Sunday, January 24, 2010

रोमन साम्राज्य


रोमन साम्राज्य (Roman empire) की कहानी थोड़ी-बहुत विदित है। वह सामंतों और गुलामों की कहानी है। वहाँ नरबलि भी दी जाती थी। रोमन सभ्यता में एक यवन साधु और सिंह की गाथा है, जिसे बर्नार्ड शा ने अपने प्रसिद्घ नाटक 'आंद्रकुलिस और सिंह' (Androcles and the Lion)  में चित्रित किया। यह कथा रोमन सभ्यता का प्रतिरूप है और रोमन साम्राज्य के अंतर्गत प्रथम तीन शताब्दियों में ईसाइयों पर अत्याचार भी दिखाती है।





ईसाई शहीदों की आखरी प्रार्थना

आंद्रकुलिस नामक ईसाई साधु को एक बार जंगल में एक सिंह मिला। अगले पैर में काँटा गड़ जाने के कारण वह लंगड़ाता था और पीड़ा से कराह उठता था। आंद्रकुलिस डर गया; पर जब उसे बार-बार पंजा चाटते और उस क्रिया में गड़ा कांटा दुखते देखा तो साहस कर कांटा निकाल दिया। कालांतर में ईसाइयों के विरूद्घ अभियान में वह पकड़ा गया और गुलामों की टोली में रोम लाया गया। यहाँ रोमन सम्राट, सामंतगण तथा अधिकारी बैठकर शस्त्रों से गुलामों की लड़ाई, रक्त की धार बहते, जीवित अंग-अंग कटते तथा मानव तड़पन पर क्रूरता की पैशाचिक लीला देखने, गुलामों के रक्त-पसीने से निर्मित सीढ़ीनुमा भवन (stadium) में इकट्ठा होते थे। इस प्रकार क्रूरतापूर्ण प्राण-हरण के विकृत खेल (sport) का मजा लूटते थे। जो लड़ने से इनकार करता, जैसे श्रद्घालु ईसाई, उन्हें अखाड़े में भूखे शेर के समक्ष छोड़ दिया जाता और लोग शेर को मनुष्य पर झपटते और चिथड़े कर खाते देखते। दुबले-पतले आंद्रकुलिस के लड़ने से इनकार करने पर उसे भूखे सिंह के समक्ष ढकेला गया। दहाड़कर सिंह अखाड़े में कूदा। लोगों में हिंसक स्फुलिंग की अतीव उत्सुकताएँ जागीं। पर सिंह ने अपने उपकारक की एकाएक पहचान कर उसे खाने के स्थान पर अपने नाखून सिकोड़कर पंजा उसकी ओर बढ़ा दिया। कहते हैं, इस पर आंद्रकुलिस और सिंह दोनों को जंगल की राह पर स्वतंत्र छोड़ दिया गया।


साम्राज्य, युद्घ और गुलाम, इनका कार्य-कारण संबन्ध है। रोम पर उत्तर की बर्बर जातियों ने आक्रमण किया। रोमन साम्राज्य के दो टुकड़े-पूर्व (अनातोलिया तथा यूनान आदि) और पश्चिम (शेष यूरोप) हो गए। बाद में सेना में विदेशियों की भरती और देश में गुलामों की संख्या बढ़ने के कारण रोम का पतन हो गया। यह होते हुए भी रोम की यूरोप में बपौती विधि के क्षेत्र में वैसी ही है जैसे विज्ञान, दर्शन और साहित्य के क्षेत्र में यूनान की। लैटिन भाषा, जो संस्कृत से निकली, ने भी आधुनिक यूरोपीय विज्ञान को शब्दावली दी। विक्रम संवत् की छठी शताब्दी में रोमन सम्राट जस्टिनियन (Justinian) ने, जिसका स्थान कुस्तुनतुनिया (Constantinople) था, अपनी संहिता (Code Constitutionum) प्रवर्तित की, जो आधुनिक यूरोपीय विधि का एक स्त्रोत बनी। इसकी मनु के धर्मशास्त्र से तुलना करें तो लगता है, कितना पीछे ढकेल दिया गया मानव जीवन। रोमन विधि लगभग निर्बाध अधिकार (patria potesta) घर अथवा कुटुंब के मुखिया (pater familias) को देती थी। वही सभी जायदाद का और गुलामों का स्वामी था; उस जायदाद का भी जो उसकी पत्नी एवं पुत्र की थी। पुत्री भी विवाह तक उसके अधिकार में थी और विवाह के बाद पति के अधिकार में चली जाती थी। दूसरा था गुलाम वर्ग, जिनको कुछ अधिकार न थे और जो अपने स्वामी की संपत्ति थे। यह मनु की मूल धारणाओं के बिलकुल विपरीत था, जहाँ पुत्र को संयुक्त परिवार की संपत्ति में स्वत्व प्राप्त होता था और स्त्री-धन की व्यवस्था थी; सभी नागरिक थे। रोमन विधि सामंती या सम्राट-रचित थी; न कि ऋषि-मुनियों या विद्वानों (स्मृतिकारों) द्वारा प्रणीत, जैसा मनु का धर्मशास्त्र।



