Monday, July 27, 2009

सुमेर व भारत

सुमेर के ऐतिहासिक युग (लगभग ३२०० वर्ष विक्रम संवत् पूर्व) के सहस्त्राब्दियों पहले से देश अनेक नगर-राज्यों में बँटा था। ये नगर स्वायत्तशासी थे। आख्यानों से लगता है कि इन नगर-राज्यों की सत्ता जनसभाओं के हाथ में थी। प्रत्येक नगर-राज्य में दो सदन होते थे। 'समिति' में संभवतया सभी नागरिक शामिल होते थे। पर दूसरे सदन (जिसे भारत में 'समिति' की छोटी बहन 'सभा' कहते थे) में कुछ चुने हुए विशेषज्ञ रहते थे। उनके परामर्श के अनुसार ही राज्य और शासन चलता था। कुछ पुरातत्वज्ञ सुमेरवासियों को 'प्रजातंत्र का जनक' और उनकी सभाओं को 'विश्व की प्राचीनतम जनसभाएँ' कहते हैं। पर भारत में सदा अत्यंत प्राचीन काल से 'गणतंत्र' और 'समिति' तथा 'सभा' का प्रयोग चला आया है। (देखें-पृष्ठ १४२-४३) ये प्रजातंत्र के प्रयोग सामी सभ्यता में कभी नहीं हुए, वहाँ निरंकुश राजतंत्र ही सामान्य शासन-पद्धति थी। यह निर्णायक है कि सुमेरवासी भारत से गए अथवा भारत से आए देवता ने उन्हें भारत में प्रचलित 'गणराज्य' की, उसमें जनता की सत्ता की कल्पना दी। कहा जाता है कि सुमेर से ही यह परंपरा यूनान गयी, जहाँ भारत से प्रभावित उनके उत्कर्ष काल के नगर-राज्य आए।

भारतीय संस्कृति का जहाँ प्रभाव पड़ा वहाँ संस्कृति का किसी साम्राज्य से विलग जीवन देखा जा सकता है। सुमेर में ही अनेक विजेता हुए, जिन्होंने कई नगरों को जीतकर संयुक्त राज्य स्थापित किया, पर हर बार जनशक्ति तथा नागरिक भावना ने पुन: विकेंद्रित कर दिया। अनेक आख्यान हैं, जिनमें नगर के राजा ने सभा (अनुभवी ज्येष्ठों के सदन) में विचार किया, परंतु असहमति होने पर समिति (लोकसभा) के परामर्श से कार्य किया। सुमेरियन सभ्यता में राजसत्ता जनसभाओं में थी और राजा उनके परामर्श के अनुसार कार्य करता था। उसका मूल प्राचीन भारतीय रचना में है। इस प्रकार सांस्कृतिक एकता के बाद भी एक साम्राज्यवादी शक्ति का उदय नहीं हो पाया। ऐसा भारत में अनेक बार होता रहा।

सुमेर का जीवन नगर-देवता के मंदिर के चारों ओर निर्मित था। भूमि मंदिर (अर्थात समाज) की होती थी। उसका एक भाग निगेन्ना सामूहिक था, जिसमें उस मंदिर के सभी व्यक्तियों को काम करना पड़ता था। वहाँ कार्य करने के लिए हल, जोतने के लिए बैल और गधे, खेती के औजार और बोने के लिए बीज-सभी मंदिर की ओर से उपलब्ध होते थे। सार्वजनिक भवन और बाँध की मरम्मत भी सभी लोग मिलकर करते थे। मंदिर का प्रमुख पुजारी बीज तथा उत्सवों के लिए उपज रखकर बाकी सभी लोगों में बाँट देता था। उत्सवों में भी सभी को कुछ भाग मिलता था। भूमि का दूसरा भाग ('कुर') मंदिर के पदाधिकारी सभी सदस्यों में बाँटते थे। इससे हरेक को कुछ-न-कुछ भूमि अपनी अलग खेती करने के लिए मिल जाती थी। और तीसरा भाग ('उरूललू') लगान पर (जो उपज का १/६ से १/३ तक हो सकता था) उठा दिया जाता था। प्रमुख पुजारी के सहायक के रूप में खेतों, भंडारगृहों और संपत्ति की देखरेख तथा आय-व्यय का लेखा-जोखा रखने के लिए अनेक पदाधिकारी कर्मचारी रहते थे। नगर-देवता एवं मंदिर की दृष्टि में सभी सदस्य समान थे। चाहे वह पुजारी हो अथवा कृषक, व्यापारी या मंदिर से संबंधित बढ़ई, लोहार अथवा अन्य कारीगर, या श्रमिक, सभी को सामूहिक भूमि में श्रम व काम करना पड़ता था। स्त्रियों को पुरूषों के समान अधिकार प्राप्त थे। समता का यह आदर्श और अनुशासनबद्घ कार्य, जिसे कुछ विद्वानों ने 'धार्मिक समाजवाद' कहा, भारत की देन है। प्राचीन भारतीय जीवन अथवा सारस्वत नगरों में ये पहलू देखे जा सकते हैं।

