Sunday, December 27, 2009

यूनान


यूनान के इतिहास में होमर युग 'मध्य काल' के नाम से जाना जाता है। यह बृहत्‌ प्रव्रजनों (great migrations) का भी कालखंड था। यवनों ने तब एजियन सागर के द्वीपों से होते हुए अनातोलिया के दक्षिण-पश्चिमी किनारों पर उपनिवेश बसाए। इसी से इसके प्रारंभिक काल को 'वीर काल' (heroic age)  भी कहते हैं। 

ब्रिटिश संग्रहालय में रखी होमर की अर्धप्रतिमा का चित्र

होमर (Homer) ने, जिसे यूनान का गूरू कहा जाता है, इस कालखंड का वर्णन किया है। सभ्यता व संस्कृति की दृष्टि से यह अत्यंत पिछड़ा युग था, जब आखेट और पशुपालन ही प्रमुख उद्यम था। प्राचीन सभ्यताओं की उपलब्धियां लिपि, कला, स्थापत्य आदि विस्मृत हो गयी थीं। आदिम राज्य-व्यवस्था, जहाँ विवाद युद्घ व हत्या द्वारा तय होते थे, सामंतों पर आधारित थी। सुंदर स्त्री के लिए संघर्ष की कथाएं सामान्य थीं। पर व्यवस्था के अभाव में राज्य की आय शासकों द्वारा लूटपाट अथवा उनको दी गयी भेंट थी। और पाप-पुण्य की धारणाएँ अथवा नैतिकता पर आधारित धर्म व आत्मा-परमात्मा की कल्पना न थी; जैसी पहले से भारतीय संस्कृति में है। ऐसी दशा से यूरोपीय इतिहास में कहा जाने वाला 'महान क्लासिकल यूनान' (Great Classical Greece) की सभ्यता की ओर संक्रमण विक्रम संवत पूर्व आठवीं शती में प्रारंभ हुआ। कुछ यूरोपीय विद्वान इसे यूनान के मध्यकाल में प्रव्रजन के कारण यवन कबीलों की एशियाई एवं प्राचीन मिनोयन और माइकीनी सभ्यताओं के साथ रक्त-सम्मिश्रण का सुफल मानते हैं। इस प्रकार सम्मिश्रण रूपी अमृत-मंथन से नयी चेतना, नवजीवन समाज को प्राप्त होता है।

यह वह समय था जब भारतीय सभ्यता के विचार पश्चिमी एशिया और यूरोप में फैल रहे थे। उसके पहले भी अंकुर के रूप में सुमेर द्वारा कुछ सामी रंगों में रँगे भारतीय विचार तथा सामाजिक रचना फणीश और यहूदी सभ्यताओं में गयी। सम्मिश्रण के कारण छनकर जो भारतीय विचार यूनान और उसके चारों ओर पहुँचे, उससे यूनान के जीवन में आमूल परिवर्तन स्वाभाविक था। उसके पहले सामंतशाही व्यवस्था में उथल-पुथल उत्पन्न हुयी। कुछ नेताओं ने शस्त्रबल से राजसत्ता हथिया ली। कालांतर में ये निरंकुश शासक (Tyrants) जनता ने हटा दिए और यूनान में नगर-राज्य आए। तब कुछ अपवाद छोड़कर सुमेर एवं फणीश सभ्यता द्वारा पहुँची भारतीय जनतंत्रात्मक प्रणाली लागू हो सकी।

प्राचीन यूनान में कुछ स्थलों के नाम 'शिव' से संबन्धित पाए जाते हैं। वहाँ 'त्रिशूल' उसी रूप का एक भूखंड है, वहीं 'सलोनिका' नगर है। कहते हैं, यहाँ शिव-पूजक रहते थे, जो कभी एशिया से यूरोप जाने वाले राजमार्ग में व्यापारियों से कर वसूलते थे। कभी अरब प्रायद्वीप से यूनान तक शिव के उपासक निवास करते थे। शिव सर्वसाधारण के आराध्य देवता सहज रूप में थे। इसके स्मृति चिन्ह सारे क्षेत्र में फैले हैं।

पर यूनान का इस कालखंड का जीवन ईरानी हखमनीषी आक्रमणों से ग्रस्त था। उससे छुटकारा विक्रम संवत् पूर्व पाँचवीं शती में हो सका, सलामी (Salamis) या प्लेटियाई के युद्घ में आक्रामकों की स्थल-सेना और माइकेल के युद्घ में ईरानी जल बेड़ा समूचा नष्ट हो गया। इसी से यवन सभ्यता एवं संस्कृति बच सकी। इसके बाद नगर-राज्यों के आपसी संघर्ष होते हुए भी अनेक चिंतक, विचारक, दार्शनिक, गणितज्ञ, वैज्ञानिक और साहित्यकार छोटे से कालखंड में हुए, तब ईरानी आक्रमण समाप्त हो गया था और मखदूनिया का अधिकार एथेंस (Athens) समेत यूनान पर न आया था। यूनान के जीवन में कुछ अपवाद छोड़ यह प्रजातंत्र का युग था। इस छोटे से कालखंड ने अंततोगत्वा सारे यूरोप को प्रभावित किया। यूरोप के पुनर्जागरण (renaissance) के युग में कला, दर्शन तथा विज्ञान को दिशा मिली। क्लासिकल युग के दर्शन, शासन और समाज-व्यवस्था के विचारों में भारत का स्पष्ट प्रभाव दिखता है। परंतु मानवता अथवा मानव-मूल्यों का भारतीय पक्ष वहाँ पहुँच न सका, जिससे विसंगति उत्पन्न हुयी। तदुपरांत भविष्य में समूचे यूरोप के चिंतन को दिशा देना जिसके भाग्य में लिखा था, यूनान के उस स्वर्ण युग, जिसे पेरिक्लीस (Pericles) का युग भी कहते हैं, का अंत सिकंदर के महत्वाकांक्षी अभियान के दौरान प्रारंभ हो गया।

कितना छोटा यूनान का कालखंड और कैसा प्रभावी ! पर मुक्त विचारधारा के विकास के साथ-साथ मानव-मूल्यों के अनुरूप सांस्कृतिक जीवन बनना चाहिए। पेरिक्लीस (Pericles) (यूनानी स्वर्ण युग के कथित नायक) ने सार्वजनिक मताधिकार रूपी नए अस्त्र का प्रयोग सामंतशाही को समाप्त करने में किया; भारतीय गणतांत्रिक विचारधारा अपनाकर जनता के अधिकारों का समर्थन किया। इसी कालखंड के आसपास हर तरह का यवन साहित्य पनपा। विचारकों एवं दार्शनिकों के संवाद लिखे गए। उनमें भारतीय अध्यात्म तथा दर्शन की गहराई न होने के बाद भी मुक्त तार्किक विचारधाराएँ देखने को मिलती हैं। इन्हीं से यूरोपीय विज्ञान का जन्म हुआ। यवन साहित्य के सुखांत और दुखांत नाटक एवं काव्य, इन्होंने आधुनिक विज्ञान, मनोविज्ञान तथा मानविकी को पारिभाषिक शब्द और रूपक प्रदान किए। इसी कालखंड में गुलामों की नागरिक की मान्यता मिलना प्रारंभ हुआ। संपत्ति के सम वितरण के प्रयत्न हुए।

पर इसी क्रिया में बिना सर्वसाधारण के जीवन को सुसंस्कृत बनाए और उदात्त मूल तत्वों पर मानव की आस्था जगाए, जब न्याय-व्यवस्था भी प्रजातंत्र के नाम पर सभी नागरिकों के भीड़तंत्र को सौंप दी गयी तो कैसी विकृति फली ! मुक्त विचारों के कारण सुकरात के ऊपर नवयुवकों के मस्तिष्क को मान्यताओं से हटाकर दूषित करने का अभियोग लगाया गया और जनता-न्यायाधिकरण ने उसे मृत्युदंड दिया। अपनी वैचारिक स्वतंत्रता के कारण जेल में विष का प्याला, बाद में यूरोप के नवचैतन्यदाता कहलाने वाले, दार्शनिक को पीना पड़ा। उस तर्क के अनुसार सहस्त्रों गुना अपराध भारतीय मुक्त चिंतकों, श्रमण और अन्य विचारकों ने किया था, जिनको समाज ने सम्मान दिया और स्वयं गौतम बुद्घ ने भी किया, जो अवतार कहलाए। अरस्तू को भी इसी बात पर भागकर मृत्युदंड से अपनी जान बचानी पड़ी। अनेक पुरातत्वज्ञों ने यवन इतिहास के इस कालखंड को भारत के वैदिक काल के समान कहा है। पर उन्होंने इस मूलभूत अंतर को अनदेखा कर दिया। बिना वैचारिक स्वतंत्रता के, बिना एक-दूसरे की बात सुनने और आदर करने की समझ के सामाजिक जीवन पूर्णता की ओर नहीं बढ़ सकता। यही भारतीय संस्कृति की विलक्षणता है।

चित्र विकिपीडिया के सौजन्य से। 


प्राचीन सभ्यताएँ और साम्राज्य

०१ - सभ्यताएँ और साम्राज्य
०२ - सभ्यता का आदि देश
०३ - सारस्वती नदी व प्राचीनतम सभ्यता
०४ - सारस्वत सभ्यता
०५ - सारस्वत सभ्यता का अवसान
०६ - सुमेर
०७ - सुमेर व भारत
०८ - अक्कादी
०९ - बैबिलोनिया
१० - कस्सी व मितन्नी आर्य
११ - असुर जाति
१२ -  आर्यान (ईरान)
१३ - ईरान और अलक्षेन्द्र (सिकन्दर)
१४ - अलक्षेन्द्र और भारत
१५ - भारत से उत्तर-पश्चिम के व्यापारिक मार्ग
१६ - भूमध्य सागरीय सभ्यताएँ
१७ - मिस्र सभ्यता का मूल्यांकन
१८ - पुलस्तिन् के यहूदी
१९ - यहूदी और बौद्ध मत
२० - जाति संहार के बाद इस्रायल का पुनर्निर्माण
२१ - एजियन सभ्यताएँ व सम्राज्य
२२ - फणीश अथवा पणि
२३ - योरोप की सेल्टिक सभ्यता
२४ -  योरोपीय सभ्यता के 'द्रविड़'
२५ - ईसाई चर्च द्वारा प्राचीन यरोपीय सभ्यताओं का विनाश
२६ - यूनान

