच्छामि' प्रवेश का मंत्र बना।


उनकी विशेषता जीवनोद्देश्य प्राप्त करने के लिए एक तर्कशुद्घ ढांचा खड़ा करने में है। इसके लिए प्राचीन भारतीय दर्शन में व्यवहृत शब्दों का प्रयोग किया। पंद्रह हजार ग्रंथों में संगृहीत विचारों में (जो अनेक देशों और भाषाओं में हैं) उन्होंने किसी नए मत के प्रचार की बात कभी नहीं कही। सदा चिरकाल से आए 'धम्म' (धर्म) का वर्णन किया। बारंबार कहा, 'एष पोराण पन्था:।' (पाली : यह पुरातन पंथ है) तरह-तरह के उदाहरण देकर तर्कसम्मत आधार पर दर्शन को कसा। वे समन्वयवादी थे, पुरातन विचारों को नए समयानुकूल ढंग से रखकर सबको क्रोध एवं हिंसा की प्रवृत्ति पर विजय प्राप्त कर, त्याग और शांति का मार्ग सुझाया। इसी से करूणावतार कहाए। अपनी साधना के बल पर आध्यात्मिक ज्ञान के चरमोत्कर्ष पर जो अधिष्ठित हुए और जिन्होंने मानव के महाकल्याण का शंख फूंका, उस महाविभूति को श्रद्घा से भारत ने विष्णु का अवतार कहा।


उनका चिंतन भारतीय दर्शन की अजस्त्र प्रवाहित धारा का अभिन्न अंग है। भारतीय वाङ्मय में ज्ञान की अनेक धाराओं की वर्णन आया है--'वैदिका:, मीमांसका:, नैयायिका:, बौद्घा:, शैवा:, शाक्या:।' बौद्घ धारा भी भारतीय दर्शन  की शैली है। अनेक बाद पाश्चात्य मानसिकता लिये और दर्शन से अछूते कुछ व्यक्ति इस 'बौद्घ' धारा को एक अलग पंथ या वैदिक धारा के प्रति विद्रोह ( अथवा ब्राम्हणों के विरूद्घ क्षत्रिय विद्रोह) के रूप में चित्रित करते हैं। ये संपूर्ण बौद्घ ग्रंथों को धोखा देकर भारतीय संस्कृति को झुठलाते हैं। एक दिन हम लेह से दक्षिण-पूर्व सिंधु नदी पार कर वहां के प्रसिद्घ गुफा में पहुंचे तो त्रिविष्टप (तिब्बत) के पास इस बौद्घ मंदिर में बुद्घ भगवान की बृहत् मूर्ति के चारों ओर हिंदू देवी-देवताओं की, विष्णु के पूर्व अवतारों की प्रतिमाएं तथा चित्र देखे। ऎसा प्राय: सभी बौद्घ मंदिर और अन्य हिंदू देवी-देवताओं के मंदिर एक-दूसरे से ग्रथित है।


कोरिया में बौद्ध मन्दिर - चित्र विकिपीडिया के सौजन्य से उसी की सर्तों पर

बुद्घ ने अपना उपदेश मागधी अथवा पाली में दिया। उसे सभी देशों में अपनी-अपनी भाषा में अनुवाद करने का भिक्षुओं को आदेश दिया। बौद्घ साहित्य संसार के साहित्य की अपूर्व निधि है। बुद्घ के बाद ही उनकी पूजा और संभवतया मूर्तिपूजा प्रारंभ हुई। बुद्घ की मुद्राओं में मूर्तियां संपूर्ण एशिया में मिलती हैं और बौद्घ विहारों के अवशेष भी। उत्तर में साइबेरिया (प्राचीन शिविर देश, जहां शंकु की तरह के शिविरनुमा घर हैं) से लेकर मंगोलिया, चीन, जापान और दक्षिण-पूर्व के देश, वियतनाम (प्राचीन चंपा), कंबोडिया (प्राचीन कंबोज), थाईलैंड (प्राचीन स्याम), मलयेशिया (प्राचीन मलय देश), सुमात्रा, जावा (प्राचीन यव द्वीप)--सभी जगह यह मत छा गया। कुछ इतिहासकार कहते हैं कि ईसा के जीवन के जो कुछ वर्ष अज्ञात हैं वे भारत में बीते, जहां से ईसा ने 'अहिंसा' अपनाई। पर येस्सलम में भी, जहां ईसा का जन्म हुआ, एक बौद्घ विहार का होना कहा जाता है, जहां से यह विचार ईसाई जगत में फैला।


इसके बाद संसार के सबसे बड़ भूखंड एशिया में भारतीय संस्कृति का पुन: आलोक फैला। भारतीय चिंतन का आधुनिक काल की देहली पर दस्तक देता स्वर्ण युग आया। बुद्घ के मानव मात्र के कल्याण के लिए इस संदेश को एशिया ने सिर माथे लगाया। कल्पना करें उदात्त सभ्यता के परम उत्कर्ष की, जिसने मानव की समता के आदर्श को रखा, विचार -स्वतंत्रता का बोध कराकर तर्क के आधार पर जीवन-दर्शन खड़ा किया, अहिंसा का अमर संदेश दिया, त्याग एवं शांति के आधार पर मान-कल्याण का मार्ग सुझाया। यह संसार के इतिहास में अभूतपूर्व है।

कालचक्र: सभ्यता की कहानी
०१- रूपक कथाऍं वेद एवं उपनिषद् के अर्थ समझाने के लिए लिखी गईं
०२- सृष्टि की दार्शनिक भूमिका
०३ वाराह अवतार
०४ जल-प्‍लावन की गाथा
०५ देवासुर संग्राम की भूमिका
०६ अमृत-मंथन कथा की सार्थकता
०७ कच्‍छप अवतार
०८ शिव पुराण - कथा
०९ हिरण्‍यकशिपु और प्रहलाद
१० वामन अवतार और बलि
११ राजा, क्षत्रिय, और पृथ्वी की कथा
१२ गंगावतरण - भारतीय पौराणिक इतिहास की सबसे महत्‍वपूर्ण कथा
१३ परशुराम अवतार
१४ त्रेता युग
१५ राम कथा
१६ कृष्ण लीला
१७ कृष्ण की सोलह हजार एक सौ रानियों
१८ महाभारत में, कृष्ण की धर्म शिक्षा
१९ कृष्ण की मृत्यु और कलियुग की प्रारम्भ
२० बौद्ध धर्म
२१ जैन धर्म
२२ सिद्धार्त से गौतम बुद्ध तक का सफर
२३ बौद्ध धर्म का विकास

