Wednesday, October 17, 2007

ईसा मसीह का जन्म दिन - बड़ा दिन और भारतीय त्योहार

मानव सभ्‍यता के आदि काल का प्रमुख त्‍योहार सूर्य-पूजा से संबंधित है। हम जानते हैं कि सूर्य २३ दिसंबर को उत्‍तरायण होते हैं। जब भारतीय पंचाग का अंतिम पुनर्निर्धारण हुआ, तब यह घटना सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के साथ होती थी। इसी से दक्षिणतम रेखा को, जहॉं सूर्य (२१ तथा २२ दिसंबर को) लंबवत चमकता है, ‘मकर रेखा’ (Tropic of Capricorn) कहा और उसके उत्‍तरायण होने के दिन को मकर संक्रांति। यही भारतीय खिचड़ी ( पोंगल) का त्‍योहार है। कालांतर में पृथ्‍वी सूर्य के चारों ओर जो दीर्घवृत्‍त बनाती है उसके पात (प्रतिच्‍छेद बिंदु: nodes) पीछे हटते गए, और अब सूर्य के मकर राशि में प्रवेश का दिन १४ जनवरी है। स्‍मरण होगा कि नरेंद्रनाथ दत्‍त (स्‍वामी विवेकानंद) का जन्‍म मकर संक्रांति के दिन १२ जनवरी को हुआ था। ईसाई पंथ के प्रारंभिक विस्‍तार के समय सभी प्राचीन सभ्‍यताओं में ‘बड़ा दिन’ (अर्थात सूर्य के उत्‍तरायण होने का भारतीय उत्‍सव, यानी उस समय सूर्य के मकर राशि में प्रवेश का दिन) २५ दिसंबर था।

पृथ्‍वी को आवेष्टित करती प्राचीन आदि सभ्‍यताओं की मेखला में सर्वत्र यह मकर संक्रांति अथवा सूर्य के उत्‍तरायण होने का त्‍योहार सूर्य-पूजा का अंग समझकर मनाया जाता था। ईसाई पंथ के प्रचारकों ने आदि सभ्‍यताओं में प्रचलित इस भारतीय त्‍योहार को ईसा मसीह का जन्‍म- दिवस कहकर अपना लिया। नवीन शोध बताते हैं कि ईसा के जन्‍म के समय प्रभात में तीन ग्रहों की एक साथ युति दिखी, एक जात्‍वल्‍यमान प्रकाश के रूप में, वह घटना ९ सितंबर ईस्‍वी पूर्व तीसरे या छठे वर्ष की है। हिंदी विश्‍वकोश के अनुसार संवत ५८५ (सन ५२७) के लगभग रोम निवासी पादरी डायोसिनियस ने गणना करके रोम की स्‍थापना के ७९५ वर्ष बाद ईसा मसीह (Jesus Christ) का जन्‍म होना निश्चित किया तथा छठी शताब्‍दी से ईस्‍वी ‘सन्’ का प्रचार प्रारंभ हुआ। इस प्रकार २५ दिसंबर को मनाया जाने वाला विशुद्ध भारतीय त्‍योहार ‘बड़े दिन’ (christmas) को ईसाई जगत के लिए अपहृत कर लिया गया और भारतीय पद्धति के अनुसार उन्‍होंने शिशु ईसा की ‘छठी’ का दिन १ जनवरी तथा ‘बरहों’ ६ जनवरी को मनाना प्रारंभ किया।

ईसाई और मुसलिम मान्‍यता है कि मानव का प्रारंभ आदम और हव्‍वा से अदन वाटिका में हुआ। यह मानव की जन्‍मस्‍थली अदन वाटिका थी कहॉं ? इस विषय में अरब (प्राचीन अर्व देश, अर्थात अच्‍छे घोड़ों का देश) की किंवदंतियों तथा विश्‍वासों का सहारा लें तो मानव का आदि प्रदेश उसके शैशव की लीलास्‍थली, जहॉं से वे संसार में फैले, उनके देश के पूर्व में दक्षिण भारत के पठारी शीतोष्‍ण जलवायु के अरण्‍य में थी।

