Monday, January 26, 2009

अन्य देशों में मानवाधिकार और स्वत्व

इस स्वत्व के साथ जुड़ा है व्यक्तिगत स्वतंत्रता का प्रश्न। पश्चिम एशिया, अफ्रीका और यूरोप की सभी प्राचीन सभ्यताओं में मानव समाज के कलंक 'दासता' (slavery) की भयावह प्रथा प्रचलित थी। विशेष रीति से जो साम्राज्य एवं सभ्यताएँ तलवार के बल से कायम हुईं, टिकीं और बड़ी बनीं, उनमें इस अत्याचारी प्रथा का नंगा नाच देखा जा सकता है। दासों (गुलामों) के व्यापक  शोषण एवं उत्पीड़न से, उनके पसीने एवं रक्त से, कम-अधिक मात्रा में सने हैं इन सभ्यताओं के रंगमहल। उसी से बनी पश्चिमी जीवन की इमारत। अरब और मुसलिम जगत, यूनान, रोम, भूमध्य सागर के चारों ओर के अन्य देशों में और अंत में यूरोपीय देशों की उपनिवेश तथा साम्राज्य-लिप्सा द्वारा पश्चिमी एशिया, यूरोप, अफ्रीका और उत्तरी एवं दक्षिणी अमेरिका में इस घोर गर्हित प्रथा की काली घटा छाई।


कबीलों का सादा जीवन (जैसा आस्ट्रेलिया और अमेरिका के आदिम निवासियों में पाया गया) दास प्रथा से अपरिचित था। पर पश्चिमी सभ्यता में संघर्ष तथा युद्घ आया और तज्जनित कृषि एवं उद्योंगों में श्रमिकों की आवश्यकता। तब युद्घबंदियों का मजदूर के रूप में उपयोग प्रारंभ हुआ। संभवतया उसी में इस निंदनीय प्रथा का जन्म उस समाज में हुआ जहाँ बर्बर अवस्था से उबरना न हो सका था, न सामाजिक जीवन-दर्शन उत्पन्न हुआ, न मानव-मूल्यों की कल्पना आई।


दास पाने का प्रमुख स्त्रोत युद्घबंदी थे। इसके अतिरिक्त दीन माता-पिता कभी नितांत विपत्ति अथवा संकट में अपनी संतान को, या ऋण चुका सकने में असमर्थ व्यक्ति अपने को दास के रूप में उपस्थित करता था। दासों का क्रय-विक्रय यूनान, साइप्रस, रोम, अरब और पश्चि के बाजारों में साधारण घटना थी। यहाँ एशियाई, अफ्रीकी तथा यूरोपीय दासों का सौदा होता था। यूनान में दास बहुत बड़ा संख्या में थे। कहते हैं, अकेले एथेंस में उनकी संख्या स्वतंत्र नागरिकों से अधिक थी। होमर के महाकाव्य 'इलियड' तथा 'ओडेसी' में उनका वर्णन आता है।


रोम साम्राज्य का प्रारंभ तथा प्रसार सैन्य बल पर हुआ था। वहाँ दास प्रथा पराकाष्ठा पर पहुँची। इस प्रथा के नियम रोमन विधि के विशिष्ट अंग थे। जिस कार्थेज (Carthage) को फणीशियों ( Phoenicians) (संभवतया यह पुराणों में वर्णित पणि या नाग जाति है) ने उत्तरी अफ्रीका के सुरक्षित तट पर विक्रम पूर्व नौवीं-आठवीं शताब्दी में बसाया, उसके साथ युद्घ-श्रंखला के चलते रोम में श्रमिकों की कमी हो गई। तब युद्घबंदियों से दासों की भाँति काम करवाने से यह प्रथा निर्ममता के शिखर छूने लगी। कहते हैं, उस समय कुछ प्रमुख बाजारों में दस हजार दासों का प्रतिदिन सौदा होता था। मनोरंजन के लिए भी दासों को शस्त्रों से अथवा कठघरे में रखे बए हिंस्र पशु से युद्घ करना पड़ता था, जिनमें घायल होना एवं मृत्यु साधारण बात थी।


ऎसी दशा में विक्रम संवत् पूर्व प्रथम शताब्दी में रोम के विरूद्घ दास-विद्रोह प्रारंभ हुए। एक समय दक्षिण इटली दासों के हाथ में चला गया। इधर साम्राज्य का विस्तार और उसके लिए युद्घ बंद हो गए। तब दासों का मिलना कम हो गया। रोमन साम्राज्य के पतन का प्रमुख कारण यह दास प्रथा कही जाती है। दास का अपने उत्पीड़न के आधार पर खड़ी व्यवस्था से कोई लगाव न था। रोमन साम्राज्य के समाप्त होते ही दास प्राप्त करने के लिए छापे तथा आक्रमण कम हो गए और दास प्रथा में कमी आई।


पर यूरोप में यह दास प्रथा चौदहवीं शताब्दी तक सामान्यतया चलती रही। अब दास अधिकांशत: 'स्लाव' (Slav); देश से मिलते थे। इसी से अंग्रेजी में दासता के लिए 'स्लेवरी' शब्द प्रयोग होता है। चौदहवीं शताब्दी के समीप पश्चिमी एशिया तथा पूर्वी यूरोप में पुन: युद्घ की छाया मँडराई। इसके कारण पश्चिमी यूरोप को युद्घबंदी दास के रूप में प्राप्त होने लगे। ये बंदी 'यीशु के शत्रु' समझे जाते थे और निरंकुश अत्याचारों के शिकार बनते। पादरियों की सेवा के लिए गिरनाघर में जो दास रखे जाते थे उनकी सबसे बदतर दुर्दशा थी। अरब देश तो सदा से अफ्रीकी दासों का व्यापार करते थे। पैगंबर ने गुलामों के साथ सहृदयता दिखाने की सलाह दी। पर व्यवहार में घोर कट्टरपन ने उलटा उन्हें नारकीय जीवन बिताने पर विवश किया। अरब का यह इसलामी कालखंड अधिकांशत: युद्घ की भट्ठी में जलता रहा। उनके साम्राज्य-प्रसार ने दासता को हवा दी। दास व्यापार पुन: बड़ी मात्रा में चालू हुआ।


जब यूरोप निवासियों का औपनिवेशिक युग प्रारंभ हुआ तब दास प्रथा में और बढ़ोत्तरी हो गई। पुर्तगाली अफ्रीकी दासों के व्यापार में अरबों से लोहा लेने लगे। नई दुनिया की खोज के बाद पश्चिमी द्वीप समूह, मेक्सिको और मेक्सिको की खाड़ी के क्षेत्र तथा पूर्व-उत्तरी अमेरिका का पूर्व-दक्षिण तट, पूरू, ब्राजील तथा अन्य देशों में यूरोपवासियों ने बड़े-बड़े क्षेत्र अपने कब्जे में कर लिये। वहाँ गन्ना, कपास, तंबाकू आदि और खाद्यान्नों की विस्तृत खेती के लिए श्रमिक चाहिए थे। उसकी पूर्ति पहले छापा मारकर वहाँ के आदिम निवासियों को दास बनाकर की, जिनको उनके खेतों से अथवा प्रदेश से निकाल दिया; उनके स्त्री-बच्चों को बाजारों में बेचा। अनेक आदिम जातियों का नाम इस प्रक्रिया में मिट गया। इन ईसाई 'सभ्य' लोगों के लिए इन 'धर्मभ्रष्ट'  लोगों को 'सच्चा धर्म' दिखाने का एकमेव मार्ग इन्हें दास बनाना था। यूरोप निवासियों के अत्याचारों की कहानी अमेरिकी मूल जातियों के ह्रास तथा समूल वंश-नाश ने लिखी है।


