Saturday, August 23, 2008

सिद्धार्त से गौतम बुद्ध तक का सफर

इन श्रमण परंपराओं और जैन मत की भूमिका में यह कहानी उभरती है, जिसने एशिया महाद्वीप की काया-पलट कर दी और अंततोगत्वा सारे संसार को प्रभावित किया। ईसाई पंथ भी जिसका चिर ऋणी है। ऎसी है मानव जीवन में उदात्त पराकाष्ठा की सिद्घार्थ गौतम (जो बाद में 'बुद्घ' बने) की कहानी।

सिद्घार्थ का जन्म भारतीय साक्ष्य के अनुसार विक्रम संवत् पूर्व १८३० में (न कि पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार विक्रम संवत् के ५०६ वर्ष पूर्व) (युगाब्द १२१५ में) शाक्य गणराज्य की राजधानी कपिलवस्तु के निकट लुंबिनी (आधुनिक रूम्मिदेई) वन में गौतम गोत्र के क्षत्रिय राजा शुद्घोदन के यहां बैसाखी पूर्णिमा को हुआ था। यह स्थान भारत की सीमा से आठ किलोमीटर दूर नेपाल में है। वहां सम्राट् अशोक का स्तंभ-लेख है, 'यहां बुद्घ का जन्म हुआ था।' माता मायादेवी का उस सप्ताह में ही निधन हो गया। तब उनका लालन-पालन उनकी मौसी महाप्रजापति गौतमी ने किया। कहते हैं कि महापुरूषों के बत्तीस लक्षणों को देखकर उनके बुद्घ (पूर्ण विकसित ज्ञानी) बनने की भविष्यवाणी असित और देवल ऋषियों ने की। बुद्घपुराण (पराशर रचित 'ललित-लघुविस्तर') में उनके बचपन के चमत्कारों का वर्णन है। कैसे उन्होंने ६४ लिपियों का और परमाणु गणना का विवरण देकर अपने आचार्यों को चकित कर दिया। अस्त्र-शस्त्रों की क्षत्रियोचित विद्या एवं शिल्प तथा कलाओं में पारंगत होने के बाद उनका विवाह यशोधरा से हो गया।

उनके संन्यासी बनने की भविष्यवाणी के कारण उनके पिता ने उनके ग्रीष्म, हेमंत एवं वर्षा ऋतु के लिए अलग-अलग प्रासाद बनवाए। उनका लालन-पालन एक मनोरम सुखोपभोग के वातावरण में हुआ, जहां दु:ख, व्याधि, जरा, मरण की हवा भी न लगे। कहते हैं कि उद्यान-यात्रा में उन्होंने इन सबको देखा और बाद में शांतचित्त आनंदमय संन्यासी को देखा। ये दु:ख उनके मन को मथने लगे। उनके लौटते समय कुश गौतमी ने उनकी प्रशंसा में गीत कहा। उसमें उनके लिए 'निवृत्त' शब्द का प्रयोग हुआ था। सिद्घार्थ ने निवृत्ति (मोक्ष ) को ही इस संसार के दु:खों से पीछा छुड़ाने का साधन समझा।

वापस आने पर पुत्र-जन्म का सुखद समाचार मिला। पर उनको लगा कि मोह का एक नया बंधन आया तब रात्रि को सिद्घार्थ पत्नी, पुत्र, कुटुम्ब और घर-द्वार छोड़कर, रथ पर सवार हो सारथि के साथ निकल गए। रातोंरात शाक्य, कोलिय एवं मल्ल गणराज्य की सीमा पार कर अनोमा नदी के तट पर पहुंचे। वहां उन्होंने संन्यासी का वेश धारण किया। सारथि को रथ-घोड़े सहित लौटा दिया और तर्क से इस संसार की गुत्थी को सुलझाने चल पड़े; अर्थात् बोधिसत्व बने। पहले वह अनेक ऋषियों से मिले। अश्वघोष ने 'बुद्घचरित्र' में उनका वर्णन किया है। दो सांख्य योगियों --आलाम कालार तथा उद्दक रामपुत्त को उन्होंने अपना गुरू माना। परंतु उपदेशों, दर्शन एवं यौगिक क्रियाओं से वह पूर्ण संतुष्ट नहीं हुए। उन्हें लगा कि जब तक भोगों की इच्छा रहेगी, ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता। इसलिए उन्होंने उरूवेला में सेनानिग्राम के निकट नैरंजना नदी के किनारे घोर तपस्या प्रारंभ की। शरीर सूखकर कांटा हो गया और उसने जवाब दे दिया। एक दिन मूर्च्छा आ गई। तब उनको अनुभूति हुई कि इससे ज्ञान प्राप्त नहीं होगा। तत्पश्चात उन्होंने अपना जीवन बदला। उचित मात्रा में भोजन लेना प्रारंभ किया। उनके पांच शिष्यों ने उन्हें मार्ग से स्खलित समझकर छोड़ दिया। वह पुन: ह्रष्ट-पुष्ट हो गए।

