बुधवार, जुलाई 02, 2008

कृष्ण लीला: अवतारों की कथा

दु:ख और जोखिम से भरा कृष्‍ण का बहुआयामी जीवन अगले अवतार की कहानी है। इस दुनिया का कौन सा ऐसा कष्‍ट है जो कृष्‍ण ने मुसकराते न झेला हो; कौन सा संकट है जिसका युक्ति से निराकरण न किया हो।

यशोदा मैया बालक कृष्ण को नहलाती हुईं

क्‍या कहा जाय उसे, जिसके माता-पिता यौवन की दहलीज पर कारागार में डाल दिए गए हों ! जिसके छह अग्रज जनमते ही मार डाले गए। जन्‍म के समय जिसकी ऑंखें कारागार में खुलीं। जिसने माता-पिता का सुख कभी देखा नहीं आर उनके रहते लालन-पालन पराए घर में हुआ। गोप-गोपियों के बीच गौऍं चराकर जिसका बचपन बीता। और ऐसे समय मृत्‍यु के घाट उतारने में जिसके मामा ने कोई कसर बाकी र रखी। जिसके भाग्‍य मेंजन्‍म-स्‍थान और लालन-पालन के स्‍थान छोड़कर दूर द्वारका में शरण लेना बदा था। रण छोड़कर भागना पड़ा, इसी से ‘रणछोड़’ कहलाया। मणि चुराने का झूठा अपवाद सहन करना पड़ा। सारा जीवन अन्‍याय के विरूद्ध संघर्ष करते बीता। राजसूय यज्ञ में अपने लिए जिसने जूते रखने का कार्य चुना। सर्वगुण-संपन्‍न होने के बाद भी अर्जुन के रथ को हॉंकने वाला सारथि बना। सदा विजय होने के बाद भी कभी राजा बनना नहीं स्‍वीकारा। महाभारत में जिसने चार अक्षौहिणी सेना विरूद्ध पक्ष को देकर नष्‍ट होने दी। जिसने गांधारी के क्रोध और ‘तुम्‍हारे भी कुल का सर्वनाश हो जाय’, इस दारूण शाप को हँसते हुए सिर-माथे पर लगाया, कहा,
‘तुम्‍हारे ज्ञान चक्षु होते तो तुम समझतीं कि हर बार मैं ही मरा हूँ।‘
उसके बाद अपने यादव वंश को अपने सामने नष्‍ट होते देखा। कुल की ललनाओं का अपहरण हो गया, उन्‍हें महाबली अर्जुन भी न बचा सके और जिस परम वीर की मृत्‍यु जंगली जंतु की भॉंति व्‍याध के हाथों हुई।

इस संकटापन्‍न जीवन में सदा धर्म की मर्यादा बनाए रखी, उसी के अनुगामी बने। सर्वदा उसी का समर्थन। हँसते-हँसते महाविपत्तियों को झेला। मानो महाकाल को भी चुनौती दी। युद्ध न हो, यही सतत प्रयत्‍न; पर जब युद्ध अवश्‍यंभावी दिखा तो विजय की कामना ही मूल मंत्र बनी। जिसने ‘गीता’ में समस्‍त वेद- उपनिषदों का सारतत्‍व गाया, भारतीय दर्शन का चरम सत्‍य समझाया। नृत्‍य, गान आदि ललित कलाओं का प्रवर्तक; सौंदर्य, माधुर्य, भक्ति और प्रेम रस की खान, वह योगेश्‍वर बना। कितना विरोधाभास और विसंगतियॉं आईं, द्वंदात्‍मक परिस्थितियॉं उभरीं; पर उनके बीच से निष्‍पाप निकलने का मार्ग बनाया।
रामावतार विष्‍णु की बारह कलाओं का था पर सभी सोलह कलाओं से युक्‍त विष्‍णु का पूर्णावतार, ऐसा था श्रीकृष्‍ण का चमत्‍कारिक जीवन।

कृष्ण गोवर्धन पर्वत उठाये हुऐ

उनके बचपन में ब्रज में इंद्र की पूजा होती थी, जो वर्षा से पृथ्‍वी को सिंचित करता था। बालक कृष्‍ण ने कहा,
‘होंगे इंद्र स्‍वर्ग के राजा, उनसे बड़ी तो हमारी गोवर्द्धन पहाड़ी है, जिसने हमारी गायों को बड़ा किया। पूजा करनी है तो उसी की करो।‘
फिर क्‍या था, ब्रज में उस वर्ष इंद्र के स्‍थान पर गोवर्द्धन की पूजा हुई। तब इंद्र ने कुपित होकर घनघोर वर्षा की। सारी पृथ्‍वी जल-प्‍लावित हो गई। सब भागकर कृष्‍ण के पास गए। तब कृष्‍ण ने कहा,
‘चलो, गोवर्द्धन के पास चलें। उसकी पूजा की है, वही रक्षा करेगा।‘
कहते हैं कि सबने मिलकर उठाया तो पर्वत भी उठ गया। उसके नीचे सबने शरण ली। उस एक सप्‍ताह की घटाटोप वर्षा और कीचड़ से गोवर्द्धन ने व्रजवासियों तथा उनकी गायों को त्राण दिया। इस प्रकार कृष्‍ण ने जीवन में कृति से बताया कि स्‍वर्ग के राजा से अपनी मातृभूमि की छोटी सी वस्‍तु भी बड़ी है। यदि मिलकर काम करें तो पहाड़ भी उठ जाए; कौन सा ऐसा दु:साध्‍य कार्य है जो सरल नहीं हो जाता।


इस चिट्ठी के चित्र विकिपीडिया से और उसी की शर्तों के अन्तर्गत में प्रकाशित हैं।

कालचक्र: सभ्यता की कहानी
०१- रूपक कथाऍं वेद एवं उपनिषद् के अर्थ समझाने के लिए लिखी गईं
०२- सृष्टि की दार्शनिक भूमिका
०३ वाराह अवतार
०४ जल-प्‍लावन की गाथा
०५ देवासुर संग्राम की भूमिका
०६ अमृत-मंथन कथा की सार्थकता
०७ कच्‍छप अवतार
०८ शिव पुराण - कथा
०९ हिरण्‍यकशिपु और प्रहलाद
१० वामन अवतार और बलि
११ राजा, क्षत्रिय, और पृथ्वी की कथा
१२ गंगावतरण - भारतीय पौराणिक इतिहास की सबसे महत्‍वपूर्ण कथा
१३ परशुराम अवतार
१४ त्रेता युग
१५ राम कथा
१६ कृष्ण लीला

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