कांसटेंटाइन  की अर्धप्रतिमा

विक्रम संवत् की चौथी शताब्दी में रोमन सम्राट कांसटेंटाइन (Constantine) ने ईसाई पंथ अंगीकार कर लिया। तब तक चर्च की मशीन खड़ी हो चुकी थी। साम्राज्यवादी रंग जमाकर ऊपरी तौर पर ईसा की प्रेम, अहिंसा की वाणी को जोर-जबरदस्ती से तथा छल-कपट से ठूसने की वृत्ति आ चुकी थी। इसके बाद का 'चर्च' साम्राज्यवाद का पोषक बना, वही ढंग अपनाए। हर प्रकार का बल-प्रयोग और जाल-फरेब की नीति अपनाकर भी धर्मांतरण, स्वतंत्र विचारों का हनन और पंथाचार्यों का कठोर नियंत्रण तथा इसके लिए सभी तरह के उपायों का सहारा उनके तौर-तरीके बने। जिस प्रकार के अत्याचार सहन कर ईसाई संतों ने गौरव प्राप्त किया वैसे ही अत्याचार राज्य द्वारा ईसाईकरण में हुए। चर्च और पंथाधिकरण, उसके 'पापमोचक' प्रमाण पत्र तथा उनके कठोर नियंत्रण ने ईसा की मूलभूत शिक्षा पर ग्रहण लगा दिया। उस समय राजाश्रय में किए गए बल प्रयोग और छल-कपट के कारण श्री पी.एन.ओक ने सम्राट कांसटेंटाइन को 'कंसदैत्यन' कहा है। उसके बाद यूरोप का चर्च द्वारा अनेक संदिग्ध तरीकों से ईसाईकरण हुआ। राज्य तथा ईसाई पंथ एकाकार हो गए। नया सिद्घांत प्रतिपादित हुआ-'साम्राज्य, चर्च का 'सेकुलर' शस्त्र-सज्जित शासन तंत्र है, जिसे पोप ने गढ़ा और जो केवल पोप के प्रति उत्तरदायी है।' यूरोपीय उपनिवेशवाद और ईसाई पंथ का एक गहरा नाता है।

इस चिट्ठी के चित्र विकिपीडिया के सौजन्य से। 

प्राचीन सभ्यताएँ और साम्राज्य
०१ - सभ्यताएँ और साम्राज्य
०२ - सभ्यता का आदि देश
०३ - सारस्वती नदी व प्राचीनतम सभ्यता
०४ - सारस्वत सभ्यता
०५ - सारस्वत सभ्यता का अवसान
०६ - सुमेर
०७ - सुमेर व भारत
०८ - अक्कादी
०९ - बैबिलोनिया
१० - कस्सी व मितन्नी आर्य
११ - असुर जाति
१२ -  आर्यान (ईरान)
१३ - ईरान और अलक्षेन्द्र (सिकन्दर)
१४ - अलक्षेन्द्र और भारत
१५ - भारत से उत्तर-पश्चिम के व्यापारिक मार्ग
१६ - भूमध्य सागरीय सभ्यताएँ
१७ - मिस्र सभ्यता का मूल्यांकन
१८ - पुलस्तिन् के यहूदी
१९ - यहूदी और बौद्ध मत
२० - जाति संहार के बाद इस्रायल का पुनर्निर्माण
२१ - एजियन सभ्यताएँ व सम्राज्य
२२ - फणीश अथवा पणि
२३ - योरोप की सेल्टिक सभ्यता
२४ -  योरोपीय सभ्यता के 'द्रविड़'
२५ - ईसाई चर्च द्वारा प्राचीन यरोपीय सभ्यताओं का विनाश
२६ - यूनान
२७ - मखदूनिया
२८ - ईसा मसीह का अवतरण
२९ - ईसाई चर्च
३० - रोमन साम्राज्य

1 comment:

  1. bhayee sahab,
    email se nirantar aapko padhta hoon aur gyan vriddhi karta hoon.
    anany dhanyavad.

    ReplyDelete