सोलहवीं शताब्दी में अफ्रीकी दासों का अमेरिका में आयात प्रारंभ हुआ। इन हब्शियों को जहाजों में जानवरों की तरह ठूसकर समुद्र पार अमेरिका ले जाया जाता था। वहाँ उन्हें बेचकर वस्तुएँ और सोने से लदे जहाज यूरोत आते। मानव का क्रय ही यूरोप और अमेरिका की लौकिक समृद्घि की कहानी है। परंतु इससे इस भयानक अत्याचार का पूरा व्याप प्रकट नहीं होता। दासों के आवास से घुड़साल अच्छी; उनका आधा पेट भोजन और काम के समय पूरी टोली पर गोरे पर्यवेक्षक के कोड़े! दास प्रथा का दु:ख-दर्द तो आंशिक रूप से श्रीमती हैरियट स्टोई की पुस्तक 'टाम काका की कुटिया' ('Uncle Tom's Cabin': Harriet Beecher Stowe)  पढ़कर समझ सकते हैं। कहते हैं कि इसी पुस्तक के कारण संयुक्त राज्य अमेरिका का गृहयुद्घ हुआ। अब्राहम लिंकन ने (जो उस समय वहाँ के राज्याध्यक्ष थे) कहा, 'यदि दास प्रथा पाप नहीं है तो संसार में कुछ भी पाप नहीं।' फ्रांस की राज्यक्रांति के नारों के कारण भी यूरोप का वातावरण बदल रहा था। ऎसे समय में भीषण गृहयुद्घ में वह देश संयुक्त बच सका।


पर यूरोपीय साम्राज्यवाद दास प्रथा के नए रूप लेकर आया। भारत से बड़ी मात्रा में अनुबंध के अंतर्गत गिरमिटिया कहकर श्रमिकों को अनेक प्रकार के लालच दे, प्रशांत तथा हिंद महासागर के द्वीपों में और अफ्रीका में भेजना प्रारंभ हुआ। वहाँ उनके कोई अधिकार न थे। वे केवल उन अधिकारों का उपभोग कर सकते थे जो उनके स्वामी उन्हें देते थे। उनके रीति-रिवाज, यहाँ तक कि भारत में हुआ विवाह भी अमान्य था। पति पत्नी से, भाई भाई से, माता-पिता संतानों से अलग, करार के अंतर्गत स्वामी की इच्छानुसार रखे जा सकते थे। वेतन जब चाहा, फर्जी त्रुटि दिखाकर काटा जा सकता था। अपनी मातृभूमि से दूर गुलाम देश के इन निवासियों की दशा 'दास' के समान थी। तब वैसी ही एक नाटक की पुस्तक 'कुली प्रथा अथवा बीसवीं सदी की गुलामी' आई। यह पुस्तक हिंदी की प्रसिद्घ कवयित्री सुभद्राकुमारी चौहान के पति श्री लक्ष्मणसिंह चौहान ने लिखी थी। प्रकाशित होने के कुछ दिन बाद वह जब्त हो गई। पर यह 'गिरमिटिया' नामक कुली प्रथा प्रथम महायुद्घ के समीप बंद हो गई।

इस चिट्ठी के चित्र विकिपीडिया के सौजन्य से हैं।
०१ - कुरितियां क्यों बनी
०२ - प्रथम विधि प्रणेता - मनु
०३ - मनु स्मृति और बाद में जोड़े गये श्लोक
०४ - समता और इसका सही अर्थ
०५ - सभ्यता का एक मापदंड वहाँ नारी की दशा है
०६ - अन्य देशों में मानवाधिकार और स्वत्व  




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Tuesday, January 20, 2009

प्राचीन भारत में मानवाधिकार

तीसरी बुनियादी धारणा मानव-मूल्यों को लेकर है। आज सारे संसार में मानवाधिकार (human rights) को लेकर बतंगड़ खड़ा किया जाता है और इसकी होड़ में कुछ देश शायद जानबूझकर या अपप्रचार के शिकार बनकर अपनी स्वार्थ-पूर्ति में दादागिरी का दृश्य उपस्थित करते हैं। खोखले दावों की प्रतीति भी उन्हें नहीं होती। प्राणिमात्र के 'स्वत्व' की भारतीय विचारधारा के संदर्भ में इसे समझना आवश्यक है।

मानवाधिकारों के पश्चिमी विचारों के मूल में एक मनोग्रंथि है। वहाँ सभी अधिकारों की चर्चा करते हैं। कानून की आवश्यकता के बारे में उनकी साधारण मान्यता है कि मानवाधिकार और समूह अर्थात समाज के अधिकारों में कोई विरोध है, इसलिए कानून के मूल में ऎसी धारणा पर यूरोपीय समाजवाद या साम्यवादी विचार दर्शन खड़ा है। पर हिंदु विधि एवं दर्शन का मूलभूत विश्वास है कि व्यक्ति और समाज ( जिसका वह एक घटक है) के अधिकारों में कोई अंतर्निहित प्रतिकूलता नहीं है। दोनों परस्परावलंबी हैं। सामाजिक विकास का मूलाधार उसके घटकों का विकास है, और मानव जीवन के गुणों के विकास के लिए व्यक्तिगत स्वतंत्रता अनिवार्य है। पर दूसरी ओर मनुष्य की सार्थकता समाज में है।

इससे भी बढ़कर हिंदु जीवन एवं दर्शन का विश्वास है कि मानव-मूल्यों के अनुरूप प्राणिमात्र के स्वत्व की रक्षा होनी चाहिए। यही नहीं, सभी प्राणियों व मानव का प्रकृति के साथ सामंजस्य होना चाहिए। यह पर्यावरण के संरक्षण का मूल मंत्र है।

प्राचीन भारतीय विधि में 'स्वत्व' शब्द का प्रयोग होता है। साधारणतया इसे 'अधिकार' का समानार्थी मानते हैं। पर इस शब्द का जोड़ शायद संसार की किसी भाषा में नहीं है। व्युत्पत्ति की दृष्टि से इसका अर्थ होता है, 'जो तुमको देय या तुम्हारा प्राप्य है' अर्थात वही तुम्हारा 'स्वत्व' है। यह तुम्हारा अधिकार नहीं, पर स्वत्व होने के नाते सभी को वह तुमको देना होगा। स्वत्व उन सबके कर्तव्य से, जो तुम्हारे संबंध में आएँ, जुड़ा दायित्व है। यह अधिकारों को दूसरी ओर से देखने का उपक्रम है; एक अनूठी भारतीय कल्पना।

