Thursday, December 11, 2008

कुरितियां क्यों बनी

समाज की व्यवस्था का सही  मूल्यांकन होता है उसकी स्थायी अवस्था से। समाज के संघर्ष काल में अनेक प्रकार के नियम बनते हैं। परंतु वे उस समाज का स्थायी भाव नहीं दर्शाते। न विशेष परिस्थितिजन्य अवस्था पर समाज का सच्चा मूल्यांकन संभव है। संघर्ष की अवस्था में तो उस समाज की संघर्ष- क्षमता ही नापी जाती है।


हाल के द्वितीय जागतिक महायुद्घ के समय का उदाहरण लें। युद्घरत देशों में कैसी उथल-पुथल मची। उस समय भारत में अंग्रेजी शासन था। इसलिए सुदूर पूर्व मणिपुर में आजाद हिंद फौज के आक्रमण के अतिरिक्त कहीं प्रत्यक्ष युद्घ न होने पर भी, कितने प्रकार के विचित्र नियम बने। यहां भी तरह-तरह के 'कंट्रोल' आए, जिन्होंने समाज को हिला दिया। वे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में व्याप्त हो गए। वहां भी जहां शासन के हस्तक्षेप की किसी को कल्पना न थी। उनमें से अनेक विचित्र नियम थे। सारे द्वार, खिड़कियां, रोशनदान और झरोखे, सबमें मोटा-काला परदा डालकर रखो; मोटरों की हेड लैंप के ऊपरी भाग में कालिख पोत दो। कहीं शत्रु का लड़ाकू वायुयान न आ जाय। यह वस्तु इस चीज की बनाओ, इसकी मत बनाओ; इतने से कम में मत बेचो, इससे अधिक में मत बेचो। 'राशन', पद्घति लागू हो गई। इंग्लैंड में सप्ताह में केवल एक मक्खन की टिकिया, वह भी मां बनने वाली को। यदि ऎसे समय में बाहर से कोई व्यक्ति आता, जिसे पता न हो कि यह देश युद्घरत है तो यही कहेगा कि यह पागलों का देश है जहां इस प्रकार के नियम बने। परंतु ये नियम समाज के संरक्षण के लिए आवश्यक थे।


युद्घ समाप्त होने के बाद भी ये नियम कुछ वर्षों तक ही सही, चलते रहे। समाज एकाएक उनको उखाड़कर फेंक नहीं पाता। ये अनेक प्रकार के 'कंट्रोल'- युद्घजन्य परिस्थिति से जूझने के लिए और लाइसेंस आदि। अभावग्रस्त तथा भयग्रस्त समाज का विकृत रूप दूर कर जर्जरित समाज-व्यवस्था को पुन: पटरी पर लाने में स्वाभाविक ही कठोर परिश्रम और समय की आवश्यकता पड़ती है।


भारत में एक सहस्त्र वर्षों का संघर्ष-काल रहा है। ऎसा संघर्ष-काल जिसमें आबालवृद्घ ने भाग लिया। इसे अंतरराष्ट्रीय विधि में सार्विक युद्घ-'टोटल वार' (total war)  कहते हैं, जहां सेनाएं ही नहीं लड़तीं, पूरा समाज युद्घरत होता है। ऎसे घनघोर संघर्ष में कुछ आपातकालीन नियम बने होंगे। संघर्ष समाप्त होने के बाद भी ये आपातकालीन नियम अथवा उनके अपभ्रंश कुरीतियां बनी रहीं। ये शाश्वत नहीं, न गुलामी के कारण हैं; वरन् संघर्ष-काल के बाद चलने वाली कुरीतियां मानसिक दासता के लक्षण, उसका परिणाम मात्र हैं। समाज का सच्चा मूल्यांकन तो उसकी शाश्वत धारा का मूल्यांकन है।स्मृतिकार और समाज रचना समाज की व्यवस्था का सही  मूल्यांकन होता है उसकी स्थायी अवस्था से। समाज के संघर्ष काल में अनेक प्रकार के नियम बनते हैं। परंतु वे उस समाज का स्थायी भाव नहीं दर्शाते। न विशेष परिस्थितिजन्य अवस्था पर समाज का सच्चा मूल्यांकन संभव है। संघर्ष की अवस्था में तो उस समाज की संघर्ष- क्षमता ही नाजी जाती है।


