Monday, March 31, 2008

अमृत-मंथन कथा की सार्थकता: अवतारों की कथा

एक बार असुरों ने तीखे शस्‍त्रों से देवताओं को पराजित किया। अनेक देवता रणभूमि में गिरकर उठ न सके। स्‍वयं इंद्र श्रीहीन हो गए। तब ब्रम्‍हा ने यह देखकर कि सभी देवताओं की दुर्दशा हो रही है तथा उनकी परिस्थिति विकट एवं संकटग्रस्‍त हो गई है, जबकि असुर फल-फूल रहे हैं, कहा, ‘मैं, देवता तथा असुर, दैत्‍य, मनुष्‍य, पशु-पक्षी, वृक्ष, कीट आदि समस्‍त प्राणी, जिनके विराट् रूप के अत्‍यंत छोटे-से-छोटे अंश से रचे गये हैं, उन शंकर की शरण में चलें।‘ तब सबने भगवान के विराट स्‍वरूप, अर्थात् जड़-जीव से युक्‍त समूची सृष्टि की उपासना की। भगवान ने सलाह दी, ‘असुरों से संधि कर लो। फिर क्षीर सागर में सब प्रकार के घास-तिनके, लताऍं और औषधियॉं डालकर मंदराचल की मथानी बनाकर वासुकि नाग की रस्‍सी से मेरी सहायता से समुद्र-मंथन करो। असुर लोग जो कहें सब स्‍वीकार कर लो। पहले कालकूट विष निकलेगा, उससे डरना नहीं। किसी वस्‍तु का लोभ न करना। इस प्रकार बिना विलंब अमृत निकालने का प्रयत्‍न करो। इसे पी लेने पर मरने वाला प्राणी भी अमर हो जाता है।‘

तब देवताओं ने असुरों से संधि कर समुद्र-मंथन के लिए सम्मिलित उद्योग प्रारंभ किया। दैत्‍य सेनापतियों ने कहा, ‘पूँछ तो सॉंप का अशुभ अंग है, हम उसे न पकड़ेंगे। हमने वेद-शास्‍त्रों का अध्‍ययन किया है। ऊँचे वंश में हमारा जन्‍म हुआ है और हमने वीरता के कार्य किए हैं। हम देवताओं से किस बात में कम हैं।‘ अंत में देवताओं ने वासुकि नाग की पूँछ पकड़ी और असुरों ने उसका फन। इस प्रकार स्‍वर्ण पर्वत मंदराचल की मथानी से मंथन प्रारंभ हुआ। पर नीचे कोई आधार न होने के कारण मंदराचल डूबने लगा। तब भगवान ने कच्‍छप अवतार के रूप में प्रकट हो जंबूद्वीप के समान फैली अपनी पीठ पर मंदराचल को धारण किया।

सागर-मंथन में पहले कालकूट विष निकला। यह चारों ओर फैलने लगा। तब संपूर्ण प्रजा तथा प्रजापति कहीं त्राण न मिलने पर शिव की शरण में गए। शिव ने वह तीक्ष्‍ण हलाहल पी लिया, जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया। जो थोड़ा विष टपक पड़ा उसे विषैले जीवों एवं वनस्‍पतियों ग्रहण कर लिया।

