Thursday, December 25, 2008

मनु स्मृति और बाद में जोड़े गये श्लोक

संसार में जितनी विधि-प्रणालियां हैं, वे एक विशेष कालखंड में एक विशिष्ट समाज के लिए बनीं थीं। मनु-प्रणीत विधि की इन सब प्रणालियों से तुलना नहीं हो सकती । यह विधि किसी एक समाज (या देश) के लिए न होकर संपूर्ण मानव समाज के लिए थी। मानव सभ्यता का सबसे साहसपूर्ण प्रथम चरण! अनगिनत रीतियों से विभूषित तथा विविधताओं से पूर्ण इस मानव समाज में प्रचलित रीति-रिवाजों के बीच एक सभ्य, न्यायपूर्ण समाज के सिद्घांत खोजना कैसा दुस्तर कार्य था! इसे करने का साहस मनु ने किया।

इसी से मनुस्मृति (Manusmṛti) के कुछ प्रसंग निबंध सरीखे लगते हैं। उदाहरणार्थ मनु आठ प्रकार के 'विवाह' का वर्णन करते हैं जिनमें 'राक्षस' तथा 'पैशाच' विवाह भी हैं। ये बलात्कार और अपराध हैं। यह एक निबंध में संसार में फैले मानव समाज में स्त्री-पुरूष के यौन संबंधों का वर्गीकरण मात्र है। उनमें विधिसम्मत विवाह के रूप भी बताए। इसी प्रकार पुत्रों का वर्णन करते समय मनु ने बारह प्रकार के पुत्र बताए हैं। यह संसार में पुत्र संबंधी सभी प्रथाओं का निचोड़ है। उसमें जारज (व्यभिचार से उत्पन्न) संतान भी है। उन्होंने बताया कि कौन पुत्र नरक से त्राण दिलाने में सक्षम है। वही उत्तराधिकार पाने का अधिकारी है।

मानव समाज में रीति-रिवाजों की विविधता और भरमार सदा रही है। भारत में ही पितृप्रधान से लेकर मातृप्रधान समाज-व्यवस्थाएं रहीं, जैसी भारत के पूर्व तथा दक्षिण के कुछ क्षेत्रों में थीं। मानव समाज के असंख्य चेहरे उसकी रीति में प्रतिबिंबित हुए। उनके बीच सर्वमान्य विधि मनु ने प्रतिपादित की। इसी से कहते हैं, मनु का विवाह 'शतरूपा' से हुआ था, शत फलकयुक्त समाज से। अनेक रूप धारण किए इस मानव समाज के नियमन के लिए थी 'मनुस्मृति'। जिस प्रकार कहा जाता है कि वेदों में सारे संसार का ज्ञान संकलित हुआ, पुराणों में संसार के सुने हुए इतिहास का, उसी प्रकार मनु ने (और उसके बाद के स्मृतिकारों ने) संसार के धर्माचरण के नियमों का, विधि का, संहिता में रखने का कार्य किया। एक महान् प्रयोग 'वसुधैव कुटुंबकम्' को चरितार्थ करने, संपूर्ण मानव जाति को एक विधि के ताने-बाने में कसने का था। यह सभ्यता का सबसे बड़ा अस्त्र था।

सारी मानव जाति को आलोड़ित करती यह विधि-प्रणाली काल-बाह्य हो कई क्या ?आज की विस्मृति में क्या है इसका उत्तर ?

मनु- प्रणीत इस विधि में रीति सर्वोपरि है। इसी से अनेक स्थानिक रीतियां भी विधि का अंग बनीं। सभी को इस विधि ने आत्मसात् किया। इस प्रकार की रीति पर एक ही अंकुश था जिसे मनु ने धर्मशास्त्र के दूसरे अध्याय के प्रथम श्लोक में कहा, 'जिसे सत्पुरूष, राग-द्वेषरहित विद्वान् अपने हृदय से अनुकूल जानकर सेवन करते हैं, वही धर्म (विधि) है।'
समाज में सदा परिवर्तन होता रहा है, होता रहेगा। ज्यों-ज्यों वैज्ञानिक उपलब्धियां बढ़ती है और जातियों का संघर्ष तीव्रतर होता है, नवीन परिस्थितियां उत्पन्न होती हैं। ये नई रीतियों एवं परंपराओं को जन्म देती हैं, नई परिस्थितियों से निपटने के लिए नयी रीति चाहिए। रीतियां भी बदलती हैं। अत: रीति के साथ विधि भी बदलती गई। समाज की रीतियां ही भिन्न-भिन्न संहिताओं में संगृहीत हुई। इसलिये जब समय बदला, युग बदला और नए प्रश्न उठे तब मानव के संबंधों का नए परिप्रेक्ष्य  में निर्धारण करने के लिए रीतियां बनीं, जो विधि का अंग हुईं। विधि भी इस प्रकार बदलती गई। नई चुनौतियों का सामना करने के लिए वह सक्षम बनी। इसमें अंतर्निहित है स्वयं को समयानुकूल, युगानुकूल तथा मानव-मूल्यों के अनुरूप बनाने की प्रक्रिया। इसी से यह कालजयी थी। इसे सार्वकालिक बनाया थ। कितना बड़ा कालखंड और कैसी विचित्र परिस्थितियां भी इसे पूर्णरूपेण विद्रूप न कर सकीं।

इसके इस सार्वभौमिक एवं सार्वकालिक स्वरूप को न समझने के कारण अनेक भ्रम उत्पन्न हुए हैं। आज मनुस्मृति का जो रूप उपलव्ध है उसमें विषय के विरूद्घ अप्रांसगिक, परस्पर विरोधी क्षेपक त पुनरूक्तियां भी पाई जाती हैं। मूल शैली से भिन्न अनेक पक्षपातपूर्ण तर्कविहीन बातें सामान्य भाषा में जोड़ दी गई हैं। इन्हीं को लेकर भ्रमित आलोचना का बवंडर खड़ा किया गया । सभी भाष्यकारों ने न्यूनाधिक प्रक्षेप का अस्तित्व स्वीकार किया है। प्रारंभिक भाष्यकार कुल्लूक भट्ट ने १७० श्लोक प्रक्षिप्त माने थे। बाद के सभी पौराणिक पंडितों ने इन प्रक्षेपों को स्वीकार करने के साथ-साथ अन्य की ओर भी इंगित किया है। पाश्चात्य विद्वानों (वूलर, जौली आदि) ने और महर्षि दयानंद ने भी। एक शोधग्रंथ (देखें--मनुस्मृति: आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट, खारी बावली, दिल्ली) के अनुसार कुल् २६८५ श्लोकों में १४७१ प्रक्षिप्त हैं। इनमें १२१४ ही मौलिक हैं। सार्वभौमिक एवं सार्वकालिक संहिता की भूमिका में मनु की आधारभूत मान्यताओं को समझना चाहिए।




कालचक्र: सभ्यता की कहानी
स्मृतिकार और समाज रचना 
०१ - कुरितियां क्यों बनी
०२ - प्रथम विधि प्रणेता - मनु 
०३ - मनु स्मृति और बाद में जोड़े गये श्लोक
 

2 comments:

  1. आपका यह लेख बहुत ज्ञानवद्र्धक लगा। मनुस्मृति की अनेक बातों को लेकर विवाद खड़े किये जाते हैं और नये संदर्भों में समझने का प्रयास नहीं किया जाता। आपका प्रयास सराहनीय है।
    दीपक भारतदीप

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