Sunday, July 25, 2010

पताल देश व मय देश

सागर की उत्ताल तरंगों पर महाकाल से भी खेलते भारतीय संस्कृति के पुजारियों ने चंपा देश से और आगे कदम बढ़ाया। कालांतर में सबसे विशाल और तूफानी महासागर (यह व्यंग्योक्ति है कि धोखे से उसे आज प्रशांत महासागर ( Pacific Ocean) कहते हैं) को सहस्त्रों किलोमीटर चीरकर पाताल देश (मध्य एवं दक्षिणी अमेरिका) जा पहुँचे ये हिंदु संस्कृति के संदेशवाहक। यह यूरोप का मिथ्याभिमान है कि कोलंबस ने अमेरिका की खोज की, अथवा हालैंड के वाइकिंग (Vikings) ने उस भूमि पर प्रथम पग रखा। यह 'पाताल देश' भारत के लिए नयी दुनिया कभी न था।


जब पहले-पहल यूरोपीय मध्य एवं दक्षिण अमेरिका पहुँचे तो हाथी के सिर और सूँड़ की मूर्ति देखकर चकित हो गए।  कारण, हाथी अमेरिका में नहीं पाया जाता। ऎसा ही एक उकेरा चित्र पेरू के संग्रहालय में है, जिसमें गले में सर्प धारण किए जटाजूटधारी देवता एक सूँड़धारी युवक को आशीर्वाद दे रहा है। शिव से आशीर्वाद प्राप्त करते गणेश के इस चित्र को 'प्रेरणा प्राप्त करता हुआ इन्का (Inca, Inga)' कहा गया। इसी प्रकार ग्वाटेमाला (Guatemala) के पूर्व एक हाथी पर बैठे देवता की मूर्ति है। यह ऎरावत पर आसीन इंद्र यहाँ कैसे प्रकट हुए ? शिव एवं गणेश जी और इंद्र इस अनजानी नई दुनिया में कैसे अवतरित हुए? यह उन स्वर्ण-लोभी, दंभी और बर्बर यूरोपवासियों की समझ में न आया जो लूट-खसोट करने अमेरिका पहुँचे थे।

महाभारत में पाताल देश के राजा का युद्घ में भाग लेने का उल्लेख है और वर्णन है 'मय ' दावन का, जिसने इंद्रप्रस्थ में अपने पाताल देश से लाए रत्नों से जटित पांडवों के अभूतपूर्व राजप्रासाद का निर्माण किया। जब स्पेनवासी मध्य तथा दक्षिण अमेरिका पहुँचे तो उनके रत्नजटित एवं स्वर्णमंडित मंदिर देखकर दंग रह गए। विष्णुपुराण में पृथ्वी के दूसरी ओर के सात क्षेत्रों का वर्णन है- अतल, वितल, नितल, गर्भास्तमत (भारत के एक खंड को भी कहते हैं), महातल, सुतल और पाताल। उसके अनुसार वहाँ दैत्य, दानव, यक्ष, नागों और देवताओं का निवास है। नारद मुनि वहाँ से लौटकर देवताओं से वर्णन करते हैं 'इंद्र की अमरावती से भी सुंदर पाताल देश' का। आज हम नहीं जानते कि पूथ्वी के दूसरी ओर के अन्य क्षेत्र कौन हैं, पर मध्य अमेरिका एवं दक्षिण अमेरिका का उत्तरी-पश्चिमी भाग (जिसमें आज उत्तर-पश्चिम कोलंबिया, इक्वाडोर, पेरू तथा उत्तरी चायल के आसपास का क्षेत्र है) की प्राचीन सभ्यता के भारतीय लक्षणों को देखते हुए उसकी पहचान संस्कृत वाङ्मय में वर्णित 'पाताल' से हो जाती है।