इसके बाद सागर-मंथन से अनेक वस्‍तुऍं निकलीं। कामधेनु को, जो यज्ञ के लिए घी-दूध देती थी, ऋषियों ने ग्रहण किया। इसी प्रकार उच्‍चै:श्रवा नामक श्‍वेत वर्ण घोड़ा, ऐरावत हाथी, कौस्‍तुभ मणि, कल्‍पवृक्ष-जो याचकों को इच्छित वस्‍तु देता था-और संगीत- प्रवण अप्‍सराऍं प्रकट हुई। इसके बाद नित्‍यशक्ति लक्ष्‍मी प्रकट हुई जो सृष्टि रूपी भगवान के वक्षस्‍थल पर निवास करले लगीं। इसके बाद वारूणी-शराब-निकली, जिसे असुरों ने ले लिया। अंत में भगवान के अंशावतार तथा आयुर्वेद के प्रवर्तक धन्‍वंतरि हाथ में अमृत कलश लिये प्रकट हुए। तब असुरों ने उस अमृत कलश को छीन लिया। उनमें आपस में झगड़ा होने लगा कि पहले कौन पिए। कुछ दुर्बल दैत्‍य ही बलवान दैत्‍यों का ईर्ष्‍यावश विरोध करने तथा न्‍याय की दुहाई देने लगे-‘देवताओं ने हमारे बराबर परिश्रम किया, इसलिए उनको यज्ञ-भाग समान रूप से मिलना चाहिए।‘

इस पर भगवान ने अत्‍यंत सुंदर स्‍त्री मोहिनी का रूप धारण किया। असुरों ने मोहित हो मोहिनी को ही वारूणी तथा अमृत सबमें बॉंटने के लिए दे दिए। मोहिनी ने असुरों तथा देवताओं को अलग-अलग पंक्ति में बैठाकर पिलाना प्रारंभ किया। असुरों की बारी में वारूणी तथा देवताओं की बारी में अमृत पिलाया। नशा उतरने पर असुरों ने देखा कि उनके साथ धोखा हुआ। तब उन्‍होंने देवताओं पर धावा बोल दिया। पुन: देवासुर संग्राम हुआ। अबकी बार असुरराज बेहोश हो गए, पर शुक्राचार्य ने संजीवनी विद्या से उन्‍हें फिर ठीक कर दिया। नारदजी के आग्रह पर, कि देवताओं को अभीष्‍ट प्राप्‍त हो चुका है, युद्ध बंद हुआ। देवता और असुर अपने-अपने लोक को पधारे।

यदि समझें कि क्षीर सागर मानव समूह का रूपक मात्र है तो अमृत-मंथन की कथा सार्थक हो उठती है। भिन्‍न-भिन्‍न रूप-रंग, आचार-व्‍यवहार, मत-कतांतर और परंपरा के लोग इस पृथ्‍वी पर निवास करते हैं। इन सबको मथकर एकरस जीवन उत्‍पन्‍न किया-यही अमृत-मंथन है। आखिर उत्‍कृष्‍ट जीवनी शक्ति से अनुप्राणित एकरस समाज अमर है। असुरों और देवों, दोनों के उपासकों ने इसमें भाग लिया।

इस प्रकार मथकर एक राष्‍ट्रीय जीवन उत्‍पन्‍न करने की प्रक्रिया में प्रारंभ में विष मिलता है। आपसी संदेह, अपनेपन के झूठे आग्रह, काम, क्रोध, अभिमान तथा लोभ से भरे जीवन में, असामाजिक प्रवृत्तियों के नियंत्रण और एकीकरण के प्रयत्‍नों में प्रारंभ में कालकूट विष निकलता है। इसे किसीको पीना पड़ता है। इसके लिए संहारक शक्ति के अधिष्‍ठातृ देव ‘शिव’ उपयुक्‍त थे। कालकूट पीकर वह महादेव बने।


कालचक्र: सभ्यता की कहानी

०१- रूपक कथाऍं वेद एवं उपनिषद् के अर्थ समझाने के लिए लिखी गईं
०२- सृष्टि की दार्शनिक भूमिका
०३ वाराह अवतार
०४ जल-प्‍लावन की गाथा
०५ देवासुर संग्राम की भूमिका
०६ अमृत-मंथन कथा की सार्थकता