प्राचीन विधि में मुक्त वायु, जल, धरती और आकाश प्राणिमात्र के 'स्वत्व' कहे गए हैं। यह प्रत्येक प्राणी को दिया जाता है, क्योंकि उसने इस पृथ्वी पर जन्म लिया है। इसको 'ना' नहीं करेंगे। यह स्वत्व प्राणों से जुड़ा है; जीवन में व्याप्त है। उसे अलग नहीं किया जा सकता। पिंड जहाँ बना है वहाँ उसका स्वत्व है। यह किसी के द्वारा प्रदत्त नहीं, और इसलिए किसी के द्वारा छीना भी नहीं जा सकता । अधिकार राजसत्ता तथा अंतरराष्ट्रीय समझौते के द्वारा प्रतिबंधित किए जा सकते हैं; पर 'स्वत्व' न तो प्राधिकार (Privilege) है, न नैसर्गिक अधिकार, क्योंकि वह अहरणीय है।

'मुक्त वायु' दैहिक स्वतंत्रता की कल्पना है। मेरे बचपन में मेरी माँ गाय को दुहने के समय के अतिरिक्त बाँधकर रखना गर्हित समझती थीं। उसे बाड़े में, जिसके किनारे गोशाला का छप्परयुक्त कमरा था, छोड़ देते थे। केवल अपराधी को ही निरूद्घ किया जा सकता था। पालतू चिड़ियों और पशुओं को पिंजरे या कठघरे में बंद रखना नीच कर्म माना गया।


०१ - कुरितियां क्यों बनी
०२ - प्रथम विधि प्रणेता - मनु
०३ - मनु स्मृति और बाद में जोड़े गये श्लोक
०४ - समता और इसका सही अर्थ
०५ - सभ्यता का एक मापदंड वहाँ नारी की दशा है
०६- प्राचीन भारत में मानवाधिकार

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Saturday, January 10, 2009

सभ्यता का एक मापदंड वहाँ नारी की दशा है

समाज में सभ्यता का एक मापदंड वहाँ नारी की दशा है। लगभग दो शताब्दियों से स्त्री-स्वतंत्रता की आवाज संसार में उठ रही है। पर भिन्न सामाजिक प्रणालियों में प्राचीन काल से उसकी दशा क्या चली आई?

अनेक पुरूषर-आक्रांत सभ्यताओं में लोग स्त्री को संपत्ति समझते थे। अफ्रीका के भागों में वधू की खरीद होती है और इसके लिए वरपक्ष को मूल्य चुकाना पड़ता है। सामी सभ्यताओं में उसे अनेक निर्योग्यताओं से जूझना पड़ता रहा है, जो आज तक हैं। यह आदम और हव्वा, सामी सभ्यताओं में प्रचलित कहानी की देन है जो नारी के जीवन को तथा प्रसूति को भगवान के आदेश की अवहेलना कर अर्जित सेब खाने को प्रेरित करने के कारण शापग्रस्त करार देती है। वरदान ही शाप बन गया।

विक्रमी संवत् की सातवीं शताब्दी में ईसाई जगत ने एक बृहत् सम्मेलन किया (मैकन : सन् ५८५)। प्रश्न था, नारी मनुष्य है अथवा पशु? बाइबिल के अनुसार उसकी निर्मित आदमी की पसली से हुई। इसलिए सभी ने कहा, उसे मनुष्य की श्रेणी में कैसे रख सकते हैं ? तब तक किसी ने याद दिलाई,
'तो फिर ईसा की माता मरियम को क्या (पशु) कहा जाय?'

तब यह सम्मेलन अनिर्णय में भंग हो गया। पर यह प्रश्न खलता रहा और अनेक सम्मेलन बुलाए गए। तब कहीं संवत् की उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी के संधिकाल में इस पर ईसाइयों का पुन: बृहत् सम्मेलन हुआ। अंत में उन्होंने निर्णय लिया कि
'ईसाई नारी को मानव की श्रेणी में रख सकते हैं; पर अन्य सभी स्त्रियाँ पशु की श्रेणी में आती हैं, अर्थात वे मनुष्य की संपत्ति मात्र हैं।'

ईसाई जगत में इसके बाद ही नारी की मुक्ति का द्वार कुछ खुल पाया।

ईसाई विधि में विवाह होने पर स्त्री की कुल संपत्ति उसके पति की हो जाती थी, क्योंकि वह स्वयं पति की संपत्ति थी। यही कारण था कि ईसाई देशों में उन्नीसवीं सदी तक विवाहित स्त्री को उधार कोई वस्तु, बिना पति के कहे, बेचता न था; क्योंकि उससे दाम वसूल ही नहीं हो सकते थे । इंग्लैंड में विवाहित स्त्री को संपत्ति रखने का अधिकार पहले-पहल सन् १८७० में 'विवाहित महिला संपत्ति अधिनियम' (Married Women's Property Act, 1870) द्वारा प्राप्त हुए। नेपोलियन संहिता (Napoleonic Code) के अंतर्गत फ्रांस और यूरोप के उससे प्रभावित देशों में स्त्री का संपत्ति पर धारणाधिकार सीमित चला आता है। उसके अन्य अधिकार भी पुरूष की तुलना में सदा कम थे। तलाक के मामलों में समान अधिकार तो आज भी नहीं हैं। रोजगार, नियोजन, वेतन, मजदूरी, उद्योग-धंधा, व्यवसाय, वृत्ति और शासन-सभी में नारी की सहभागिता और हिस्सेदारी बहुत कम है। इस भूमिका में इंग्लैंड और अमेरिका में संवत् की बीसवीं सदी तक न्यायालयों ने स्त्री को 'व्यक्ति' मानने तथा वकील के रूप में पंजीकृत करने से इनकार किया।

पर मुसलिम जगत में स्त्री की दयनीय दशा का संसार में सानी नहीं है। यह सत्य है कि मुसलिम विधि में कुछ स्त्री संबंधियों को दायाधिकार मिलना अनिवार्य हो गया; पर पुरूष संबंधियों के सामने उसे आधे का अधिकार मिला और उसके जीवन में छा गया एक घोर आवरण, जिसने उसकी स्वतंत्रता हर ली। जीवन में मानो बेड़ियाँ पड़ गई और वह बुरके की कारा में आबद्घ हो गई। आंग्ल विश्वकोश (Encyclopedia Brittanica) के अनुसार, मुसलिम देशों में महिलाओं की श्रमिकों में, उद्योग-धंधों में, सार्वजनिक जीवन और कार्यों में, देश के निर्णयों में, कला-विज्ञान-दर्शन-शिक्षा आदि के विस्तृत क्षेत्रों में सहभागिता नगण्य है। उन्हें सामान्य नागरिक अधिकार भी प्राप्त नहीं होते। इन देशों में अथवा जहाँ भी मुसलिम आबादी है, बच्चों की दर प्रति विवाहित स्त्री छह से आठ बच्चे हैं, जबकि अनेक देशों और दूसरे समाजों में यह दर एक या दो के आसपास है। जैसे केवल पुरूष के उपभोग अथवा घर के कामकाज के लिए दासी का जीवन उनका हो।