Saturday, August 23, 2008

सिद्धार्त से गौतम बुद्ध तक का सफर

इन श्रमण परंपराओं और जैन मत की भूमिका में यह कहानी उभरती है, जिसने एशिया महाद्वीप की काया-पलट कर दी और अंततोगत्वा सारे संसार को प्रभावित किया। ईसाई पंथ भी जिसका चिर ऋणी है। ऎसी है मानव जीवन में उदात्त पराकाष्ठा की सिद्घार्थ गौतम (जो बाद में 'बुद्घ' बने) की कहानी।

सिद्घार्थ का जन्म भारतीय साक्ष्य के अनुसार विक्रम संवत् पूर्व १८३० में (न कि पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार विक्रम संवत् के ५०६ वर्ष पूर्व) (युगाब्द १२१५ में) शाक्य गणराज्य की राजधानी कपिलवस्तु के निकट लुंबिनी (आधुनिक रूम्मिदेई) वन में गौतम गोत्र के क्षत्रिय राजा शुद्घोदन के यहां बैसाखी पूर्णिमा को हुआ था। यह स्थान भारत की सीमा से आठ किलोमीटर दूर नेपाल में है। वहां सम्राट् अशोक का स्तंभ-लेख है, 'यहां बुद्घ का जन्म हुआ था।' माता मायादेवी का उस सप्ताह में ही निधन हो गया। तब उनका लालन-पालन उनकी मौसी महाप्रजापति गौतमी ने किया। कहते हैं कि महापुरूषों के बत्तीस लक्षणों को देखकर उनके बुद्घ (पूर्ण विकसित ज्ञानी) बनने की भविष्यवाणी असित और देवल ऋषियों ने की। बुद्घपुराण (पराशर रचित 'ललित-लघुविस्तर') में उनके बचपन के चमत्कारों का वर्णन है। कैसे उन्होंने ६४ लिपियों का और परमाणु गणना का विवरण देकर अपने आचार्यों को चकित कर दिया। अस्त्र-शस्त्रों की क्षत्रियोचित विद्या एवं शिल्प तथा कलाओं में पारंगत होने के बाद उनका विवाह यशोधरा से हो गया।

उनके संन्यासी बनने की भविष्यवाणी के कारण उनके पिता ने उनके ग्रीष्म, हेमंत एवं वर्षा ऋतु के लिए अलग-अलग प्रासाद बनवाए। उनका लालन-पालन एक मनोरम सुखोपभोग के वातावरण में हुआ, जहां दु:ख, व्याधि, जरा, मरण की हवा भी न लगे। कहते हैं कि उद्यान-यात्रा में उन्होंने इन सबको देखा और बाद में शांतचित्त आनंदमय संन्यासी को देखा। ये दु:ख उनके मन को मथने लगे। उनके लौटते समय कुश गौतमी ने उनकी प्रशंसा में गीत कहा। उसमें उनके लिए 'निवृत्त' शब्द का प्रयोग हुआ था। सिद्घार्थ ने निवृत्ति (मोक्ष ) को ही इस संसार के दु:खों से पीछा छुड़ाने का साधन समझा।

वापस आने पर पुत्र-जन्म का सुखद समाचार मिला। पर उनको लगा कि मोह का एक नया बंधन आया तब रात्रि को सिद्घार्थ पत्नी, पुत्र, कुटुम्ब और घर-द्वार छोड़कर, रथ पर सवार हो सारथि के साथ निकल गए। रातोंरात शाक्य, कोलिय एवं मल्ल गणराज्य की सीमा पार कर अनोमा नदी के तट पर पहुंचे। वहां उन्होंने संन्यासी का वेश धारण किया। सारथि को रथ-घोड़े सहित लौटा दिया और तर्क से इस संसार की गुत्थी को सुलझाने चल पड़े; अर्थात् बोधिसत्व बने। पहले वह अनेक ऋषियों से मिले। अश्वघोष ने 'बुद्घचरित्र' में उनका वर्णन किया है। दो सांख्य योगियों --आलाम कालार तथा उद्दक रामपुत्त को उन्होंने अपना गुरू माना। परंतु उपदेशों, दर्शन एवं यौगिक क्रियाओं से वह पूर्ण संतुष्ट नहीं हुए। उन्हें लगा कि जब तक भोगों की इच्छा रहेगी, ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता। इसलिए उन्होंने उरूवेला में सेनानिग्राम के निकट नैरंजना नदी के किनारे घोर तपस्या प्रारंभ की। शरीर सूखकर कांटा हो गया और उसने जवाब दे दिया। एक दिन मूर्च्छा आ गई। तब उनको अनुभूति हुई कि इससे ज्ञान प्राप्त नहीं होगा। तत्पश्चात उन्होंने अपना जीवन बदला। उचित मात्रा में भोजन लेना प्रारंभ किया। उनके पांच शिष्यों ने उन्हें मार्ग से स्खलित समझकर छोड़ दिया। वह पुन: ह्रष्ट-पुष्ट हो गए।

