Monday, February 12, 2007

भौतिक जगत और मानव-९

कालचक्र: सभ्यता की कहानी
संक्षेप में
प्रस्तावना
भौतिक जगत और मानव-१
भौतिक जगत और मानव-२
भौतिक जगत और मानव-३
भौतिक जगत और मानव-४
भौतिक जगत और मानव-५
भौतिक जगत और मानव-६
भौतिक जगत और मानव-७
१० भौतिक जगत और मानव-८

जीवन के विकास के पद-चिन्ह प्रकृति ने पृथ्वी की पपड़ी के शैलखंडों पर छोड़े हैं। पर यह उस पुस्तक की तरह है जो अनजान भाषा में लिखी गई है, जिसके पन्ने फट गए हैं। कुछ उलट-पुलट कर गायब भी हो गए हैं। कुछ गल गए या जल गए हैं। अथवा क्रूर समय के हाथों ने जिनके भग्नावशेषों को इधर-उधर सभी दिशाओं में विसर्जित कर दिया है।

पर शैल चिन्ह छोड़ सकने के लिए भी जीव को लंबी विकास यात्रा करनी पड़ी। केन नदी के उदगम स्थान के पास एक सहायक नदी में पारभासी (translucent)पत्थर मिलते हैं, जिनमें तरह- तरह के पेड़ पौधे या अन्य चित्र हैं । ये काई के अवशेष लिये पारभासी स्फटिक हैं। अरबों वर्षो के महायुग में एक प्रकार का अध:जीवन ही इस पृथ्वी पर रहा। जब जीव में सीप-घोघें सरीखा कवच या हड्डी या ढांचा प्रारंभ हुआ, तभी से पुराजीवी चट्टानों(palaeozoic rocks) में जीवन की विविधता के संकेत मिलने लगे। पहले घोंघे, सीपी, और कीड़े (केकड़े, भीमकाय समुद्री बिच्छू और जलीय रंगनेवाले जीव) और समुद्री सेंवार आदि, ऊपरी परतों में मछलियॉ। इसके बाद आते हैं उभयचर (amphibian) जो जल, थल दोनों में रह सकते हैं और कार्बोनी युग (carboniferous age) के बड़े-बड़े पर्णांग (fern) के जंगल। इन जंगलों की लुगदी आज कोयले के रूप में पृथ्वी की परतों में विद्ययमान है।

जल के बिना जीवन असंभव है। निर्जल (dehydration)होने पर वनस्पति और जंतु मर जाते हैं। कहा गया है कि जल ही अमृत है। आदि जीव जल के बाहर फिंक जाने पर ‘बिना जल के मीन’सरीखे मर जाते थे। इसलिए उन अत्परिवर्तनों को, जिनके द्वारा सूखे में जीव अपने अंदर की नमी कुछ देर बनाए रख सके, प्रोत्साहन मिला। आदि-जैविक महाकल्प (proterozoic age) की विस्तीर्णता में प्रकृति के वे प्रयोग हुए जिनसे जीवन निरंतर जल में रहने की बाध्‍यता से मुक्‍त हो चला ।

अगला मध्यजीवी महाकल्प (mesozoic age) जीवन की प्रचुरता और विस्तार के नए चरण से प्रारंभ होता है। अब आए जल रेख के ऊपर नीची भू‍मि पर, सदाहरित वनस्पति और इनके साथ तरह-तरह के सरीसृप; इनकी दुनिया विवधिता से भरपूर थी । डायनासोर (dinosaur : दानवासुर) शरीर में तिमिंगल मछली (whale) के बराबर थे। अर्थर कैनन डायल का एक उपन्यास ‘वह खोई दुनिया’ (The Lost World) प्रसिद्ध है । यह एक अगम्य पठार की, जहॉ मध्यजीवी कल्प के भयानक जानवर थे, उनके बीच कुछ लोगों के जोखिम की कहानी है।

इस भरे-पूरे भीमकाय जंतुओं के कल्प का अंत बड़ा विचित्र है। एक दिन ये जंतु अपने आप मिट गए। जैसा पुराजीवी कल्प के अंत में एक लंबे समय का अंतरात आता है वैसा ही मध्यजीवी कल्प के अंत में हुआ। पर किसी अनजाने भाग्य ने इन भयानक, भीममाय सरीसृपों का सत्यानाश कर डाला। मनव के अवतरण के पहले सबसे विलक्षण घटना यही है। ये सरीसृप स्थिर ग्रीष्म जलवायु में रहने के आदी थे। यह तभी होगा जब पृथ्वी की घुरी उसकी कक्षा पर प्राय: लंबवत् (perpendicular) होगी। एकाएक कठोर शीतयुग आया। इस सर्दी को या तापमान के तात्कालिक बदल को सहन करने का सामर्थ्य उस कल्प के जीवन में न था और सरीसृप एवं वनस्पति संभ्वतया जलवायु की चंचलता के शिकार बने। संभवतया किसी अत्यंत प्रचंड खगोलीय शक्ति से या आकाशीय पिंडाघात से पृथ्वी की धुरी,जो उसकी कक्षा पर प्राय: लंबवत् थी, एक ओर झुक गई। तब ग्रीष्म-शीत ऋतुऍ प्रारंभ हुई । आज भी हम नहीं जानते कि अनिश्चित काल में पृथ्वी को आच्छादित करते ‘हिमयुग’ (ice age) क्यों आए।

भरतीय भूविज्ञान के अनुसार चतुर्युगी के बाद कृतयुग के बराबर संध्या है,प्रलय के कारण सुनसान तथा उजाड़ (देखें – खण्ड २)। इसके बाद विमोचन में पुन: सृष्टि खुलती है। जिस समय जीवन की गाथा मध्यजीवी महाकल्‍प के अंत में विध्वंस और सूने अंतराल के बाद पुन: अपनी विपुलता में खिली, तब नूतनजीवी कल्प (cainozoic age) आ चुका है। विलुप्त भीमकाय सरीसृपों का स्थान उनसे विकसित स्तनपायी जीवों तथा पक्षियों ने ले लिया हे। उनके साथ आधुनिक वृक्ष दिखाई देने लगे हैं । इनमें फूल लगने लगे हैं और इसके साथ आया है तितलियों का थिरकना तथा मधुमक्खियों का गुंजन । मध्यजीवी कल्प के अंत में आई घास ने अब मैदानों और नग्न पर्वतों को छा दिया और वह चट्टानों के नीचे से झांकने लगी।

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