इस मुसलिम व्यक्तिगत विधि में उनकी दशा सबसे गई-गुजरी है। पति चाहे जितने विवाह करके (कुरान में वर्णित चार विवाह केवल लाक्षणिक हैं) पत्नी का घर में आबद्घ जीवन दूभर और अर्थहीन बना सकता है। जब चाहे बिना पत्नी के किसी कसूर के, बिना उसे बताए, अपनी स्वेच्छाचारिता में केवल तीन बार उस जादुई शब्द का प्रयोग कर अथवा एक बार ही कहकर कि तुझे तीन बार तलाक देता हूँ, उसे 'तलाक' दे समता है। तब बिना किसी गुजारे के बेसहारा उसे घर से निकलकर सड़क पर खड़ा होना पड़ता है। पति का कोई उत्तरदायित्व शेष नहीं रहता। ये कानून विवाहिता नारी की स्थिति साधारण दासी से भी बदतर बना देते हैं। इस सबने नारी जीवन में कितनी विडंबना भर दी है।

ऎसे ही विचार कार्ल मार्क्स के 'साम्यवादी घोषणापत्र' (Communist Manifesto) में हैं। कौटुंबिक संबंधों को 'बुर्जुआ बकवास' बताकर वह घोषणा करता है कि 'नारी उत्पादन की मशीन समझी जाती है और पूँजीवादी समाज में 'संपत्ति', इसलिए जब सभी उत्पादन के साधन समाज के हो जाएँगे तब नारी का भी खुला साझा समूह बनेगा। इसलिए विवाह प्रथा त्याज्य है।'

यूरोप व संयुक्त राज्य अमेरिका में उन्नीसवीं शताब्दी में, जब ज्ञानोदय (enlightenment) का प्रारंभ कहा जाता है, स्त्री-स्वतंत्रता का आंदोलन फूट निकता उस समय अनेक विचारकों की रचनाएँ स्त्रियों के अधिकारों के बारे में लिखी गईं। उनमें मेरी वोज्सटेनक्राफ्ट की 'स्त्री अधिकारों का संरक्षण' (A Vindication of the Rights of Women) प्रसिद्घ है। स्त्री-स्वतंत्रता के आंदोलन में अग्रणी रहने के बाद भी वह अंग्रेजी के प्रसिद्घ कवि शैली (Shelly) की पत्नी और इस रूप में एक कुशल तथा आदर्श गृहिणीं थी। स्त्री-स्वातंत्र्य के विरोधियों के इस तर्क का कि
'स्त्रियाँ स्वतंत्रता पाकर बिगड़ जाती हैं'

यह एक व्यावहारिक उत्तर था। वास्तव में उन्नीसवीं तथा बीसवीं सदी के साहित्य ने इसे आकार और रूप-रंग दिया; पर दो शताब्दी बाद भी यह कार्य अधूरा है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने अंतरराष्ट्रीय महिला वर्ष १९७५ में मनाया। पर आज भी इस विषय में सामी सभ्यता की काली छाया संसार पर मँडरा रही है। भारतीय संविधान की उद्घोषणा के बाद भी, कि कानून में लिंग के आधार पर द्वेषपूर्ण विभेद नहीं होगा, इस प्रकार के घनघोर विभेद मुसलिम विधि के कुछ भाग में प्रचलित हैं। आश्चर्य है कि सुधार के पट बंद करने की कट्टरपंथियों (fundamentalists) की चीख-पुकार सभी विवेक को ग्रस लेती है और एक जन-वातोन्माद (mass hysteria) उत्पन्न करती है।

यही हाल नारी-मताधिकार के बारे में ईसाई और मुसलिम जगत का है। यह समस्या राष्ट्रीय एवं स्वायत्तशासी इकाइयों में भी पुरूषों के समान उसे मत देने के अधिकार की है। भारत के प्राचीन गणराज्यों में स्त्री-पुरूष दोनों को मत के और उस समय की सभा एवं समिति में भाग लेने के समान अधिकार थे। यह सभा एवं समिति सामाजिक (सांस्कृतिक) तथा धार्मिक अथवा दर्शन जैसे विषयों पर शास्त्रार्थ भी करती थीं। उसमें पुरूष एवं स्त्री दोनों ही भाग लेते थे। यहाँ तक कि खेल-कूद, अस्त्र-शस्त्र प्रतियोगिता में भी स्त्रियों के भाग लेने का वर्णन मिलता है। जब अंग्रेज भारत में आए तब भारतीयों को संपत्ति के अधिकार पर सीमित मताधिकार स्थानिक इकाइयों और विधानसभा के लिए मिले। उस समय भी भारत में स्त्री के साथ कोई भेदभाव न था और दोनों के समान अधिकार थे। यह गणतंत्र की स्त्री-पुरूष के लिए समान मताधिकार की परंपरा आदि काल से आज तक यहाँ चलती आई।

पर मुसलिम और ईसाई जगत में स्त्री को प्राचीन काल में किसी प्रकार का मताधिकार न था। मुसलिम जगत में कुछ देशों में (उदाहरणार्थ सऊदी अरब और फारस की खाड़ी के अरब देशों में) उन्हें आज भी मत देने का अधिकार नहीं है। एक शताब्दी के संघर्ष के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका में मत देने का अधिकार नारी को सन् १९२० में मिला। इंग्लैंड में आंशिक/पूर्णरूप से सन् १९१८/१९२८ में। इसी प्रकार यूरोप के कुछ अन्य देशों में प्रथम महायुद्घ के आसपास ही मताधिकार मिला। पर फ्रांस, इटली, रूमानिया, यूगोस्लाविया में द्वितीय महायुद्घ के बाद ही नारी को मताधिकार प्राप्त हुए और स्विट्जरलैंड में सन् १९७१ में। आश्चर्य यही कि कभी-कभी भारत को, जहाँ प्राचीन काल से चली आई स्त्री-स्वातंत्र्य की परंपरा है, ऎसे देश जिनके द्वारा स्त्री के अधिकारों की सदा अवहेलनाहुई, इसी स्त्री-स्वातंत्र्य के नाम पर आँखें दिखाते हैं।

एक बार शिकागो नगर में एक भारतीय मूल के निवासी के घर जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उनकी पुत्री, जो स्नातक कक्षा में पढ़ती थी, ने कहा,
'मैं भारत कभी नहीं जाऊँगी। वहाँ लड़कियों पर अत्याचार करते हैं।'
इस भ्रामक जानकारी का स्त्रोत पूछने पर उसने बताया,
'यह अमेरिकी दूरदर्शन कहता है।'
मैंने पूछा,
'तुमने इंदिरा गांधी का नाम सुना है?'
उसके 'हाँ' कहने पर कि वह भारत की प्रधानमंत्री हैं, मैंने पूछा,
'क्या तुम उसकी तरह शक्तिशाली, दृढ़ इच्छा-शक्ति का कोई दूसरा प्रधानमंत्री बता सकती हो ?'
उत्तर था, 'नहीं।'
'तो फिर कैसे कहती हो कि भारत में स्त्री के साथ दुर्व्यवहार होता है ? जो देश इंदिरा सरीखी प्रधानमंत्री दे सकता है वहाँ नारी कभी पददलित होगी?'
मैंने कहा,
'मानव प्रकृति सब जगह समान है। हर जगह अच्छे और बुरे लोग हैं। पर भारत में स्त्री-स्वतंत्रता की गौरवशाली परंपरा रही है। बीच के सहस्त्र वर्षों का गुलामी और उसके विरूद्घ संघर्ष का काल आया, जिसमें विकृतियाँ उत्पन्न हुई। पर भारत एकमात्र ऎसी प्राचीन सभ्यता है जहाँ स्त्री की स्वतंत्रता का भाव साधारण रीति से संस्कृति में पगा।'