Sunday, December 20, 2009

ईसाई चर्च द्वारा प्राचीन यरोपीय सभ्यताओं का विनाश

ईसाई पंथ के प्रवर्तन के समय से इन 'द्रविड़ों' पर घनघोर अत्याचार हुए। ईसाई पादरियों की समझ में प्राचीन द्रविड़ 'अगम' (Ogham) लिपि नहीं आती थी (तुलना करें संस्कृत 'आगम' एवं 'निगम')। 'द्रविड़' जंगलों में आश्रम बनाकर पठन-पाठन का कार्य करते थे, जहाँ उनकी प्रथाएँ और परम्पराएं अखंड चलती रहें। जहाँ युवा होने तक बच्चे पढ़ते थे। वह साधारणतया स्मृति से होता था। पर जो कुछ भी लेख थे, वे ईसाइयों ने जादू-टोना समझकर नष्ट कर दिए। जनता को धर्मपरायण बनाने वाले गीत बंद हो गए। उनके आश्रम, गुरूकुल नष्ट किए गए। उनका समूल नाश करने का यत्न हुआ। रोम के ईसाई सम्राट अगस्त (Augustus) ने फरमान जारी किया कि रोमन लोग द्रविड़ों से कोई संबन्ध न रखें। बाद में गिरजाघर में या अन्यत्र ईसाई प्रवचन होते ही भीड़ औजार लेकर निकल पड़ती और द्रविड़ों के मंदिर व मूर्तियां तोड़ती तथा घरों एवं ग्रंथों को आग लगाती। यह ईसाई पंथ उसी प्रकार के निर्मम अत्याचारों, छल-कपट से और जबरदस्ती लादा गया जैसे 'तलवार के बल पर इसलाम'।


अगस्त की अर्ध-प्रतिमा



फलतः ये सेल्टिक सभ्यता के बचे-खुचे अवशेष आज छोटे-छोटे गुटों में विभाजित, छिपकर अपने को द्रविड़ (द्रुइड) कहते पाए जाते हैं। किसी एक स्थान पर इकट्ठा होकर अपनी प्राचीन भाषा में स्तुति कर वे एकाएक पुन: लुप्त हो जाएँगे, ऐसी परंपरा बन गयी। आज भी अपने को ऊपरी तौर पर ईसाई कहते हुए भी इन्होंने अपनी प्राचीन संस्कृति की स्मृति बचाए रखी है। श्री पी.एन.ओक का कहना है कि वे अपनी भाषा में अनूदित गायत्री मत्रं का उच्चारण और पंथ की छोटी-मोटी पुस्तिकाएं (जैसे 'सूर्यस्तुति' और 'शिवसंहिता' सरीखी शायद खंडित एवं त्रुटिपूर्ण और विकृत रूप में) आज भी रखते हैं। गुप्तता उनके जीवन का अभिन्न अंग बन गयी है। कैसे सदियों अत्याचारों की सामूहिक स्मृति वंशानुवंश विद्यमान रहती है, उसका यह एक उदाहरण है।



जोन का एक चित्र

इसी प्रकार प्राचीन द्रविड़ों से प्रभावित इटली की एत्रुस्कन सभ्यता (Etruscan civilisation)  रोमन साम्राज्य में, और उससे बची-खुची बातें ईसाई पंथ को राजाश्रय मिलने पर नष्ट हो गयी। रोम नगर टाइबर नदी के तट पर कुछ गांवों को मिलाकर रामुलु (Romulus) (यह आंध्र प्रदेश में सामान्य नाम है) ने बसाया था। वहां एत्रुस्कन सभ्यता के कुछ पटिया, फूलदान एवं दर्पण में अंकित रहस्य बने, विक्रम संवत पूर्व सातवीं शताब्दी के अनेक चित्र मिले। इन चित्रों को रामायण के बालकांड, अयोध्याकांड, अरण्यकांड, किष्किंधाकांड, लंकाकांड एवं उत्तरकांड के दृश्यों के रूप में पहचाना गया है। एत्रुस्कन लोगों को रामकथा की विस्तृत जानकारी थी। विक्रम संवत पूर्व सातवीं शताब्दी तक इस सभ्यता का कभी-कभी युत्र आच्छादित इतिहास मिलता है। पर कहते हैं कि ईसाई पंथ के फैलते  यह सभ्यता स्वतः नष्ट हुयी। ऐसा भयंकर सामूहिक समूल नाश वास्तव में ईसाई अत्याचारों का परिणाम है। ईसाई पंथ-गुरूओं के अत्याचारों से इतिहास के पन्ने रँगे हैं। उनके वे पंथाधिकरण (Inquisitions), जिनमें रोमहर्षक, पंथ के नाम पर, मानवता की हड्डियों पर दानवता का निष्ठुर नंगा नर्तन तथा अकथनीय अत्याचार की कहानियां हैं। फ्रांस की उस देहाती हलवाहे की लड़की 'जोन' की मन दहलाने वाली कथा, जिसे यह कहने पर कि उसे देवदूतों ने कहा है कि फ्रांस की धरती से अंग्रेजों को निकाल दो (और जिसने फ्रांसीसी सेना का सफल नेतृत्व कर विजय दिलायी), ईसाई पंथ के ठेकेदारों ने सूली से बाँधकर जीवित जला दिया। यह अन्य बात है कि सौ वर्ष पूरे होने के पहले ही उसे 'संत' की उपाधि देकर पुनः प्रतिष्ठित करना पड़ा।

इस चिट्ठी का चित्र विकिपीडिया के सौजन्य से। 

प्राचीन सभ्यताएँ और साम्राज्य

०१ - सभ्यताएँ और साम्राज्य
०२ - सभ्यता का आदि देश
०३ - सारस्वती नदी व प्राचीनतम सभ्यता
०४ - सारस्वत सभ्यता
०५ - सारस्वत सभ्यता का अवसान
०६ - सुमेर
०७ - सुमेर व भारत
०८ - अक्कादी
०९ - बैबिलोनिया
१० - कस्सी व मितन्नी आर्य
११ - असुर जाति
१२ -  आर्यान (ईरान)
१३ - ईरान और अलक्षेन्द्र (सिकन्दर)
१४ - अलक्षेन्द्र और भारत
१५ - भारत से उत्तर-पश्चिम के व्यापारिक मार्ग
१६ - भूमध्य सागरीय सभ्यताएँ
१७ - मिस्र सभ्यता का मूल्यांकन
१८ - पुलस्तिन् के यहूदी
१९ - यहूदी और बौद्ध मत
२० - जाति संहार के बाद इस्रायल का पुनर्निर्माण
२१ - एजियन सभ्यताएँ व सम्राज्य
२२ - फणीश अथवा पणि
२३ - योरोप की सेल्टिक सभ्यता
२४ -  योरोपीय सभ्यता के 'द्रविड़'
२५ - ईसाई चर्च द्वारा प्राचीन यरोपीय सभ्यताओं का विनाश


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Sunday, December 13, 2009

योरोपीय सभ्यता के 'द्रविड़'

इसी प्रकार प्राचीन सेल्टिक सभ्यता के दिशा-निर्देशकों को 'द्रविड' (Druids)  के नाम से जाना जाता है। भारत के ब्राम्हणों में एक वर्ग द्राविड़ कहलाता है (देखें- ब्राह्मणों का वर्गीकरण 'पंचगौड़'  एवं 'पंचद्राविड़', पृष्ठ ४३)। 'द्रविड़' (अथवा 'द्रुइड') का सेल्टिक भाषा में अर्थ है- 'बलूत वृक्ष का जाननहार' (Knowing the oak tree) । यह बलूत वृक्ष वहाँ ज्ञानवृक्ष है जैसे भारत में पीपल या बोधिवृक्ष। वैसे 'द्रविड़' (द्र= द्रष्टा, विद् अथवा विर्= जानकार) (द्रुइड) प्राचीन सेल्टिक सभ्यता का ज्ञानी वर्ग था। ये साधारणतया बलूत के जंगलों में घूमते और पुजारी एवं अध्यापक के रूप में कार्य करते थे। ये प्राचीन सेल्टिक सभ्यता के संरक्षक थे। जनता के सभी वर्ग उनका बड़ा सम्मान करते थे। वे ही सार्वजनिक अथवा व्यक्तिगत, सभी प्रकार के विवादों में न्यायकर्ता भी थे। वे अपराधियों को दंड भी दे सकते थे। वे युद्घ में भाग नहीं लेते थे, न सरकार को कोई कर देते थे।



न्यायधीश के कपड़ों में एक द्रविड़

वर्ष में एक बार ये द्रविड़ आल्पस पर्वत के उत्तर-पूर्व में किसी पवित्र स्थल पर इकट्ठा होते थे। ये वार्षिक सम्मेलन गाल (Gaul)  देश में होते, जहाँ अनातोलिया से लेकर आयरलैंड तक के द्रविड़ इकट्ठा होकर अपना प्रमुख चुनते। वहीं सब प्रतिनिधियों के बीच नीति विषयक बातें होती थीं। समस्त विवादों का, जो उन्हें सौंपे जाते, वे निर्णय करते थे। ये वैसे ही सम्मेलन थे जैसे भारत में कुंभ मेले के अवसर पर होते थे। वे साधारणतया अपने कर्मकांड एवं पठन-पाठन बस्ती से दूर निर्जन जंगल में करते। द्रविड़ आत्मा की अनश्वरता और पुनर्जन्म पर विश्वास करते थे और मानते थे कि आत्मा एक शरीर से नवीन कलेवर में प्रवेश करती है। 'ये 'त्रिमूर्ति' को मानते थे। एक, ब्रह्मा जिन्होंने विश्व का निर्माण किया; दूसरे, ब्रेश्चेन (Braschen) यानी विष्णु, जो विश्व के पालनकर्ता हैं और तीसरे, महदिया (Mahaddia) यानी  महादेव, जो संहारकर्ता हैं।' इन देवमूर्तियों का वे पूजन भी करते थे। आंग्ल विश्वकोश के अनुसार- 'बहुत से विद्वान यह विश्वास करते हैं कि भारत के हिंदु ब्राह्मण और पश्चिमी प्राचीन सभ्यता के सेल्टिक 'द्रविड़' एक ही हिंदु-यूरोपीय पुरोहित वर्ग के अवशेष हैं।'