मध्य अमेरिका का परंपरागत विश्वास है कि उनके पूर्वज एक दूरस्थ प्राची देश (Orient), जिससे बृहत्तर भारत अर्थात भारत सहित दक्षिण-पूर्व एशिया का बोध होता है, से आए। स्पेनवासियों के मेक्सिको पहुँचने पर उनके राजा (Monetzuma) ने कहा था कि उनके गोरे पूर्वज ('पीत' नहीं) जलमार्ग से महासागर पार कर आए। इसी प्रकार इन्का किंवदंती है कि उनके 'अय्यर' (Ayer) राजा, जिन्होंने सहस्त्राब्दि से अधिक राज्य किया, मध्य अमेरिका से सूर्य देवता की कृपा से अवतरित हुए। 'अय्यर' राजा, अर्थात दक्षिण भारत के 'अय्यर ब्राम्हण', जिन्होंने अमेरिका को जीवन-पद्घति दी, छोटे-छोटे नगर, खंड और समाज के हर वर्ग को स्वायत्त शासन दिया, विज्ञान तथा पंचांग दिया और दिया गणित में स्थानिक मान एवं शून्य की कल्पना।

स्पेन निवासियों ने मध्य अमेरिका के कैरीबियन (Caribbean Sea) तट पर घास-फूस से छाए मिट्टी से निर्मित 'मय' (Maya) लोगों के मकान देखे, वैसे ही जैसे आज भी दक्षिण भारत के सागर-तट पर छोटी-छोटी बस्तियों में देख सकते हैं। उन्होंने उस सुसंस्कृत समाज को आदिम, अविकसित और जंगली समझा। इसीलिए वे उच्च भूमि पर बने सुनियोजित वर्गाकार नगर, जिनकी चौड़ी वीथिकाएँ एक-दूसरे को लंब रूप में काटती हैं और जिनमें अर्द्घ-पिरामिड सदृश चबूतरों के ऊपर देवताओं की आकृतियाँ और मंदिर थे, जो वेधशाला के रूप में भी काम आते थे, और बड़े सभ्यता के अंग हैं। इन सभ्यताओं की जीवन-पद्घति में भारत की झलक है।

शरद हेबालकर ने अपनी पुस्तक में इन मिट्टी से बनी दीवारों और घास-फूस के छप्परों के बीच पलते जीवन का वर्णन किया है,

'आदर्श भारतीय गृहिणी का आतिथ्य मेक्सिको की इन झोंपड़ियों में देखने को मिलेगा। यदि भोजन करने बैठे तो मेज-कुरसी छोड़ चटाई पर बैठकर थाली रखी जाएगी।-- उसमें होगी बेलन से चकले पर बेली और व्यवस्थित सेंकी गोल रोटी (खमीरी नहीं) और साथ में खाने के लिए बढ़िया छौंकी हुयी दाल।' 
उनका भोजन है चकला-बेलन पर बनी मक्का की रोटी, दाल, सेम आदि का साग और चटनी- जैसे भारत में लेते हैं। आगे कहा है, 
'ये मेक्सिकोवासी स्वभास व चाल-चलन से पूर्ण भारतीय हैं। अमेरिका का सच्चा वैभव है मेक्सिको, ग्वाटेमाला (Guatemala= गौतमालय), पेरू और बोलीविया प्रदेशों की प्राचीन संस्कृतियाँ; और ये अपना नाता भारतीय संस्कृति से बताती हैं।' 
अमेरिका के प्राचीन सांस्कृतिक जीवन में भारत की झलक दिखती है, जैसे हिंदुओं ने उन्हें संस्कृति के प्रथम दर्शन कराए हों।

भारतीय संस्कृति के दूतों से उन्होंने खेती करना सीखा।आज पुरातत्वज्ञ यह विश्वास करते हैं कि कपास की खेती और उपयोग भारत ने सारे संसार को दिया। अमेरिका निवासियों ने भी इन भारतीय पथ-प्रदर्शकों से वस्त्र पहनना सीखा। और उन्हें मिला एक समाज के रूप में सामूहिक जीवन और टोलियों में रहनेवाले तथा अनजान भाषाएँ बोलनेवालों को एकता में आबद्घ करती जीवन-पद्घति। यह चमत्कार भारतीय संस्कृति के दूतों ने विक्रम संवत् के लगभग पंद्रह सौ वर्ष पूर्व अथवा उसके भी पहले करके दिखाया।