यदि सारस्वत सभ्यता सुमेर सभ्यता से पुरानी है (जैसा अधिकांश पुरातत्वज्ञ विश्वास करने लगे हैं) तो कीलाक्षर लिपि की प्रेरणा (जैसा सुमेरी किवदंतियां कहती हैं) पूरबी सारस्वत सभ्यता से प्राप्त हुई। सुमेरी लिपि पश्चिम एशिया की प्राचीनतम लिपि है। उसका उपयोग अन्य सभ्यताओं ने सीखा। सुमेर का व्यापार सारस्वत नगरों में था ही। सुमेर में वैसा ही साहित्य, जीवन एवं मृत्यु के विचार, दार्शनिक आख्यान, जैसी प्राचीन भारत की प्रारंभिक परंपरा थी, पाए जाते हैं। गणना '६०' के अंक को आधार मानकर अर्थात 'षाष्ठिक' (sexagesimal) स्थानिक मान पद्धति पर करते थे। आज तक हम कोणीय माप में ६० के आधार का प्रयोग करते हैं। पर उन्हें 'शून्य' का संकेत ज्ञात न था। संभवतया वे भारत से उस संकेत के आविष्कार के पहले विलग हो गए। उनकी षाष्ठिक गणना-पद्घति और ज्योतिष का ज्ञान तथा कीलाक्षर लिपि को बाद की सामी सभ्यताओं ने अपना लिया।


प्राचीन सभ्यताएँ और साम्राज्य


०१ - सभ्यताएँ और साम्राज्य
०२ - सभ्यता का आदि देश
०३ - सारस्वती नदी व प्राचीनतम सभ्यता
०४ - सारस्वत सभ्यता
०५ - सारस्वत सभ्यता का अवसान
०६ - सुमेर
०७ - सुमेर व भारत
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Sunday, July 19, 2009

सुमेर

सुमेर (Sumer) कुछ समय पहले तक प्राचीनतम समझी जाने वाली सभ्यता, जहाँ की कुछ बातें सारस्वत सभ्यता से मिलती-जुलती हैं। यह बाइबिल में वर्णित 'शिनार (Shinar) की दजला और फरात के दो-आबे के दक्षिणी-पूर्वी भाग की कहानी है। इस दो-आबे में प्राचीन काल में हर प्रकार से भिन्न दो जातियाँ निवास करती थीं। दक्षिण-पूर्वी भाग को सुमेर (शिनार) कहते थे, जहाँ रहते थे साँवले अथवा गेहुँए वर्ण और नाटे कद के, ऊँची और नुकीली नाक तथा काले बाल वाले सुमेर वासी। ये सिर एवं मुख को केशरहित रखते थे। दो-आबे के उत्तर-पश्चिमी भाग में सामी लोग थे, जिन्हें अक्कादी कहा जाता है। ये दाढ़ी और बाल रखते थे। इन दोनों के क्षेत्र मिलाकर 'मेसोपोटामिया' (शाब्दिक अर्थ : नदियों के मध्य) नाम दिया गया है; जहाँ बाद में बाबुल की सभ्यता आई। यह परवर्ती सभ्यता वास्तव में सुमेरी सभ्यता की देन है।

