Sunday, January 24, 2010

रोमन साम्राज्य


रोमन साम्राज्य (Roman empire) की कहानी थोड़ी-बहुत विदित है। वह सामंतों और गुलामों की कहानी है। वहाँ नरबलि भी दी जाती थी। रोमन सभ्यता में एक यवन साधु और सिंह की गाथा है, जिसे बर्नार्ड शा ने अपने प्रसिद्घ नाटक 'आंद्रकुलिस और सिंह' (Androcles and the Lion)  में चित्रित किया। यह कथा रोमन सभ्यता का प्रतिरूप है और रोमन साम्राज्य के अंतर्गत प्रथम तीन शताब्दियों में ईसाइयों पर अत्याचार भी दिखाती है।





ईसाई शहीदों की आखरी प्रार्थना

आंद्रकुलिस नामक ईसाई साधु को एक बार जंगल में एक सिंह मिला। अगले पैर में काँटा गड़ जाने के कारण वह लंगड़ाता था और पीड़ा से कराह उठता था। आंद्रकुलिस डर गया; पर जब उसे बार-बार पंजा चाटते और उस क्रिया में गड़ा कांटा दुखते देखा तो साहस कर कांटा निकाल दिया। कालांतर में ईसाइयों के विरूद्घ अभियान में वह पकड़ा गया और गुलामों की टोली में रोम लाया गया। यहाँ रोमन सम्राट, सामंतगण तथा अधिकारी बैठकर शस्त्रों से गुलामों की लड़ाई, रक्त की धार बहते, जीवित अंग-अंग कटते तथा मानव तड़पन पर क्रूरता की पैशाचिक लीला देखने, गुलामों के रक्त-पसीने से निर्मित सीढ़ीनुमा भवन (stadium) में इकट्ठा होते थे। इस प्रकार क्रूरतापूर्ण प्राण-हरण के विकृत खेल (sport) का मजा लूटते थे। जो लड़ने से इनकार करता, जैसे श्रद्घालु ईसाई, उन्हें अखाड़े में भूखे शेर के समक्ष छोड़ दिया जाता और लोग शेर को मनुष्य पर झपटते और चिथड़े कर खाते देखते। दुबले-पतले आंद्रकुलिस के लड़ने से इनकार करने पर उसे भूखे सिंह के समक्ष ढकेला गया। दहाड़कर सिंह अखाड़े में कूदा। लोगों में हिंसक स्फुलिंग की अतीव उत्सुकताएँ जागीं। पर सिंह ने अपने उपकारक की एकाएक पहचान कर उसे खाने के स्थान पर अपने नाखून सिकोड़कर पंजा उसकी ओर बढ़ा दिया। कहते हैं, इस पर आंद्रकुलिस और सिंह दोनों को जंगल की राह पर स्वतंत्र छोड़ दिया गया।


साम्राज्य, युद्घ और गुलाम, इनका कार्य-कारण संबन्ध है। रोम पर उत्तर की बर्बर जातियों ने आक्रमण किया। रोमन साम्राज्य के दो टुकड़े-पूर्व (अनातोलिया तथा यूनान आदि) और पश्चिम (शेष यूरोप) हो गए। बाद में सेना में विदेशियों की भरती और देश में गुलामों की संख्या बढ़ने के कारण रोम का पतन हो गया। यह होते हुए भी रोम की यूरोप में बपौती विधि के क्षेत्र में वैसी ही है जैसे विज्ञान, दर्शन और साहित्य के क्षेत्र में यूनान की। लैटिन भाषा, जो संस्कृत से निकली, ने भी आधुनिक यूरोपीय विज्ञान को शब्दावली दी। विक्रम संवत् की छठी शताब्दी में रोमन सम्राट जस्टिनियन (Justinian) ने, जिसका स्थान कुस्तुनतुनिया (Constantinople) था, अपनी संहिता (Code Constitutionum) प्रवर्तित की, जो आधुनिक यूरोपीय विधि का एक स्त्रोत बनी। इसकी मनु के धर्मशास्त्र से तुलना करें तो लगता है, कितना पीछे ढकेल दिया गया मानव जीवन। रोमन विधि लगभग निर्बाध अधिकार (patria potesta) घर अथवा कुटुंब के मुखिया (pater familias) को देती थी। वही सभी जायदाद का और गुलामों का स्वामी था; उस जायदाद का भी जो उसकी पत्नी एवं पुत्र की थी। पुत्री भी विवाह तक उसके अधिकार में थी और विवाह के बाद पति के अधिकार में चली जाती थी। दूसरा था गुलाम वर्ग, जिनको कुछ अधिकार न थे और जो अपने स्वामी की संपत्ति थे। यह मनु की मूल धारणाओं के बिलकुल विपरीत था, जहाँ पुत्र को संयुक्त परिवार की संपत्ति में स्वत्व प्राप्त होता था और स्त्री-धन की व्यवस्था थी; सभी नागरिक थे। रोमन विधि सामंती या सम्राट-रचित थी; न कि ऋषि-मुनियों या विद्वानों (स्मृतिकारों) द्वारा प्रणीत, जैसा मनु का धर्मशास्त्र।