सेल्टिक सभ्यता के द्रविड़ (द्रुइड) के बारे में विद्वानों ने प्रारंभिक खोजों में 'उनके समय, उनकी दंतकथाओं, मान्यताओं, धारणाओं आदि के अध्ययन से यही निष्कर्ष निकाला कि वे भारत से आए दार्शनिक पुरोहित थे। वे भारत के ब्राह्मण थे, जो उत्तर में साइबेरिया ('शिविर' देश) से लेकर सुदूर पश्चिम आयरलैंड तक पहुँचे, जिन्होंने भारतीय सभ्यता को पश्चिम के सुदूर छोर तक पहुँचाया।' श्री पुरूषोत्तम नागेश ओक ने अपनी पुस्तक 'वैदिक विश्व-राष्ट्र का इतिहास' (देखें- अध्याय २३ और २४), जहाँ से ऊपर के उद्घरण हैं, में सेल्टिक सभ्यता के 'द्रविड़' (द्रुइड) का बड़ा विशद वर्णन उस विषय के शोधग्रंथों के आधार पर किया है। उन्होंने 'द्रविड़' भारत के उन ज्ञानी तथा साहसी पुत्रों को कहा जो सारे संसार में 'आर्य संस्कृति के अधीक्षक' बनकर फैले।

उनके अनुसार-'सारे मानवों को सम्मिलित करने वाले वैदिक समाज के विश्व भर के अधीक्षक, निरीक्षक, व्यवस्थापक, जो ऋषि-मुनि वर्ग होता था, उसे 'द्रविड़' की संज्ञा मिली थी। वैदिक सामाजिक जीवन सुसंगठित रूप से चलता रहे, यह उनकी जिम्मेदारी थी। वे उस समाज के पुरोहित, अध्यापक, गुरू, गणितज्ञ, वैज्ञानिक, पंचांगकर्ता, खगोल ज्योतिषी, भविष्यवेत्ता, मंत्रद्रष्टा, वंदपाठी, धार्मिक क्रियाओं की परिपाटी चलाने वाले; प्रयश्चित आदि का निर्णय लेने वाले गुरूजन थे।... यूरोप में उस शब्द का उच्चारण 'द्रुइड' रूढ़ है।'

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प्राचीन सभ्यताएँ और साम्राज्य

०१ - सभ्यताएँ और साम्राज्य
०२ - सभ्यता का आदि देश
०३ - सारस्वती नदी व प्राचीनतम सभ्यता
०४ - सारस्वत सभ्यता
०५ - सारस्वत सभ्यता का अवसान
०६ - सुमेर
०७ - सुमेर व भारत
०८ - अक्कादी
०९ - बैबिलोनिया
१० - कस्सी व मितन्नी आर्य
११ - असुर जाति
१२ -  आर्यान (ईरान)
१३ - ईरान और अलक्षेन्द्र (सिकन्दर)
१४ - अलक्षेन्द्र और भारत
१५ - भारत से उत्तर-पश्चिम के व्यापारिक मार्ग
१६ - भूमध्य सागरीय सभ्यताएँ
१७ - मिस्र सभ्यता का मूल्यांकन
१८ - पुलस्तिन् के यहूदी
१९ - यहूदी और बौद्ध मत
२० - जाति संहार के बाद इस्रायल का पुनर्निर्माण
२१ - एजियन सभ्यताएँ व सम्राज्य
२२ - फणीश अथवा पणि
२३ - योरोप की सेल्टिक सभ्यता
२४ -  योरोपीय सभ्यता के 'द्रविड़'

Sunday, December 06, 2009

योरोप की सेल्टिक सभ्यता

यूनान तथा रोम की सभ्यताएँ पश्चिमी विचारधारा पर ऐसी छा गयी है कि यह दृष्टि से ओझल हो गया कि उसके पहले भी यूरोप में कोई (संस्कृत: सुरूपा) सभ्यता थी। और कौन थे वे जिन्होंने उस सभ्यता को दिशा दी, उसका नेतृत्व किया? यूरोप की उस सभ्यता को 'सेल्टिक' (Celtic या Keltic)  नाम से हम जानते हैं। उन्होंने पश्चिमी यूरोप में बड़े-बड़े स्मारक छोड़े, जो मिस्त्र के प्रथम राजवंश द्वारा निर्मित पिरामिडों से भी प्राचीन थे।


स्टोनहेंज  का स्मारक



इन महापाषाणों (Megalith) में मंदिर, वेधशाला तथा समाधियाँ हैं। ऐसा एक प्रसिद्घ स्मारक इंग्लैण्ड (England) में स्टोनहेंज (Stonehenge) है। इसमें सूर्य एवं चंद्रमा का भलीभाँति निरीक्षण हो सकता था। उत्तरी स्काटलैण्ड में ऎसे ही ग्राम 'स्काराबेयर' (Skara Brae) में भवन, मेज, बेंच, कुरसी आदि पत्थरों की बनायी गयी थीं। आल्पस पर्वत के उत्तर में भी ये महापाषाण हैं। इनके निर्माण की पद्घति पिरामिडों से भिन्न थी- दो पत्थर के स्तंभों पर एक पत्थर रखकर। ये निर्माण सरल थे।






 स्कारबेयर में रहने का स्थान 

सेल्टिक सभ्यता की धुरी जिनके चारों ओर घूमी, अब उन संप्रदायों की ओर दृष्टि डालें। प्रथम, पाइथागोरियन (Pythagorian) संप्रदाय। आज कुछ विद्वान समझते हैं कि यह संप्रदाय विक्रम संवत् पूर्व छठी शताब्दी के 'पाइथागोरस' (Pythagoras) नामक यवन दार्शनिक ने चलाया। पर वह स्वयं तो इसी 'पीठगुरू' संप्रदाय की देन था। आज भी मज़हबी कहलाने वाले इस संप्रदाय ने उन सिद्घांतों को प्रतिपादित किया जिन्होंने यवन सभ्यता के स्वर्णिम कहे जाने वाले युग के दर्शन को, अरस्तू व प्लातोन के विचारों को रूप-रंग दिया तथा आधुनिक पश्चिमी जगत को वैज्ञानिक भूमिका और इस प्रकार एक तर्कशुद्घ एवं विवेकपूर्ण जीवन देना प्रारंभ किया। यह समय था जब भारतीय सभ्यता के विचारों का विस्तार संपूर्ण पश्चिमी संसार में हो रहा था। इन विचारों के अग्रदूत ये 'पीठगुरू' संप्रदाय को जन्म दिया।





 रोम के संग्रहालय में रखी पाईथागोरस की अर्धप्रतिमा का चित्र

इस संप्रदान की प्रमुख मान्यताओं में भारतीय श्रमण एवं बौद्घ जीवन की छाप दिखती है। पीठगुरू संप्रदाय के लोग तर्कशुद्घ चिंतन पर विश्वास करते थे। वे कहते थे कि,
  1. यथार्थता की गणितीय प्रकृति है और इसलिए अंतिम सत्य गणित के समान है।
  2. ध्यान करने से आत्मिक शुद्घि प्राप्त होती है।
  3. आत्मा ऊपर उठकर परमात्मा  अथवा दैवी अंश में विलीन हो सकती है।
  4. कुछ प्रतीक आध्यात्मिक महत्व के होते हैं।
  5. जितने भी संप्रदाय के बंधु हैं उन्हें कठोरता के साथ एक-दूसरे के प्रति निष्ठा एवं विश्वसनीयता बरतनी चाहिए।
वे संगीत को आत्मा का उन्नायक मानते थे। दफनाने के स्थान पर शवदाह करते थे। वे निवृत्ति मार्ग के समर्थक थे। उनके विश्वासों ने उस युग में वैज्ञानिक मनोवृत्ति को बढ़ावा और बाद में उनकी शिक्षा यवन दार्शनिकों तथा आधुनिक विज्ञान का पथ प्रशस्त करने वाली बनी। यही भारतीय संस्कृति की देन यूरोपीय सभ्यता को है। पर बीच के कालखंउ में एक बहुत बड़ा, अनेक शताब्दियों का, ईसाई और मुसलिम विचारों का ग्रहण लगने वाला था।

इन्हीं पीठगुरू का संदेश कि तर्क के आधार पर जीवन और विश्वासों की रचना हो (जैसे सनातन अथवा श्रमण एवं बौद्घ विचार थे), यवन इतिहास के स्वर्णिम काल के दार्शनिकों (वैज्ञानिकों) का पथ-प्रदर्शक बना। अपने ढंग से उन्होंने क्रमबद्घ विचार प्रारंभ किए। यवन चिंतक टालमी (Ptolemy), सुकरात (Socrates), प्लातोन व अरस्तू-सभी ऎसी परंपरा के मुक्त चिंतक थे। ये यूरोप की आधुनिक वैज्ञानिक विचारधारा के जनक कहलाए।

इस चिट्ठी के चित्र विकिपीडिया के सौजन्य से 

प्राचीन सभ्यताएँ और साम्राज्य

०१ - सभ्यताएँ और साम्राज्य
०२ - सभ्यता का आदि देश
०३ - सारस्वती नदी व प्राचीनतम सभ्यता
०४ - सारस्वत सभ्यता
०५ - सारस्वत सभ्यता का अवसान
०६ - सुमेर
०७ - सुमेर व भारत
०८ - अक्कादी
०९ - बैबिलोनिया
१० - कस्सी व मितन्नी आर्य
११ - असुर जाति
१२ -  आर्यान (ईरान)
१३ - ईरान और अलक्षेन्द्र (सिकन्दर)
१४ - अलक्षेन्द्र और भारत
१५ - भारत से उत्तर-पश्चिम के व्यापारिक मार्ग
१६ - भूमध्य सागरीय सभ्यताएँ
१७ - मिस्र सभ्यता का मूल्यांकन
१८ - पुलस्तिन् के यहूदी
१९ - यहूदी और बौद्ध मत
२० - जाति संहार के बाद इस्रायल का पुनर्निर्माण
२१ - एजियन सभ्यताएँ व सम्राज्य
२२ - फणीश अथवा पणि
२३ - योरोप की सेल्टिक सभ्यता

Sunday, November 29, 2009

फणीश अथवा पणि

ऐसे ही फणीश (Phoenicians) थे। इनका उल्लेख वेदों में 'पणि' नाम से आता है। ये नाग-पूजक थे और संभवतः पुराणों में वर्णित यही 'नाग' जाति है। ये भूमध्य सागर के पूर्वी तट आधुनिक लेबनान (Lebanon) और इसराइल के तटवर्ती प्रदेश के निवासी कहे जाते हैं। इतिहास इन्हें इब्रानी 'केन-आनी' (Kena-ani)  शाब्दिक अर्थ : 'व्यापारी') के नाम से जानता है।