उन्हें बचपन की ध्यानावस्था स्मरण आने लगी। एक दिन प्रभात में सेनानिग्राम के जमींदार की पुत्री सुजाता ने उन्हें चावल की खीर दी। सारा दिन उन्होंने साल वृक्षों के कुंज में व्यतीत किया और सायंकाल पास में अश्वत्थ वृक्ष (बोधिवृक्ष) के नीचे पालथी मारकर बैठ गए, इस संकल्प से कि चरम ज्ञान प्राप्त करके ही उठेंगे। तब 'मार' (ललचाने और बहकाने वाली शक्तियां : शैतान) से द्वंद्व प्रारंभ हुआ। दुर्वासनाओं के स्वामी 'मार' ने अपने बीभत्स और पैशाचिक झुंड के साथ आकर उन्हें पथ से भटकाने की कोशिश की। पर गौतम वैसे ही अडिग रहे। अपने पारमिता (सद्गुण; बौद्घ मत में वे दस कहे जाते हैं-- उदारता, सदाचार, त्याग, प्रज्ञा, ध्यान, उद्यमशीलता, धैर्य, सत्यता, संकल्प, सभी से प्रेम, मित्रता एवं शांति), जो पूर्वजन्म में बोधिसत्व (बुद्घ बनने के प्रयत्न) के रूप में अर्जित किए थे, के कारण वह अपने पथ से नहीं डिगे। उन्होंने मार से कहा, 'तुम्हारी प्रथम सेना काम-वासनाएं हैं, दूसरी उदात्त जीवन के प्रति अश्रद्घा, तीसरी भूख और प्यास, चौथी लालसाएं, पांचवीं जड़ता और आलस्य, छठी भय और कायरता, सातवीं संशय, आठवीं पाखंड और अपश्चाताप, नौवीं प्रशंसा, झूठा लाभ, मान या महिमा बखानना और दसवीं अहम्मन्यता व दूसरों से घृणा। कोई दुर्बल व्यक्ति इन्हें जीत नहीं सकता। तुम्हें चुनौती है। मेरे जीवन को धिक्कार है, यदि मैं हार जाॐ। हारने से मरना अच्छा।' अच्छाई और बुराई के इस अंतर्द्वंद्व में सिद्घार्थ ने विजय पाई।

और तब रात्रि के प्रथम प्रहर में उन्हें अपने सभी पूर्वजन्मों की घटनाएं याद हो आईं। ये 'जातक' में संगृहीत हैं, जो विश्व कथा साहित्य का आदि स्त्रोत है। (आयुर्वेद में वर्णन है कि कैसे नवयौवन में मनुष्य चिंतन करके बचपन और फिर पूर्वजन्म के भी स्मरण की शक्ति प्राप्त कर सकता है।) मध्य प्रहर में उन्हें 'दिव्य चक्षु' प्राप्त हुए, जिससे लोगों का पुनर्जन्म में संचरण देख सकते थे। और रात्रि के तीसरे प्रहर उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ, सारे विकार एवं दूषण छंट गए और 'चार महान् सत्य' उद्भासित हुए। इस प्रकार पैंतिस वर्ष की आयु में गौतक चेतन सत्ता का चरम ज्ञान प्राप्त कर बैसाखी पूर्णिमा को 'बुद्घ' बने। उन्होंने कुछ सप्ताह उरूवेला में बिताए। इस परम चेतना के साक्षात्कार से जब जन्म-मृत्यु के आवागमन से परे का बोध हुआ तो मोक्ष के लिए व्यग्र बुद्घ को मानो इंद्र एवं ब्रम्हा का संदेश मिला,
'कठिन साधना द्वारा अर्जित ज्ञान को मानव-कल्याण के लिए प्रचारित करो।'
एक दिन उस वृक्ष के नीचे बैठे उन्हें प्रेरणा मिली,
'मैंने उस सत्य को देखा, जो अत्यंत गूढ़ है, जिसे देखना और समझना कठिन है और जो प्रज्ञा ही समझ सकते हैं।'
पर सोचा,
'कमल के फूल कीचड़ में फूलकर भी निर्लिप्त रहते हैं, वैसे ही इस दुनिया में भी कुछ लोग होंगें जो सत्य को देख सकेंगे। लोग विकास की विभिन्न अवस्थाओं में रहते हैं।'
उनके दोनों गुरूओं का निधन हो चुका था। तब पांच संन्यासियों को, जो उन्हें छोड़कर चले गए थे, सारनाथ (वाराणसी) जाकर प्रथम उपदेश दिया। यह 'धर्मचक्र-प्रवर्तन सूत्र' के नाम से प्रसिद्घ है।

उन्होंने दोनों छोरों को त्याग बीच का मध्यम मार्ग सुझाया, जो अतिवादी नहीं है; न घोर असंयम का प्रवृत्तिमार्ग और न पूर्ण आत्मदमन का निवृत्तिमार्ग। 'चार आर्य (महान्) सत्य', जो उन्हें उद्भासित हुए, अपने उपदेश में इस प्रकार कहे, 'मूल रूप से इस अनित्य संसार में आवागमन एक दु:खमय चक्र है। यह दु:ख मन के भोग-विलास की, सत्ता की और जीवित रहने की लालसा के कारण उत्पन्न होता है। इन इच्छाओं को मर्यादित करने से दु:ख- निरोध हो सकता है। इसके लिए एक उदात्त आठ सूत्री कार्यक्रम है। जीवन का अंतिम लक्ष्य निर्वाण, अर्थात् इस सांसारिक आवागमन से मुक्ति है।'

अपने जीवन का जो कार्य बुद्घ ने जो कार्य बुद्घ ने निर्धारित किया, उसके लिए उन्होंने सारे उत्तरी भारत को मथ डाला। केवल वर्षा काल के चातुर्मास (जैसी परंपरा थी) एक स्थान पर व्यतीत किए। जहां वह रहे, उन स्थानों की सूची और उस समय के उनके उपदेश बौद्घ परंपरा में सुरक्षित हैं। प्रति स्थान पर प्रभावशाली और संपन्न व्यक्ति जुड़े, उनके शिष्य बने। उन्होंने बौद्घ बिहारों के लिए स्थार दिया। मगधराज बिंबिसार को राजगृह में उपदेश दिया, जिनसे वेणुवन नामक उद्यान बौद्घ संघ को प्राप्त हुआ और एक प्रमुख केन्द्र बना। प्रारंभ में जितने भी अर्हत् (परम ज्ञानी) शिष्य हुए, बुद्घ ने उन्हें सभी दिशाओं में प्रचारार्थ भेजा। गणराज्यों की परंपरा पर आधारित बौद्घ संघ का गठन किया। वहां पखवारे में निराहार व्रत के लिए सभी भिक्षु- भिक्षुणी अपने विहार में इकट्ठा होकर सभी नियमों का पाठ करते। उसके आठ विभागों में से प्रति विभाग के बाद सबसे पूछा जाता,
"क्या आप सभी इन दोषों से शुद्घ हैं?”
भिक्षु द्वारा व्यतिक्रम होने पर प्रायश्चित्त अथवा दंड की व्यवस्था होती।