कांसटेंटाइन  की अर्धप्रतिमा

विक्रम संवत् की चौथी शताब्दी में रोमन सम्राट कांसटेंटाइन (Constantine) ने ईसाई पंथ अंगीकार कर लिया। तब तक चर्च की मशीन खड़ी हो चुकी थी। साम्राज्यवादी रंग जमाकर ऊपरी तौर पर ईसा की प्रेम, अहिंसा की वाणी को जोर-जबरदस्ती से तथा छल-कपट से ठूसने की वृत्ति आ चुकी थी। इसके बाद का 'चर्च' साम्राज्यवाद का पोषक बना, वही ढंग अपनाए। हर प्रकार का बल-प्रयोग और जाल-फरेब की नीति अपनाकर भी धर्मांतरण, स्वतंत्र विचारों का हनन और पंथाचार्यों का कठोर नियंत्रण तथा इसके लिए सभी तरह के उपायों का सहारा उनके तौर-तरीके बने। जिस प्रकार के अत्याचार सहन कर ईसाई संतों ने गौरव प्राप्त किया वैसे ही अत्याचार राज्य द्वारा ईसाईकरण में हुए। चर्च और पंथाधिकरण, उसके 'पापमोचक' प्रमाण पत्र तथा उनके कठोर नियंत्रण ने ईसा की मूलभूत शिक्षा पर ग्रहण लगा दिया। उस समय राजाश्रय में किए गए बल प्रयोग और छल-कपट के कारण श्री पी.एन.ओक ने सम्राट कांसटेंटाइन को 'कंसदैत्यन' कहा है। उसके बाद यूरोप का चर्च द्वारा अनेक संदिग्ध तरीकों से ईसाईकरण हुआ। राज्य तथा ईसाई पंथ एकाकार हो गए। नया सिद्घांत प्रतिपादित हुआ-'साम्राज्य, चर्च का 'सेकुलर' शस्त्र-सज्जित शासन तंत्र है, जिसे पोप ने गढ़ा और जो केवल पोप के प्रति उत्तरदायी है।' यूरोपीय उपनिवेशवाद और ईसाई पंथ का एक गहरा नाता है।

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प्राचीन सभ्यताएँ और साम्राज्य
०१ - सभ्यताएँ और साम्राज्य
०२ - सभ्यता का आदि देश
०३ - सारस्वती नदी व प्राचीनतम सभ्यता
०४ - सारस्वत सभ्यता
०५ - सारस्वत सभ्यता का अवसान
०६ - सुमेर
०७ - सुमेर व भारत
०८ - अक्कादी
०९ - बैबिलोनिया
१० - कस्सी व मितन्नी आर्य
११ - असुर जाति
१२ -  आर्यान (ईरान)
१३ - ईरान और अलक्षेन्द्र (सिकन्दर)
१४ - अलक्षेन्द्र और भारत
१५ - भारत से उत्तर-पश्चिम के व्यापारिक मार्ग
१६ - भूमध्य सागरीय सभ्यताएँ
१७ - मिस्र सभ्यता का मूल्यांकन
१८ - पुलस्तिन् के यहूदी
१९ - यहूदी और बौद्ध मत
२० - जाति संहार के बाद इस्रायल का पुनर्निर्माण
२१ - एजियन सभ्यताएँ व सम्राज्य
२२ - फणीश अथवा पणि
२३ - योरोप की सेल्टिक सभ्यता
२४ -  योरोपीय सभ्यता के 'द्रविड़'
२५ - ईसाई चर्च द्वारा प्राचीन यरोपीय सभ्यताओं का विनाश
२६ - यूनान
२७ - मखदूनिया
२८ - ईसा मसीह का अवतरण
२९ - ईसाई चर्च
३० - रोमन साम्राज्य