पर नारी को लेकर मनुस्मृति के बारे में अनेक विवाद खड़े किए जाते हैं। मनु ने मनुस्मृति में 'स्त्री' को मान-सम्मान का उच्च स्थान दिया है। उसे 'गृहलक्ष्मी', 'गृहशोभा' आदि कहकर पुकारा (अध्याय ९, श्लोक २५ व ९/२८) और पिता, भाई एवं पति को उनका समादर-सत्कार करने के लिए कहा (३/५५)। उनको सदा प्रसन्न रखने का आदेश दिया (३/५९)। कहा कि उनकी प्रसन्नता में कुटुंब का कल्याण है(३/६०) और उनकी अप्रसन्नता कुटुंब के विनाश का कारण बनती है(३/५७)। जहाँ उन्हें प्रसन्न रखा जाता है वहाँ सभी 'देवता' अर्थात दिव्य गुण निवास करते हैं। वे गृह-स्वामिनी हैं (९/११, ५/१५०)। स्त्रियों को कोई दमनपूर्वक नहीं रख सकता (९/१०)। वे स्वयं अपनी रक्षा करने में समर्थ हैं और उसी से सुरक्षित हैं (९/१२)। मनु ने पुरूष एवं स्त्री में कोई पक्षपात नहीं किया। कभी स्त्री को पुरूष की दासी या उसके अधीन नहीं माना। सदा कहा कि स्त्री-पुरूष मिलकर रहें (९/१०) और कभी न बिछुड़ें (९/१०२)। वेदों में साधारण धर्मकार्य का अनुष्ठान भी पत्नी के साथ करने का विधान है (९/९६)। राम ने वनवासिनी सीता की स्वर्ण प्रतिमा बनाकर यज्ञ किया था। स्त्री के लिए मार्ग छोड़ने को कहा (२/११३, १३८)। पत्नी पर झूठा दोषारोपण और अपशब्द कहना, उससे झगड़ा करना दंडनीय बताया (८/१८०)।

सभी धार्मिक कार्यों में स्त्री-पुरूष का समान अधिकार वेदों में माना गया है। संस्कारों के विधान स्त्री-पुरूष के लिए समान है। गुरूकुलवास, वेदाध्ययन एवं यज्ञोपवीत धारण करना आदि सभी स्त्री-पुरूष के लिए समान रीति से वेदसम्मत हैं। ऋग्वेद में लगभग तीस स्त्री ऋषियों का वर्णन आता है (अदिति, लोपामुद्रा आदि)। वैसे ही उपनिषदों में गार्गी, मैत्रेयी आदि ब्रम्हवादिनी स्त्रियों का वर्णन आता है। मनु ने धर्मशास्त्रों को वेद पर आधारित कहा है, इसलिए उसमें वेद के विरूद्घ कोई बात कहा जाना तर्कसम्मत नहीं है।

महर्षि दयानंद की प्रेरणा से आर्यसमाज द्वारा 'मनुस्मृति' पर शोध हुआ है। वे उन श्लोकों को प्रक्षिप्त, बाद में जोड़े गए तथा मनु की मूल धारणा के विपरीत कहते हैं जो स्त्रियों के प्रति संकीर्ण और निम्न दृष्टिकोण प्रदर्शित करते हैं। ऎसे ही एक श्लोक में कहा गया--' न स्त्री स्वातन्त्रयमर्हति' (९/१३) है। यह श्लोक मनु की धारणाओं और अन्य श्लोकों से अंतर्विरोध होने के कारण शोध-संस्करण इसे प्रक्षिप्त मानते हैं। मनु ने कभी स्त्री की स्वतंत्रता हरने की बात नहीं की, वरन् पुरूष-स्त्री दोनों के लिए एक ही और समान व्यवस्था दी है।

फिर भी इतने क्षेपक कालांतर में मनुस्मृति में जोड़े गए, जिन्होंने समाज में स्त्री की दशा पर प्रश्नचिन्ह लगाना प्रारंभ किया। इसे मूल रूप में सामी सभ्यता का टकराव कह सकते हैं। (वैसे मनुस्मृति सार्वभौमिक विधि-संकलन होने के कारण उसमें स्वाभाविक ढंग से कुछ अन्य सभ्यताओं की रीतियों का वर्णन आ सकता है।) ऎसा प्रसंग बहुविवाह की प्रथा को लेकर है। किसी समय समझा जाता था कि शायद बहुपति की प्रथा कबीलों में साधारण व्यवहार रहा होगा; पर अब इस पर कोई समाजशास्त्री विश्वास नहीं करता। किंतु बहुपत्नी की प्रथा अनेक प्राचीन सभ्यताओं में मिलती है।

मनु ने सब स्थानों पर पत्नी के लिए सदा एकवचन का प्रयोग किया है, द्विवचन या बहुवचन का नहीं। जब यह बात एक वकील सम्मेलन में मैंने कही तो लोगों ने पूछा कि इसका निष्कर्ष? मैंने कहा कि संभवतया मनु ने कभी नहीं सोचा था कि एक पत्नी के रहते अन्य से विवाह हो सकता है। तब तो एक वकील ने कहा,
'वाह, राजा दशरथ के तीन रानियाँ थीं।'
मैंने कहा,
'कौन आदर्श हैं, दशरथ या राम ? आपने राम के एक-पत्नीव्रत की बात क्यों न सोची ?'
पर यह प्रश्न को टरकाना था। अत: मैंने बताया,
'प्राचीन भारतीय विधि में राजा के लिए भी विधि का पालन अनिवार्य था, वह अपने देश में एक ही कन्या से विवाह कर सकता था। पर विदेश में राजनयिक संबंध स्थापित करने के लिए दूसरे देश की कन्या से विवाह करने की छूट थी। राजा दशरथ की एक पत्नी कोशल प्रदेश की कन्या कौशल्या थी। उनका दूसरा विवाह सुमात्रा (पूर्वी हिंद द्वीप-समूह) की पुत्री सुमित्रा से हुआ था और तीसरा विवाह कैकय देश (Caucasus) की पुत्री कैकेयी से।'
पुराण में इसकी कथा वर्णित है।

फिर भी पुराणों में वर्णित अनेक गाथाओं में एक से अधिक पत्नियों का वर्णन आता है। इनमें से बहुत सी प्रतीक अथवा रूपक कथाएँ हैं, जो कल्पना-जगत में स्त्री-पुरूष की गाथा बन गई। कुछ अन्योक्ति भी हैं। जैसे द्रौपदी के पाँच पतियों की गाथा है। मेरे बाबाजी, जिन्होंने रामायण तथा महाभारत काल का इतिहास लिखने का प्रयत्न किया, ने एक बार महाभारत के मूल श्लोक दिखाकर कहा था कि वह अर्जुन की ही पत्नी थी। स्त्री कोई संपत्ति नहीं थी, जिसको माता कुंती बाँटने का आदेश दिया हो। यही बात द्रौपदी ने धृतराष्ट्र की सभा में कही,
'स्त्री या बहू किसी की संपत्ति नहीं है, जो दाँव पर लगाई जा सके।'
यह बात मान्य हुई।