Wednesday, March 26, 2008

देवासुर संग्राम की भूमिका: अवतारों की कथा

आगे अमृत-मंथन की कथा को समझने के लिए देवासुर संग्राम की भूमिका जानना आवश्‍यक है। आर्यों के मूल धर्म में सर्वशक्तिमान् भगवान के अंशस्‍वरूप प्राकृतिक शक्तियों की उपासना होती थी। ऋग्‍वेद में सूर्य, वायु, अग्नि, आकाश, और इंद्र से ऋद्धि-सिद्धियॉं मॉंगी हैं। यही देवता हैं। बाद में अमूर्त देवताओं की कल्‍पना हुई जिन्‍हें ‘असुर’ कहा। ‘देव’ तथा ‘असुर’ ये दोनों शब्‍द पहले देवताओं के अर्थ में प्रयोग होते थे। ऋग्‍वेद के प्राचीनतम अंशों में ‘असुर’ इसी अर्थ में प्रयुक्‍त हुआ है। वेदों में ‘वरूण’ को ‘असुर’ कहा गया और सबके जीवनदाता ‘सूर्य’ की गणना ‘सुर’ तथा ‘असुर’ दोनों में है। बाद में देवों के उपासक ‘देव’ शब्‍द को देवता के लिए प्रयुक्‍त करने लगे और ‘असुर’ का अर्थ ‘राक्षस’ करने लगे। पुराणों में सर्वत्र ‘असुर’ राक्षस के अर्थ में प्रयुक्‍त हुआ है। इसी प्रकार ईरानी आर्य ‘असुर’ (जो वहॉं ‘अहुर’ बना) से देवता समझते तथा ‘देव’ शब्‍द से राक्षस। फारसी से आया यह शब्‍द आज तक इसी अर्थ में प्रयोग होता है। ‘देव’ से अर्थ उर्दू में भयानक, बड़े डील-डौल के राक्षस से लेते हैं। जरथ्रुष्‍ट के पंथ में इंद्र ‘देव’ (राक्षस) है, जो शैतार ‘अग्रमैन्‍यु’ की सहायता करता है।

इन दोनों संप्रदायों-देवों के उपासक तथा असुरों के उपासक-के बीच इस प्रकार एक सांस्‍कृतिक विषमता खड़ी हुई। पुराणों में असुरों को देवों के अग्रज कहा गया है। असुरों के उपासकों ने लौकिक उन्‍नति की ओर ध्‍यान दिया और भौतिक समृद्धि प्राप्‍त की। कहा जाता है कि भौतिकता में पलकर उन्‍होंने दूसरे संप्रदाय के ईश्‍वर के विश्‍वासों को चुनौती दी। इसलिये उन्‍हें रजोगुण एवं तमोगुण-प्रधान कहा गया। देवों के उपासक इस भौतिक समृद्धि को आश्‍चर्य तथा संदेह की दृष्टि से देखते थे। वे मानते थे कि असुरों के उपासकों ने इसे माया से प्राप्‍त किया है। मय नामक असुर देवताओं का अभियंता (engineer) कहा जाता है। देव संस्‍कृति सत्‍व गुण पर आधारित थी। उसकी प्रेरणा आध्‍यात्मिक थी और दृष्टिकोण भौतिकवादी न था।

इस प्रकार कालांतर में देवों और असुरों के उपासकों में धार्मिक एवं सांस्‍कृतिक मतभेद उत्‍पन्‍न हुए। इसने संघर्ष का रूप धारण किया। असुर संप्रदाय के कुछ लोग प्रमुखतया ईरान में बसे। संभवतया इस कारण से भी आर्य आपने आदि देश भारत को छोड़कर ईरान और यूरोप में फैले हों। वैसे यह आर्यों के साहसिक उत्‍साही जीवन की कहानी है। इतिहास में अनेक संप्रदाय अपने धार्मिक एवं सांस्‍कृतिक विचारों के कारण स्‍वदेश छोड़ नए देशों में बसे। इंग्‍लैंड से बैपटिस्‍ट आदि ने अपनी धार्मिक स्‍वतंत्रता बचाने के लिए अमेरिका की शरण ली। पर भारत में असुरों के उपासक इन मतांतरों के बाद भी चक्रवर्ती सम्राट हुए। अमृत-मंथन की गाथा इन दो संप्रदायों में समन्‍वय की कहानी है।

