Thursday, December 18, 2008

प्रथम विधि प्रणेता - मनु

आज संसार ने आदि विधि प्रणेता के रूप में मनु को जाना है। प्रथम विधि-संहिता मनु का 'धर्मशास्त्र' है, जिसे मनुस्मृतिसंस्कृत भाषा में मनुष्यमात्र अथवा समाज के संदर्भ में 'धर्म' शब्द का प्रयोग विधि (कानून) के अर्थ में होता था। आज 'धर्म' शब्द पंथ के स्थान पर अथवा उसके 'कर्मकांड' या पूजा-पद्घति या प्रथा के लिए प्रयुक्त होता है। 'धर्मशास्त्र' सामाजिक आचरण के नियम अर्थात् 'विधि' की पुस्तकें हैं। इसी प्रकार संस्कृत में 'न्यायशास्त्र' तर्कशास्त्र की पुस्तक है, न कि 'विधि' (justice)  अथवा इनसाफ करने की प्रक्रिया, जिसे आज न्याय कहते हैं। भी कहते हैं।


नई दुनिया के न्यूयार्क नगर में बार एसोसिएशन के बारी प्रांगण में तीन प्राचीन विधि प्रवर्तकों की मूर्तियां प्रतिष्ठित हैं। एक हजरत मूसा (Moses) की, जिन्होंने मिश्र से वापस लौटते समय यहूदियों (Jews) को उनके दस नियम दिए; दूसरी हम्मूराबी, बाबुल (Babylonia) के शासक की, जिन्होंने दजला (Tigris) (संस्कृत : दृषद्वती) और फरात  (Euphrates) के दो-आबे में बसे समाज के लिए एक संहिता बनाई और तीसरी मूर्ति के नीचे अंकित हैं ये अमर शब्द-- 'मनु प्रथम विधि-प्रणेता' ('Manu the first law-giver)। यह मूर्ति सार्वभौमिक एवं सार्वकालिक विधि के प्रणेता की है। फिलीपीन के नए लोकसभा भवन के सम्मुख जिनकी मूर्तियां स्थापित है, उनमें एक मनु हैं जिनका चिर-स्मरणीय योगदान दक्षिण-पूर्व एशिया की विधि-प्रणालियों में हुआ।


दक्षिण में कावेरी की एक सहायक नदी 'कृतमाला' के किनारे सत्यव्रत का जन्म हुआ था। शस्त्र एवं शास्त्र के अध्ययन की समाप्ति पर उस नवयुवक ने नदी-तट पर एक आश्रम स्थापित किया। उस आश्रम की ख्याति फैलने पर वहां के गणराज्य के लोगों ने आकर सत्यव्रत से प्रार्थना की कि वह गणराज्य के प्रमुख का कार्यभार संभालें। पहले तो सत्यव्रत ने नाहीं की, पर जब सभी वर्गों के लोगों ने निवेदन किया तब वह मान गए। उन्होंने शर्त रखी, 'जो मैं कहूंगा, व्यवस्था दूंगा, वह सब मानेंगे।' सबके शर्त मान लेने पर उन्होंने प्रमुख (राजा) बनना स्वीकार किया। सबसे पहला कार्य उन्होंने राजमहल में वहां के निम्नतम वर्ग, जिसका गण-चिन्ह 'मछली' था, को राजप्रासाद में संरक्षण दिया। उस वर्ग में मत्स्य न्याय ( कि ताकतवर कमजोर को खा जाते हैं) प्रचलित था। व्यवस्था देकर उसका निराकरण किया। किंवदंती है कि मछली एक-दो दिन में इतनी बढ़ गई कि वहां न समाई। अंत में ऎसे लोगों को नदी-तट पर और फिर निरापद सागर-तट पर बसाया। इन्हीं सत्यव्रत ने व्यवस्था, सामंजस्य स्थापित कर सभी की सम्मति से लागू की। इसी से वे 'मनु' और उनकी व्यवस्था का पालन तथा धर्माचरण करने वाले, अर्थात् नियमों के अनुसार चलने वाले, 'मानव' कहलाए। धर्माचरण अर्थात् विधि के अनुसान व्यवहार। यह मात्र किसी देश के नागरिक के लिए नहीं वरन् संसार में सभी के लिए सार्विक विधि है।


