Monday, January 08, 2007

भौतिक जगत और मानव-७

कालचक्र: सभ्यता की कहानी
संक्षेप में
प्रस्तावना
भौतिक जगत और मानव-१
भौतिक जगत और मानव-२
भौतिक जगत और मानव-३
भौतिक जगत और मानव-४
भौतिक जगत और मानव-५
भौतिक जगत और मानव-६

यह विश्वास अनेक सभ्यताओं में रहा है कि ईश्वर ने सृष्टि की रचना की। भारतीय दर्शन में ईश्वर की अनेक कल्पनाऍं हैं। ऐसा समझना कि वे सारी कल्पनाऍं सृष्टिकर्ता ईश्वर की हैं, ठीक न होगा। ईश्वर के विश्वास के साथ जिसे अनीश्वरवादी दर्शन कह सकते हैं, यहॉं पनपता रहा। कणाद ऋषि ने कहा कि यह सारी सृष्टि परमाणु से बनी है।

सांख्य दर्शन को भी एक दृष्टि से अनीश्वरवादी दर्शन कह सकते हैं। सांख्य की मान्यता है कि पुरूष एवं प्रकृति दो अलग तत्व हैं और दोनों के संयोग से सृष्टि उत्पन्न हुई। पुरूष निष्क्रिय है और प्रकृति चंचल; वह माया है और हाव-भाव बदलती रहती है। पर बिना पुरूष के यह संसार, यह चराचर सृष्टि नहीं हो सकती। उपमा दी गई कि पुरूष सूर्य है तो प्रकृति चंद्रमा, अर्थात उसी के तेज से प्रकाशवान। मेरे एक मित्र इस अंतर को बताने के लिए एक रूपक सुनाते थे। उन्होंने कहा कि उनके बचपन में बिजली न थी और गैस लैंप, जिसके प्रकाश में सभा हो सके, अनिवार्य था। पर गैस लैंप निष्क्रिय था । न वह ताली बजाता था, न वाह-वाह करता था, न कार्यवाही में भाग लेता था, न प्रेरणा दे सकता था और न परामर्श। पर यदि सभा में मार-पीट भी करनी हो तो गैस लैंप की आवश्यकता थी, कहीं अपने समर्थक ही अँधेरे में न पिट जाऍं। यह गैस लैंप या प्रकाश सांख्य दर्शन का ‘पुरूष’ है। वह निष्क्रिय है,कुछ करता नहीं। पर उसके बिना सभा भी तो नहीं हो सकती थी।

इसी प्रकार प्रसिद्ध नौ उपनिषदों में पॉंच उपनिषदों को, जिस अर्थ में बाइबिल ने सृष्टिकर्ता ईश्वर की महिमा कही, उस अर्थ में अनीश्वरवादी कह सकते हैं। जो ग्रंथ ईश्वर को सृष्टिकर्ता के रूप में मानते हैं उनमें एक प्रसिद्ध वाक्य आता है, ‘एकोअहं बहुस्यामि’। ईश्वर के मन में इच्छा उत्पन्न हुई कि मैं एक हूँ, अनेक बनूँ, और इसलिए अपनी ही अनेक अनुकृतियॉं बनाई—ऐसा अर्थ उसमें लगाते हैं। पर एक से अनेक बनने का तो जीव का गुण है। यही नहीं, यह तो पदार्थ मात्र की भी स्वाभाविक प्रवृत्ति है।

भारतीय दर्शन के अनुसार यह सृष्टि किसी की रचना नहीं है, जैसा कि ईसाई या मुसलिम विश्वास है। यदि ईश्वर ने यह ब्रम्हाण्ड रचा तो ईश्वर था ही, अर्थात कुछ सृष्टि थी। इसलिए ईश्वर स्वयं ही भौतिक तत्व अथवा पदार्थ था, ऐसा कहना पड़ेगा। ( उसे किसने बनाया?) इसी से कहा कि यह अखिल ब्रम्हांड केवल उसकी अभिव्यक्ति अथवा प्रकटीकरण (manifestation) है, रचना अथवा निर्मित (creation) नहीं। उसी प्रकार जैसे आभूषण स्वर्ण का आकार विशेष में प्रकटीकरण मात्र है। इसी रूप में भारतीय दर्शन ने सृष्टि को देखा।