स्त्री-स्वातंत्र्य की यदि छवि देखनी हो तो भारत के सुदूर पूर्व के राज्यों के पुराने मातृप्रधान समाज में अथवा ब्रम्हदेश (म्याँमार) के कुछ पहले के जीवन में देखें। कहा जाता है कि इतिहास में ब्रम्हदेश के बराबर स्त्रियों को स्वतंत्रता किसी अन्य देश में नहीं रही। इसकी कुछ झलक शरच्चंद चट्टोपाध्याय के उस देश से संबंधित उपन्यासों में देखी जा सकती ह। वहाँ जो बर्मी बौद्घ विधि (Burmese Budhist law) प्रचलित थी, उसमें विवाह और तलाक के नियम सरलतम थे; पर वैवाहिक विश्वासघात (marital infidelity) अनजाना था। बाद में जब अराकान में मुसलमान बसे और उन्होंने बर्मी स्त्रियों से विवाह किया तब समस्या उठी। बर्मी स्त्रियों ने पुरूषों के समान अधिकार चाहे। तब वहाँ दंगे प्रारंभ हुए। यह स्पष्ट है कि स्त्री-स्वातंत्र्य और वैवाहिक विश्वासघात में कोई संबंध नहीं है।

ऎसा दूसरा प्रसंग, जिसे विधि में 'स्त्री के सीमित अधिकार' कहा जाता है, को लेकर है। इसे अंग्रेजों के राज्यकाल में वोमेंस इस्टेट ( women's estate) अथवा विडोज़ इस्टेट ( widow's estate) कहा जाता था। इस परिसीमित अधिकार को व्यक्त करता संस्कृत में अथवा प्राचीन धर्मशास्त्र में कोई शब्द नहीं है। यह सत्य है कि दाय का अधिकार, जहाँ पुत्री दूसरे परिवार में जाती थी, उसे पुत्र एवं पत्नी के बाद मिलता था। पर मनु ने कहा,
'जैसी अपनी आत्मा है वैसा ही पुत्र होता है और पुत्र जैसी ही पुत्री। उस आत्मा रूप पुत्री के रहते कोई दूसरा धन को कैसे पा सकता है ?' (मनुस्मृति, ९/१३०)। '
निरूक्त' में कहा गया,
'धर्मानुसार पुत्र एवं पुत्री दोनों का समान भाव से दाय में अधिकार है, यह मान्यता सृष्टि के आदि में मनु ने व्यक्त की है।'
यही मिताक्षरा का वचन है।

इसी प्रकार मनु ने पत्नी को अर्द्घांगिनी कहा। बृहस्पति ने कहा,
'वेद, स्मृति और रीति, सभी कहते हैं कि पत्नी पति की अर्द्घांगिनी है। अत: जब तक अर्द्घ भाग जीवित है, दाय का अधिकारी दूसरा कोई नहीं हो सकता।'
मनु ने माता के रहते पिता की जायदाद का पुत्रों में बँटवारा अमान्य किया। स्त्री-धन की सदा से मान्यता थी। मनुस्मृति (९/१९४) में छह प्रकार की स्त्री-धन गिनाया गया है; पर सभी मानते हैं कि ये केवल उदाहरण मात्र हैं। इसमें पति और माता-पिता द्वारा प्रदत्त धन भी हैं। नारद स्मृति में पति से प्राप्त दाय को स्त्री-धन कहा गया। जो विधि में दाय की अधिकारिणी थी और पुत्र के न रहने पर एकमात्र वारिस, यह कैसे हुआ कि दाय में प्राप्त संपत्ति (जायदाद) की वह एक प्रकार से संरक्षिका रह गई और उसके हस्तांतरण के अधिकार छिन गए ?

डा. नरेशचंद्र सेनगुप्त ने अपनी पुस्तक 'प्राचीन भारतीय विधि की विकास यात्रा (Evolution of Ancient Indian Law: Tagore Law Lectures) में पत्नी एवं पुत्री को वारिस घोषित करने का उल्लेख करने के बाद कहा,
'इन स्मृतिकारों के मस्तिष्क में इन वारिसों के बीच दाय में प्राप्त संपत्ति (जायदाद) में उनके अधिकारों को लेकर विभेद करने का विचार कभी उत्पन्न नहीं हुआ।'
मिताक्षरा में विज्ञानेश्वर ने जोर देकर वकालत की कि
'स्त्री-धन में वह सब संपत्ति आती है जो स्त्री को किसी भी तरीके से प्राप्त हुई हो।'
डा. सेनगुप्त ने लिखा,
'इतिहास साक्षी है कि जब विधवा का दायाधिकार माना गया तब विधि-प्रणेताओं ने कभी न सोचा था कि विधवा के दायाधिकार पुरूष उत्तराधिकारियों (वारिस) से भिन्न होंगें।'

पर उन कारणों की कल्पना की जा सकती है जिनसे विधवा के ही नहीं, पुत्री के भी अधिकार सीमित हो गए। विदेशी आक्रमणों के कारण एक उथल-पुथल मची। महिलाओं पर पड़ती उनकी कुदृष्टि के प्रभाव का आंशिक निराकरण यह था। स्त्री तो लौटकर आने नहीं पाएगी, तब उस विदेशी राज्य के समय संपत्ति के प्रत्यावर्तन का सिद्घान्त आया। जो जायदाद उसे पति से मिली थी वह पतिकुल को और जो पिता से मिली थी वह पितृकुल को लौट जाएगी। यह व्यवस्था (जो मुसलिम शासकों के समय के बंगाल में की गयी) विदेशी आक्रमण तथा सामी सभ्यता के संघातों का परिणाम थी। अंग्रेजी राज्य के साथ आई उनकी नजीरों के अनुसार न्याय करने की परिपाटी। इससे कानून जीवाश्म बन गया और स्वाभाविक विकास अवरूद्घ हो गया। इस प्रकार हिंदू विधि में स्त्री के दाय में परिसीमित अधिकार (वीमेंस इस्टेट) की प्रस्तर-मूर्ति खड़ी हुयी, जो हटए न हटी। संघर्ष काल का यह नियम हमारे स्मृतिकारों की देन नहीं, न मनु की। यह प्रिवी काउंसिल की देन है। यह उनकी देन है जिनके यहाँ नारी कभी 'संपत्ति' समझी जाती थी, 'व्यक्ति' नहीं। इसके लिए श्री बी.एन.राउ की अध्यक्षता में जो समिति बनी उसने स्त्री को दाय में पूर्ण स्वामिनी होने की व्यवस्था रखी। उन्होंने आलोचकों को उत्तर देते हुए कहा,
'यही हमारे स्मृतिकारों की प्राचीन व्यवस्था थी।'
आज पुन: यह लागू हुई है।