यह सुमेर वासी कौन सी जाति थी जिसने दजला और फरात के मुहानों के पास दलदलों का पानी निकालकर तथा नरकुल और उसके ऊपर मिट्टी डालकर भूमि का निर्माण किया, नहरें बनायीं, देवी-देवताओं के मंदिर और अपने लिए आवास बनाकर नगरीय सभ्यता खड़ी की? उनकी किंवदंतियों के अनुसार ये लोग पूर्व से आकर बसे। पुरानी बाइबिल के उत्पत्ति भाग में एक स्थान पर वर्णन है,
'और वे पूर्व से आए तथा शिनार (सुमेर) में मैदान पाकर बस गए। उन्होंने एक-दूसरे से कहा, 'हम ईंट बनायें और उन्हें अच्छी तरह पकाएँ।' उन्हें पत्थर के स्थान पर ईंट प्राप्त हुयी और गारे के लिए पंक।'

आखिर ये कौन थे, जो ईंट का प्रयोग जानते थे ? सुमेर के पास आधुनिक ईरान के दक्षिण-पश्चिमी भाग में एलम (Elam) की प्राचीन सभ्यता में भी सुमेरी तत्व पाए जाते हैं। उस सभ्यता के चार प्रसिद्घ नगरों में सुसा (या सुषा) नगरी (Susa) प्रसिद्घ है। इलम की वह राजधानी थी। मत्स्य पुराण में जहाँ इस बात का वर्णन है कि माया नगरी (हरिद्वार) में जब प्रभात, दोपहर, सूर्यास्त अथवा अर्द्घरात्रि होती है तब संसार के प्रसिद्घ नगरों में क्या समय होता है, वहाँ सुसा का संसार की प्रमुख नगरियों में उल्लेख आता है। आज भी भू-चित्रावली में 'सुसा के भग्नावशेष'(ruins of Susa) नामक क्षेत्र देख सकते हैं। एलम तथा सुमेर इन दोनों की किंवदंतियाँ समान हैं और कीलाक्षर लिपि भी। यह स्पष्ट है कि एलम तथा सुमेर की सभ्यता के प्रणेता एक ही थे।

इन सबसे पुरातत्वज्ञ यह विश्वास करते हैं कि ये लोग पूर्व से, सारस्वत सभ्यता के धनी सिंधु की घाटी से, आधुनिक बलूचिस्तान (गांधार) होकर एलम तथा सुमेर में आए। सुमेर के एक आख्यान में 'ओआनिज' नामक देवता का वर्णन है, जो पूर्व से समुद्री मार्ग से आया और सुमेर को उनकी सभ्यता दी। उन्हें खेती करना, लिखना, अनेक कलाएँ और विज्ञान सिखाया। वैदेल (यहां देखें) (Waddel) ने अपनी पुस्तक में कहा है कि
'सुमेर निवासी आर्य थे और उनके शासक वही हैं जिन प्राचीन राजाओं का उल्लेख पुराणों में आया है।'

प्राचीन सभ्यताओं में अनेक बार उस सभ्यता के निर्माता महापुरूष के जीवन से प्रेरणा लेकर अपने को भी वैसा ही आया हुआ कहने लगते हैं। जो भी हो, सुमेर वासी और सामी अक्कादी लोग आपस में इतने भिन्न थे कि सारस्वत सभ्यता से लोग गांधार तथा एलम होकर सुमेर पहुँचे, यही सत्य लगता है।

आज सुमेर की प्राचीन सभ्यता के बारे में जितने तथ्य ज्ञात हैं उतने किसी अन्य प्राचीन सभ्यता के बारे में नहीं। उन्नीसवीं सदी के बीच, जब पहले-पहल यह पता चला कि बाबुल की सामी सभ्यता ने कीलाक्षर लिपि एक प्राचीनतर जाति से सीखी, जो अपनी लीला-स्थली को सुमेर कहती है, तभी ऐसे अभिलेख मिले जिनमें सुमेरी भाषा की शब्दावली तथा बाबुली भाषा का अनुवाद साथ-साथ था। इससे सुमेरी भाषा पढ़ने तथा अर्थ समझने का मार्ग निकला। ये अभिलेख मृद्-पट्टिकाओं पर कुरेदकर, उन्हें पकाकर दृढ़ किए गए थे। उनके शिक्षालयों में पढ़ाने की पुस्तकें और शब्दकोश पकी मृद् (मिट्टी की) पट्टिकाओं के रूप में प्राप्त हुए। सैकड़ों अभिलेख मिले जिनसे साहित्य, दर्शन, विज्ञान, समाजिक तथा राजनीतिक गठन, सामान्य जीवन, अर्थव्यवस्था, धार्मिक विचार और पौराणिक गाथा, सभी पर प्रकाश पड़ता है।