Sunday, January 17, 2010

ईसाई चर्च


उनके सभी शिष्यों ने, जो ईसा की गिरफ्तारी के समय छिप गए थे, रोमन शासक की आज्ञा से शव को दफना दिया। पर इसके तीसरे दिन लोगों ने देखा कि कब्र खाली थी। इसे ईसा का पुनर्जन्म कहा जाता है। सामी सभ्यताओं में यह विश्वास प्रचलित था कि मानव का उसी देह में पुनर्जन्म होगा। ईसा के इस पुनर्जन्म को मानव-कल्याण के लिए फिर से जन्म माना गया। यही दिन ईस्टर के त्योहार के रूप में मनाया जाता है। तब तो ईसा उनके अनुयायियों को दिखने लगे और उन्हें उपदेश भी दिया। यह घटना ईसाई पंथ के विस्तार के लिए मूल प्रेरणा बनी। कहते हैं कि चालीस दिन बाद ईसा का स्वर्गारोहण हुआ।

ईसा का मानव धर्म सबकी समझ में आसानी से आता था। पर उसके प्रचारकों ने कालांतर में कर्मकांड से युक्त, ईसा के पुनर्जीवन के बाद में दिए गए कथित उपदेशों के अनुसार एक संगठित पंथ का ढाँचा खड़ा किया। उसे 'चर्च' (Church)  कहा। प्रारंभ में ईसाई प्रचारक पंथ के सिद्घांत और ईसा के बलिदान के गीत गाते रहे। ये बाइबिल में 'सुसमाचार' (gospel)  कहकर वर्णित है। यहूदा (Judea) में ही इसका विरोध हुआ। यूरोप में यवन दर्शन पर आधारित व्याख्या और एशिया के देशों में, जहाँ वानप्रस्थी (साधु) जीवन को सम्मान की दृष्टि से देखते थे, ईसा के सरल, सभी के प्रति प्रेम के उपदेश और बलिदान, प्रचार के प्रमुख साधन बने। उनके द्वारा कहे गये 'ईश्वर के भविष्य में आने वाले राज्य' के प्रति उत्सुकता जाग्रत होती थी। बाइबिल का 'पूर्व विधान' यहूदी जाति की कहानी है। खूँखार कबीलों से घिरी, जो स्वयं भी कम खूँखार न थी; उसने संघर्षों के बीच अनेक उतार-चढ़ाव देखे थे। उनके भयंकर ईश्वर को हटाकर एक भारतीय विचारों के स्नेहयुक्त, दयावान, क्षमाशील ईश्वर का और हिंसा, संहार एवं रक्त के पिपासु, असभ्य, क्रूर तथा स्वार्थी जीवन के हर मद में डूबे सरदारों के बीच दीन-दु:खियों के आँसू पोंछने वाले एक सरल, निष्कपट तथा अहिंसक समुदाय का भी कुछ आकर्षण था। विरोधों को झेलते, भिक्षा पात्र लिए संतों के बलिदान ने क्रूरता एवं घृणा पर कुछ सीमा तक विजय पायी। परंतु ईसाई पंथ को राजाश्रय मिलने पर असहमत लोगों का उससे भी अधिक क्रूरता एवं हिंसा से दमन प्रारंभ हुआ।

प्रारंभ में ईसाई चर्च संगठन ने भारतीय पद्घतियों से अपने उत्सवों की रचना की और कर्मकांड खड़ा किया। उन्होंने भारतीय सूर्य के उत्तरायण होने के दिन को ईसा का जन्म-दिवस मान लिया और मकर संक्रमण का हिंदु उत्सव ख्रीस्तोत्सव (Christmas) के रूप में मनाना प्रारंभ किया। इसी प्रकार शिशु ईसा की छठी और बरहों (जब शिशु को सौरी से बाहर लाते हैं: Epiphany) के दिन हिंदु पद्घति से १ तथा ६ जनवरी तथा बपतिस्मा अर्थात स्नान कर दीक्षा की विधि या नामकरण संस्कार अपनाया और पाया अहिंसा का दर्शन।