कालचक्र: सभ्यता की कहानी

०१- रूपक कथाऍं वेद एवं उपनिषद् के अर्थ समझाने के लिए लिखी गईं
०२- सृष्टि की दार्शनिक भूमिका
०३ वाराह अवतार
०४ जल-प्‍लावन की गाथा
०५ देवासुर संग्राम की भूमिका

Monday, March 17, 2008

जल-प्‍लावन की गाथा

जल-प्‍लावन की गाथा संसार की सभी सभ्‍यताओं में पाई जाती है। मनु की यह घटना सामी सभ्‍यताओं में ‘हजरत नू की नौका’ (Noah’s Ark) कहकर वर्णित है। प्रत्‍येक मन्‍वंतर में, जो चल रहा है, के वैवस्‍वत मनु की है।

द्रविड़ देश के राजर्षि सत्‍यव्रत ने एक दिन तर्पण के लिए कृतमाला नदी से जल निकाला तो अंजलि में एक छोटी मछली आ गई। उसे जल में डालने पर मछली के बड़ी करूणा से कहा, ‘आप जानते हैं, जलजंतु अपनी जातिवालों को खा जाते हैं। आप मेरी रक्षा करें।‘ तब सत्‍यव्रत ने उसे अपने कमंडलु में छोड़ दिया। वह रात भर में इतनी बड़ी हो गई कि उसे पानी भरे मटके में डालना पड़ा। वहॉं वह दो घड़ी में तीन हाथ बढ़ गई। तब उसे सरोवर में डाला गया। कुछ देर में लंबा-चौड़ा सरोवर घिर गया तो उसे सागर में ले गए। वहॉं मत्‍स्‍य ने कहा, ‘आज के सातवें दिन भूमि प्रलय के समुद्र में डूब जाएगी। तब तक एक नौका बनवा लो। समस्‍त प्राणियों के सूक्ष्‍म शरीर तथा सब प्रकार के बीज लेकर सप्‍तर्षियों के साथ उस नौका पर चढ़ जाना। उस समय चारों ओर महासागर लहराता होगा। तब अँधेरा छा जाएगा। सप्‍तर्षियों की ज्‍योति के सहारे चारों ओर विचरण करना होगा। प्रचंड ऑंधी के कारण जब नाव डगमगाने लगेगी तब मैं मत्‍स्‍य रूप में आऊँगा। तुम लोग नाव को मेरे सींग से बॉंध देना। तब प्रलय-पर्यंत मैं तुम्‍हारी नाव खींचता रहूँगा। उस समय मैं उपदेश दूँगा।‘ वैसा ही हुआ। जो उपदेश दिया वह मत्‍स्‍य पुराण है। उस समय मत्‍स्‍य ने नौका को हिमालय की चोटी ‘नौकाबंध’ से बॉंध दिया। प्रलय समाप्‍त होने पर वेद का ज्ञान वापस दिया। राजा सत्‍यव्रत ज्ञान-विज्ञान से युक्‍त हो वैवस्‍वत मनु बने।

‘मनु’ से संबंधित एक समानांतर कहानी है ‘मनुस्‍मृति’ के रचयिता की। उससे इस कहानी का अन्‍य अध्‍याय में वर्णित एक दूसरा रूपक भी निखरता है, सभ्‍यता के एक यंत्र, विधि (law) के परिप्रेक्ष्‍य में। पर जिस प्रकार ये दोनों कहानियॉं गुँथकर एकाकार हो गईं (कुछ पुरातत्‍वज्ञों का मत है कि ये दो मनु की भिन्‍न कहानियॉं हैं), इन्‍हें सुलझाने या अलग करने का कोई उपाय नहीं है।