बुद्घ की दिनचर्या उनके मौन, एकांत-प्रेमी और मननशील मन के अनुरूप थी। प्रात: नित्यकर्म के बाद एकांत आसन और ध्यान। भिक्षा के समय कभी अकेले और कभी भिक्षुओं के साथ और निमंत्रण पर घर जाकर भोजन तथा उपदेश । लौटने पर भिक्षुओं को उपदेश के बाद स्वल्प विश्राम, फिर दर्शनार्थियों को उपदेश। सायं स्नान-ध्यान के बाद भिक्षुओं की समस्याएं हल करते। कहते हैं कि वह रात्रि को देवताओं के प्रश्नों के उत्तर देते और दिव्य चक्षुओं से संसार का अवलोकन कर विश्राम करते। दया की प्रतिमूर्ति, जिसकी कहानियां 'जातक' में संग्रहीत हैं। विहार में रहते हुए प्रतिदिन रूग्ण भिक्षुओं को देखते। उपेक्षित रोगी की सेवा करते। उन्होंने कहा,
'इनकी सेवा मेरी सेवा है।'
उनका तथा संघाराम का अनुशासन राजाओं के आश्चर्य की वस्तु थी। पर यह बुद्घ के असीम स्नेह और उनके प्रति समादर एवं प्रतिष्ठा तथा सबकी निष्ठा का फल था। वह महान् व्यक्तित्व के धनी थे, जिन्होंने दुर्दांत दस्यु 'अंगुलिमाल' और बच्चों को खाने वाली राक्षसी को भी वश में किया।

उनका वैचारिक स्वतंत्रता का समर्थन उन्हें आधुनिक युग के समकक्ष खड़ा कर देता है। इसी से भागवत पुराण में कहा गया कि वह अपने तर्कों द्वारा लोगों को मोहित कर लेंगे। उन्होंने अपनी पालनकर्त्री मौसी महाप्रजापति गौतमी और आनंद के कहने पर स्त्रियों को भी संघ में स्थान दिया और भिक्षुणी संघ बना। सभी वर्णों (जातियों) और वर्गों के लोगों को उन्होंने अपना शिष्य बनाया। विद्या प्राप्त तथा आचरण-शुद्घ व्यक्ति ही उनके समक्ष ब्राम्हण कहलाने का अधिकारी था। उन्होंने समाज में जाति-पांत के परे समता की प्रतिष्ठा की। कहा, 'अपराध का दमन केवल दंड देने से नहीं होता। दरिद्रता अनैतिकता और अपराध को जन्म देती है। आर्थिक दशा तथा मन का सुधार अपराध का स्थायी उपाय है।' उनके लिए आंतरिक ज्ञान तथा परसेवा ही परमार्थ बना।

निर्वाण के पहले चातुर्मास में वे बीमार पड़े। आनंद की शंका पर उन्होंने कहा,
'मैंने धर्म का उपदेश दिया। अब अस्सी वर्ष की आयु में मेरी इच्छा आगे संघ का नेतृत्व करने की नहीं।'
अंत में पावा ग्राम में वे रक्तातिसार से ग्रसित हुए। बीमारी में ही वे कुशीनगर के लिए चल पड़े और उसके पास शालवन में लेट गए। वहीं अंतिम उपदेश दिया। भिक्षुओं से कहा,
'मैंने जो शिक्षा दी तथा 'धर्म' (सिद्घांत) बताया, आगे वही तुम्हारा शासक होगा।'
गणतंत्र पद्घति के अनुसार उन्हें कार्य करने को कहा। छोटे-मोटे परिवर्तन करने की छूट संघ को दी और कुछ दशा में ब्रम्हदंड का भी विधान किया। उन्होंने तीन बार पूछा,
'कोई शंका है क्या, जिसका निराकरण मुझसे चाहते हो?'
सबके चुप रहने पर उन्होंने कहा,
'सब अनित्य है। धर्म (उद्देश्य) को अध्यवसायपूर्वक प्राप्त करो।'

अंग्रेजी में, गौतम बुद्ध की जीवनी यहां सुने।
यह दोनो चित्र विकिपीडिया से और उसी के शर्तों में प्रकाशित हैं।

कालचक्र: सभ्यता की कहानी
०१- रूपक कथाऍं वेद एवं उपनिषद् के अर्थ समझाने के लिए लिखी गईं
०२- सृष्टि की दार्शनिक भूमिका
०३ वाराह अवतार
०४ जल-प्‍लावन की गाथा
०५ देवासुर संग्राम की भूमिका
०६ अमृत-मंथन कथा की सार्थकता
०७ कच्‍छप अवतार
०८ शिव पुराण - कथा
०९ हिरण्‍यकशिपु और प्रहलाद
१० वामन अवतार और बलि
११ राजा, क्षत्रिय, और पृथ्वी की कथा
१२ गंगावतरण - भारतीय पौराणिक इतिहास की सबसे महत्‍वपूर्ण कथा
१३ परशुराम अवतार
१४ त्रेता युग
१५ राम कथा
१६ कृष्ण लीला
१७ कृष्ण की सोलह हजार एक सौ रानियों
२० बौद्ध धर्म
२१ जैन धर्म
२२ सिद्धार्त से गौतम बुद्ध तक का सफर
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Friday, August 15, 2008

जैन धर्म

जैन परंपरा के अनुसार उनके प्रथम तीर्थंकर (प्रवर्तक अथवा शास्त्रकार) ऋषभदेव थे, जिनका उल्लेख भागवत पुराण में (एकादश स्कंध के चतुर्थ अध्याय में) विष्णु के एक अवतार के रूप में आता है। उन्होंने आत्म-साक्षात्कार के साधनों का उपदेश दिया। महाभारत युद्घ के समय जैन मत के बाईसवें तीर्थंकर नेमिनाथ कृष्ण के चचेरे भाई थे। नाथ संप्रदाय के लोग नेमिनाथ को अपना आदि आचार्य मानते हैं। और अंत में चौबीसवें तीर्थंकर महावीर गौतम बुद्घ के समकालीन कहे जाते हैं।