फणीश सभ्यता का सिक्का

इनके प्राचीन नगर जेबाल (Gebal, आधुनिक: Jubayl; ग्रीक :Byblos), सिडान (Sidon, आधुनिक: 'शायदा'), टायर (Tyre; अरबी: शूर Tsor; ग्रीक: Tyros) और बेरूत (Beror;  आधुनिक: Beirut; ग्रीक : Brytos), सभी प्रसिद्घ नगर थे। इन्हें आधार बनाकर सारे भूमध्य सागर में इनकी नौकाएँ जातीं। इनके व्यापार की वस्तुएँ थीं सभी तरह का सामान,  महीन और रँगे कसीदा तथा बेलबूटे कढ़े वस्त्र, इमारती लकड़ी, नमक, काँच और धातु का सामान, भांड, हाथीदाँत तथा काठ की कलाकृतियाँ। वस्त्रों की रँगाई और सागरीय परिवहन इनका विशेष उद्योग था। इन्होंने अनातोलिया, साइप्रस (CYpress), एजियन सागर के द्वीपों में तथा उत्तरी अफ्रीका के तट के कार्थेज एवं यूतिका (Utica), स्पेन के अटलांटिक महासागर पर केडिज (Cadiz या Grades ) और अन्य उपनिवेश बसाए।

व्यापार में अभिलेख आवश्यक थे, इसलिए कीलाक्षर लिपि से एक नई २२ अक्षरों की व्यंजन वर्णमाला विकसित की। इसमें स्वर न थे। यही ग्रीक (और अरबी) वर्णमाला की जननी है। अन्ततोगत्वा इसी से रोमन तथा आधुनिक यूरोपीय भाषाओं की वर्णमाला आई। यह उनका स्थायी योगदान आधुनिक यूरोपीय सभ्यता को है।


सिकंदर के द्वारा टायर शहर का घेरा 

इनके नगर स्वशासित व्यापारिक केंद्र थे। राज्य-सत्ता पर संपन्न व्यापारियों का अंकुश था। आश्चर्य की बात है कि नगरों में आपस में कभी लड़ाई नहीं हुयी। संभवतः लिपि के साथ यूनान ने इनसे भारतीय गणराज्य की व्यवस्था, सुमेर द्वारा, नगर-राज्य के रूप में प्राप्त की। पर यूनान में आपस में लड़ाई होती रही। विक्रम संवत् पूर्व नौवीं शताब्दी में असीरिया ने इनके नगरों पर अधिकार कर लिया। कालांतर में सिकंदर और रोम के आक्रमण इन नगरों पर हुए तथा विक्रम संवत् पूर्व दूसरी शताब्दियों में रोमवासियों ने कार्थेज नगर को जलाकर राख कर दिया। तब इस सभ्यता का अवसान पूर्ण हो गया।

इस चिट्ठी के चित्र विकिपीडिया के सौजन्य से 

प्राचीन सभ्यताएँ और साम्राज्य

०१ - सभ्यताएँ और साम्राज्य
०२ - सभ्यता का आदि देश
०३ - सारस्वती नदी व प्राचीनतम सभ्यता
०४ - सारस्वत सभ्यता
०५ - सारस्वत सभ्यता का अवसान
०६ - सुमेर
०७ - सुमेर व भारत
०८ - अक्कादी
०९ - बैबिलोनिया
१० - कस्सी व मितन्नी आर्य
११ - असुर जाति
१२ -  आर्यान (ईरान)
१३ - ईरान और अलक्षेन्द्र (सिकन्दर)
१४ - अलक्षेन्द्र और भारत
१५ - भारत से उत्तर-पश्चिम के व्यापारिक मार्ग
१६ - भूमध्य सागरीय सभ्यताएँ
१७ - मिस्र सभ्यता का मूल्यांकन
१८ - पुलस्तिन् के यहूदी
१९ - यहूदी और बौद्ध मत
२० - जाति संहार के बाद इस्रायल का पुनर्निर्माण
२१ - एजियन सभ्यताएँ व सम्राज्य
२२ - फणीश अथवा पणि

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Sunday, November 22, 2009

एजियन सभ्यताएँ व सम्राज्य


भूमध्य सागर की बाकी सभ्यताएँ {एजियन सभ्यताएँ (Aegean civilizations)} साम्राज्यों से ग्रथित हैं और उनके साये में पली हैं। केवल अपवादस्वरूप यूनान का एक छोटा कालखंड रहा है जब गणतंत्र के प्रयोग हुए और कला, विज्ञान, साहित्य एवं दर्शन, सभी क्षेत्रों में यवन सभ्यता की अभूतपूर्व प्रगति हुई। भूमध्य सागर में 'क्रीति' (Crete: ग्रीक Kriti) नामक एक द्वीप है। वहाँ नाविकों की सागरीय सभ्यता विकसित हुयी। उसे उनकी एक प्राचीन राजधानी 'नोसोस' (Knossos)  के राजा अथवा देवता मिनोस (Minos) के नाम पर मिनोयन (Minoan) सभ्यता कहा जाता है। यह शांतिप्रिय  सभ्यता थी। उनके नगर किलेबंदी अथवा खाई से रक्षित थे। आज उनके खंडहर भवनों व नगर-नियोजन के मूक साक्षी हैं। उनके भित्तिचित्र (fresco) एवं मृद्भांड साक्षी हैं उनके कला- प्रेम के, जिनमें चित्रित हैं पशु-पक्षी, मानव तथा बहुतायत से फूल (विशेषकर कुमुदिनी)। चित्र-लिपि से प्रारंभ कर उन्होंने अक्षर-लिपि का विकास किया। पर उनकी वह लिपि आज तक पढ़ी नहीं जा सकी। यदि कोई सभ्यता बीच में ही काल के गर्त में विलीन हो जाती है और आधुनिक युग तक किसी प्रकार का सातत्य या सूत्र नहीं पकड़ में आता तो उनकी लिपि पढ़ना कठिन हो जाता है। इनके चित्रों में नारी आकृति इस प्रकार दिखायी गयी है जैसे वे किसी देवी की पूजा करते हों। पूरा भूमध्य सागर उनकी नौयात्रा का क्षेत्र था; जिसमें स्पेन से लेकर पूर्वी तट तक इन साहसिक नाविकों ने व्यापार किया।

 राजकुमारी सिला (scylla), मिनोस के प्रेमपाश में बंधती हुई

पर एक दिन अचानक उनकी यह सभ्यता और उनकी कीर्ति के भव्य नगर तथा प्रासाद नष्ट हो गए। इसके बारे में दो मत हैं। प्लातोन के अनुसार मिनोयन सभ्यता का विनाश भयंकर जल-प्रलय के कारण हुआ। एक विशाल, लगभग ३०० मीटर ऊँची सागर की महातरंग आई और उसने इन नगरों, उसके भवनों को उजाड़ दिया। यह इतना अचानक हुआ कि वहाँ के लोग सँभल नहीं पाए और समूल सभ्यता नष्ट हो गयी। दूसरा मत है कि एक भयानक भूकंप से विनाश हुआ। कुछ अवशेष मिलते हैं कि क्रीति निवासियों ने पुन: भूकंप से रक्षित भवन (लकड़ी का ढाँचा खड़ा कर) बनाने का यत्न किया। ये दोनों प्राकृतिक विपत्तियाँ अचानक एक साथ भी आ सकती थीं।

नोसोस में मिले मिनोयन सभ्यता का सबसे प्रसिद्ध भित्तिचित्र

इन मिनोयन लोगों का स्थान लिया युद्घप्रिय माइकीनी (Mycenaeans) ने। पहले भी मिनोयनों ने माइकीनी सागर-तट पर अपने व्यापारिक संस्थान बनाने के यत्न किए थे, पर अधिक सफलता न मिल सकी। 'माइकीनी' नाम दक्षिण ग्रीस के पेलोपनीस (Peloponnese) प्रांत के प्रमुख नगर माइकीने (Mycenae) पर पड़ा; परंतु बाद में इससे अर्थ लिया जाने लगा 'सोने का रक्तपात (खून-खराबे) से भरा राज्य।' इन्होंने अनेक बातों में मिनोयन सभ्यता को, उनकी कला, स्थापत्य तथा नौयात्रा-विज्ञान आदि को अपनाया। अनेक प्रयासों के बाद भी वे क्रीति को जीत न सके थे, यह प्राकृतिक आपदा के बाद संभव हुआ। इनके अवशेष आज भी एजियन सागर के असंख्य द्वीपों में तथा यूनान प्रायद्वीप में मिलते हैं। हेनरिख श्लीमान ने माइकीनी राजाओं के मकबरे खोज निकाले, जहाँ शवों के मुख पर सोने के मुखौटे चढ़े थे और रत्न आदि रखे हुए थे। पर शायद ट्राय तथा अन्य गृहयुद्घों में उलझने से और उत्तर-पश्चिम के सीमांत आक्रमणों से यह सभ्यता नष्ट हो गयी।

इस चिट्ठी के चित्र विकिपीडिया के सौजन्य से 

प्राचीन सभ्यताएँ और साम्राज्य

०१ - सभ्यताएँ और साम्राज्य
०२ - सभ्यता का आदि देश
०३ - सारस्वती नदी व प्राचीनतम सभ्यता
०४ - सारस्वत सभ्यता
०५ - सारस्वत सभ्यता का अवसान
०६ - सुमेर
०७ - सुमेर व भारत
०८ - अक्कादी
०९ - बैबिलोनिया
१० - कस्सी व मितन्नी आर्य
११ - असुर जाति
१२ -  आर्यान (ईरान)
१३ - ईरान और अलक्षेन्द्र (सिकन्दर)
१४ - अलक्षेन्द्र और भारत
१५ - भारत से उत्तर-पश्चिम के व्यापारिक मार्ग
१६ - भूमध्य सागरीय सभ्यताएँ
१७ - मिस्र सभ्यता का मूल्यांकन
१८ - पुलस्तिन् के यहूदी
१९ - यहूदी और बौद्ध मत
२० - जाति संहार के बाद इस्रायल का पुनर्निर्माण
२१ - एजियन सभ्यताएँ व सम्राज्य


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Sunday, November 15, 2009

जाति संहार के बाद इस्रायल का पुनर्निर्माण


पर लगभग अस्सी वर्ष की स्वाधीनता के बाद इस्रायल पुनः रोम के आक्रमण का शिकार बना। इस भीषण युद्घ में हजारों यहूदी मारे गए और बाद में नर-संहार हुआ। रोमन साम्राज्य आने के लगभग दो शताब्दी बाद यहूदियों पर और भी भीषण अत्याचार बरपे गए। उसका वर्णन 'हिंदी विश्वकोश' ने इस प्रकार किया है,
'इसके बाद सन् १३५ ई. में रोम के सम्राट हाद्रियन ने येरूसलम के यहूदियों से रुष्ट होकर एक-एक यहूदी का कत्ल करवा दिया। वहाँ की एक-एक ईंट गिरवा दी और शहर की समस्त भूमि पर हल चलवाकर उसे बराबर करवा दिया। इसके पश्चात अपने नाम पर एक रोमी नगर का उसी स्थान पर निर्माण कराया और आज्ञा दी कि कोई यहूदी इस नए नगर में कदम न रखे। नगर के मुख्य द्वार पर रोम के प्रधान चिन्ह शूकर की एक मूर्ति स्थापित कर दी गयी।'