हमने देखा कि संभवतया किस प्रकार जल-प्‍लावन से भूमध्‍य सागर बना। उस समय हिमाच्‍छादन के बाद खगोलीय कारणों से पिघलते हिम ने और किसी आकाशीय पिंड के पृथ्‍वी के निकट आने के कारण भयंकर ज्‍वार ने जल-प्रलय का दृश्‍य उपस्थित किया। सचमुच आदि मानव ने उसको दुनिया का अंत समझा। ऐसे जल-प्रलय के समय जिसने मार्ग-निर्देशन किया, स्‍वाभाविक ही उसका नाम ‘मत्‍स्‍य’ (मछली) पड़ा। प्रलय के अंधकार में सप्‍तर्षियों का प्रकाश, जिसके कारण दिशाऍं जानी गईं, एक मात्र पथ-प्रदर्शक था। इस संहारकारी भयानक विपत्ति के बाद पुन: सभ्‍यता का बीज उगा।

हो सकता है कि कुछ वर्गों में ‘मत्‍स्‍य न्‍याय’ प्रचलित रहा हो, अर्थात बड़ी छोटी को खा जाती है। ऐसे कबीले को मनु ने संरक्षण दिया। यह कबीला अपने गण-चिन्‍ह (totem) ‘मछली’ के द्वारा जाना जाता था। सागर या जल के किनारे रहने तथा जल से आजीविका चलने के कारण उन्‍हें सागर की गतिविधियॉं और नौका का विशेष ज्ञान था। उस मत्‍स्‍य जाति ने मनु को नौका दी। ऐसी मत्‍स्‍य जाति या उसके किसी व्‍यक्ति ने महाप्रलय के समय सृष्टि-संरक्षण के कार्य की अगुआई की और मानव को जल-प्‍लावन की विपत्ति से उबारा।


कालचक्र: सभ्यता की कहानी

०१- रूपक कथाऍं वेद एवं उपनिषद् के अर्थ समझाने के लिए लिखी गईं
०२- सृष्टि की दार्शनिक भूमिका
०३ वाराह अवतार
०४ जल-प्‍लावन की गाथा

Monday, March 10, 2008

वाराह अवतार

दशावतारों में प्रथम अवतार वाराह का है। श्रीमद्भागवत में उसका वर्णन इस प्रकार है-‘ब्रम्‍हा ने मनु और उनकी पत्‍नी शतरूपा से प्रजापालन के लिए कहा। तब मनु ने उनसे अपने तथा प्रजा के रहने के लिए स्‍थान मॉंगा। जब ब्रम्‍हा जी विचार कर रहे थे तब उनकी नाक से एक छोटा वाराह शिशु प्रकट हुआ। देखते-ही-देखते वह पर्वताकार हो गरजने लगा। सभी निवासी एवं मुनिगण पवित्र मंत्रों से उसकी स्‍तुति करने लगे। वाराह बड़े वेग से आकाश में उछला और खुरों के आघात से बादलों को छितराने लगा। इसके बाद उसने जल में प्रवेश किया। जिस समय उसका वज्रमय पर्वत के समान कठोर कलेवर जल में गिरा तब उस वेग से समुद्र का पेट फट गया और बादलों की गड़गडाहट के समान भीषण शब्‍द हुआ। संपूर्ण प्राणी भय से मल-मूत्र त्‍याग क्रंदन करने लगे। फिर वह जल में डूबी पृथ्‍वी को अपने बड़े दॉंतों पर लेकर रसातल से ऊपर आया। रास्‍ते में दैत्‍य के रक्‍त से उसकी थूथनी व कनपटी सन गई, मानों लाल मिट्टी के टीले में टक्‍कर मारकर आया हो।‘ इस प्रकार पर्वतों से मंडित पृथ्‍वी समुद्र से निकालकर जल के ऊपर स्‍थापित की और मानव को बसने के लिए दी।