अपवाद एवं विकृतियाँ, जो समाज में यदा-कदा अथवा व्यक्ति के जीवन में दिखती हैं, उनसे समाज का मूल्यांकन नहीं होता। इंग्लैंड के जीवन में एक समय था जब गाँव में प्लेग आया तो बड़ी-बूढ़ी औरत को ( कि उसने चुड़ैल बनकर प्लेग बुलाया) जीवित जला दिया। फ्रांस में जान (जिसको मरणोपरांत 'संत जान' की उपाधि दी) को उदार कहलाने वाले कैथोलिक पंथ के ठेकेदारों ने जीवित रहते खंभे से बाँधकर जला डाला। मुसलिम शासकों के अत्याचारों, जनसंहार की गाथाएँ भारत में बिखरी पड़ी हैं। चित्तौड़गढ़ की पद्मिनी और चौदह सहस्त्र (?) स्त्रियों के जीवित अग्नि में समर्पण सरीखी लोमहर्षक घटनाएँ कम हैं क्या (?) और आज भी दासी के रूप में घरों में काम करने के लिए गरीब माँ-बाप की पुत्रियों को भारत से अरब देशों में भेजने का धंधा नहीं चलता (?) अंग्रेजी मानसिकता के शिकार व्यक्ति भारत की शाश्वत मूल धारा को नहीं देख पाते। ये इस सौ करोड़ के देश में कहीं भी किसी अपवाद घटना को ले, अतिरंजित कर, संपूर्ण समाज को बदनाम करते हैं। जैसे उनका कार्य निर्मल धारा छोड़ केवल बगल की क्षुद्र एवं क्षणिक गंदी नाली की समीक्षा हो।


०१ - कुरितियां क्यों बनी
०२ - प्रथम विधि प्रणेता - मनु
०३ - मनु स्मृति और बाद में जोड़े गये श्लोक
०४ - समता और इसका सही अर्थ
०५ - सभ्यता का एक मापदंड वहाँ नारी की दशा है


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Sunday, January 04, 2009

समता और इसका सही अर्थ

कुछ आधारभूत अभिधारणाएं हैं जिनपर सभ्यता के प्रारंभिक चरण बढ़े। समाज के अंदर एक आंतरिक स्नेह-बंधन, घटकों को जोड़ने वाला सीमेंट, एक ढंग की परंपराएं, आस्थाएं एवं विश्वास, सामाजिक आदर्श, सब सुख-दु:ख के एक साथ मिलकर जीने अथवा विपत्तियों को झेलने के प्रसंग और एक प्रकार के शत्रु-मित्र का भाव और सबसे बढ़कर एकता की प्रतीति है। ( ऎसा समाज किसी भूखंड से जुड़ने पर राष्ट्र कहा जाता है। इसके लिए 'समता' की आधारभूत अभिधारणा है, जिसके बिना सामाजिक ढांचा संभव नहीं है।  जिस समाज में ऊंच-नीच की कृत्रिम भावनाएं उत्पन्न होती हैं वह समाज के रूप में अधिक दिनों तक नहीं टिकता, क्योंकि सहयोग अथवा स्पर्धा के स्थान पर संघर्ष पैदा होना विनाश की ओर बढ़ने की निशानी है। फिर भी व्यक्तिगत स्वार्थ एवं लालसाएं और आपस के काम, क्रोध, मद, लोभ टकराते ही हैं। इसके लिए एक न्याय पर टिकी समाज-व्यवस्था आवश्यक है। और न्यायपूर्ण समाज की नींव 'समता' पर आधारित है।

यह समता दुर्ग्राह्य है और पकड़ में न आने वाले छलावे की भांति मृगमरीचिका दिखती रहती है। इसकी खोज सदा मानव सभ्यता में रही है। भारतीय दर्शन में कहा गया, 

'पांचों अंगुलियां बराबर नहीं होतीं, पर उनमें एक ही रक्त प्रवाहित होता है।'
इसलिए समता एकरूपता में नहीं है, वह समरसता में है। इसी के द्वारा एकात्मता उत्पन्न होती है। समता वही है जिसकी परिणति एकता में हो ।

कालांतर में 'समता' का यह भारतीय आदर्श तिरोहित हो गया। उसका स्थान एकरूपता ने ले लिया। आज साम्यवाद और यूरोपीय समाजवाद के पिछलग्गू समरसताविहीन शुषक एकरूपता के कंकाल का गुणगान करते दिखते हैं और भारतीय व्यवस्थाओं को, आंतरिक एकता न देख सकने के कारण, समताविहीन समझते हैं। जब मैं विद्यार्थी था, सामूहिक जीवन का एक साम्यवादी आदर्श चींटियों, मधुमक्खियों का जीवन कहा जाता था। कैसे सहस्त्रों कीट एक साथ, एक लगन से रहते हैं। स्वचालित अंतर्मन और सहज वृत्ति से, उस समाज का एक यंत्र बनकर। पर हम जानते हैं कि ऎसे सामूहिक जीवन में व्यक्तिगत स्वाभाविक विकास रूक जाता है। सच्चा सामाजिक जीवन सहस्त्रों शाखाओं में अलग-अलग पल्लवित- पुष्पित होता है अगणित प्रकार का, पर एक रस से अनुप्राणित मानव जीवन है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति अथवा घटक का विकास हो। अपनी विशिष्ट एवं अनंत संभावनाओं को ले एकरस समाज जीवन ही आदर्श रहा है। इसलिए सामाजिक जीवन का लक्ष्य एकरूपता नहीं, समरसता है। जिससे एकता पनपे उसी को 'समता' कहते हैं।

यह कैसा व्यंग्य है कि सच्ची समता के भक्त को आज  उसका भंजक कहें। इसका कारण है आज शब्दों के बदले हुए अर्थ का यूरोपीय चश्मा, जिसे आंखों से हटाने को लोग तैयार नहीं होते। यही बात मनु द्वारा वर्णित वर्ण-व्यवस्था विषय में है। इसे लेकर कभी-कभी विवाद खड़ा किया जाता है। यह वृत्ति के अनुसार वर्गीकरण उस वैज्ञानिक मनीषा का उदाहरण है जो संपूर्ण भौतिकी तथा मानविकी के क्षेत्र में छाई है। यही वृत्तिमूलक वर्गीकरण प्लातोन (Plato)  ने अपनी पुस्तक 'रिपब्लिक' (Republic : गणराज्य)  में किया था। यह एक व्यवस्था थी। इसके अंदर विभाजन अथवा द्वेष का भाव न था। मनु का समाज रूपी शरीर का उदाहरण ऊंच-नीच दर्शाने के लिए नहीं, वरन् एकरस समाज का चित्र खड़ा करने के लिए है। इससे इनकार करना भूल होगी कि कभी इस व्यवस्था के कारण समाज का संरक्षण हुआ था। परंतु इसमें आश्रम व्यवस्था, जहां विद्यार्थियों का वर्ण निर्धारण हो सके, नष्ट हो जाने से विकृति आई, और वर्ण जन्मना मानने लगे। भारतीय समाज रचना सभी व्यावसायिक संघों अथवा वर्गों को स्वायत्त शासन प्रदान करती थी। इसके कारण बाद में विकृत हो वर्ण ( अथवा जाति-पांत) में एक निहित स्वार्थ निर्मित हो सकता था। जिससे एक वर्ण से दूसरे में संचरण बंद हो गया। इस कारण आज यह वर्ण-व्यवस्था काल-बाह्य हो गई है और उसका कंकाल मात्र रह गया है। मनु ने स्वयं कहा कि नवीन रीतियां और सदाचरण ही विधि का स्त्रोत हैं, अर्थात काल-बाह्य रीतियां त्याज्य हैं।