प्राचीन सभ्यताएँ और साम्राज्य


०१ - सभ्यताएँ और साम्राज्य
०२ - सभ्यता का आदि देश
०३ - सारस्वती नदी व प्राचीनतम सभ्यता
०४ - सारस्वत सभ्यता
०५ - सारस्वत सभ्यता का अवसान
०६ - सुमेर

Saturday, July 11, 2009

सारस्वत सभ्यता का अवसान

ऐसा ही एक रहस्य सारस्वत सभ्यता के अवसान का कहा जाता है। बदलती जलवायु की दैवी आपदा ही शायद इसका कारण बनी। एक जगह सीढ़ी पर कंकाल देखकर कुछ विद्वान कल्पना करते हैं कि शत्रु द्वारा पीछा करने पर सीढ़ी से ऊपर भागने की दशा में उनका शरीरांत हुआ। परंतु उस दृश्य से ऐसा लगता है कि पास की सिंधु नदी में अचानक बाढ़ आने से, जैसे बांध टूटने पर हो, छत पर जाते समय पानी के एकाएक भरने पर जल-समाधि हो गयी। अनेक बातों में आज के साधारण देहाती जीवन में सारस्वत सभ्यता के रहने के ढंग का आभास दिखता है। कला और विज्ञान में भी और उनके पशु-पक्षियों तथा वृक्षों से परिचय में भी। यदि यह आर्य सभ्यता का एक प्राचीन रूप ही था तो आर्यों का कहीं बाहर से आकर इस सभ्यता को नष्ट करना मनगढ़ंत है। संभवतः इसके नष्ट होने का कारण प्रमुख केंद्रों की ओर बढ़ती सर्वग्रासी मरूभूमि, बदलती और शुष्क-कठोर बनती जलवायु ही थी।

कैसी भी सभ्यता हो, उसमें विचार सदा एक- से नहीं रहते। वे समय के अनुसार और बदलती आवश्यकताओं के कारण परिवर्तित होते हैं। इसलिए उस समय से चले हुए सभ्यता के सूत्र को परिवर्तित तथा विषमता भेद कर देखना पड़ता है, जिससे उस धारा की प्रतीति पा सकें । इस ढंग से देखें कि कैसे सारस्वत सभ्यता ने संसार की अनेक सभ्यताओं को प्रभावित किया। भारत में सभ्यता की जो स्तर आया, वह आर्यों की अनेक शाखाओं, जिन्होंने यूरोप, पश्चिमी एशिया या भूमध्य सागर के देशों को अपना लीला-स्थल बनाया, से उच्च एवं भिन्न था। भारत की शांति की नगर-ग्रामयुक्त आवासीय सभ्यता से देसरे आर्यों के घुमक्कड़ जीवन की तुलना अर्थहीन है। पता नहीं कि यूरोपीय बर्बर, आर्यवंशी कहलाने वाले, कबीलों के घुमंतू जीवन की तथा भारत की आवासीय सभ्यता ने जिन्हें महिमामंडित किया, इन दोनों समाजों की तुलना में समान व्यवहार की अपेक्षा करने और समकक्ष रखकर देखने का बुद्घिभ्रंश कैसे उत्पन्न हुआ।


प्राचीन सभ्यताएँ और साम्राज्य


०१ - सभ्यताएँ और साम्राज्य
०२ - सभ्यता का आदि देश
०३ - सारस्वती नदी व प्राचीनतम सभ्यता
०४ - सारस्वत सभ्यता
०५ - सारस्वत सभ्यता का अवसान

Sunday, July 05, 2009

सारस्वत सभ्यता

परंतु भारत की धरती पर उत्पन्न और पली संसार की इस प्राचीनतम सभ्यता के उदय के बारे में पश्चिम के कुछ पुरातत्वज्ञों ने प्रश्नचिन्ह खड़ा किया। वे कहते हैं कि वैदिक सभ्यता और सारस्वत सभ्यता भिन्न थीं, क्योंकि एक ग्राम्य कृषि प्रधान सभ्यता थी तो दूसरी नागर व्यापार-प्रधान। जैसे व्यापारिक नगर तथा कृषि-ग्राम साथ-साथ एक संस्कृति के अंग न हो सकते हों। भारत में सदा इनका सह-अस्तित्व रहा है। इस पूर्वाग्रह ने कि 'आर्य' बाद में बाहर से आए, सारस्वत सभ्यता को 'अनार्य' सभ्यता घोषित करना चाहा। कारण दिया,