यह सारा वर्णन मध्‍य-नूतन युग में ज्‍वालामुखी के क्रिया-कलापों का है, जब बसने योग्‍य धरती का निर्माण हुआ। यह सारा ब्रम्‍हांड ब्रम्‍ह है। उसी से ज्‍वालामुखी पर्वत उत्‍पन्‍न हुआ। इसका आकार भी सूँड़ की तरह है, इसी से यह कल्‍पना की गई है।

एक विचित्र कथा वाराह अवतार के बारे में कही जाती है। मानव के बसने योग्‍य धरती समुद्र से निकालने के बाद वाराह प्रजापति बना। स्‍पष्‍ट ही आदि मानव ने इस समाज के लिए आधार रूप धरती प्रदान करने के महान कल्‍याणकारी कार्य के बाद ज्‍वालामुखी की देवता के रूप में पूजा प्रारंभ की। दक्षिण भारत के पठार पर सर्वत्र ज्‍वालामुखी के लावा से निर्मित कपास उत्‍पन्‍न करने वाली काली मिट्टी (black cotton soil) पाई जाती है। उत्‍तरी भारत में यह मिट्टी नदी निर्मित मैदानों से बह गई। बुंदेलखंड में नदी-नालों से दूर कहीं-कहीं काली मिट्टी की मोटी परत आज भी विद्यमान है। कहते हैं कि प्रजापति होकर वाराह अत्‍याचारी हो गया। तब प्रजा ने एक दिन उसका मूलोच्‍छेद कर दिया, अर्थात् सिर काट लिया। उस स्‍थान को आज वाराहमूल (बारामूला, कश्‍मीर) कहते हैं। स्‍पष्‍ट है कि ज्‍वालामुखी द्वारा निर्मित पृथ्‍वी पर उसके आश्रय में मानव बस गए। तब एक दिन उनका वह देवता ज्‍वालामुखी पुन: फूट निकला-सारी बस्‍ती में अग्नि, लावा तथा पिघले पत्‍थरों की, विनाश की वर्षा करता हुआ। अंत में उसका शमन हुआ। आज भारत में कोई ज्‍वालामुखी नही है। ‘ज्‍वालामुखी’ तीर्थ में भी नहीं।

भूमध्‍य सागर के सिसली द्वीप के विसूवियस (Vesuvius) ज्‍वालामुखी और उसके किनारे बसे पंपा (Pompei) नगरी की कहानी प्रसिद्ध है। विक्रम संवत् के आरंभ से आरंभ से कुछ पहले यह विसूवियस फूट निकला। उसका बहता हुआ लावा संपन्‍न नगर में एकाएक भर गया। लोग जैसा कर रहे थे वैसे ही रह गए और संपूर्ण नगर विशाल पिघले पत्‍थर की नदी में दब गया। अब खुदाई होने पर वह नगर प्रकट हुआ। आज विसूवियस शांत है, पर कभी-कभी घरघराहट सुनाई पड़ती है।


कालचक्र: सभ्यता की कहानी

०१- रूपक कथाऍं वेद एवं उपनिषद् के अर्थ समझाने के लिए लिखी गईं
०२- सृष्टि की दार्शनिक भूमिका
०३ वाराह अवतार