इन अत्याचारों के कारण यहूदी सारे संसार में बिखर गए। उन्हें उनका देश 'इस्रायल' द्वितीय महायुद्घ के बाद ही प्राप्त हो सका। भारत को छोड़कर दुनिया के सभी देशों ने उनके ऊपर अत्याचार किए। पर अपने पंथ की भावनाओं को संजोए सभी अत्याचार, जिनमें हिटलरी जर्मनी के गैस चैंबर का जाति-संहार (genocide) भी है, उन्होंने सहन किए। द्वितीय महायुद्घ के बाद ही उनकी भूमि (देश) उन्हें प्राप्त हुयी। वहाँ बसने की छूट मिली और मिली स्वतंत्रता, अपने पंथ के अनुसार जीवन बनाने की छूट। सारे संसार से यहूदी इस्रायल में पुनः आकर बसे। उन्होंने प्राचीन मृत कही जाने वाली भाषा इब्रानी को राष्ट्रभाषा के रूप में अपनाया। स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद इस्रायल की स्वतंत्र यहूदी सरकार ने एक श्वेतपत्र (white paper) जारी किया कि किस देश से कितने यहूदी कैसे आकर बसे। उस श्वेतपत्र में उल्लेख है भारत देश का, जहाँ उन पर कभी कोई अत्याचार नहीं हुआ; जहाँ अपने पंथ की मान्यताओं का पालन करते हुए वे भारत के नागरिकों की भाँति रह सके। और है भारत और उस हिंदु संस्कृति के प्रति उनकी श्रद्घांजलि।


इस्रायली संसद - चित्र विकिपीडिया के सौजन्य से

प्राचीन सभ्यताएँ और साम्राज्य

०१ - सभ्यताएँ और साम्राज्य
०२ - सभ्यता का आदि देश
०३ - सारस्वती नदी व प्राचीनतम सभ्यता
०४ - सारस्वत सभ्यता
०५ - सारस्वत सभ्यता का अवसान
०६ - सुमेर
०७ - सुमेर व भारत
०८ - अक्कादी
०९ - बैबिलोनिया
१० - कस्सी व मितन्नी आर्य
११ - असुर जाति
१२ -  आर्यान (ईरान)
१३ - ईरान और अलक्षेन्द्र (सिकन्दर)
१४ - अलक्षेन्द्र और भारत
१५ - भारत से उत्तर-पश्चिम के व्यापारिक मार्ग
१६ - भूमध्य सागरीय सभ्यताएँ
१७ - मिस्र सभ्यता का मूल्यांकन
१८ - पुलस्तिन् के यहूदी
१९ - यहूदी और बौद्ध मत
२० - जाति संहार के बाद इस्रायल का पुनर्निर्माण

Sunday, November 08, 2009

यहूदी और बौद्ध मत

यह समय था जब बौद्ध तथा अन्य प्रचारक भारत (जिसके अंतर्गत गांधार भी था) की पश्चिमी सीमा लाँघ कर ईरान और सुदूर पश्चिमी एशिया में अहिंसा का संदेश लेकर फैले। इस भारतीय संस्कृति के संदेश से यहूदियों में नए संप्रदाय उत्पन्न हुए। ऐसे 'फारिसी' (Pharisee) थे जिन्होंने अपनी धर्मपरायणता और तप एवं संयम के द्वारा सर्वसाधारण के प्रतिदिन के जीवन में भगवान के प्रति आस्था जगाने का यत्न किया। हज़रत मूसा के आदेशों की सद्य: परिस्थिति के अनुसार व्याख्या की, जिसके लिए लिखित 'थोरा' के अतिरिक्त मौखिक परंपराएँ भी वैसे ही बंधनकारी बनीं। वे आत्मा को अनश्वर मानते थे, पुनर्जन्म पर विश्वास करते थे और मानते थे कि बुरे कर्मों का फल भगवान देते हैं।






 ईसा और फारसी के बीच विवाद - चित्र  विकिपीडिया के सौजन्य से 

ऎसे ही यहूदियों के अंदर एक 'एस्सेनी' (Essene)  संप्रदाय आया। ये पंजाब के सैनी (ब्राम्हणों) से संबंधित कहे जाते हैं। उसका वर्णन हिंदी विश्वकोश ने (ग्रंथ १, पृष्ठ ५१०) निम्न शब्दों में किया है--

'हर 'एस्सेनी' ब्राम्ह मुहूर्त में उठता था और सूर्योदय के पहले प्रात: क्रिया, स्नान, उपासना आदि से निवृत्त हो जाता था। उसका मुख्य सिद्घांत था अहिंसा। एस्सेनी हर तरह की पशुबलि (जो येरूसलम मंदिर में प्रचलित थी), मांस-भक्षण या मदिरापान के विरूद्घ थे। हर एस्सेनी को दीक्षा के समय प्रतिज्ञा करनी पड़ती थी-'मैं यह्वे अर्थात् परमात्मा का भक्त रहूँगा। मैं मनुष्यमात्र के साथ सदा न्याय का व्यवहार करूँगा। मैं कभी किसी की हिंसा नहीं करूँगा और न किसी को हानि पहुँचाऊँगा। मनुष्यमात्र के साथ मैं अपने वचनों का पालन करूँगा। मैं सदा सत्य से प्रेम करूँगा।' आदि।

'उस समय के निकट हिंदु दर्शन के प्रभाव से इसराइल में एक और विचार-शैली ने जन्म लिया, जिसे 'कब्बाला' (Kabbalah)  (शाब्दिक अर्थ : 'परंपरा') कहते हैं। उसके सिद्घांत हैं-ईश्वर अनादि, अनंत, अपरिमित, अचिंत्य, अव्यक्त और अनिर्वचनीय है। वह अस्तित्व और चेतना से भी परे है।' 'कब्बाला' की पुस्तकों में योग की विविध श्रेणियाँ, शरीर के भीतर के चक्र और अभ्यास के रहस्यों का वर्णन है।'

ऎसा था हिंदु दर्शन का प्रभाव, जिसने यहूदियों के घोर निराशा और गुलामी के काल में भी श्रेष्ठ जीवन का संदेश देकर संस्कृति को जगाए रखा।




प्राचीन सभ्यताएँ और साम्राज्य

०१ - सभ्यताएँ और साम्राज्य
०२ - सभ्यता का आदि देश
०३ - सारस्वती नदी व प्राचीनतम सभ्यता
०४ - सारस्वत सभ्यता
०५ - सारस्वत सभ्यता का अवसान
०६ - सुमेर
०७ - सुमेर व भारत
०८ - अक्कादी
०९ - बैबिलोनिया
१० - कस्सी व मितन्नी आर्य
११ - असुर जाति
१२ -  आर्यान (ईरान)
१३ - ईरान और अलक्षेन्द्र (सिकन्दर)
१४ - अलक्षेन्द्र और भारत
१५ - भारत से उत्तर-पश्चिम के व्यापारिक मार्ग
१६ - भूमध्य सागरीय सभ्यताएँ
१७ - मिस्र सभ्यता का मूल्यांकन
१८ - पुलस्तिन् के यहूदी
१९ - यहूदी और बौद्ध मत

Sunday, November 01, 2009

पुलस्तिन् के यहूदी


भूमध्य सागर के पूर्वी भाग का जिन प्राचीन सभ्यताओं से संबंध का वर्णन आता है; उनमें बाइबिल के 'पूर्व विधान' में वर्णित यहूदी जाति और सभ्यता है। उनका देश था पुलस्तिन् (फिलिस्तीन), बाइबिल ने जिसे दूध एवं मधु का देश कहा। आज प्राचीन इतिहास के 'उर्वर अर्धचंद्र' का यह दक्षिणी-पश्चिमी छोर बदलती जलवायु के कारण मरूभूमि  में परिणत हो गया है। उस समय की उनकी सभ्यता, ज्ञान, दर्शन और जीवन उक्त 'पूर्व विधान' की प्रथम पाँच पुस्तकों में वर्णित है, जो 'पंचक' (Pentateuch)  के नाम से प्रसिद्घ हैं। इसराइल (Israil) शब्द का प्रयोग 'पूर्व विधान' की प्रथम पुस्तक 'उत्पत्ति' में यहूदियों के बारह कबीलों के लिए हुआ है। इनके प्रथम पैगम्बर (अथवा पूर्व पुरूष) अब्राहम (Abraham) (इब्राहीम?) के पौत्र याकूब [Jacob] (जिनका दूसरा नाम 'इसराइल' था) ने इन बारह कबीलों को एक सूत्र में बाँधा था। ये बारह कबीले अपने को 'बनी इसराइल' (इसराइल के पुत्र) कहने लगे। बाद में इबरानी (Hebrew) भाषा में इसराइल का अर्थ ही 'भगवान का प्यारा राष्ट्र' हो गया। याकूब का एक पुत्र 'यहूदा' या 'जूडा' (Juda) था। उसी के नाम पर यह जाति यहूदी (Jew) कहलायी।



याकूब (जेकब) फरिश्ते से लड़ते हुऐ

यहूदी मूलत: सामी परिवार की एक शाखा थी। इनका एक दु:खपूर्ण, सामूहिक आव्रजनों (Migrations)  से लिपटा इतिहास है। (ये आव्रजन द्वितीय जागतिक महायुद्घ के बाद अब समाप्त हुए जब यहूदियों ने इच्छित देश, 'इसराइल', पा लिया।) यहूदी पंथ के संस्थापक अब्राहम ने अत्याचारों से पीड़ित सभी यहूदियों को सुमेर की उर नगरी तथा उत्तरी अरब देश से पुलस्तिन को प्रयाण कराया था। दोबारा हजरत मूसा के नेतृत्व में उन्होंने मिस्र में नील नदी के मुहाने से पुन:पुलस्तिन की ओर आव्रजन किया और पुन: इसराइल की प्रतिज्ञात भूमि (Promised land) पर आए (जिसे पैगंबर मूसा के अनुसार भगवान ने देने को कहा था)।