'सिंधु सभ्यता को आर्य सभ्यता मानने पर भारत को आर्यों का आदि देश मानना आवश्यक हो जाएगा।'
अनेक तर्क जो दिए जाते थे उनको आज सरस्वती नदी और उसके नगरों की खोज और इस नवीन शोध ने कि भारत मानव का आदि देश है, गलत सिद्ध किया है।

अभी तक की खोज में सारस्वत सभ्यता के नगर मिले हैं। सभी नगर पूर्व-नियोजित ज्यामितीय ढाँचे में आयताकार हैं। उस समय की दृष्टि से खूब चौड़ी उत्तर-दक्षिण एवं पूर्व-पश्चिम समकोणीय सड़कें, जिनमें दो पहिए की बैलगाड़ियाँ और चार पहिए वाले रथ चल सकते थे। अच्छी तरह पकाई ईंटों से निर्मित बड़े सभा भवन तथा दुमंजिले आवास, जिनमें आँगन, सीढ़ियां, कुएँ, स्नानागार एवं शौचालय की व्यवस्था थी और छत का पानी निकालने के लिए परनाले। गृह के द्वार तथा खिड़कियाँ सड़क की ओर न होकर गली की ओर थे, जो दो से तीन मीटर तक चौड़ी थीं। बाजार, जहाँ क्रय-विक्रय के लिए चबूतरे थे। पश्चिम की ओर दुर्गनुमा विशाल कोठार, उसके पास संभवतया अनाज दलने तथा पीसने के पर्याप्त बड़े गोल चबूतरे। वहीं श्रमिकों के आवास और धातु गलाने की भट्ठियाँ। सड़कों से नगर कई भागों में विभक्त थे और संभवतया प्रत्येक भाग में किसी विशिष्ट व्यवसाय, निर्माण अथवा उत्पादन में लगे कारीगर रहते होंगे, ऐसा पुरातत्वज्ञों का मत है। क्या यह उस समय की वर्ण-व्यवस्था का या कर्म अथवा व्यवसाय के अनुसार विभाजन का पर्याय था? जल-निकासी का समुचित प्रबंध; भलीभाँति पाटों  से ढकी नालियां। छोटी नालियां सड़क के दोनों ओर की पक्की नालियों से जाकर मिलती थीं। नालियों के किनारे गढ़े मिले, जहाँ कूड़ा अथवा नालियों का कीचड़ इकट्ठा किया जाता होगा। इन नालियों में कहीं-कहीं जल शोषक गड्ठे (soak pit) भी थे। सड़कों की सफाई का प्रचुर ध्यान तथा व्यवस्था थी। सबसे बड़ा आश्चर्य एक विशाल जल-संरक्षण का साधन है, जिसे कुछ ने स्नानागार कहा। यह एक पक्के तालाब के रूप में है, जिसमें पानी भरने और निकालने की व्यवस्था है। उसके किनारे नहाने के लिए कोठरियां हैं। तालाब की ईंटों की परतों के बीच डामर  भरा है।

आवास तथा भवन के लिए पकी ईंट का प्रयोग प्राचीन सभ्यताओं में अभिनव था। सुमेर में इसका प्रयोग स्नानागार एवं शौचालय तक सीमित रहा। मिश्र में पकी ईंट का प्रयोग रोमन युग में प्रारंभ हुआ। स्पष्ट है कि सारस्वत सभ्यता में वास्तुकला तथा नगर-नियोजन  के विशेषज्ञ थे, जो आधुनिक नगर-नियोजक की भाँति नगर, यातायात, आवास, व्यापारिक संस्थान, जल-संरक्षण और निकासी, स्वच्छता, मल तथा कूड़े की व्यवस्था आदि का योजनापूर्वक निर्माण कर सके। ऎसा नियोजन संसार की किसी सभ्यता में विक्रम संवत् की उन्नीसवीं शताब्दी तक नहीं मिलता, जब आधुनिक नगर बनने प्रारंभ हुए।