एक दिन एक छोटे झरने को पार कर हम लोग हिमालय की गोद में बसी मनाली (हिमाचल प्रदेश) की पुरानी बस्ती में पहुंचे। वहां थोड़ी सी समतल भूमि के कोने में एक छोटा सा मूर्तिरहित ( तीन फीट लंबा-चौड़ा और लगभग इतना ही ऊंचा) मंदिर है। परंपरा है कि उसमें कभी कोई देवता की मूर्ति नहीं रही। संभवतया प्राचीन काल में कभी वहां 'मनुस्मृति' रही होगी, वह कालांतर में लुप्त हो गई। आज उनकी कर्मभूमि में वह छोटा मंदिर ही संसार के प्रथम विधि-प्रणेता की स्मृति है। उनकी तपोभूमि 'मन्वालय' (मनु-आलय), जहां जल-प्लावन के बाद उन्होंने अपना स्थान बसाया, का नाम आज 'मनाली' हो गया। चमक-दमक युक्त आधुनिक मनाली के ऊपरी पार्श्व में अतीत के धुंधलेपन की चादर ओढ़े, विस्मृत गांव का यह छोटा सा मंदिर।


सृष्टि के आदिकाल में जिज्ञासु ऋषियों ने 'धर्म' (अर्थात् समाज की धारणा जिससे हो वह 'विधि') समझाने के लिए तत्वदृष्टा मनु को चुना। उनकी वाणी 'मनुस्मृति' में गूंजी। आज संसार की प्रथम विधि-संहिता और उसके प्रणेता को विवादों ने घेर लिया है। अनेक प्रक्षेपों के कारण कभी-कभी इसे 'स्वार्थी ब्राम्हणों का पोथा' कहकर अथवा उस पर 'स्त्री निंदा' या 'निम्न वर्ग के प्रति विद्वेष' के आरोप लगाए जाते हैं। इसका ठीक उल्टा मनु ने किया था। संसार जिसका सदा ऋणी है, उस विधि-प्रणाली को समझने के लिए उसकी मूल प्रकृति को पहचानना आवश्यक है।

कालचक्र: सभ्यता की कहानी
स्मृतिकार और समाज रचना 
०१ - कुरितियां क्यों बनी
०२ - प्रथम विधि प्रणेता - मनु


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3 comments:

  1. मुझे दद्दा दादा से मिलने का कई बार अवसर मिला है, कई बार हमने एक साथ लम्‍बी यात्राऍं भी की जिसमें वाराणसी और चित्रकूट की यात्रा प्रमुख है। उनकी स्‍मृति क्षमता और ज्ञान का कोई भी सानी नही है। उन्‍हे वो सब जगहे याद थी जो उन्‍होने करीब 5-10 पहले देखी थी। 80 साल से ज्‍यादा उम्र में यह क्षमता विरले लोगो में ही द‍िखती है।

    मनु‍स्मृति,राष्‍ट्रवाद, हिन्‍दु विधि और मुस्लिम विधि पर उनके विचार सुनने योग्य होते है। मन करता हूँ कि हमेशा उनके पास बैठा रहूँ और जो कुछ भी वे कहते रहे उसे सुनता रहूँ। और अपनी ज्ञानार्जन की भूख को मिटाता रहूँ। आप जो काम कर रहे है, उसके लिये बधाई और धन्‍यवाद के पात्र है। ऐसे ही प्रक‍ाशित करते रहे।

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  2. The last verse of Manu-smriti itself referres Maharshi Bhrigu for its authority and says that this Manav shashtra was propounded by Bhrigu.
    "Itiyetam manavam shashtram bhrigu proktam pathandvijah;
    bhavatyacharvannityam yatheshtam prapnuyadgatim" - (Manu smriti, 12/126).

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  3. But the last verse of Manu-smriti (12/126)itself referres Maharshi Bhrigu for its authority and says that this Manav shashtra was propounded by Bhrigu. Thus it appears that first Law maker was Bhrigu and Manu-smriti is reproduction of Laws propounded by Maharshi Bhrigu.

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