Thursday, March 06, 2008

सृष्टि की दार्शनिक भूमिका

पुराणों का अर्थ समझने के लिए पहले सृष्टि की दार्शनिक भूमिका समझनी होगी। कहते हैं, प्रारंभ में एक ही मूल तत्‍व था, जिसे आदि द्रव्‍य (पदार्थ) कह सकते हैं। उसमें कुछ हलचल या गति उत्‍पन्‍न होने के लिए जो ऊर्जा तत्‍व आवश्‍यक है और जिसके कारण सृष्टि संभव हुई, यह ईश्‍वर तत्‍व है। इसी को ‘विष्‍णु’ कहा गया। बाद में सृजन, पालन और विकास तथा संहार के कालचक्र ने त्रिमूर्ति देवताओं की कल्‍पना दी। बीज ‘ब्रम्‍ह’ है। अंकुर फूटकर वह वृक्ष बनता है। यह सृष्टि की पालनकारिणी तथा विकासपरक शक्ति ‘विष्‍णु’ है। अंत में यह वृक्ष नष्‍ट हो जाता है, यह संहारक शक्ति ‘महेश’ है। इसी से ‘ब्रम्‍हा, विष्‍णु, महेश’ की कल्‍पना का उदय हुआ। यह स्‍पष्‍ट है कि उस शक्ति के रूप में ईश्‍वर तत्‍व, जो पालनकर्ता है, जिसके द्वारा सृष्टि में सब विकसित होकर फूलते-फलते हैं, भिन्‍न युगों में, भिन्‍न रूपों एवं प्रतीकों में प्रकट हुआ। सृजन शक्ति ने सृजन कर अपना कार्य किया और संहारक शक्ति ‘रूद्र’ तो संहार करेगी। इसीलिए सभी अवतार ‘विष्‍णु’ के हैं।

पुराणों में अवतारों की कथाऍं, जनश्रुतियॉं संकलित हैं। सारी चराचर सृष्टि ईश्‍वर का स्‍वरूप है। उसके छोटे-छोटे अंशों से विविध योनियों (species) की सृष्टि हुई, ऐसा पुराणों का कथन है। पर जब ईश्‍वर का अधिक अंश लेकर कोई इस पृथ्‍वी पर पैदा हुआ तो उसे ईश्‍वर का अवतार कहा। कुल चौबीस अवतार कहे गए हैं, पर प्रमुखतया दस अवतारों की कथा कही जाती है। इन अवतारों में प्रथम चार-अर्थात वाराह, मत्‍स्‍य, कच्‍छप और नृसिंह-मानव नहीं हैं। पॉंचवें अवतार वामन अर्थात् बौने हैं। छठे अवतार परशुराम हैं। बाकी अवतार राम, कृष्‍ण और बुद्ध ऐतिहासिक व्‍यक्ति हैं, और कलियुग के अंत में जन्‍म लेंगे ‘कल्कि’।

इन अवतारों की कहानी में एक विशेष बात दिखाई पड़ती है। इनमें से प्रत्‍येक के द्वारा मानव समाज का कोई-न-कोई महत् कार्य संपन्‍न हुआ। इसी से ये ‘अवतार’ कहलाए। संसार में तो जिन्‍होंने नया ‘पंथ’ चलाया और शिष्‍य परंपरा निर्मित की, उन्‍हें उस पंथ के अनुयायियों ने अवतार कहा। मुहम्‍मदको मुसलमानों ने ईश्‍वर का दूत कहा, ईसा को ईसाइयों ने ईश्‍वर का पुत्र। ऐसा ही भारत के कुछ पंथों ने भी किया। पर पुराणों में वर्णित इन अवतारी महापुरूषों ने संपूर्ण मानव समाज के लिए कोई-न-कोई महान कार्य किया। गौतम बुद्ध को छोड़कर उनमें से किसी ने शिष्‍य परंपरा नहीं चलाई, न किसी मत के प्रवर्तक बने। यहॉं तक कि जिन लोगों ने राम और कृष्‍ण को अवतारी पुरूष बनाया ऐसे उनके गुरू-विश्‍वामित्र और सांदीपनि ऋषि-को अवतार नहीं कहा। चौबीसों अवतारों में प्रत्‍येक के द्वारा मानव मात्र के लिए कोई-न-कोई वंदनीय कार्य हुआ।


कालचक्र: सभ्यता की कहानी

०१- रूपक कथाऍं वेद एवं उपनिषद् के अर्थ समझाने के लिए लिखी गईं
०२- सृष्टि की दार्शनिक भूमिका