इस बीच हजरत मूसा ने उन्हें उपदेश दिया। वे बाइबिल के 'तौरेत' (इबरानी 'थोरा' : शाब्दिक अर्थ 'धर्म') भाग में संकलित किये गए हैं। उनके उपदेशों के दो सार हैं-उपनिषदों के निराकार ब्रम्ह, 'यहोवा' की उपासना और मनुस्मृति में धर्म के जो दस लक्षण बताए गए हैं, लगभग उन्हीं सदाचार के दस नियमों का पालन। यही बाइबिल के उस भाग में वर्णित दस आदेश ( ten commandments) हैं।

कहा जाता है कि उसके बाद सुलेमान (Soloman) के जमाने में उनकी लौकिक उन्नति हुयी। सुलेमान ने येरूसलम में विशाल मंदिर एवं भवन बनवाया। उनका व्यापार संसार के सभी ज्ञात देशों से और भारत से भी होने लगा। परंतु सुलेमान की मृत्यु के बाद इसराइल और जूडा पुन: स्वतंत्र रियासतें बनीं। उनमें झगड़े शुरू हुए। तब असीरिया (असुर देश:  Assyria) ने चढ़ाई की। वहाँ के विशाल मंदिर एवं भवनों में आग लगा दी और येरूसलम नगर भी ध्वस्त कर दिया। यहूदी पुरोहितों और सरदारों का संहार कर २७,२९० प्रमुख यहूदी परिवारों को कैद कद और गुलाम बनाकर बाबुल भेजा। वहाँ उन पर अनेक अत्याचार हुए और उन्हें नारकीय यातनाएँ सहन करनी पड़ीं।

परंतु जब ईरान ने बाबुल पर विजय पाई तो आर्य राजा 'कुरू' ने उन्हें स्वतंत्र किया। लूट का सारा धन जो बाबुल आया था, उसे यहूदी राजा के वंशज, जो वहाँ गुलाम थे, के सुपुर्द कर आदर के साथ वापस पुलस्तिन भेजा (देखें-पृष्ठ १६७)। राजा कुरू ने येरूसलम के मंदिर का अपने व्यय से पुनर्निर्माण कराया और पुराने पुरोहित के वंशजों को सौंप दिया। यहूदी जाति का पुनर्वास हुआ, उनके खुशी के दिन फिर लौटे। उनकी स्वतंत्रता व स्वायत्त शासन लौटा और उनके स्वर्णिम दिन आए। धार्मिक विचार लिपिबद्घ हुए। प्रात:-सायं का हवन और वेदी की अग्नि कभी बुझने न पाए; सुगंध एवं खाद्य पदार्थ की आहुति और विशेष अवसरों पर जीव की आहुति तथा भगवान का भजन उनका कर्मकांड बना।

सामी सभ्यताओं के जीवन में यह घटना अभूतपूर्व है। ईरानियों ने दास प्रथा के विपरीत इन गुलामों को स्वतंत्रता एवं स्वशासन दिया। जो अत्याचार उन पर दूसरों ने किया था उसका परिमार्जन किया। ऎसा था भारतीय संस्कृति का प्रभाव; जो इसके संपर्क में आया उसे उदात्त जीवन की प्रेरणा मिली। संस्कृति वास्तव में पारस पत्थर के समान है। जिसका स्पर्श करेगी वह मन-वचन-कर्म से स्वर्ण और खरा बनेगा।

पर सिकंदर के आक्रमण के बहाने पुन: विपत्ति आई। इसराइल और यहूदा पुन: परतंत्र हुए। अंत में सेल्यूकस और उसके वंश का राज्य आया। उसी वंश में अंतिओकस ने विद्रोह के दंड स्वरूप येरूसलम का मंदिर पुन: भूमिसात् कर दिया। हजारों यहूदियों को मरवा डाला। उनके ही देश में उनकी उपासना-पद्घति अपराध घोषित की गयी। उनकी धर्म पुस्तकें जला दी गयी और यहूदी मंदिरों में यूनानी प्रतिमाएँ स्थापित की गयी। लगभग पौने दो सौ वर्ष बाद यहूदी पुन: यूनानी पाश से मुक्त हो सके।

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प्राचीन सभ्यताएँ और साम्राज्य

०१ - सभ्यताएँ और साम्राज्य
०२ - सभ्यता का आदि देश
०३ - सारस्वती नदी व प्राचीनतम सभ्यता
०४ - सारस्वत सभ्यता
०५ - सारस्वत सभ्यता का अवसान
०६ - सुमेर
०७ - सुमेर व भारत
०८ - अक्कादी
०९ - बैबिलोनिया
१० - कस्सी व मितन्नी आर्य
११ - असुर जाति
१२ -  आर्यान (ईरान)
१३ - ईरान और अलक्षेन्द्र (सिकन्दर)
१४ - अलक्षेन्द्र और भारत
१५ - भारत से उत्तर-पश्चिम के व्यापारिक मार्ग
१६ - भूमध्य सागरीय सभ्यताएँ
१७ - मिस्र सभ्यता का मूल्यांकन
१८ - पुलस्तिन् के यहूदी

Saturday, October 24, 2009

मिस्र सभ्यता का मूल्यांकन

पर पश्चिमी जगत में सबसे गौरवपूर्ण कही जाने वाली इस प्राचीन सभ्यता का मूल्यांकन?   साम्राज्य युग ही इसके जीवन का वैभव काल रहा। उत्तरी और दक्षिणी प्रदेशों को संयुक्त करके जो अनेक राजवंश आए उसी की विरूदावली गायी जाती है। इन राजवंशों के साम्राज्य एक 'दैवी व्यवस्था' घोषित किए गए, जिसके शीर्ष स्थान पर देवता सूर्यदेव 'रे' का प्रतिनिधि उनका राजा 'फराउन' या 'फैरो' (Pharaoh)  था। इस कारण वह स्वयं देवता था। मृत्यु के बाद वह देवताओं में शामिल हो जाता था और उसकी पूजा पिरामिड अथवा समाधि के सामने मंदिर में होती थी। इसी से बना 'पेर-ओ' (फैरो) अर्थात 'अच्छे देवता'। वे राज्य के सर्वेसर्वा थे, सभी देवताओं के अधिकृत पुजारी और प्रवक्ता। मिस्री बहुदेववाद में फैरो हर देवता की सभी जगह पूजा नहीं कर सकता था, इसलिए वह अपना कार्यभार सहायक पुजारियों को सौंपता था। वे मंदिरों और फैरो के संपत्ति की देखभाल करते थे और युद्घ के समय सेना का संचालन। इन मंदिरों में देवदासियाँ थीं और चाकरी के लिए गुलाम। ये पुजारी कृषि, व्यापार, उद्योग, सभी पर नियंत्रण रखते, उपज का अनुमान लगाकर कर-निर्धारण करते। शासनकर्ता और पुजारी एक ही थे।

फैरो का सूचक चित्र

कल्पना करें कि कैसा सामाजिक जीवन इस निरंकुश राजतंत्र में रहा होगा जहाँ फैरो ही राज्य था। जिनकी भाषा में 'राज्य' के लिए कोई अलग शब्द न था, क्योंकि वह मानव संस्था थी ही नहीं, वह दैव-प्रदत्त थी। स्पष्ट है कि पुजारी, सामंत (अर्थात पुजारी के अतिरिक्त अधिकारी) और सैनिक बड़े प्रभावशाली थे; सुखोपभोग के अधिकारी थे। दूसरा साधारण नागरिक वर्ग था। ये थे किसान, जो खेती करते और पशु पालते अथवा व्यापारी, पर सबसे बड़ा वर्ग गुलामों का था। सभी सामी सभ्यताओं और साम्राज्यों की भाँति मिस्त्र में भी मानवता का कलंक दास प्रथा थी। अर्थात युद्घ में बनाए गए बंदी, अथवा जो ऋण अथवा कर अदा न कर सके। किसान पर करों का भार लदा रहता और डर सताता था कि यदि कर न दे सके तो फैरो के पास ले जाए जाएँगे, जहाँ गुलाम बनाकर बेगार में जोता जाएगा। व्यवहारत: राजकर्मचारी और सामान्य वर्ग के रहन-सहन में जमीन-आसमान का अंतर था।

सोचें, कैसे फैरो के मृत शरीर को लेपन के बाद सुरक्षित रखने के लिए पिरामिड बने। इन्हें देखकर सुमित्रानंदन पंत की ताजमहल पर पंक्तियाँ हठात् याद आती हैं-
    हाय मृत्यु का कैसा अमर अपार्थिव पूजन,
    जबकि विषण्ण निर्जीव पड़ा हो जग का जीवन।
    स्फटिक सौध में हो श्रंगार मरण का शोभन,
    नग्न क्षुधातुर वास-विहीन रहे जीवित जन।
    मानव, ऎसी भी विरक्ति क्या जीवन के प्रति,
    आत्मा का अपमान, प्रेत और छाया से रति।




 हिरोडोटस अर्धप्रतिमा

यवन इतिहासकार हिरोडोटस (Herodotus) का कहना है कि गीजा (Giza) के विशाल पिरामिड को १ लाख व्यक्तियों ने २० साल में बनाया था। यह १४६ मीटर ऊँचा, २३० मीटर लंबा और १३ एकड़ भूमि पर खड़ा हो। नेपोलियन ने कहा था कि इन महान पिरामिडों में लगे पत्थरों से यदि एक १० फीट ऊँची और १ फुट चौड़ी दीवार बनायी जाए तो वह पूरे फ्रांस को घेर लेगी। कैसे ये ढाई-ढाई टन के २३ लाख प्रस्तरखंड एक के ऊपर एक चढ़ाए गए होंगे ! कैसे तराशे गए होंगे कि उनके बीच सुई या बाल डालने की भी गुंजाइश नहीं है ! और कितने दास इसमें काम आए ! यह सब विचार कर मन सिहर उठता है। यह कैसी सभ्यता ?