ऋषभदेव, पहले तीर्थंकर

शांति के बहुत बड़े कालखंड में भी महाभारत युद्घ की त्रासदी भूली नहीं होगी। वह वेदव्यास की वाणी में गूंजती रही और सैनिक वृत्ति थी ही। भारत में चारों ओर फैले छोटे गणराज्य (republics) थे, जिनमें खेल-कूद, सैनिक शिक्षण, शौर्य का प्रदर्शन वस्तुत: अनिवार्य था। यही सब और शास्त्रों का ज्ञान प्रमुख (राजा) के चयन का आधार था। तब इसे संयोग कैसे कहें कि जैन मत के सभी चौबीस तीर्थंकरों का जन्म क्षत्रिय परिवार अर्थात् सैनिक परंपरा में हुआ; किंतु 'अहिंसा' जैनियों का मूल मंत्र बना। यह कैसे हुआ कि सिद्घार्थ गौतम (जो बुद्घ बने) का जन्म भी सैन्य वृत्ति करने वाले क्षत्रिय कुल में हुआ और उन्होंने भी 'अहिंसा' अपनाई। यह किसी युद्घ की विभीषिका की प्रतिक्रिया न थी। यह तो थी नचिकेता सरीखी जिज्ञासा, जिसने वेद वाक्य को भी चुनौती दी और था समाज तथा जीवन -मृत्यु के रहस्य उद्भासित करने की तीव्र आकांक्षाजनित का फल। इससे भारत में सभ्यता एवं संस्कृति के उत्कर्ष की कल्पना की जा सकती है, जैसा संसार में अन्य कहीं, कभी नहीं हुआ।

प्रजापतियों के यज्ञ में दक्ष द्वारा शिव को शाप देने पर पुरोहित हंसे थे, तब नंदी का पुरोहितों को बदले में दिया गया शाप सच हो आया। पुरोहितों में सांसारिक वस्तुओं के भोग की प्रवृत्ति जगी। वे कर्मकांडी रह गए; जीव हत्या करते और यज्ञ में बलि चढ़ाते। सिद्घान्त से जन्म-मरण और पुनर्जन्म का चक्र प्राणियों को मानव के साथ जोड़ता है। (जातक कथाएं बुद्घ की पशु-पक्षी के रूप में पूर्वजन्म की गाथाएं हैं।) इसलिए जनमानस में पशुबलि पर आपत्ति स्वाभाविक थी। महावीर ने कहा, 'जीव, वनस्पति और जड़ वस्तुओं के प्रति भी हिंसा नहीं करनी चाहिए। वेद के नाम पर दी जाने वाली बलि निरर्थक है।' स्पष्ट ही यह अहिंसा बलवान की थी। उनकी, जिन्होंने इच्छाशक्ति से इंद्रियों पर विजयी हो संयम सीखा तथा भोग्य वस्तुओं को त्याग निवृत्ति मार्गी बने।

वर्द्घमान (जो महावीर कहलाए) का जन्म वैशाली (आधुनिक बसढ़, बिहार) के पास कौंडिन्यपुर (क्षत्रियकुंडपुर ग्राम) के प्रमुख के घर, वैशाली के लिच्छवि गणराज्य के राजा की पुत्री त्रिशला देवी की कोख से हुआ था। क्षत्रियों के योग्य शिक्षा ग्रहण करने के बाद उनके चिंतनशील मन को जगत् असार लगने लगा। विवाह एवं पुत्री के जन्म के बाद अट्ठाईस या तीस वर्ष की अवस्था में घर-द्वार छोड़ संन्यासी बने। तब बारह वर्ष तक घोर तपस्या एवं साधना की। अनेक वर्ष वस्त्र त्यागकर नग्न बिताए। अज्ञानियों के हाथों तिरस्कार एवं कष्ट झेले; पर मन में विषाद, क्रोध आदि न आने दिया। किसी जीव और जड़ को उनके द्वार पीड़ा न पहुंचे, इसका सतत प्रयत्न किया। जीवन में उन सिद्घांतों को उतारा जो जैन मत का मूल चिंतन था। तब उन्हें कैवल्य - अर्थात् संशय तथा भ्रमरहित ज्ञान - प्राप्त हुआ। वह महावीर बने।

महावीर अन्तिम तीर्थंकर

'जिन' का अर्थ विजेता है- अर्थात् जिसनसे मोह, राग-द्वेष आदि आत्मा के शत्रुओं पर विजय प्राप्त की हो। ऎसे जो तीर्थंकर 'जिन' हुए उनके अनुयायी 'जैन' कहलाए। वर्द्घमान का परिवार तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ, जो उनके लगभग २५० वर्ष पहले हुए, का अनुयायी था। उन्हीं के अनुगामी बने। अपने निर्ग्रन्थ (गांठरहित अर्थात् बंधनों से मुक्त) मत के प्रचार के लिए महावीर ने बिहार तथा उत्तर प्रदेश में कई स्थानों पर विहार (भिक्षुओं के मठ) स्थापित किए।

उन्होंने जैन समुदाय को संगठित किया। मत में दीक्षित करने के लिए सरल पद्घति अपनाई और उसमें सम्मिलित होने के आकांक्षी स्त्री-पुरूष-सभी को लिया, चाहे वे जिस वर्ण के हों। वर्ण-भेद को कर्मणा माना। पार्श्वनाथ ने प्रत्येक जैन को चार व्रत अपनाने को कहा-अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना; पर निरी आवश्यकता से अधिक रखना भी चोरी मानी) और अपरिग्रह (शरीर के लिए जितना आवश्यकता हो उससे अधिक न लेना) । पर महावीर ने अंतिम व्रत अपरिग्रह को दो भागों में विभाजित कर दिया--ब्रम्हचर्य और अपरिग्रह। उनका पंचाणुव्रत संप्रदाय कहलाया।

अहिंसा- अर्थात् जीव, वनस्पति और जड़ वस्तुओं, सभी के प्रति कर्म, वचन और मन से अहिंसा का भाव रखना। यह जैनियों का मूल मंत्र है। महावीर ने कहा, 'सजीव-अजीव किसी को पीड़ा पहुंचाने के अतिरिक्त काम-भोगों में आसक्ति भी हिंसा है, इसलिए सच्ची अहिंसा क्रोध, राग-द्वेष आदि विकारों पर विजय, इंद्रिय-दमन और समस्त कुवृत्तियों को त्यागने में है।'