 ईश्वर के दूत संत थॉमस

ईसाई पंथ के प्रारंभ के दिनों में सीरियाई ईसाइयों ने मलाबार तट पर पहुँचकर आश्रय माँगा। उस समय राजा हिंदु एवं प्रजा हिंदु। हिमालय की गोद में जनमी और इसलिए उसकी पुत्री कहलाने वाली देवी पार्वती की तपोभूमि एवं शबरीमाला की दैवी सुषमा से अलंकृत केरल की नैसर्गिक भूमि। भारतीय संस्कृति के अनुरूप उन शरणार्थियों को स्थान ही नहीं, अपने पंथ की परंपराओं एवं मान्यताओं के अनुसार रहने की छूट मिली। उनका प्रार्थना मंडप, गिरजाघर सभी ने बनवा दिया और दी पंथ के प्रचार की अनुमति। यदि यही घटना अरब प्रायद्वीप या यूरोप की होती तो उन सबको गुलाम बना लिया जाता और सारे अधिकारों से वंचित  सर्वहारा श्रेणी में वे और उनके वंशज खड़े होते। आज भी ये मलाबारी ईसाई, पंथ प्रचारक संत थामस के ईसाई कहे जाते हैं; यद्यपि संत थामस कभी भारत नहीं आए। उनके अंदर की हिंदु भक्ति-परंपरा उनके किसी पुराने पंथ की, जैसा ईसाई ग्रंथ कहते हैं, न होकर प्राचीन ईसाई परंपरा का अवशेष है, जो यहाँ हिंदु पृष्ठभूमि में चलता आया। यूरोपीय चर्च द्वारा इसको समाप्त कर अपने साँचे में ढालने के यत्न हुए। एक समय इन मलाबारी ईसाइयों को पुर्तगाली पादिरयों के अधीन कर दिया गया, ताकि ये पूर्ण रोमन कैथोलिक रंग में रँग जाएँ। दूसरी उपासना-पद्घति (Liturgy) ठूसने के प्रयत्न हुए। वे पंथाधिकरण, जिन्होंने यूरोप में स्वतंत्रता को नकार कर मानव के ऊपर पंथ के नाम पर अत्याचार किए। पर पुर्तगाली आर्कबिशप ( archbishop) के प्रति विद्रोह खड़ा हुआ और मलाबारी ईसाइयों ने पुर्तगाली धर्म सत्ता के अधीन कभी न रहने की शपथ ली। किंतु भारत में यूरोपीय शासन आने पर उनका कुछ सीमा तक रोमीकरण हो गया।

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प्राचीन सभ्यताएँ और साम्राज्य
०१ - सभ्यताएँ और साम्राज्य
०२ - सभ्यता का आदि देश
०३ - सारस्वती नदी व प्राचीनतम सभ्यता
०४ - सारस्वत सभ्यता
०५ - सारस्वत सभ्यता का अवसान
०६ - सुमेर
०७ - सुमेर व भारत
०८ - अक्कादी
०९ - बैबिलोनिया
१० - कस्सी व मितन्नी आर्य
११ - असुर जाति
१२ -  आर्यान (ईरान)
१३ - ईरान और अलक्षेन्द्र (सिकन्दर)
१४ - अलक्षेन्द्र और भारत
१५ - भारत से उत्तर-पश्चिम के व्यापारिक मार्ग
१६ - भूमध्य सागरीय सभ्यताएँ
१७ - मिस्र सभ्यता का मूल्यांकन
१८ - पुलस्तिन् के यहूदी
१९ - यहूदी और बौद्ध मत
२० - जाति संहार के बाद इस्रायल का पुनर्निर्माण
२१ - एजियन सभ्यताएँ व सम्राज्य
२२ - फणीश अथवा पणि
२३ - योरोप की सेल्टिक सभ्यता
२४ -  योरोपीय सभ्यता के 'द्रविड़'
२५ - ईसाई चर्च द्वारा प्राचीन यरोपीय सभ्यताओं का विनाश
२६ - यूनान
२७ - मखदूनिया
२८ - ईसा मसीह का अवतरण
२९ - ईसाई चर्च