प्राचीन सभ्यताएँ और साम्राज्य
०१ - सभ्यताएँ और साम्राज्य
०२ - सभ्यता का आदि देश
०३ - सारस्वती नदी व प्राचीनतम सभ्यता
०४ - सारस्वत सभ्यता
०५ - सारस्वत सभ्यता का अवसान
०६ - सुमेर
०७ - सुमेर व भारत
०८ - अक्कादी
०९ - बैबिलोनिया
१० - कस्सी व मितन्नी आर्य
११ - असुर जाति
१२ -  आर्यान (ईरान)
१३ - ईरान और अलक्षेन्द्र (सिकन्दर)
१४ - अलक्षेन्द्र और भारत
१५ - भारत से उत्तर-पश्चिम के व्यापारिक मार्ग
१६ - भूमध्य सागरीय सभ्यताएँ
१७ - मिस्र सभ्यता का मूल्यांकन
१८ - पुलस्तिन् के यहूदी
१९ - यहूदी और बौद्ध मत
२० - जाति संहार के बाद इस्रायल का पुनर्निर्माण
२१ - एजियन सभ्यताएँ व सम्राज्य
२२ - फणीश अथवा पणि
२३ - योरोप की सेल्टिक सभ्यता
२४ -  योरोपीय सभ्यता के 'द्रविड़'
२५ - ईसाई चर्च द्वारा प्राचीन यरोपीय सभ्यताओं का विनाश
२६ - यूनान
२७ - मखदूनिया
२८ - ईसा मसीह का अवतरण
२९ - ईसाई चर्च
३० - रोमन साम्राज्य
३१ - उत्तर दिशा का रेशमी मार्ग
३२ -  मंगोलिया
३३ - चीन
३४ - चीन को भारत की देन 
३५ - अगस्त्य मुनि और हिन्दु महासागर
३६ -  ब्रम्ह देश 
३७ - दक्षिण-पूर्व एशिया
३८ - लघु भारत 
३९ - अंग्कोर थोम व जन-जीवन
४० - श्याम और लव देश
४१ - मलय देश और पूर्वी हिन्दु द्वीप समूह
४२ - चीन का आक्रमण और निराकरण
४३ - इस्लाम व ईसाई आक्रमण
४४ - पताल देश व मय देश

Sunday, July 11, 2010

इस्लाम व ईसाई आक्रमण

परन्तु यह सब कालांतर में नष्ट हो गया। यह सत्य है कि जहाँ मंगोल (मुगल) आक्रमण भारत में बाद में आया वहाँ कुबलई खाँ के  आक्रमण ने पहले ही दक्षिण-पूर्व एशिया में ध्वंस बरपा। उत्तरी चंपा पर चीन का कुछ काल तक अधिकार चलने पर भी इन हिंदु राज्यों की जनता ने पुन: कुछ सीमा तक उसका निराकरण किया। और दक्षिण-पूर्व के हिन्द द्वीप समूह ने तो चीन की नौसेना के एक बड़े अंश को जावा के पास जल-समाधि दिला दी। इसके बाद अरब के आक्रमण का भयानक खतरा आया इसलाम के रूप में। सरल और निष्कपट लोग छल के शिकार बने। पर भारत की सर्व कल्याण की इच्छा रखने वाली और हर प्रकार के विचारों की आश्रय-प्रदात्री संस्कृति ने उसे भी मानवता का एक रूप समझकर स्थान दिया। उन्हें अपनी श्रद्घा के अनुकूल रहने की, अपने पंथ की रीति का पालन करने की स्वतंत्रता दी। परंतु अनेक स्थानों पर वे विदेशी हस्तक बने। प्रदत्त स्वतंत्रता का दुरूपयोग किया। बाह्य निष्ठाएँ जगाईं और धीरे-धीरे मलयेशिया एवं पूर्वी हिंद द्वीप समूह मुसलिम बहुल हो गए।