धार्मिक प्रवृत्ति के लोगों को यह विचार कि जीवन इस पृथ्वी पर स्वाभाविक और अनिवार्य रासायनिक- भौतिक प्रक्रिया द्वारा बिना किसी चमत्कारी शक्ति के उत्पन्न हुआ, इसलिए प्रतिकूल पड़ता है कि वे जीव का संबंध आत्मा से जोड़ते हैं। उनका विश्वास है कि बिना आत्मा के जीवन संभव नहीं और इसलिए कोई परमात्मा है जिसमें अंततोगत्वा सब आत्माऍं विलीन हो जाती हैं। पर जड़ प्रकृति का स्वाभाविक सौंदर्य, वह स्फटिक (crystal), वह हिमालय की बर्फानी चोटियों पर स्वर्ण-किरीट रखता सूर्य, वह उष:काल की लालिमा या कन्याकुमारी का तीन महासागरों के संधि-स्थल का सूर्यास्त, अथवा झील के तरंगित जल पर खेलती प्रकाश-रश्मियॉं- ये सब कीड़े-मकोडों से या कैंसर की फफूँद से या अमरबेल या किसी क्षुद्र जानवर से निम्न स्तर की हैं क्या? पेड़-पौधे और उनमें उगे कुकुरमुत्ते में आत्मा है क्या ? एक बात जो मुसलमान या ईसाई नहीं मानते। सृष्टि में इस प्रकार के जीवित तथा जड़ वस्तुओं में भेदभाव भला क्यों ?

शायद हम सोचें, सभी जीवधारियों का अंत होता है। ‘केहि जग काल न खाय।‘ वनस्पति और जंतु सभी मृत्यु को प्राप्त होते हैं और उनका शरीर नष्ट हो जाता है। परंतु यदि एक-कोशिक जीव बड़ा होकर अपने ही प्रकार के दो या अधिक जीवों में बँट जाता है तो इस घटना को पहले जीव की मृत्यु कहेंगे क्या ? वैसे तो संतति भी माता-पिता के जीवन का विस्तार ही है, उनका जीवनांश एक नए शरीर में प्रवेश करता है।

जीवन और मृत्यु का रहस्य अपने प्राचीन चिंतन का बहुत बड़ा भाग रहा है। यह चिंतन आत्मा रूपी केंद्र से प्रारंभ होकर संपूर्ण जीव और जड़ सृष्टि तथा उनके नियमों को व्याप्त करता था। इस दर्शन में कालांतरजनित विकृति, क्षेपक, अंधविश्वास और मत-मतांतरों के तोड़-मरोड़ जुड़ गए। पर आज भी उसकी नैसर्गिक हृदयग्राही अपील देश तथा युगों के परे सनातन है। इसलिए यह हिंदु संस्कृति आध्यात्मिक कहलाई।

इसी से संबंधित पुनर्जन्म का विश्वास है। मेरे एक मामाजी का पुत्र तीन-चार वर्ष की अवस्था में युद्ध के आधुनिकतम शास्त्रास्त्रों की, जिन्हें कम आयु में समझना संभव न था, चर्चा करने लगा। उसने बताया कि कैसे लद्दाख के मोरचे पर खंदक में एकाएक प्रबल प्रकाश कौंध गया। उसी समय एक चीनी बम गिरने से वह आहत हो गया और अंत में सैनिक अस्पताल में उसकी मृत्यु हो गई; कि वह डोगरा है और उसके पत्नी और बच्चे हैं। इस तरह की अनेक घटनाऍं सुनने में आती हैं, जहॉं जीवन-मरण के उस पार से अचेतन मन को स्पर्श करता हुआ एक इंद्रियातीत स्मृति का झोंका आ रहा हो परा-मनोविज्ञान ( para psychology) के रहस्यों के इन किनारों की ओर,जिन्हें पहले कपोल कल्पना कहकर टाल देते थे, अब वैज्ञानिकों का ध्यान आकर्षित हो रहा है। फिर भी जिस ‘आत्मा’ की खोज में ऋषि-मुनियों ने इतनी पीढियॉं लगाई, उसका ज्ञान आज विलक्षण अनुभूमि के अतिरिक्त दिखता नहीं, न वैज्ञानिक जगत इसे समझता है।

इसी ‘आत्मा’ के साथ उलझा है जीवन-मरण का परम सत्य। वास्तव में जीवन और मृत्यु क्या है, यह निश्चित रूप से कहना कठिन है। और उनके बीच की विभाजन रेखा प्रारंभ में कहाँ थी, यह जानना तो और कठिन है। भारत में ‘आत्मा’ साधारणतया उस अनुभूति को मानते थे जो किसी शरीर को अनुप्राणित रखे और परमात्मा मन की उस चरम अनुभूमि को, जो सृष्टि में व्याप्त सामूहिक सत्ता का बोध कराए।

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