इस नगर सभ्यता के संभरण-पोषण के लिए बड़े पैमाने पर कृषि की आवश्यकता थी। बदलती जलवायु के कारण यहाँ के जंगल (जिसकी लकड़ी तथा ईंधन से पकी ईंटें प्राप्त हुईं), कृषि-क्षेत्र एवं संलग्न ग्राम और नदी से निकली सिंचाई की नहरें आज लुप्त हो गयीं। पर इनका अस्तित्व असंदिग्ध है। उपयोगी मृदभांड  तथा कांस्य के पात्र मिलते हैं। इन बरतनों पर पशु-पक्षियों, जंतुओं अथवा वृक्षों के सरल रेखाचित्र और मानव आकृतियाँ हैं। वैसी ही हैं मिट्टी, पाषाण तथा काँसे की मूर्तियाँ। लोग पलथी लगाए बैठे हैं। हीरे-जवाहरात से सजी, केश सँवारे स्त्री प्रतिमाएँ। परंतु पुरूष प्राय: उघारे बदन हैं, जिनमें शरीर का सौष्ठव दिखता है। और ढेर सारी सेलखड़ी से बनी मुद्राएँ हैं जिनमें पशु आकृति, साधारणतया बैल की थी। इनमें कुछ लिखा है। भारतीय जीवन में ऎसे आँगनयुक्त भवन, उसी प्रकार पुरूषों के लिए गरम स्थलों में उघारे बदन रहना स्वाभाविक है। एक सींगधारी पुरूष की मूर्ति भी पायी गयी, जिसे कुछ पुरातत्वज्ञ शिव की मूर्ति समझते हैं। दूसरे पुरूषों की दाढ़ी युक्त मूर्तियाँ भी हैं, जिनमें मूँछों के बाल नहीं हैं। मुसलमानों हाजियों की यह प्रथा, जैसा चक्रवर्ती सम्राट सगर के आख्यान से प्रकट है, पहले भी थी।

आज भी सारस्वत सभ्यता अनेक रहस्यों से घिरी है, उनमें सबसे जटिल उनकी 'कीलाक्षर लिपि' है। वह पूर्णरूपेण पढ़ी नहीं जा सकी। डा. फतेहबहादुर सिंह ने, जो जोधपुर संग्रहालय के अध्यक्ष थे, उसके पाठ का यत्न किया। श्री सुब्बाराव ने अब पर्याप्त कार्य किया है। वैसे वैदेल (Waddel) ने अपनी पुस्तक 'पुराण व इतिहास में सभ्यता के निर्माता' (The makers of Civilization in Race and History)  में एक स्थान पर एक मुद्रा की भाषा का रोमन लिपि में ध्वनि रूपांतर (phonetic translation) सुझाया- 'DILIPT-PRT-JYNT-NR'; मेरे छोटे बाबा जी (चौ. धनराज सिंह) ने कहा था,

'कैसे पूर्वाग्रह ग्रसित हैं पाश्चात्य विद्वान! वे इसका अर्थ  सामी अथवा आसुरी भाषा में खोजते हैं भारत की धरती में। अपने दोषपूर्ण आधार के कारण, कि यह आर्यों के पहले की कोई सभ्यता है। पढ़ो इसे संस्कृत में। मुद्रा कहती है-'दिल्लीपति-पार्थ-जयंत-नर'। ये सब अर्जुन के नाम हैं।'
मैंने कहा,

'दिल्ली तो आधुनिक नाम है। तब कहाँ से आया?'
हँसते हुए उन्होंने उत्तर दिया,

'पुराणों में राजा 'दिलीप' का वर्णन है न? वे दिल्ली के पालक थे, इसी से 'दिलीप' नाम पड़ा।'
जैसा भी हो, लिपि देर से पढ़ी जाने के एक कारण दुराग्रह है। इससे सारस्वत सभ्यता के उदय, इतिहास, दर्शन, समाज-रचना तथा धार्मिक विचार पर पड़ा आवरण अब धीरे-धीरे हट रहा है।

प्राचीन सभ्यताएँ और साम्राज्य


०१ - सभ्यताएँ और साम्राज्य
०२ - सभ्यता का आदि देश
०३ - सारस्वती नदी व प्राचीनतम सभ्यता
०४ - सारस्वत सभ्यता