कंबोडिया के राजा: नोरोदम - चित्र विकिपीडिया से
उनके पीछे अनेक देशों से आए ईसाई। जहाँ-जहाँ यूरोपीय (ईसाई) बए, उनके आगे चले पादरी। सबसे पहले क्रूरकर्मा पुर्तगाली कंबुज एवं लव देश पहुँचे। लव देश में पुर्तगालियों ने भयंकर अत्याचार किए। उसके बाद सोलहवीं सदी में भिन्न-भिन्न यूरोपीय देशों से, व्यापार करने के बहाने, नौसेना सहित वहाँ पहुँचे अंग्रेज, डच और फ्रांसीसी। उनके साथ मानवता की खाल ओढ़े आया ईसाई चर्च और तथाकथित लोकोपकार कार्य। 'स्याम' (थाईलैंड) को छोड़कर सभी देश उनकी सर्वग्रासी साम्राज्यवादी भूख के ग्रास बने। राजा नोरोदम (नरोत्तम) के समय फ्रांसीसी साम्राज्य पूर्ण हो गया।

इनके अत्याचारों से तंग हो जनता साम्यवाद की ओर आकर्षित हूयी। तब जो कुछ बचा था उसको कंबुज, लव देश और चंपा (वियतनाम) में आए साम्यवाद के आक्रमण ने नष्ट कर दिया। साम्यवादी सरकारों ने वहाँ की भारतीय संस्कृति के अवशेषों को कुचला। मनमाने आदेशों से उनके प्राचीन काल से चलते आए जीवन के समूल विनाश का यत्न किया। मंदिर एवं विहार, अमूल्य शिल्प और कलाकृतियाँ नष्ट कर पुजारियों और बौद्घ भिक्षुओं को बलात् श्रम में जोता। साहित्य, परंपराएँ एवं संस्कृति- सभी उनके कोपभाजन बने।

मानव सभ्यता के हतभाग्य के ये सब निमित्त मात्र थे। मूल कारण शरद हेबालकर ने निम्न शब्दों में वर्णित किया है,

'सैकड़ों  वर्षों से भरत-भूमि के पुत्र इन हिंदु राज्यों में जाते रहते थे। वे ज्ञान, विज्ञान, पराक्रम लेकर जाते थे। पर दसवीं सदी के बाद स्वयं भारत इसलाम के आक्रमण का प्रतिकार करने में व्यस्त हो गया। धर्म, संस्कृति, भूमि, समाज आदि पर सर्वकष आक्रमणों से भारत ही घायल व व्याकुल था। एक भयंकर ग्लानि से वह ग्रस्त था।-- और जब चैतन्य का यह स्त्रोत ही बंद हो गया तो नहरों में चैतन्य का प्रवाह कहाँ से आता ? और उस चैतन्य के अभाव में यदि उन नहरों के आसपास के प्रदेश सूख बए तो क्या आश्चर्य ?' 
मानव सभ्यता की सबसे बड़ी त्रासदी थी भारत में विदेशी शासन।

प्राचीन सभ्यताएँ और साम्राज्य
०१ - सभ्यताएँ और साम्राज्य
०२ - सभ्यता का आदि देश
०३ - सारस्वती नदी व प्राचीनतम सभ्यता
०४ - सारस्वत सभ्यता
०५ - सारस्वत सभ्यता का अवसान
०६ - सुमेर
०७ - सुमेर व भारत
०८ - अक्कादी
०९ - बैबिलोनिया
१० - कस्सी व मितन्नी आर्य
११ - असुर जाति
१२ -  आर्यान (ईरान)
१३ - ईरान और अलक्षेन्द्र (सिकन्दर)
१४ - अलक्षेन्द्र और भारत
१५ - भारत से उत्तर-पश्चिम के व्यापारिक मार्ग
१६ - भूमध्य सागरीय सभ्यताएँ
१७ - मिस्र सभ्यता का मूल्यांकन
१८ - पुलस्तिन् के यहूदी
१९ - यहूदी और बौद्ध मत
२० - जाति संहार के बाद इस्रायल का पुनर्निर्माण
२१ - एजियन सभ्यताएँ व सम्राज्य
२२ - फणीश अथवा पणि
२३ - योरोप की सेल्टिक सभ्यता
२४ -  योरोपीय सभ्यता के 'द्रविड़'
२५ - ईसाई चर्च द्वारा प्राचीन यरोपीय सभ्यताओं का विनाश
२६ - यूनान
२७ - मखदूनिया
२८ - ईसा मसीह का अवतरण
२९ - ईसाई चर्च
३० - रोमन साम्राज्य
३१ - उत्तर दिशा का रेशमी मार्ग
३२ -  मंगोलिया
३३ - चीन
३४ - चीन को भारत की देन 
३५ - अगस्त्य मुनि और हिन्दु महासागर
३६ -  ब्रम्ह देश 
३७ - दक्षिण-पूर्व एशिया
३८ - लघु भारत 
३९ - अंग्कोर थोम व जन-जीवन
४० - श्याम और लव देश
४१ - मलय देश और पूर्वी हिन्दु द्वीप समूह
४२ - चीन का आक्रमण और निराकरण
४३ - इस्लाम व ईसाई आक्रमण