द्वितीय, कर्म का सिद्घान्त,जिसे सर्वोपरि माना। मनुष्य अपने भाग्य का विधाता है, क्योंकि अच्छे-बुरे कर्मों का फल अवश्य मिलता है। सत्कर्मों द्वारा मनुष्य अपने विकास के चरमोत्कर्ष को पहुंच सकता है और यही ईश्वर है। इस प्रकार सब भेदभावों को मिटा, मानव के लिए निर्ग्रंथ राग-द्वेषरहित होने को मोक्ष (सृष्टि के प्रपंच से मुक्ति) का मार्ग बताया।

जैन दर्शन का तीसरा आधार 'अनेकांतवाद' है। इसे अहिंसा का व्यापक रूप कह सकते हैं। यह वैचारिक सह-अस्तित्व की घोषणा है। एक ही बात किसी दृष्टिकोण से है, पर दूसरे दृष्टिकोण से नहीं है- इसे 'स्याद्वाद' कहते हैं। यह 'ही' ठीक है, इस आग्रह से विवाद खड़े होते हैं। यह 'भी' ठीक है, इससे विवाद समाप्त होते हैं। यह सच्चा, किसी को पीड़ा न पहुंचाने का मार्ग है।

स्पष्ट रीति से जैन मत में साम्य (समता) भाव प्रतिष्ठित हुआ। अपने चरित्र तथा व्यवहार द्वारा जीवन में जो असमानता है उसे दूर करना जैन मत का 'संवर' (मनोनिग्रह) है। भारतीय दर्शन का वह पक्ष लेकर जिसकी उस समय आवश्यकता थी, यह मत बढ़ा। यह दृष्टिकोण वही है जो उपनिषदों के 'ब्रम्हन' की कल्पना है, या उससे जनित होती है। ऎसा आचरण, व्यवहार एवं दार्शनिक विचार जो समता की वृत्ति उत्पन्न करे उसे ही जैन मत में 'ब्रम्हचर्य' कहा गया। 'श्रमण', जिसमें समानता मूर्तिमंत हुई हो, ही (वैदिक) 'ब्राम्हण' है। इसी से जैन मत का मोक्षमार्ग रत्न-त्रय पर आधारित है--सम्यक् दर्शन (सही श्रद्घा), सम्यक् ज्ञान तथा सम्यक् चरित्र (सही आचार)। ये भागवत के भक्तिमार्ग, वेदांतिन के ज्ञानमार्ग और मीमांसाकों के कर्ममार्ग का स्थान ले लेते हैं। भक्ति, ज्ञान तथा कर्म को अकेले महत्व न देते हुए जैन मत का आग्रह है इन तीनों का एक साथ व्यक्ति के अंदर उदय, जिससे सांसारिक प्रपंच से मुक्ति प्राप्त हो। इसकी तुलना दवा की आरोग्य करने की प्रक्रिया से दी जाती है; दवा पर विश्वास चाहिए तथा उसके उपयोग करने की विधि का ज्ञान और उसे लेने का कर्म भी चाहिए।

एक बार वैदिक षडदर्शन पर दृष्टि डालने से दिखता है कि प्राचीन भारतीय चिंतन से युगानुकूल मानव-मूल्यों के अनुरूप तत्व को जैन दर्शन ने किस प्रकार आगे बढ़ाया। यही इसकी व बौद्घ चिंतन की अलौकिकता है। महावीर ने गणतंत्र पद्घति, जो इस कालखंड में भारतीय सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन का सर्वत्र आधार थी, अपनाकर जैन चैत्य-विहारों (जैन मठों) का गठन किया। सर्वसाधारण जैन मतावलंबियों और जैन मुनियों के लिए अलग-अलग व्यवहार नियम निर्धारित किए तथा जैन मत को एक सुदृढ़ नींव पर खड़ा किया।

महावीर की देशना (उपदेश) से जैन मत बड़ा व्यापक बना। उसे समय-समय पर राजाश्रय भी प्राप्त हुआ। मगध के राजा बिंबिसार ने जैन मत स्वीकार किया। चंद्रगुप्त मौर्य के काल में मगध में भयंकर अकाल पड़ा। उसके बाद पाटलिपुत्र में जैन आगमों (मान्य पाठ) की प्रथम बांचना हुई। कहा जाता है कि चंद्रगुप्त ने जैन दीक्षा ली और दक्षिण के जैन तीर्थ श्रवणबेलगोला (जहां अब संसार की सबसे बड़ी जैन मुनि बाहुबली की प्रतिमा स्थापित हुई में देह-त्याग किया। सम्राट् अशोक के पौत्र संप्रति ने भी जैन दीक्षा ली।
कलिंग (उत्कल) के राजा खारवेले ने जैन मत अपनाया। राज्य में ऋषभदेव की प्रतिमा तथा जैन साधुओं के लिए गुफा खुदवाई। मथुरा, गिरिनार (मुजरात), पैठन (महाराष्ट्र), आबू (राजस्थान) जैनियों के केंद्र बने, जहां अत्यंत सुंदर मंदिर और भवन निर्मित हुए।

जैनियों ने उस समय की अपभ्रंश भाषाओं में अर्द्घ-मागधी (प्राकृत का वह रूप, जो पटना से मथुरा तक प्रचलित था) एवं शौरसेनी ( मथुरा के आसपास की भाषा) में अपने उपदेश दिए। इनमें जैन साहित्य का सृजन हुआ। इससे भारत की अपभ्रंश भाषाओं के साहित्यिक विकास में अभूतपूर्व योगदान मिला। जैनियों द्वारा भारत की स्थापत्य कला के विकास के उदाहरण आज सारे देश में फैले हैं। भारत की अधिकांश आधुनिक भाषाएं उस समय की देन हैं और आज जैन मत संबंधी बहुत सी जानकारी तमिल ग्रंथों में मिलती है।