उन्हें बचपन की ध्यानावस्था स्मरण आने लगी। एक दिन प्रभात में सेनानिग्राम के जमींदार की पुत्री सुजाता ने उन्हें चावल की खीर दी। सारा दिन उन्होंने साल वृक्षों के कुंज में व्यतीत किया और सायंकाल पास में अश्वत्थ वृक्ष (बोधिवृक्ष) के नीचे पालथी मारकर बैठ गए, इस संकल्प से कि चरम ज्ञान प्राप्त करके ही उठेंगे। तब 'मार' (ललचाने और बहकाने वाली शक्तियां : शैतान) से द्वंद्व प्रारंभ हुआ। दुर्वासनाओं के स्वामी 'मार' ने अपने बीभत्स और पैशाचिक झुंड के साथ आकर उन्हें पथ से भटकाने की कोशिश की। पर गौतम वैसे ही अडिग रहे। अपने पारमिता (सद्गुण; बौद्घ मत में वे दस कहे जाते हैं-- उदारता, सदाचार, त्याग, प्रज्ञा, ध्यान, उद्यमशीलता, धैर्य, सत्यता, संकल्प, सभी से प्रेम, मित्रता एवं शांति), जो पूर्वजन्म में बोधिसत्व (बुद्घ बनने के प्रयत्न) के रूप में अर्जित किए थे, के कारण वह अपने पथ से नहीं डिगे। उन्होंने मार से कहा, 'तुम्हारी प्रथम सेना काम-वासनाएं हैं, दूसरी उदात्त जीवन के प्रति अश्रद्घा, तीसरी भूख और प्यास, चौथी लालसाएं, पांचवीं जड़ता और आलस्य, छठी भय और कायरता, सातवीं संशय, आठवीं पाखंड और अपश्चाताप, नौवीं प्रशंसा, झूठा लाभ, मान या महिमा बखानना और दसवीं अहम्मन्यता व दूसरों से घृणा। कोई दुर्बल व्यक्ति इन्हें जीत नहीं सकता। तुम्हें चुनौती है। मेरे जीवन को धिक्कार है, यदि मैं हार जाॐ। हारने से मरना अच्छा।' अच्छाई और बुराई के इस अंतर्द्वंद्व में सिद्घार्थ ने विजय पाई।

और तब रात्रि के प्रथम प्रहर में उन्हें अपने सभी पूर्वजन्मों की घटनाएं याद हो आईं। ये 'जातक' में संगृहीत हैं, जो विश्व कथा साहित्य का आदि स्त्रोत है। (आयुर्वेद में वर्णन है कि कैसे नवयौवन में मनुष्य चिंतन करके बचपन और फिर पूर्वजन्म के भी स्मरण की शक्ति प्राप्त कर सकता है।) मध्य प्रहर में उन्हें 'दिव्य चक्षु' प्राप्त हुए, जिससे लोगों का पुनर्जन्म में संचरण देख सकते थे। और रात्रि के तीसरे प्रहर उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ, सारे विकार एवं दूषण छंट गए और 'चार महान् सत्य' उद्भासित हुए। इस प्रकार पैंतिस वर्ष की आयु में गौतक चेतन सत्ता का चरम ज्ञान प्राप्त कर बैसाखी पूर्णिमा को 'बुद्घ' बने। उन्होंने कुछ सप्ताह उरूवेला में बिताए। इस परम चेतना के साक्षात्कार से जब जन्म-मृत्यु के आवागमन से परे का बोध हुआ तो मोक्ष के लिए व्यग्र बुद्घ को मानो इंद्र एवं ब्रम्हा का संदेश मिला,
'कठिन साधना द्वारा अर्जित ज्ञान को मानव-कल्याण के लिए प्रचारित करो।'
एक दिन उस वृक्ष के नीचे बैठे उन्हें प्रेरणा मिली,
'मैंने उस सत्य को देखा, जो अत्यंत गूढ़ है, जिसे देखना और समझना कठिन है और जो प्रज्ञा ही समझ सकते हैं।'
पर सोचा,
'कमल के फूल कीचड़ में फूलकर भी निर्लिप्त रहते हैं, वैसे ही इस दुनिया में भी कुछ लोग होंगें जो सत्य को देख सकेंगे। लोग विकास की विभिन्न अवस्थाओं में रहते हैं।'
उनके दोनों गुरूओं का निधन हो चुका था। तब पांच संन्यासियों को, जो उन्हें छोड़कर चले गए थे, सारनाथ (वाराणसी) जाकर प्रथम उपदेश दिया। यह 'धर्मचक्र-प्रवर्तन सूत्र' के नाम से प्रसिद्घ है।