Sunday, July 04, 2010

चीन का आक्रमण और निराकरण

मंगोलिया में कुबलई खां की मूर्ति
विक्रम संवत् की ग्यारहवीं शताब्दी से उत्तरी चीन का दबाव दक्षिण-पूर्व एशिया पर बढ़ा। चीनी प्रव्रजन की लहरें ब्रम्ह देश, कंबुज, चंपा, मलय में आई और द्वीपों तक पहुँचीं। इन हलचलों ने उथल-पुथल मचायी, सबको त्रस्त किया। तब आए चीन के मंगोल सम्राट् कुबलई खाँ के आक्रमण। इन्होंने मंदिर, बस्तियाँ नष्ट कीं; उससे बढ़कर जन-संस्थाए, स्वायत्त शासन और सार्वजनिक जीवन उद्ध्वस्त किया। चंपा पर चीन ने कुछ समय के लिए अधिकार कर लिया। ब्रम्ह देश एवं कंबुज के अंदर विनाश-लीला की। कुबलई खाँ की जलसेना का प्रबल आक्रमण हुआ, एक-एक द्वीप को अकेला कर जीतने की लालसा से। ऎसे समय में विक्रम संवत् की तेरहवीं शताब्दी में उसका समुचित उत्तर दिया यव द्वीप के सम्राट् कृतनगर के नेतृत्व में हिंदु राज्यों की संगठित शक्त ने। चंपा से लेकर कलिंग, कालीमंथन तथा बाली, मदुरा, यव द्वीप, सुमात्रा एवं मलय तक हिंदु राज्यों की मालिका खड़ी हुयी। अंत में उसके दामाद और बाली के राजपुत्र विजय ने चतुराई से मंगोल-नौदल का सर्वनाश किया। जावा में चीनी जलसेना नष्ट हो गयी। जनता ने विजय को 'कीर्तिराज जयवर्धन' के नाम से विभूषित किया।


मजपहित स्वर्णिम युग को दर्शाती अप्सरा की सवर्ण मूर्ति
'कृतनगर' और 'जयवर्धन' द्वारा इस क्षेत्र के स्वर्ण युग का पदार्पण हुआ। यह साम्राज्य 'मजपहित' कहलाता है। यहाँ के एक संस्कृत काव्य में इसका वर्णन 'यव द्वीप की प्रजा के जीवन का सर्वश्रेष्ठ कालखंड' कहकर है। श्री शरद हेबालकर ने मजपहित साम्राज्य को 'हिंदु संस्कृति के वैभव का परमोच्च शिखर' कहा है। इसी वंश में 'त्रिभुवना' सम्राज्ञी हुयी, जिसका काल एक आदर्श शासन-व्यवस्था लागू करने के लिए प्रसिद्घ हुआ। श्री शरद हेबालकर ने लिखा है,
'उसकी शासन-व्यवस्था चाणक्य के अर्थशास्त्र और कामंदक के राजनीतिशास्त्र पर आधारित थी। अर्थशास्त्र में वर्णित सप्तांग राज्य-कल्पना प्रत्यक्ष व्यवहार में आई। राज्य-शासन के विधि, नियम और न्याय-व्यवस्था मनुस्मृति पर आधारित थी। इसी समय जनगणना और भू-मापन संपन्न हुआ, जिससे राष्ट्र-समृद्घि की अनेक योजनाएँ बन सकीं। श्रमिक एवं भृत्य वर्ग का वेतन शासन द्वारा निश्चित किया गया। भ्रष्टाचार से मुक्त जीवन बनाने की दृष्टि से आर्थिक तंत्र के अधिकारी नियुक्त करते समय जाँच-पड़ताल और कुल-शील देखकर नियुक्तियाँ की जाती थीं। प्रजा के लिए देय कर न्यूनतम थे। कर-संग्रह तथा समुचित लेखा-जोखा रखा जाता था। साम्राज्य में सरदारों तथा वरिष्ठ वर्ग पर भेंट, उपहार आदि लेने के विषय में कठोर प्रतिबंध थे।' 
यह साम्राज्य विक्रम संवत् की सोलहवीं शताब्दी तक बना रहा। यह किसी आधुनिक कल्याण राज्य का वर्णन नहीं है क्या?