स्‍वस्तिक चिन्‍ह सदा-सर्वदा भारत में मंगल, सर्वकल्‍याणकारी, शुभ चिन्‍ह के रूप में प्रयोग होता आया है। कहते हैं, प्रारंभ में ऋषियों ने आकाश के किसी भाग में तारों को देखकर इस शुभ चिन्‍ह की कल्‍पना की थी। भारत में पूजा, हवन या अन्‍य शुभ अवसरों पर, घर तथा मंदिरों में यह चिन्‍ह बनाते हैं। भारत में यह दक्षिणावर्ती (clockwise) है, पर कहीं वामावर्ती (anti- clockwise) स्‍वस्तिक (swastik) चिन्‍ह भी प्रचलित था। जब हिटलर ने जर्मन लोगों को विशुद्ध आर्य कहना प्रारंभ किया तब ‘वामावर्ती स्‍वस्तिक’ धारण किया। इसके पहले लगभग सहस्‍त्र वर्ष से इसका उपयोग भारत में सीमित रह गया था। यह स्‍वस्तिक चिन्‍ह भारत से उक्‍त भू-मेखला में फैला।

संभवतया भारत के सांस्‍कृतिक प्रभाव के कारण ही इन पूजा और स्‍वस्तिक चिन्‍ह ने संसार का चक्‍कर काटा। यह विशेषकर पुरानी दुनिया के लिए ही नहीं वरन् नई दुनिया, मेक्सिको और पेरू के लिए भी सत्‍य है जहॉं पिंगल प्रजाति के लोग भी बसे। मानव केवल रूप-रंग का आकार नहीं। उसने विचारों की सृष्टि की, जिन्‍होंने एक सभ्‍यता उपजाई। प्राचीन सभ्‍यताओं की प्रेरणा का कोई केंद्र, कोई छोर है क्‍या, जहॉं से वह नि:सृत हुई? ज्‍यों-ज्‍यों अधखुले नेत्रों से प्रारंभ होकर मानव सभ्‍यता की यह कहानी आगे बढ़ती है, यह केंद्र स्‍पष्‍टतर होता जाता है।


कालचक्र: सभ्यता की कहानी
मानव का आदि देश
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९ ईसा मसीह का जन्म दिन - बड़ा दिन और भारतीय त्योहार

Saturday, October 13, 2007

मानव का आदि देश-८

नव प्रस्‍तर युग में भूमंडल की मेखलाकार पट्टी में फैली एक विशेष संस्‍कृति दिखाई पड़ती है। यह मेखला आइबेरियन प्रायद्वीप से लेकर भूमध्‍य सागर के दोनों ओर के प्रदेश, संपूर्ण दक्षिण एशिया और प्रशांत महासागर के द्वीपों को लेकर उस पार मेक्सिको और पेरू तक नई दुनिया में फैली थी। इसके कुछ लक्षण ऐसे विचित्र थे कि पृथ्‍वी के दूरस्‍थ भागों में उनका स्‍वाभाविक रीति से प्रकट होना असंभव है। चारों ओर घेरती इस मेखला में सूर्य-पूजा तथा नाग –पूजा के साथ ‘स्‍वस्तिक’ का शुभ चिन्‍ह के रूप में प्रयोग दिखता है। इसमें सूर्य-पूजा होने के कारण कुछ पुरातत्‍वज्ञ इसे सूर्यप्रस्‍तर संस्‍कृति ( Heliolithic Culture) कहते हैं।