यह दोनो चित्र विकिपीडिया से और उसी के शर्तों में प्रकाशित हैं

कालचक्र: सभ्यता की कहानी
०१- रूपक कथाऍं वेद एवं उपनिषद् के अर्थ समझाने के लिए लिखी गईं
०२- सृष्टि की दार्शनिक भूमिका
०३ वाराह अवतार
०४ जल-प्‍लावन की गाथा
०५ देवासुर संग्राम की भूमिका
०६ अमृत-मंथन कथा की सार्थकता
०७ कच्‍छप अवतार
०८ शिव पुराण - कथा
०९ हिरण्‍यकशिपु और प्रहलाद
१० वामन अवतार और बलि
११ राजा, क्षत्रिय, और पृथ्वी की कथा
१२ गंगावतरण - भारतीय पौराणिक इतिहास की सबसे महत्‍वपूर्ण कथा
१३ परशुराम अवतार
१४ त्रेता युग
१५ राम कथा
१६ कृष्ण लीला
१७ कृष्ण की सोलह हजार एक सौ रानियों
२० बौद्ध धर्म
२१ जैन धर्म

Wednesday, August 06, 2008

बौद्घ धर्म

वेदव्यास के पुत्र शुकदेव के मुख से विष्णु के अवतारों की गाथा परीक्षित ने सुनी थी। वह 'भागवत पुराण' में संगृही है। यह बुद्घ के जन्म से पहले कही गई। इसलिए इसमें केवल उल्लेख है,
'फिर आगे चलकर भगवान् ही बुद्घ के रूप में प्रकट होंगे और यज्ञ के अनधिकारियों को यज्ञ करते देख अनेक प्रकार तर्क-वितर्क से उन्हें मोहित कर लेंगे।'

महाभारत के जागतिक युद्घ के बाद संसार में शांतिपर्व आया, जिसमें सभ्यता के चरण अबाध आगे बढ़े। लगभग २५०० वर्ष बाद विक्रम संवत् पूर्व सातवीं तथा छठी शताब्दी को विश्व इतिहास में 'जागरण काल' कहा जाता है। भारत में यह गहन विचार-मंथन का युग था। इस समय महत्वपूर्ण आध्यात्मिक प्रवृत्तियों का जन्म हुआ। अनेक विद्वान् (ब्राम्हण) तथा श्रमण हुए, जिन्होंने आमूल चिंतनस कर विभिन्न मतों का प्रतिपादन किया। उनमें कई ने परिव्राजक अथवा यायावर जीवन अपनाया। इन श्रमण संप्रदायों का उल्लेख प्राचीन बौद्घ तथा जैन आगम (मान्य ग्रंथ) में है और जैन तथा बौद्घ मतों के प्रणेता महावीर एवं बुद्घ के प्रवचनों में उनकी आलोचना। वास्तव में जैन तथा बौद्घ दो प्रमुख श्रमण संप्रदाय माने जाते हैं।

उस समय के दर्शन में विभिन्न मतों का वर्णन करते समय दो शब्दों का प्रयोग आता है। आज उनके अर्थ भिन्न हो गए हैं। 'आस्तिक' उस परंपरा को कहते थे जो वेद को अकाट्य प्रमाण माने। मनु ने 'नास्तिक' वेद निंदक को कहा है। उसका अर्थ 'निरीश्वरवादी' नहीं था। परंतु स्व-अनुभव अथवा तर्क के आधार पर अपने मत का प्रतिपादन करने वाले संप्रदायों ने भी वेद आदि ब्राम्हण (अर्थात् विद्वानों के) ब्रम्ह विषयक ग्रंथों से कुछ अंश ग्रहण कर अपने पंथ में प्रमुखता दी। ब्राम्हण ग्रंथ अर्थात् विद्वानों द्वारा रचित ब्रम्ह विषयक ग्रंथ। इसका अर्थ कोई जाति विशेष (ब्राम्हण) द्वारा अथवा उनके लिखित ग्रंथ नहीं हैं। वास्तव में प्राचीन स्मृतिकारों में विरले ने ही, जिसे आज ब्राम्हण कुल कहा जाय, में जन्म लिया। इसलिये मनीषा समझे बिना और उस समय का अर्थ जाने बिना शब्दों का ठप्पा लगाना गलत है। वैसे इन श्रमण संप्रदायों को बुद्घ ने 'अनधिकृत' (heretic) कहा है।

इन श्रमण धार्मिक प्रवृत्तियों में कुछ समान लक्षण पाए जाते हैं। यह बौद्घिक विकास का समय था, इसलिये केवल वेद-वाक्यों को प्रमाण न मानकर तर्क से तथा अनुभूति से समझने का यत्न हुआ। अपने संप्रदाय में उन्होंने सभी लोगों को बिना वर्ण या आश्रम का विचार कर सम्मिलित किया। इसी से कुछ लोग जैन एवं बौद्घ पंथों को सुधारवादी कहते हैं, जो उनकी स्वयं की धारणाओं के विपरीत हैं। श्रमण संप्रदाय विशिष्ट नैतिक सिद्घांतों का पालन करते थे। साधारणतया ये सांसारिक जीवन से दूर निवृत्ति मार्ग के अनुगामी थे। इनमें कोई भी वयस्क घर-द्वार त्याग परिव्राजक बन सकता था। ब्रम्चर्य (वेदाध्ययन एवं ज्ञानार्जन का समय) का अर्थ भिक्षाटन रह गया। ये श्रमण संप्रदाय अपने प्रणेता के नाम से जाने जाते हैं। चिंतन के अनेक फलक प्रदर्शित करते, जैन एवं बौद्घ दर्शन की भूमिका समझने के लिए, ये इतिहास के विशिष्ट पन्ने हैं।

वैदिक चिंतन जगत् के मूल तत्व की खोज है। एक 'पुरूष' तत्व है, निष्क्रिय, पर जिसके बिना सृष्टि संभव नहीं। दूसरी ओर पदार्थ (matter) अथवा प्रकृति का मूल तत्व या उपादान, जिससे यह सारी सृष्टि रचित है, कौन है? इसकी खोज। तीसरी दिशा है सृष्टि में परिवर्तन की नियमितता देखकर आत्मा-शरीर तथा कर्मफल के संबंधों का निरूपण। इसलिए कर्मवाद इस चिंतन का एक अभिन्न भाग बना। पर कर्मवाद से अनेक जटिल प्रश्न उठते हैं। इसका हल श्रमण संप्रदायों में मुक्त चिंतन द्वारा खोजने का यत्न हुआ। संसार का यह विचार-मंथन का समय, इसमें कितने प्रकार की विचारधाराएं श्रमण संप्रदायों द्वारा फली-फूलीं, इसे देख आश्चर्य होता है।