कैसे वैभव-संपन्न ये भारतीय संस्कृति से अनुप्राणित राज्य निर्मित हुए। इसके साक्षी उस क्षेत्र में आए चीनी प्रतिनिधियों और यात्रियों के वर्णन, वहाँ के शिलालेख,उनके साहित्य तथा आज प्राप्य सरकारी अभिलेखों में प्रयुक्त भारतीय वर्णमाला एवं लिपि,उनकी भाषा,जिसपर संस्कृत की अमिट छाप है, उनका शिल्प और कला-वैभव तथा उनमें अंकित हिंदु पवित्र चिन्ह हैं। रामायण और महाभारत, जातक, पंचतंत्र एवं पुराणों से लिये संदर्भ उनके जीवन की कहानी बने। स्वायत्तता एवं सामाजिक रचना हिंदु जीवन से ओतप्रोत  बनी। वैष्णव,शैव, शाक्त और बौद्घ-सभी मतों का अद्भुत समन्वय संस्कृति की सिद्घि थी। सभी विचारो का समादर और मानवता के अनुकूल वृत्ति।


इस चिट्ठी के दोनो चित्र विकिपीडिया से

प्राचीन सभ्यताएँ और साम्राज्य
०१ - सभ्यताएँ और साम्राज्य
०२ - सभ्यता का आदि देश
०३ - सारस्वती नदी व प्राचीनतम सभ्यता
०४ - सारस्वत सभ्यता
०५ - सारस्वत सभ्यता का अवसान
०६ - सुमेर
०७ - सुमेर व भारत
०८ - अक्कादी
०९ - बैबिलोनिया
१० - कस्सी व मितन्नी आर्य
११ - असुर जाति
१२ -  आर्यान (ईरान)
१३ - ईरान और अलक्षेन्द्र (सिकन्दर)
१४ - अलक्षेन्द्र और भारत
१५ - भारत से उत्तर-पश्चिम के व्यापारिक मार्ग
१६ - भूमध्य सागरीय सभ्यताएँ
१७ - मिस्र सभ्यता का मूल्यांकन
१८ - पुलस्तिन् के यहूदी
१९ - यहूदी और बौद्ध मत
२० - जाति संहार के बाद इस्रायल का पुनर्निर्माण
२१ - एजियन सभ्यताएँ व सम्राज्य
२२ - फणीश अथवा पणि
२३ - योरोप की सेल्टिक सभ्यता
२४ -  योरोपीय सभ्यता के 'द्रविड़'
२५ - ईसाई चर्च द्वारा प्राचीन यरोपीय सभ्यताओं का विनाश
२६ - यूनान
२७ - मखदूनिया
२८ - ईसा मसीह का अवतरण
२९ - ईसाई चर्च
३० - रोमन साम्राज्य
३१ - उत्तर दिशा का रेशमी मार्ग
३२ -  मंगोलिया
३३ - चीन
३४ - चीन को भारत की देन 
३५ - अगस्त्य मुनि और हिन्दु महासागर
३६ -  ब्रम्ह देश 
३९ - अंग्कोर थोम व जन-जीवन
४० - श्याम और लव देश
४१ - मलय देश और पूर्वी हिन्दु द्वीप समूह
४२ - चीन का आक्रमण और निराकरण