इसी प्रकार इनकी समाधियाँ (मस्तबा)। इन पूर्वजों की समाधियों पर उनके मनोरंजन के लिए ऎसे चित्र उकेरे गए हैं जिन्हें हम अश्लील कहेंगे। इन मस्तबा या पिरामिडों में भोजन, पेय, सुखोपभोग की सामग्री, प्रिय वस्तुओं और कभी-कभी शौचालय की भी व्यवस्था रहती थी। विश्वास था कि हर व्यक्ति का प्रतिरूप 'का' रहता है जो मृत्यु के बाद भी उसे छोड़ता नहीं और जिसे इन सब वस्तुओं की आवश्यकता पड़ती है। वैसे 'का' के अतिरिक्त 'आत्मा' को भी वे मानते थे। नौका से पार कर सागर के उस पार पाताल में दुष्ट आत्माएँ चली जाती हैं। पर सदात्माएँ उसके दूसरे कोने में सुखोपभोग करती हैं। एक सीधा-सादा परलोकवाद, जिसमें दार्शनिक उड़ानों का स्थान न था

प्राचीन मिस्त्र बड़ा 'धार्मिक' (रिलीजियस) कहा जाता है। वह अंधविश्वासों से घिरा था। शायद उनका पंथ साधारण किसान और व्यापारी को संतुष्ट रखने के लिए और फैरो को देवता का प्रतिनिधि बनाने में था। यही नमूना संपूर्ण सामी सभ्यताओं में 'पादशाही' के रूप में प्रकट हुआ, जिसमें साधारण जनता का शासन में सहभागी होने का मार्ग न था। उनका पंथ अथवा मजहब संस्कृति के सर्वश्रेष्ठ गुणों-समता, मानव-मूल्यों का आदर और सभी का शासनतंत्र में किसी प्रकार सहभागी होना- से दूर था। राज्य सिमटकर फैरो में केंद्रित हो गया और फैरो ही राज्य का पर्याय बना।

मिस्र के कौटुंबिक जीवन का एक पहलू भाई-बहन का आपर में अंतर्विवाह है। संभवतः रक्त-शुद्घता का विकृत अर्थ ले, फैरो अथवा अनुवंशीय पदों पर आसीन लोगों का 'रक्त' मिश्रित न हो, इस भावना से यह रीति चली। स्पष्ट ही भिन्न वर्गों के कर्म में तो अंतर था ही, पर उनके बीच घोर विषमताएँ थीं। जैसे एकरस जीवन की कल्पना भारत में थी, वह वहाँ कभी नहीं आई। इसी से जीवशास्त्रीय और सामाजिक दुष्परिणामों को दुर्लक्ष्य कर यह विकृत परंपरा वहाँ आई।

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प्राचीन सभ्यताएँ और साम्राज्य

०१ - सभ्यताएँ और साम्राज्य
०२ - सभ्यता का आदि देश
०३ - सारस्वती नदी व प्राचीनतम सभ्यता
०४ - सारस्वत सभ्यता
०५ - सारस्वत सभ्यता का अवसान
०६ - सुमेर
०७ - सुमेर व भारत
०८ - अक्कादी
०९ - बैबिलोनिया
१० - कस्सी व मितन्नी आर्य
११ - असुर जाति
१२ -  आर्यान (ईरान)
१३ - ईरान और अलक्षेन्द्र (सिकन्दर)
१४ - अलक्षेन्द्र और भारत
१५ - भारत से उत्तर-पश्चिम के व्यापारिक मार्ग
१६ - भूमध्य सागरीय सभ्यताएँ
१७- मिस्र सभ्यता का मूल्यांकन

Sunday, October 18, 2009

भूमध्य सागरीय सभ्यताएँ

कभी इतिहास में भूमध्य सागर के दोनों ओर के देश ही यूरोप की दुनिया थी। इसी से कहा 'भूमध्य सागर'। यूरोपीय विद्वान प्रारम्भ में यही सभ्यताएँ जानते थे और इन्हें प्राचीनतम मानव सभ्यता समझते थे। इनमें भी सबसे प्राचीन है मिस्र की सभ्यता (Egypt, संस्कृत : 'अजपति')।


मिस्र, नील नदी का वरदान है। नदी का प्राचीन संस्कृत नाम आज तक चला आता है। वहाँ के जीवन में दो देवताओं की मानो होड़ थी। एक 'नील (Nile) नदी', जिसकी देन मिस्र का जीवन है। दूसरे सूर्यदेव 'रे' (रवि) । नील नदी में वर्ष में सदा उसी तारीख को बाढ़ आती है। इससे ३६५ दिन का (तीस दिन के बारह मास और ५ अतिरिक्त दिवस) उनका वर्ष बना। नील की क्षीण धारा तब  प्रबल हो उठती है। बाढ़ के साथ अन्नदायिनी नई मिट्टी सारी घाटी में फैलने लगती है और अक्तूबर के अंत तक सारी घाटी डूब जाती है। फिर एकाएक पानी उतरना प्रारम्भ होता है और तब निकल आते हैं उर्वर खेत। यह चिलचिलाती धूप व शुष्क गर्मी के कारण नील नदी और उसके साथ वनस्पति तथा हरियाली की मृत्यु और पुनर्जीवन की कहानी वर्षानुवर्ष दुहरायी जाती है। सूर्य का प्रतिदिन उदय एवं अस्त भी मानो उसके पुनर्जीवन की कथा है। यह प्रकृति की, उनके दोनों देवताओं की नियमितता, उनकी प्राचीन सभ्यता के आशावादी दर्शन का आधार तथा प्रतीक बनी।

आज प्राचीन मिस्री सभ्यता के अध्ययन के लिए उनके द्वारा निर्मित विशाल पिरामिड (pyramid), उनके मंदिर, भित्तिचित्र एवं मूर्तियां, उनकी चित्राक्षर लिपि में लिखे गए लेख और उनके अभिलेखागार हैं।

प्राचीन मिस्री सभ्यता का तिथि क्रम पाँच भागों में बाँटा जा सकता है। प्रथम प्राग्वंशीय युग, जो लगभग विक्रम संवत् पूर्व ३४०० के पहले था। उस समय मिस्र में दो भिन्न सभ्यताएँ पनप रही थीं। प्रथम मिस्र में अवस्थित नील की घाटी में, जो लगभग १५ से ३० किलोमीटर चौड़ी उत्तर से दक्षिण एक पट्टी है और दूसरी उसके मुहानों की भूमि पर। भिन्न होने के बाद भी दोनों ने नील नदी की बाढ़ प्रारम्भ होने की प्रति वर्ष का ३६५ दिन बाद आने वाला क्रम स्व-अनुभव से जाना था। जब यह गणना प्रारम्भ की गयी अर्थात वर्ष के प्रथम वर्ष के प्रथम दिन 'लुब्धक तारे', (Sirius : Alpha Canis Majoris) का उदय सूर्योदय के साथ हुआ था। पर नक्षत्र वर्ष लगभग १/४ दिन अधिक का होने के कारण यह घटना १४६० वर्ष के पश्चात पुन: वर्ष के प्रथम दिन आएगी। इसे 'सोथिक चक्र' (Sothic cycle)  कहते हैं। इसलिए किस मास के दिन यह घटना हुयी, जानने पर सोथिक चक्र से वह कौन सा वर्ष था, जान सकते हैं। मिस्त्री जीवन में ऎसी तिथियों के विशेष उल्लेख से काल या संवत् पूर्व का अनुमान कर सकते हैं।

किंवदंती के अनुसार मिस्र के अति प्राचीन जीवन में नील की घाटी में बसने वाली जाति दक्षिण से और उनके देवता दक्षिण और पूर्व स्थित 'देवभूमि' से आए। संभवतः ये अफ्रीका के उत्तरी-पूर्वी तट के निवासी होंगे, जिन्हें ये सजातीय समझते थे। नील के मुहाने में दो जातियाँ- पश्चिम में लीबिया वासी और पूर्व में अरब से आई सामी जाति के लोग बसते थे। दक्षिणी मिस्र के प्राचीन लोगों ने मुहाने में बसे लोगों को शत्रु जाति और सामी बताया है। पर इनके अतिरिक्त एक तीसरी जाति भी थी जो इंजीयन सागर (भूमध्य सागर के पूर्वी भाग) के असंख्य द्वीपों में भी फैली थी। धीरे-धीरे संघीय युग में वह मिस्र के दक्षिणी भाग में फैल गयी। प्राग्वंशीय युग की सभ्यता के बारे में बहुत कुछ अज्ञात है। लगभग ३४०० विक्रम संवत् पूर्व के आसपास एक संयुक्त राज्य की स्थापना हुयी और इसके साथ राजवंशीय युग में पदार्पण हुआ।


राजवंशीय युम में ३० वंशों के राजाओं का साम्राज्य और शासन था। तीसरे से छठे वंश के काल को पिरामिड युग भी कहते हैं, जब पिरामिड बने और आई मेंफिस की नरसिंह की मूर्ति (Sphinx)। इसके अंत के करीब सत्ताईसवें से तीसवें वंश के शासन में आया ईरान का आधिपत्य तथा विद्रोह की घटनाएँ। विक्रम संवत् पूर्व २७४-२७० में सिकंदर (अलक्षेंद्र : Alexander) का आक्रमण और उसके बाद यूनान का राज्य। और अंत में विक्रम संवत् की प्रथम शताब्दी के प्रारम्भ में ही मिस्र रोम का एक प्रांत बनकर रह गया। यवनों ने उसका इतिहास लिखवाने का, लिपि पढ़ने का और उनकी सभ्यता को समझने का यत्न किया। पर रोम का प्रांत बनने पर रोमन साम्राज्य के ईसाईकरण के अत्याचारों से उसकी पाँच सहस्र वर्ष पुरानी सभ्यता का अंत हो गया। जो कुछ बचा उसे अरब में इस्लाम की शक्ति बढ़ने पर इस्लामी वाहिनियों के अत्याचारों की आंधी ने ध्वस्त कर नील की घाटी और मुहाने के रहे-सहे पुराने अवशेषों को भी जला कर नष्ट कर दिया। आज मिस्र स्वतंत्र है। उसके ये विशाल पिरामिड तथा मूर्तियां आज तक खड़ी हैं। पर उसका प्राचीन से नाता टूट गया और उस पुरानी सभ्यता की पहचान सदा के लिए मिट गयी। अत्याचारों की जोर-जबरदस्ती से लादे गए जीवन से उबरने की आशा भी न रही। आज इस्लामी रूढ़िवाद और कट्टरपन के आतंक से मुक्ति कहाँ?

