Wednesday, August 29, 2007

मानव का आदि देश-३

कालचक्र: सभ्यता की कहानी
मानव का आदि देश
मानव का आदि देश
३ मानव का आदि देश

चतुर्थ हिमाच्‍छानज के समय हिमालय पर्वत से रक्षित प्रकृति की अनुपम छवि-छटा का स्‍थल, उस समय भी सम एवं स्थिर जलवायु के वरदान से मंडित यह भारत, जहॉं प्रकृति ने वनस्‍पति एवं जीव-जंतुओं से भरपूर धरती दी। इनकी विपुलता में मानव जाति को भोजन प्राप्‍त होता रहा। इस सम एवं स्थिर जलवायु के लगभग दो लाख वर्षों ने यहॉं मानव को शारीरिक- मानसिक क्षमता प्राप्‍त करने का अनुपम आश्रय-स्‍थान दिया। उस समय उत्‍तर का यह मैदान अपनी सहायक नदियों के साथ सिंधु और यमुना आदि से सिंचित था। इनके बीच बहती सरस्‍वती नदी, जो आज लुप्‍त हो गई, राजस्‍थान के अंदर तक फैले सागर में गिरती थी। आज कच्‍छ का रन और राजस्‍थान की खारे पानी की सॉंभर झील उस सागर की याद दिलाती है । अब आसपास का सारा स्‍थान बालुकामय मरूस्‍थल हो गया है। हो सकता है कि उस समय आज का सिंध तथा बंगाल के कुछ भाग सागर तल रहे हों। इस सिंधु- यमुना के मैदान के दक्षिण में हैं विंध्‍याचल पर्वत की श्रेणियां, उनके दक्षिण में है भारत का प्रायद्वीप जिसके मानो रत्‍नाकर ( सिंधु सागर), जिसे अब अरब सागर (Arabian Sea) भी कहते हैं, और महोदधि ( गंगा सागर), जिसे अब बंगाल की खाड़ी (Bay of Bengal) कहकर पुकारते हैं, चरण पखार रहे हैं। यह प्रायद्वीप समान उष्‍ण जलवायु के प्राचीन काल के जंगल, महाकांतर और दंडकारण्‍य से ढका था। अरब निवासियों का विश्‍वास है कि यही दक्षिण का प्रायद्वीप, आदम और हव्‍वा की अदन वाटिका (Garden of Eden) है। उसके दक्षिण में है हिंदु महासागर, जिसकी उत्‍ताल तरंगों पर कभी फैला भारत का अधिराज्‍य।

दक्षिण भारत और हिदु महासागर से संबंधितअगस्ति (अगस्‍त्‍य) मुनि की गाथा है। उन्‍होंने विंध्‍याचल के बीच से दक्षिण का मार्ग निकाला। किंविंदंती है कि विंध्‍याचलपर्वत ने उनके चरणों पर झुककर प्रणाम किया। उन्‍होंने आशीर्वाद देकर कहा कि जब तक वे लौटकर वापस नहीं आते, वह इसी प्रकार झुका खड़ा रहे। वह वापस लौटकर नहीं आए और आज भी विंध्‍याचल पर्वत वैसे ही झुका उनकी प्रतीक्षा कर रहा है। दक्षिणी पठार, जो पीठ की तरह है, उसको देखकर ही झुकने की बात सूझी होगी। उनके चरणों ने दक्षिण जाने का मार्ग सरल किया, इसी से यह जनश्रुति चल निकली। भूवैज्ञानिक (geologists) विश्‍वास करते हैं कि पहले विंध्‍याचल पर्वत ऊँचा था, पर भूकंप युग में नीचा हो गया।

इसके बाद अगस्ति मुनि ने हिंदु महासागर का दूर तक अन्‍वेषण किया। इसी से कहा जाता है कि मानो उन्‍होंने समस्‍त महासागर पी लिया था। उनका बाद का जीवन इस महासागर में घूमते बीता। दक्षिणी गोलार्द्ध के आकाश में चमकते ‘त्रिशंकु नक्षत्र’ (The Southern Cross) को, जो दक्षिण भारत से ही दिखता है, उन्‍होंने हिदु महासागर की नौ-यात्रा का पथ-प्रदर्शक नक्षत्र बनाया। आधुनिक नौ-यात्रा के साधनों के पहले तक दक्षिणी गोलार्द्ध में समुद्र-यात्रा करते समय इस नक्षत्र का प्रयोग चला आता रहा है। त्रिशंकु नक्षत्र के प्रमुख तारे का नाम, जो दक्षिणी खगोलार्द्ध में सबसे अधिक चमकता तारा है, ‘अगस्‍त्‍य’ (Augustus) पड़ा। इसी तारे का उल्‍लेख करते हुए तुलसीदास ने रामचरितमानस के किष्किंधाकांड में लिखा है—
'उदित अगस्ति पंथ जल सोखा।'

1 comment:

  1. बहुत काम की जानकारी है.

    लेखन की शैली सरल है, प्रवाहमय है, एवं व्यस्त व्यक्तियों के लिए उचित लम्बाई रखी गई है.

    -- शास्त्री

    हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
    http://www.Sarathi.info

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