इन विचाराधाराओं और प्रवर्तकों के नाम व जानकारी, साधारणतया उनके आलोचकों की, जैन-बौद्घ साहित्य अथवा तमिल एवं चीनी साहित्य की देन है। कैसे निर्भीक चिंतक थे। अपने तर्क पर विश्वासी, सिद्घांतवादी और अपने नैतिक मूल्यों के पालनकर्ता। अपने चिंतन की छाप उन्होंने छोड़ी। इस प्रकार के छह (अथवा दस?) प्रमुख श्रमण संप्रदाय कहे जाते हैं, जिनका चीनी अथवा तमिल साहित्य में भी वर्णन है। उसमें इन श्रमण आचार्यों के दर्शनों के अनेक नाम दिए गए। 'कालवाद', 'भौतिकवाद' (materialism), 'नियतिवाद', 'ज्ञानवाद', 'शाश्वतवाद', 'उच्छेदवाद', 'संशयवाद' (scepticism) आदि। ऎसा है यह बहुदर्शी बौद्घिक पट। अधिकांश विचारक जन्म से पुनर्जन्म के संचरण को दु:खमय तथा कर्मफल के अधीन मानते थे। किंतु जीव, कर्म, मोक्ष आदि सभी विषयों में अनेक उनझे मतभेद थे।

पूर्ण काश्यप 'अक्रियावाद' अथवा 'अहेतुवाद' के प्रवक्ता थे। वैसे आज के वैज्ञानिक विकास की प्रक्रिया को 'अहेतुक' ही कहते हैं। फिर 'आजीविक' थे, जिस संप्रदाय में 'शील' के अनुपालन पर विशेष बल दिया जाता था। 'आजीविक' संभवतया इसलिए कि गृहविहीन होकर भी आजीविका कमाने को महत्व देते थे, जिसमें फलित ज्योतिष, शकुन-अपशकुन, फलाफल का विचार और मार्गदर्शन सम्मिलित था -और थे घोर भौतिकवादी। केशकंबली अर्थात् (केशों का कंबल धारण करने वाले) का विश्वास पुनर्जन्म पर न था। बेलद्विपुत्र 'संशयवाद' के आचार्य थे, जिसमें सापेक्षवाद का जन्म हुआ। 'चार्वाकपंथी' अथवा जिन्हें 'लोकायत' (केवल इस लोक पर विश्वास रखने वाले) कहते हैं, वे भी बुद्घ के समय थे। इसलिए बुद्घ ने 'धम्म' (धर्म) का, बीच का मार्ग अपनाने को कहा।

इनके अतिरिक्त जैन एवं बौ मत भी श्रमण परंपरा के अंग कहे जाते हैं। वर्द्घमान (जो बाद में महावीर कहलाए) और सिद्घार्थ ( जो बुद्घ कहलाए) जैसे मत-प्रवर्तकों ने इसी कालखंड में जन्म लिया। इनके दर्शन ने एशिया और अंततोगत्वा सारे संसार को प्रभावित किया। बौद्घ ग्रंथों ने जैनियों के अंतिम तीर्थंकर (जो भवसागर को पार करने के लिए तीर्थ अर्थात् घाट बनाए) महावीर को 'निर्ग्रंथ ज्ञतृपुत्र' कहा है। निर्ग्रंथ (सब प्रकार की गांठों-बंधनों से मुक्त) मार्गी, जिन्होंने ज्ञातृवंशीय क्षत्रिय कुल में जन्म लिया।

विचार-स्वतंत्रता का यह अद्भुत प्रस्फुटन एक जीवंत, प्रखर तथा बुद्घिमान समाज की निशानी थी, जैसा संभवतया संसार की किसी अन्य सभ्यता में नहीं हुआ (सुकरात को ऎसी परिस्थिति में मृत्युदंड दिया गया)। इससे भी बढ़कर सभी विचारों के प्रति सहिष्णुता तथा उदारता, उन्हें समझने का यत्न। एक-दूसरे के प्रति मत-भिन्नता रहते हुए भी द्वेषरहित भाव। आपस में बिना कोई दुर्भाव लाए विचार-विनिमय तथा मंथन, परस्पर विरोधी विचारों एवं मान्यताओं का सह-अस्तित्व। यह सभ्यता का चरमोत्कर्ष है। ऎसे समय में इन श्रमण संप्रदायों के विचार-आलोड़न के बीच उनकी परंपराओं के घ्रुवीकरण में दो प्रमुख मतों-जैन और बौद्घ का जन्म हुआ। यह उनका नवनीत था।

एक समृद्घ, समुन्नत और शांति के वातावरण में जहां मानव-मानव एवं मानव-प्रकृति के संबंधों को समझने और निर्धारण करने की अखंड परंपरा तथा व्यवहार चला आया वहां ही महावीर तथा गौतम बुद्घ सरीखे महापुरूषों का जन्म हो सकता था।

गौतम बुद्ध के दोनो चित्र विकिपीडिया से उसी के शर्तों में प्रकाशित हैं

कालचक्र: सभ्यता की कहानी
०१- रूपक कथाऍं वेद एवं उपनिषद् के अर्थ समझाने के लिए लिखी गईं
०२- सृष्टि की दार्शनिक भूमिका
०३ वाराह अवतार
०४ जल-प्‍लावन की गाथा
०५ देवासुर संग्राम की भूमिका
०६ अमृत-मंथन कथा की सार्थकता
०७ कच्‍छप अवतार
०८ शिव पुराण - कथा
०९ हिरण्‍यकशिपु और प्रहलाद
१० वामन अवतार और बलि
११ राजा, क्षत्रिय, और पृथ्वी की कथा
१२ गंगावतरण - भारतीय पौराणिक इतिहास की सबसे महत्‍वपूर्ण कथा
१३ परशुराम अवतार
१४ त्रेता युग
१५ राम कथा
१६ कृष्ण लीला
१७ कृष्ण की सोलह हजार एक सौ रानियों
२० बौद्ध धर्म