Monday, January 11, 2010

ईसा मसीह का अवतरण


यह अरब प्रायद्वीप, जहाँ संसार के दो बड़े पंथों ने जन्म लिया, प्राचीन काल में 'अर्व' (संस्कृत अर्वन्=घोड़े) देश के नाम से प्रसिद्घ था। यह घास का मैदान, जहाँ संसार के श्रेष्ठ घोड़े पाए जाते थे, धीरे-धीरे मरूभूमि में परिणत हो गया। इसी प्रकार अफ्रीका में 'सहारा' मरूभूमि बनी। विक्रम संवत् प्रारंभ होने के बाद संसार का जो चित्र बदला, उसमें इन ईसाई और मुसलिम पंथों की और उनके मज़हबी उन्माद की अहम भूमिका रही। इन दोनों पंथों ने सभ्यता के प्रवाह को बदला; उन पर अपना मुलम्मा चढ़ाया और अपनी ही बात अथवा अपनी किताब के आग्रही बने। सभी दूसरी संस्कृतियों को उन्होंने नकारा। कहा कि उनके मसीहा पर जो विश्वास न करे उसे कभी सदगति या स्वर्ग नहीं मिलेगा। अंत:करण की तथा अपनी परंपराओं, मान्यताओं एवं विश्वासों के अनुरूप आचरण करने की स्वतंत्रता, विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता नष्ट हो गयी और आया मज़हब के नाम पर अत्याचारों का युग।

परंतु यह सब ईसा मसीह के निश्छल सरल स्वभाव में न था। उन्होंने मानवमात्र को स्नेह, अहिंसा का पाठ सिखाया; अनासक्ति और सबकुछ अर्पण करने की शिक्षा दी। ऎसे एक असामान्य व्यक्तित्व की ईश्वर से प्रेम की सीख को मजहब के ठेकेदार कैसे छल-कपट, लोभ तथा अत्याचार द्वारा धर्मांतरण की जोर-जबरदस्ती की आँधी में अपने 'चर्च' के स्वार्थ के लिए डुबो देते हैं! इसका दूसरा उदाहरण तलवार से इसलाम का प्रसार है।

'ईसा' या 'यीशु' के जन्म और प्रारंभिक जीवन के बारे में बहुत कम ज्ञात है। जो कुछ कहा जा सकता है वह बाइबिल में ईसाई पंथ के 'सुसमाचार' (Gospel)  में भिन्न दृष्टिकोण से अंकित कुछ मज़हबी सूचनाओं पर आधारित है। 'ईसा' इब्रानी शब्द 'येशुआ' (Joshua अथवा यीशु)  का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ है 'मुक्तिदाता'। 'मसीह' उनकी पदवी थी, जो उनका ईश्वर-प्रेरित होना दर्शाती है। हिंदी शब्दकोश के अनुसार इसका अर्थ है 'अभिषिक्त', अर्थात यूनानी भाषा में 'खीस्तोस'। इसी से पश्चिम में इन्हें 'यीशु ख्रीस्त' (Jesus Christ)  कहा गया है। श्री पुरूषोत्तम नागेश ओक के अनुसार संस्कृत शब्द 'ईशस्' ही 'जीसस' (Jesus)  हो गया। यहूदी इसीको इशाक (Issac, जहाँ 'सी' का उच्चारण 'स' के स्थान पर 'क' हो गया) कहते हैं।

ईसा का जन्म यहूदी परिवार में विक्रम संवत् ५१ में (६ वर्ष ईस्वी पूर्व) कहा जाता है। उनकी माता 'मरियम' नाजरेथ की रहने वाली थीं। श्री पी.एन.ओक के अनुसार यह नाम 'मरि अंबा' अथवा 'मरिअम्मा', वैदिक 'मातृदेवी' (लैटिन 'Mater Dei') है, दक्षिण भारत में जिनके अनेक मंदिर हैं। बाइबिल के अनुसार उनकी माता कुँवारी रहते हुए भी ईश्वरीय प्रभाव से गर्भवती हो गयीं। तब दैवी संकेत पाकर उनके वाग्दत्त यूसुफ उनसे विवाह कर यहूदा (Juda या Judea) प्रांत के बेथलेहम (Bethlehem) नगर में बस गए, जहाँ ईसा का जन्म हुआ। इस प्रकार उनके अलौकिक जन्म का रहस्य छिप गया। आंग्ल विश्वकोश का कहना है कि संभवतया यह कथा ईसा का संबंध डेविड के राजघराने से स्थापित करने के लिए बनायी गयी और कुँवारी माता के गर्भ से उत्पन्न होने की कथा यवन भाषा में दुविधापूर्ण अनुवाद का परिणाम हो सकती है। जो भी हो, रोम के निरंकुश शासक हिरोद (Herod) से शिशु को बचाने के लिए यूसुफ मिस्त्र भाग गए। वे हिरोद की मृत्यु के बाद लौटकर पुन: नाजरेथ में बसे। तीस वर्ष की आयु तक ईसा ने पारिवारिक बढ़ईगिरी में मन लगाया।