मनु (Manu) ने मानवमात्र की समानता दिखाई है।सब मानव कर्मों के द्वारा श्रेष्ठता को, और जो वर्ण चाहें उसे प्राप्त कर सकते हैं। मनु ने वर्ण व्यवस्था को कर्मणा माना, 'जन्मना' नहीं। गुण कर्म के अनुसार ( जैसा 'गीता' में कृष्ण ने कहा, गुणकर्म विभागश:') वर्ण निश्चित होता है। कर्मों के अनुसार वर्ण प्राप्त करने की बात मनु ने कही ( अध्याय १०, श्लोक ६५) –'शूद्र ब्राम्हण हो जाता है तथा ब्राम्हण शूद्र हो जाता है।' मनु ने उसे शूद्र कहा, जो अन्य तीन वर्णों के योग्य कर्म न कर सके। यदि आश्रम में शूद्र के पुत्र में अन्य वर्ण के गुण पाए जाएं तो वैसा ही वर्ण उसे प्राप्त होता है। उसी वर्ण की शिक्षा प्राप्त युवती के साथ उसका विवाह होता है। शूद्र भी इस समाज रूपी विराट् पुरूष के अंग हैं। वे न घृणास्पद हैं, न अस्पृश्य। किसी को श्रेष्ठ कहने वाले, किसी को वेदाध्ययन का अधिकार नहीं कहने वाले अथवा हीन प्रदर्शित करने वाले श्लोक, नवीन शोधग्रंथों के अनुसार बाद में जोड़े गये हैं। ये मनुस्मृति की मूल भावना के प्रतिकूल हैं। मनु के अनुसार संस्कारों से और धर्मपालन से मनुष्य श्रेष्ठ बनता है और उसके कर्मों के अनुसार वर्ण-परिवर्तन होता है।

'ब्राम्हणवादी संस्कृति' कहकर मजाक उड़ाना या समाज के कुछ वर्गों के प्रति वर्ण-व्यवस्थ को ले रोष उत्पन्न करने का कार्य गर्हित है। एक दिन रेल में यात्रा करते समय साथ के सज्जन मेरा खादी का कुरता-धोती देख राजनेता समझकर बोले,

'इन ब्राम्हणों ने देश का सत्यानाश कर दिया है।'
'कैसे ?' पूछने पर वह बोले,

'यही व्यवस्था देकर।'
मैंने पूछा,

'किस ब्राम्हण ने व्यवस्था दी?'
मेरी अनभिज्ञता पर आश्चर्य से बोले,

'यही मनु, याज्ञवल्क्य, शांडिल्य, पराशर आदि।'
इस पर मैंने कहा,

'हां, ये सब विद्वान् मनीषी ऋषि थे। पर इनमें से किसी का जन्म, जिसे आज ब्राम्हण कुल कहते हैं, में नहीं हुआ। मनु तथा  याज्ञवल्क्य के पिता क्षत्रिय थे , परंतु ये सब विद्वान ऋषि बने, इसलिए ब्राम्हण कहलाए।'
पूर्वाग्रह की रंगीनी ने उस सहयात्री को मनु के महान कार्य के प्रति अंधा बना दिया।

स्मृतिकारों ने कभी किसी कार्य को छोट या बड़ा नहीं कहा। सबमें भगवान का अंश माना। मध्ययुगीन संतों में से विरले ने ही, आज जिसे ब्राम्हण कुल कहेंगे, उसमें जन्म लिया थ। समर्थ गुरू रामदास का जन्म क्षत्रिय कुल में हुआ था। संत गोरोबा कुम्हारी करते थे। संत नामदेव दर्जी परिवार के थे। महाराष्ट्र के संत-शिरोमणि तुकाराम कुनबी परिवार के थे और कर्णावती (अहमदाबाद) के संत चांडाल परिवार के, जिनका पेशा मांस बेचना था। संत रैदास उस परिवार के थे जहां चर्मकारी होती थी। समाज के हित में अपना कार्य निपुणता एवं दक्षता से करने से भगवान की प्राप्ति होती है, यह स्मृतिकारों ने कहा।

बाह्य आक्रमणों से जब आश्रम शिक्षा पद्घति नष्ट हो गयी और गुण-कर्म के अनुसार विद्यार्थी का वर्ण-निर्धारण करने की प्रक्रिया न रही तब जिस कुल में जन्म लिया उसी का वर्ण मान लेने की परंपरा आई। जब गुण एवं शिक्षा के आधार पर वर्ण निश्चित होता था तब स्पष्ट ही 'वर्णसंकर' का कोई अर्थ न था। महाभारत में कितने उदाहरण हैं जहां स्त्री-पुरूष ने अन्य कर्म करने वाले परिवार के युवक-युवती के साथ विवाह किया। तब यह शब्द नहीं था। इस विषय में मनुस्मृति में जोड़े गये श्लोक मनु की धारणाओं के विरूद्घ प्रक्षिप्त हैं। कहा जाता है कि दशरथ के पुरोहित वसिष्ठ की माता वनवासी कन्या थीं। उनके पिता से विवाह का आग्रह होने पर उन्होंने एक वनवासी कन्या से विवाह की इच्छा की तो उनसे कहा गया,

'उसे वाणी (शिक्षा) दो, फिर विवाह कर सकते हो।'
पर शिक्षा कौन दे? गुरू बनकर तो उसके साथ विवाह न हो सकता था; शिष्या के साथ विवाह वर्जित है। तो अन्य आश्रम में शिक्षा प्राप्त कर उनका विवाह हुआ।

वास्तव में समाज के दीर्घ जीवन के लिए बहिर्विवाह ( exogamy) की भारत की प्राचीन प्रथा थी। इसके अनुसार अपने कबीले या गांव अथवा गोत्र ( या जिस आश्रम में शिक्षा पाई) या समूह के बाहर विवाह। इनके अंदर सब भाई-बहन के समान समझे जाते थे। आज भी इसका स्मरण दिलाता सपिंड विवाह का निषेध है। वर्ण वृत्तिमूलक कल्पना थी, इसलिए उसी वर्ण में विवाह, पति-पत्नी का एक ही वृत्ति का होना अच्छा समझते थे। अंतर्विवाह (एक ही कबीले या निकट रक्त-संबंधियों में विवाहऋ के जीवशास्त्रीय तथा सामाजिक दुष्परिणामों से यहां अति प्राचीन काल से परिचय था। वैसे संसार के अनेक भागों, उदाहरणार्थ मिस्त्र में, रक्त -शुद्घता की विकृत कल्पना ले, भाई-बहन या निकट रक्त-संबंधियों के बीच विवाह प्रचलित थे जिससे रक्तस्त्राव की बीमारी या अन्य समस्याएं उत्पन्न हुई।

समता का लक्षण समान अवसर है। आज भी सारे संसार में समता की खोज समाज तथा न्याय प्रणाली में हो रही है। साम्यवादी अथवा यूरोपीय समाजवादी दर्शन में एकरूपता में समता खोजते हैं। उसके मर्म 'समरसता' को आज हम भूल गए और इसलिए भटक गए। इसका फल है संघर्ष, द्वेष और शतखंड-खंडित जीवन तथा उसकी परिणति है युद्घ, हिंसा और भय की काली छाया।


कालचक्र: सभ्यता की कहानी
स्मृतिकार और समाज रचना 
०१ - कुरितियां क्यों बनी
०२ - प्रथम विधि प्रणेता - मनु 
०३ - मनु स्मृति और बाद में जोड़े गये श्लोक
०४ - समता और इसका सही अर्थ
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