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प्राचीन सभ्यताएँ और साम्राज्य

०१ - सभ्यताएँ और साम्राज्य
०२ - सभ्यता का आदि देश
०३ - सारस्वती नदी व प्राचीनतम सभ्यता
०४ - सारस्वत सभ्यता
०५ - सारस्वत सभ्यता का अवसान
०६ - सुमेर
०७ - सुमेर व भारत
०८ - अक्कादी
०९ - बैबिलोनिया
१० - कस्सी व मितन्नी आर्य
११ - असुर जाति
१२ -  आर्यान (ईरान)
१३ - ईरान और अलक्षेन्द्र (सिकन्दर)
१४ - अलक्षेन्द्र और भारत
१५ - भारत से उत्तर-पश्चिम के व्यापारिक मार्ग
१६ - भूमध्य सागरीय सभ्यताएँ

Sunday, October 11, 2009

भारत से उत्तर-पश्चिम के व्यापारिक मार्ग




कारगिल से पर्वतमाला


भारत से उत्तर-पश्चिम की ओर जाने का व्यापारिक भू-मार्ग सदा से रहा है। एक मार्ग 'करगिल' (कश्मीर) [कारगिल] होकर था। करगिल का शाब्दिक अर्थ है, जहाँ करों की 'गिला' (शिकायत) अथवा अपवंचना हो, अथवा जो कर-मुक्त स्थान (पत्तन: Free port) हो।  ये मार्ग उत्तर में बल्ख-बुखारा, समरकंद और ताशकंद आदि को जाते थे। यहाँ से दो मार्ग थे। एक उत्तर को चीन एवं मंगोलिया की ओर तो दूसरा पश्चिम-मध्य एशिया के देशों की ओर मुड़ जाता था। ये सभी दुर्गम मार्ग भारतीय व्यापारियों ने निकाले। सर्वश्रेष्ठ धातु की वस्तुएँ, रेशम के वस्त्र, चंदन, मूर्तियाँ तथा अन्य कला-कौशल का सामान, मसाले और औषधियाँ सभी एशिया, यूरोप के देशों में भारत से जाते थे और बदले में स्वर्ण एवं चाँदी आती थी। भारतीयों ने इन मार्गों में अपने उपनिवेश बना रखे थे। जहाँ कहीं भारतीय गए वहाँ के लोगों को शील दिया, धर्म दिया, श्रेष्ठ (आर्य) बनने की ज्योति उनके मन में जलाई। उन्हें शिक्षा दी, अपना ज्ञान-विज्ञान दिया और कलाएँ, सहकारिता और सहयोग के पाठ सिखाए। जीवमात्र एवं प्रकृति से प्रेम और बड़ों के आदर के गुण उन्हें दिए तथा चरित्र की शिक्षा दी। सबसे बढ़कर मानवता का अभिमान और स्वशासन उन्हें दिया। कहीं किसी को गुलाम नहीं बनाया, न किसी की श्रद्घा पर आघात किया, न उनके पवित्र स्थान भ्रष्ट किए, न पूजा-स्थल तोड़े।


  करगिल (कारगिल) की ज़ंसकार तहसील में, फुगतल बौद्ध मन्दिर


आगे चलकर बौद्घ प्रचारकों ने भी व्यापार के मार्ग अपनाकर मध्य एशिया में और दूर चीन-मंगोलिया में बुद्घ के संदेश की दुंदुभि बजाई। दृढ़व्रती और साहसी बौद्घ भिक्षुओं ने व्यापारिक मार्गों पर सब जगह बौद्घ विहार स्थापित किए। मध्य एशिया के साथ ईरान और सुदूर पश्चिम में भूमध्य सागर के तट तक बौद्घ भिक्षु गए। यही ईसा मसीह की अहिंसा की प्रेरणा बने।

पर सामी सभ्यता और उनके साम्राज्यों की चमक-दमक ईरान के जीवन को बदल रही थी। उनमें साम्राज्यवादी लिप्सा उत्पन्न हुयी और एक दूसरी वृत्ति के शिकार बने। मुस्लिम आक्रमण के बाद तो ईरान में सब बदल गया। उसने शिया पंथ अपनाया। आज का कट्टरपंथी आतंकवादी जीवन बना उस देश का। भारत में उस इसलामी आक्रमण के शिकार बने और अपनी पवित्र अग्नि बचाकर आए पारसी। अपनी मूल संस्कृति तथा इस विभीषिका की स्मृति, जिसके कारण ईरान छोड़ना पड़ा, आज वे भूलते हैं। भारत में उनके नाम मुसलमानों से मिलते-जुलते होने के कारण वस्तुत: उन्हें मुसलमान ही समझने लगे। आज वे उस हिंदु संस्कृति को जिसका आश्रय उन्होंने घोर विपत्ति में ग्रहण किया, तथा उस माता के उपकारों को भूल गए। दोनों संस्कृतियों का प्रेरणा-केन्द्र एक था, इसका भी विस्मरण। क्या कभी ईरान में प्राचीन आर्य संस्कृति की स्मृति, उसके प्रति आस्था जगेगी?


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प्राचीन सभ्यताएँ और साम्राज्य

०१ - सभ्यताएँ और साम्राज्य
०२ - सभ्यता का आदि देश
०३ - सारस्वती नदी व प्राचीनतम सभ्यता
०४ - सारस्वत सभ्यता
०५ - सारस्वत सभ्यता का अवसान
०६ - सुमेर
०७ - सुमेर व भारत
०८ - अक्कादी
०९ - बैबिलोनिया
१० - कस्सी व मितन्नी आर्य
११ - असुर जाति
१२ -  आर्यान (ईरान)
१३ - ईरान और अलक्षेन्द्र (सिकन्दर)
१४ - अलक्षेन्द्र और भारत
१५ - भारत से उत्तर-पश्चिम के व्यापारिक मार्ग

Saturday, September 12, 2009

सिकंदर (अलक्षेन्द्र) और भारत

सिकंदर (Alexander) के साथ भारत में क्या हुआ, इस बारे में यवन इतिहासकारों ने असंगत बातें लिखी हैं पर राजा पुरू (Porus) की संधि बताती है कि वह विजेता एवं विजित के बीच न थी। यवन इतिहासकार कहते हैं कि वह संधि तब हुयी जब सिकंदर के पूछने पर कि उसके साथ कैसा व्यवहार किया जाय, पुरू ने निर्भीकता से उत्तर दिया कि जैसा एक राजा दूसरे स्वतंत्र राजा के साथ करता है। उनके अनुसार,
'यह सिकंदर की महानता थी कि उत्तर से प्रसन्न हो संधि में बराबरी की शर्तें तय हुयी।' 

यह कहकर तो किसी को बहलाया नहीं जा सकता। और सिकंदर जैसे सुरसा, परसीपुलिस आदि ईरानी नगरों की भयंकर लूट और नर-संहार करने वाले क्रूरकर्मा से तो कभी ऎसी अपेक्षा नहीं हो सकती।





 पोरस बायें और सिकंदर दायें


हम उसके बाद की कहानी जानते हैं। पुरू के राज्य व सतलुज नदी के बीच और सतलुज के पार अनेक गणराज्य थे। चाणक्य ने, जो उन दिनों तक्षशिला में आचार्य थे, एक भीषण प्रतिरोध की योजना चालू की, जिसकी प्रमुख कड़ी उनका प्रिय शिष्य चंद्रगुप्त था। गणराज्यों के प्रतिरोध के कारण सिकंदर की सेना और उसके साहस ने जवाब दे दिया। अंत में सिकंदर अपनी सेना के साथ नावों से नदी के मार्ग से भागा। ऎसे समय चंद्रगुप्त अथवा उसके साथियों का बाण सिकंदर की छाती में लगा। उस घाव के पकने से लौटते समय उसे ज्वर आया और बगदाद में उसकी महत्वाकांक्षी जीवन-लीला, विश्व-विजय का अधूरा स्वप्न लिए, समाप्त हो गयी। उसने पूर्वी ईरान में अपने सेनापति सेल्यूकस को छोड़ा था। उसका भी क्या हुआ, इतिहास हमें बताता है पर सिकंदर जैसे लोगों को इतिहास  'महान' का विशेषण लगाता है। वास्तव में सिकंदर जैसे लोग सभ्यता  के शांत प्रवाह में महामारी के समान थे। उन्होंने ज्वालामुखी सरीखी हलचल मचाई सभ्यता के शांत प्रवाह में और फिर अपनी विनाश-लीला और क्रूरता की कहानी छोड़कर शून्य में विलीन हो गए। जहाँ भी पहुँचे वहाँ के लोगों को गुलाम बनाया। स्वतंत्रता-प्रेमी जनों से नृशंस बदला लिया। मानवता के लिए आखिर उसका योगदान क्या था? दानवता का नंगा नाच?

लगभग डेढ़ सौ वर्षों तक यूनान का शासन रहा। उसके बाद पार्थिया प्रांत के राजा मित्रादित्य (अथवा मित्रदत्त) (Mitridates) ने यवनों को निकाल बाहर किया। पार्थी राजाओं ने लगभग चार सौ वर्षों तक राज्य किया। पर अंत में ईरान धार्मिक-पांथिक कर्मकांड एवं अंधविश्वास में जकड़ गया। उसके पहले आमू (वक्षु) और सीर नदी के सहारे हीरमंद तक और पूरे उत्तरी ईरान में बौद्घ भिक्षु फैल चुके थे।

गांधार आदि प्रदेश तब भारत के थे। तब ईरान में एक नए महात्मा 'मानी' (Mani) का जन्म हुआ। इनके विचार बौद्घ विचार थे। इन्होंने जरथ्रुष्ट्र, बौद्घ तथा ईसाई मतों का समन्वय करके 'मानी मजहब' प्रारंभ किया, जो मूलत: बौद्घ मत ही था। पर कुछ कट्टरपंथी और दकियानूसी मागी पुरोहितों ने षड्यंत्र करके उसे सूली पर चढ़वा दिया। पार्थी राजाओं के बाद सासानी कुल आया; उसमें प्रसिद्घ राजा नौशेरवाँ हुआ। पैगंबर मुहम्मद की मृत्यु के पश्चात् अरबों ने ईरान जीत लिया। समस्त ईरान ने, अत्याचारों का  शिकार हो, इसलाम स्वीकार किया। सहस्त्रों जरथ्रुष्ट्री पंथ के अनुयायी पवित्र अग्नि बचाकर भारत भागे। आज के पारसी यही हैं जिन्हें भारत ने इसलामी आक्रमण के विरूद्घ शरण दी।


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प्राचीन सभ्यताएँ और साम्राज्य

०१ - सभ्यताएँ और साम्राज्य
०२ - सभ्यता का आदि देश
०३ - सारस्वती नदी व प्राचीनतम सभ्यता
०४ - सारस्वत सभ्यता
०५ - सारस्वत सभ्यता का अवसान
०६ - सुमेर
०७ - सुमेर व भारत
०८ - अक्कादी
०९ - बैबिलोनिया
१० - कस्सी व मितन्नी आर्य
११ - असुर जाति
१२ -  आर्यान (ईरान)
१३ - ईरान और अलक्षेन्द्र (सिकन्दर)
१४ - अलक्षेन्द्र और भारत