पर (संवत् ८५ में) जब योहन बपतिस्ता (John, the Baptist) ने कहना प्रारंभ किया,
'पश्चाताप करो, क्योंकि ईश्वर का राज्य निकट है',
(Repent for the kingdom of God is near)
ईसा ने बढ़ईगिरी त्याग, उनसे बपतिस्मा (Baptism) (स्नान करके दीक्षा) ली और देश में घूमकर उपदेश देने लगे। डेविड के बाद यहूदियों में कोई नबी (पैगंबर, ईश्वर का दूत) पैदा नहीं हुआ था। धर्मग्रंथ (देखें-बाइबिल, पूर्व विधान) में वर्णित था, मसीहा (शाब्दिक अर्थ, फूँक मारकर शव में जीवन डालनेवाला) अथवा नबी आएगा, जो स्वर्ग का राज्य अपने प्रियजन यहूदियों को दिलाएगा, अर्थात लौकिक दृष्टि से पराधीनता से मुक्ति दिलाने वाला होगा। इसलिए अचानक जब सरल शब्दों में दैनिक जीवन के उदाहरणयुक्त उपदेश ईसा ने देने प्रारंभ किए तो लोगों ने समझा कि उनका नया मसीहा आ गया।

ईसा ने मानव धर्म का प्रचार किया। हिंदी विश्वकोश के अनुसार ईसा के उपदेशों का सार है-
'पहला, ईश्वर को अपना दयालु पिता समझकर समूचे हृदय से प्यार करना और उसी पर भरोसा रखना। दूसरा, अन्य सभी मनुष्यों को भाई-बहन मानकर किसी से बैर न रखना, अपने विरूद्घ किए हुए अपराध को क्षमा करना तथा सच्चे हृदय से सबका कल्याण चाहना। जो यह भ्रामृप्रेम निबाहने में असमर्थ हो वह ईश्वरभक्त होने का दावा न करे। भगवद्भक्ति की कसौटी भ्रातृप्रेम है।'
वे येरूसलम में मंदिर में जाते थे। पर्वत प्रवचन (Sermon on the Mount) में उन्होंने कहा,
'मैं मूसा के नियम और नबियों की शिक्षा रद्द करने नहीं, पूरी करने आया हूँ।'
यहूदी अपने को ईश्वर का विशेष प्रिय पात्र समझते थे। ईसा ने कहा,
'स्वर्ग के राज्य पर यहूदियों का एकाधिकार नहीं है, मानवमात्र उसे पा सकते हैं।'
रोगी, दीन-दु:खी के लिए उमड़ता वात्सल्य, सिद्घार्थ गौतम के समान, उन्हे मिला था। उनके चमत्कारों की कहानियों ने ईसा के 'नबी' और 'मसीह' होने की पुष्टि कर दी।

उनके इस मानव पक्ष के कारण, जो भारतीय संस्कृति का स्पष्ट प्रक्षेपण है, और प्रारंभ के तीस वर्ष के अज्ञात जीवन ने अनेक कल्पनाओं को जन्म दिया है। कुछ विद्वानों ने कहा कि संभवतया ईसा के जीवन का कुछ भाग भारत में पालिताना (गुजरात) में बीता, जहाँ उन्होंने जैनियों से व्रत रखना सीखा, या फिर कश्मीर में, जो शिक्षा का केंद्र था। परंतु पुलस्तिन् में भी बौद्घ विहार प्रारंभ हो गए थे, जिनसे अहिंसा का मंत्र प्राप्त हो सकता था। स्वयं यहूदियों में 'फारिसी' एवं 'एस्सेनी' आदि संप्रदाय थे, जिन्होंने अपना धार्मिक जीवन बहुत कुछ भारत से लिया था। ईसा ने बारह शिष्यों को चुनकर उन्हें प्रशिक्षित किया और उनको अपनी शिक्षा पर विश्वास करने वाले समुदाय के संगठन का कार्य सौंपा। ये बारह शिष्य उनके बाद ईसाई पंथ के प्रचारक बने।