सूर्य को अपने यहॉं भगवान का स्‍वरूप कहा है। इसे प्राचीन ग्रंथों में अनेक नामों से पुकारा गया है और वेद की ऋचाऍं उसकी महिमा गाती हैं। ऋग्‍वेद एवं बौधायन ने सूर्य को आकाश मार्ग पर हिरण्‍य रथ पर सवार दिखाया है, जिसे सात भिन्‍न रंगों के घोड़े हॉंक रहे हैं। यह इंद्रधनुषी वर्णक्रम ( spectrum) का वर्णन है। सूर्य- रश्मियों से प्रकाश- रासायनिक प्रक्रिया (photo chemical process) द्वारा जीवन प्रारंभ हुआ—सूर्य जीवनदाता है। यह अन्‍यत्र ऊर्जा का उद्गम है, जिससे संसार का संचालन होता है। कोणार्क का सूर्य मंदिर प्रसिद्ध है-वैसे ही हैं दक्षिण अमेरिका में पेरू ( Peru) के सूर्य मंदिर। पृष्‍ठ २०-२१ पर पृथ्‍वी को आवेष्टित और इस प्रकार धारण करती जल-प्‍लावन के समय शेष रही पर्वतमाला की भारतीय कल्‍पना का ‘शेषनाग’ के नाम से वर्णन है। इसी से है नाग-पूजा। फनीशियन ( Phoenecians: यह संभवतया ‘फणीश’ अर्थात नाग का अपभ्रंश है) नाग-पूजक थे। ये वेदों में पणि नाम से उल्लिखित हैं। सूर्य और नाग दोनोंकिंवदंतियों में मिलते हैं। भूमंडल को चारों ओर से कटिबंध की भॉंति घेरती ये उपासनाऍं भारतीय हैं। एच.जी.वेल्‍स ने अपनी प्रसिद्ध पुस्‍तक ‘इतिहास की रूपरेखा’
(Outline of History) में लिखा है – ‘किंतु अंततोगत्‍वा जब कभी रहन-सहन के प्रस्‍तरयुगीन तौर- तरीकों का प्रसार-केंद्र निर्धारित होगा तो वह प्रदेश होगा जहॉं सर्प और धूप जीवन में मूलभूत महत्‍व के होंगे।‘ दुर्भाग्‍यवश वे इन विचारों के अवश्‍यंभावी परिणाम भारत तक न पहुँच सके।


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Monday, October 01, 2007

मानव का आदि देश-७

वेदग्रंथ संभवतया संवत् के बीस सहस्‍त्र वर्ष पूर्व रचे गए। भारतीय गणना के अनुसार वे सदा थे, पर साधना द्वारा व्‍यक्‍त हुए। ‘ऋग्‍वैदिक’ घटनाओं और ‘शतपथ ब्राम्‍हण’ के वाक्‍य से कि ‘कृत्तिकाऍं ठीक पूर्व दिशा में उदय होती हैं’ पंचांग-सुधार एवं वेदों के लिपिबद्ध करने का समय संवत् के आरंभ से कम-से –कम छह सहस्‍त्र वर्ष पूर्व अथवा उसके पहले जब कभी वैसा समय आया हो, प्रमाणित होता है। रचना के समय वैदिक संस्‍कृत एक उन्‍नत और सशक्‍त भाषा थी, जिसमें घटनाओं और मनोभावों से लेकर अध्‍यात्‍म, विज्ञान और दर्शन की परिकल्‍पनाओं को व्‍यक्‍त करने की सामर्थ्‍य थी।

किंतु यूरोपीय इतिहासज्ञों के अनुसार आर्य भारत में संवत् के सहस्‍त्र वर्ष पूर्व उत्‍तर-पश्चिम के दर्रो से आकर पंजाब में बसे और वहॉं से पूर्व एवं दक्षिण की ओर बढ़े। किंतु हम जानते हैं कि रामायण काल और दशरथ का अयोध्‍या का राज्‍य इससे पहले आया। तब पूर्व में मगध एवं कौशल प्रतापी राज्‍य थे। और संवत् के करीब ३५०० पूर्व महाभारत काल और हस्तिनापुर ( दिल्‍ली) का राज्‍य आया। इसी प्रकार मोइन-जो-दड़ो (मृतकों की डीह) तथा हड़प्‍पा के पृथ्‍वी में दबे नगर और उनकी सभ्‍यता पंजाब से पुरानी सिद्ध होती है। इसलिए पूर्व एवं दक्षिण की सभ्‍यताऍं पंजाब से गई हुई नहीं हैं। एक गलत पूर्वाग्रह के कैसे दुष्‍परिणाम हाते हैं कि सारा इतिहास उलट गया।

आर्य खेती जानते थे। यह प्रकृति के अध्‍यययन उन्‍होंने सीखा। भारत में ऋतुओं के क्रम, और साल में एक बार वर्षा के आगमन से जब बीज जमते और सारी प्रकृति हरा परिधान धारण करती, खेती के विचार का जन्‍म हुआ। अन्‍यत्र कहॉं बहती हैं मौसमी हवाऍं और कहॉं आती हैं षट ऋतुऍं ? यह जलवायु तो संसार में अन्‍यत्र नहीं। मानव ने उत्‍तरी भारत के मैदानों में पहले-पहल पृथ्‍वी से अन्‍न उपजाया। चतुर्थ हिमाच्‍छादन के बाद जब प्रस्‍तरयुगीन प्रव्रजन की अनेक लहरें यूरोप पहुँचीं तब वे खेती से परिचित थे।


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