हाल के द्वितीय जागतिक महायुद्घ के समय का उदाहरण लें। युद्घरत देशों में कैसी उथल-पुथल मची। उस समय भारत में अंग्रेजी शासन था। इसलिए सुदूर पूर्व मणिपुर में आजाद हिंद फौज के आक्रमण के अतिरिक्त कहीं प्रत्यक्ष युद्घ न होने पर भी, कितने प्रकार के विचित्र नियम बने। यहां भी तरह-तरह के 'कंट्रोल' आए, जिन्होंने समाज को हिला दिया। वे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में व्याप्त हो गए। वहां भी जहां शासन के हस्तक्षेप की किसी को कल्पना न थी। उनमें से अनेक विचित्र नियम थे। सारे द्वार, खिड़कियां, रोशनदान और झरोखे, सबमें मोटा-काला परदा डालकर रखो; मोटरों की हेड लैंप के ऊपरी भाग में कालिख पोत दो। कहीं शत्रु का लड़ाकू वायुयान न आ जाय। यह वस्तु इस चीज की बनाओ, इसकी मत बनाओ; इतने से कम में मत बेचो, इससे अधिक में मत बेचो। 'राशन', पद्घति लागू हो गई। इंग्लैंड में सप्ताह में केवल एक मक्खन की टिकिया, वह भी मां बनने वाली को। यदि ऎसे समय में बाहर से कोई व्यक्ति आता, जिसे पता न हो कि यह देश युद्घरत है तो यही कहेगा कि यह पागलों का देश है जहां इस प्रकार के नियम बने। परंतु ये नियम समाज के संरक्षण के लिए आवश्यक थे।


युद्घ समाप्त होने के बाद भी ये नियम कुछ वर्षों तक ही सही, चलते रहे। समाज एकाएक उनको उखाड़कर फेंक नहीं पाता। ये अनेक प्रकार के 'कंट्रोल'- युद्घजन्य परिस्थिति से जूझने के लिए और लाइसेंस आदि। अभावग्रस्त तथा भयग्रस्त समाज का विकृत रूप दूर कर जर्जरित समाज-व्यवस्था को पुन: पटरी पर लाने में स्वाभाविक ही कठोर परिश्रम और समय की आवश्यकता पड़ती है।


भारत में एक सहस्त्र वर्षों का संघर्ष-काल रहा है। ऎसा संघर्ष-काल जिसमें आबालवृद्घ ने भाग लिया। इसे अंतरराष्ट्रीय विधि में सार्विक युद्घ-'टोटल वार' (total war)  कहते हैं, जहां सेनाएं ही नहीं लड़तीं, पूरा समाज युद्घरत होता है। ऎसे घनघोर संघर्ष में कुछ आपातकालीन नियम बने होंगे। संघर्ष समाप्त होने के बाद भी ये आपातकालीन नियम अथवा उनके अपभ्रंश कुरीतियां बनी रहीं। ये शाश्वत नहीं, न गुलामी के कारण हैं; वरन् संघर्ष-काल के बाद चलने वाली कुरीतियां मानसिक दासता के लक्षण, उसका परिणाम मात्र हैं। समाज का सच्चा मूल्यांकन तो उसकी शाश्वत धारा का मूल्यांकन है।


विधि समाज का दर्पण है। उसमें समाज की दशा का प्रतिबिंबित चित्र देखा जा सकता है। इसलिए भिन्न प्राचीन समाजों की विधि-परंपराओं को समझना आवश्यक है। उनके लिए एक कसौटी चाहिए। यह कसौटी प्राचीन या आधुनिक नहीं हो सकती । प्राचीन या आधुनिक कसौटी तो किसी स्थिर विधि-प्रणाली के संदर्भ में हो सकती है, जो संसार के किसी भूभाग में और किसी विशिष्ट कालखंड के लिए बनाई गई। पर विधि की सार्थकता नवीन चुनौतियों का सामना करने, नित्य नई परिस्थितियों से जूझने तथा अपने अंदर युगानुकूल मानव-मूल्यों के अनुरूप परिवर्तन कर सकने की क्षमता में है। हमें शाश्वत कसौटी चाहिए। यह और भी आवश्यक मुसलिम और ईसाई समाज के परिप्रेक्ष्य में है जो स्थिर, एक काल के लिए बने पंथ हैं।


विधि समाज का दर्पण है। उसमें समाज की दशा का प्रतिबिंबित चित्र देखा जा सकता है। इसलिए भिन्न प्राचीन समाजों की विधि-परंपराओं को समझना आवश्यक है। उनके लिए एक कसौटी चाहिए। यह कसौटी प्राचीन या आधुनिक नहीं हो सकती । प्राचीन या आधुनिक कसौटी तो किसी स्थिर विधि-प्रणाली के संदर्भ में हो सकती है, जो संसार के किसी भूभाग में और किसी विशिष्ट कालखंड के लिए बनाई गई। पर विधि की सार्थकता नवीन चुनौतियों का सामना करने, नित्य नई परिस्थितियों से जूझने तथा अपने अंदर युगानुकूल मानव-मूल्यों के अनुरूप परिवर्तन कर सकने की क्षमता में है। हमें शाश्वत कसौटी चाहिए। यह और भी आवश्यक मुसलिम और ईसाई समाज के परिप्रेक्ष्य में है जो स्थिर, एक काल के लिए बने पंथ हैं।

कालचक्र: सभ्यता की कहानी
स्मृतिकार और समाज रचना 
 ०१- कुरितियां क्यों बनी

2 comments:

  1. बहुत सही बातें कही है आपने। किसी जमाने की सुरक्षा के लिए शुरू की गयी रीतियां बाद के जमाने में कुरीतियां बन जाती हैं।

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  2. Absolutely correct!
    I do not understand, why this approach is not adopted by media and other responsible forums!

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