लेकिन उस समय के यहूदी जनमानस का एक अंश ईसा के मानव धर्म को येरूसलम के उनके मंदिर के विरोध में एक नए पंथ का प्रसारण समझ संशय की दृष्टि से देखने लगा। ईसा के संदेश ने कि
'वे यहूदी जाति को पापों से मुक्ति का मार्ग सुझाने आए हैं',

इस धारणा को बढ़ावा दिया। अंत में ईसा को (संवत् ८७, अर्थात सन् ३० में) इस अपराध में कि वे 'मसीह' अथवा 'ईश्वर का पुत्र' होने का झूठा दावा करते हैं, बंदी बना लिया गया। किंवदंती है कि उन्होंने जो शिष्य चुने थे और जो उनके प्रति आजन्म सच्ची निष्ठा की शपथ लेकर अंतिम रात्रिभोज में शामिल हुए, उन्हीं में से तेरहवें शिष्य ने रात के अवसान के पहले (इसके पूर्व कि मुरगा बाँग देता) विश्वासघात कर उनके विरोधियों को पता-ठिकाना बता दिया। रोमन दंडाधिकारी (Pilate) उन्हें निर्दोष समझकर छोड़ना चाहता था; पर यहूदी विरोधियों ने, जिनमें रोमन साम्राज्य के पिट्ठू भी थे, यह न होने दिया। यहूदी महासभा ने उन्हें प्राणदंड दिया, जिसकी रोमन शासक ने पुष्टि कर दी। ईसा को सूली (क्रॉस: Cross)  पर चढ़ा दिया गया।

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प्राचीन सभ्यताएँ और साम्राज्य
०१ - सभ्यताएँ और साम्राज्य
०२ - सभ्यता का आदि देश
०३ - सारस्वती नदी व प्राचीनतम सभ्यता
०४ - सारस्वत सभ्यता
०५ - सारस्वत सभ्यता का अवसान
०६ - सुमेर
०७ - सुमेर व भारत
०८ - अक्कादी
०९ - बैबिलोनिया
१० - कस्सी व मितन्नी आर्य
११ - असुर जाति
१२ -  आर्यान (ईरान)
१३ - ईरान और अलक्षेन्द्र (सिकन्दर)
१४ - अलक्षेन्द्र और भारत
१५ - भारत से उत्तर-पश्चिम के व्यापारिक मार्ग
१६ - भूमध्य सागरीय सभ्यताएँ
१७ - मिस्र सभ्यता का मूल्यांकन
१८ - पुलस्तिन् के यहूदी
१९ - यहूदी और बौद्ध मत
२० - जाति संहार के बाद इस्रायल का पुनर्निर्माण
२१ - एजियन सभ्यताएँ व सम्राज्य
२२ - फणीश अथवा पणि
२३ - योरोप की सेल्टिक सभ्यता
२४ -  योरोपीय सभ्यता के 'द्रविड़'
२५ - ईसाई चर्च द्वारा प्राचीन यरोपीय सभ्यताओं का विनाश
२६ - यूनान
२७ - मखदूनिया
२८ - ईसा मसीह का अवतरण

Sunday, January 03, 2010

मखदूनिया

मखदूनिया (Macedonia) के लोग भाषा एवं जाति की दृष्टि से यूनानी थे, पर सांस्कृतिक दृष्टि से पिछड़े तथा अर्द्घ-बर्बर। एक समय आया जब सिकंदर के पिता फिलिप ने, और उसकी मृत्यु के बाद सिकंदर ने सारा यूनान और एथेंस शस्त्रों के बल पर जीता। सिकंदर के विश्व-विजय के स्वप्न ने यूनान के स्वर्ण युग पर अपनी काली छाया डालनी प्रारंभ की, जिससे उस समय के विज्ञान, समाजशास्त्र, कला, साहित्य, सभी पर धीरे-धीरे ग्रहण लगना प्रारंभ हो चला। शस्त्रों की झनझन सांस्कृतिक जीवन के अवसासन का द्वार खटखटा रही थी। इसके बाद मानो मखदूनिया के युद्घोन्माद के सम्मुख एथेंस और उसके साथ यूनान समर्पित हो गया।



प्लेटो और अरस्तू

सिकंदर के विश्व-विजय अभियान के प्रारंभ की एक कहानी है। सिकंदर के पिता फिलिप ने एथेंस की अकादमी से अरस्तू (Aristotle) को बुलाकर सिकंदर का शिक्षक नियुक्त किया था। कहते हैं, जब सिकंदर की महत्वाकांक्षा अरस्तू को पता चली और सिकंदर उससे अभियान की सफलता के लिए शुभकामनाएँ प्राप्त करने गया तो गुरू ने कहा,
'भारत जाते हो तो जाओ, पर वहाँ से अपने गुरू के लिए लाना गंगाजल, जो अमृत के समान पवित्र है और लाना 'गीता' की पवित्र पुस्तक। वह देश दार्शनिकों एवं ज्ञानियों की खान है; हो सके तो किसी ज्ञानी को आदर से साथ लाना।' 
यूनान में उस महिमामय देश भारत का पता था; सर्वसाधारण का विश्वास था कि गंगा की भूमि इस पृथ्वी का स्वर्ग है। इसीलिए वह अंत है, उसके बाद कुछ नहीं। यवन इतिहासकारों ने अरस्तू की इस उक्ति को सिकंदर और पुरू की संधि का कारण बताया। कहते हैं, जब सिकंदर ज्ञानी व्यक्ति की खोज में एक विद्वान के पास ले जाया गया तो वह धूप का सेवन कर रहे थे। 'विश्व-विजयी सिकंदर' के रूप में परिचय के बाद सिकंदर ने कहा कि वह उन्हें अपार धन-दौलत, सभी वस्तुएँ दे सकता है, यदि वह उसके साथ चलें। इस पर ज्ञानी ने इतना ही कहा,
'भगवान की दी हुयी यह धूप छोड़कर एक तरफ हट जाओ। इससे अधिक मुझे कुछ नहीं चाहिए।'
यह है दोनों संस्कृतियों के दृष्टिकोण का अंतर।

सिकंदर की मृत्यु के पश्चात उसके गुरू अरस्तू को भी सुकरात की तरह नवयुवकों को भड़काने के आरोप में मृत्युदंड मिला। उसने भागकर अपनी जान बचाई; पर कुछ दिनों बाद यह दार्शनिक भी चल बसा। 'अकादमी' समाप्तप्राय हो गयी। यवन सभ्यता को रोम की साम्राज्य-लिप्सा लील गयी। 

इसके बाद रोमन साम्राज्य का उदय हुआ। मखदूनिया के युद्घोन्मादजनित जीवन तथा उसके साम्राज्य का भी पतन हुआ और वह रोम का शिकार बना। रोम का साम्राज्य और अरब प्रायद्वीप का जीवन तथा यवन व मखदूनिया, सभी गुलामी प्रथा पर आधारित थे। रोमन सभ्यता के बारे में विस्त़ृत विचार करने के लिए ईसाई पंथ के उदय एवं प्रारम्भिक अवस्था को जानना आवश्यक है।

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प्राचीन सभ्यताएँ और साम्राज्य
०१ - सभ्यताएँ और साम्राज्य
०२ - सभ्यता का आदि देश
०३ - सारस्वती नदी व प्राचीनतम सभ्यता
०४ - सारस्वत सभ्यता
०५ - सारस्वत सभ्यता का अवसान
०६ - सुमेर
०७ - सुमेर व भारत
०८ - अक्कादी
०९ - बैबिलोनिया
१० - कस्सी व मितन्नी आर्य
११ - असुर जाति
१२ -  आर्यान (ईरान)
१३ - ईरान और अलक्षेन्द्र (सिकन्दर)
१४ - अलक्षेन्द्र और भारत
१५ - भारत से उत्तर-पश्चिम के व्यापारिक मार्ग
१६ - भूमध्य सागरीय सभ्यताएँ
१७ - मिस्र सभ्यता का मूल्यांकन
१८ - पुलस्तिन् के यहूदी
१९ - यहूदी और बौद्ध मत
२० - जाति संहार के बाद इस्रायल का पुनर्निर्माण
२१ - एजियन सभ्यताएँ व सम्राज्य
२२ - फणीश अथवा पणि
२३ - योरोप की सेल्टिक सभ्यता
२४ -  योरोपीय सभ्यता के 'द्रविड़'
२५ - ईसाई चर्च द्वारा प्राचीन यरोपीय सभ्यताओं का विनाश
२६ - यूनान
२७ - मखदूनिया