उन्होंने दोनों छोरों को त्याग बीच का मध्यम मार्ग सुझाया, जो अतिवादी नहीं है; न घोर असंयम का प्रवृत्तिमार्ग और न पूर्ण आत्मदमन का निवृत्तिमार्ग। 'चार आर्य (महान्) सत्य', जो उन्हें उद्भासित हुए, अपने उपदेश में इस प्रकार कहे, 'मूल रूप से इस अनित्य संसार में आवागमन एक दु:खमय चक्र है। यह दु:ख मन के भोग-विलास की, सत्ता की और जीवित रहने की लालसा के कारण उत्पन्न होता है। इन इच्छाओं को मर्यादित करने से दु:ख- निरोध हो सकता है। इसके लिए एक उदात्त आठ सूत्री कार्यक्रम है। जीवन का अंतिम लक्ष्य निर्वाण, अर्थात् इस सांसारिक आवागमन से मुक्ति है।'

अपने जीवन का जो कार्य बुद्घ ने जो कार्य बुद्घ ने निर्धारित किया, उसके लिए उन्होंने सारे उत्तरी भारत को मथ डाला। केवल वर्षा काल के चातुर्मास (जैसी परंपरा थी) एक स्थान पर व्यतीत किए। जहां वह रहे, उन स्थानों की सूची और उस समय के उनके उपदेश बौद्घ परंपरा में सुरक्षित हैं। प्रति स्थान पर प्रभावशाली और संपन्न व्यक्ति जुड़े, उनके शिष्य बने। उन्होंने बौद्घ बिहारों के लिए स्थार दिया। मगधराज बिंबिसार को राजगृह में उपदेश दिया, जिनसे वेणुवन नामक उद्यान बौद्घ संघ को प्राप्त हुआ और एक प्रमुख केन्द्र बना। प्रारंभ में जितने भी अर्हत् (परम ज्ञानी) शिष्य हुए, बुद्घ ने उन्हें सभी दिशाओं में प्रचारार्थ भेजा। गणराज्यों की परंपरा पर आधारित बौद्घ संघ का गठन किया। वहां पखवारे में निराहार व्रत के लिए सभी भिक्षु- भिक्षुणी अपने विहार में इकट्ठा होकर सभी नियमों का पाठ करते। उसके आठ विभागों में से प्रति विभाग के बाद सबसे पूछा जाता,
"क्या आप सभी इन दोषों से शुद्घ हैं?”
भिक्षु द्वारा व्यतिक्रम होने पर प्रायश्चित्त अथवा दंड की व्यवस्था होती।

बुद्घ की दिनचर्या उनके मौन, एकांत-प्रेमी और मननशील मन के अनुरूप थी। प्रात: नित्यकर्म के बाद एकांत आसन और ध्यान। भिक्षा के समय कभी अकेले और कभी भिक्षुओं के साथ और निमंत्रण पर घर जाकर भोजन तथा उपदेश । लौटने पर भिक्षुओं को उपदेश के बाद स्वल्प विश्राम, फिर दर्शनार्थियों को उपदेश। सायं स्नान-ध्यान के बाद भिक्षुओं की समस्याएं हल करते। कहते हैं कि वह रात्रि को देवताओं के प्रश्नों के उत्तर देते और दिव्य चक्षुओं से संसार का अवलोकन कर विश्राम करते। दया की प्रतिमूर्ति, जिसकी कहानियां 'जातक' में संग्रहीत हैं। विहार में रहते हुए प्रतिदिन रूग्ण भिक्षुओं को देखते। उपेक्षित रोगी की सेवा करते। उन्होंने कहा,
'इनकी सेवा मेरी सेवा है।'
उनका तथा संघाराम का अनुशासन राजाओं के आश्चर्य की वस्तु थी। पर यह बुद्घ के असीम स्नेह और उनके प्रति समादर एवं प्रतिष्ठा तथा सबकी निष्ठा का फल था। वह महान् व्यक्तित्व के धनी थे, जिन्होंने दुर्दांत दस्यु 'अंगुलिमाल' और बच्चों को खाने वाली राक्षसी को भी वश में किया।

उनका वैचारिक स्वतंत्रता का समर्थन उन्हें आधुनिक युग के समकक्ष खड़ा कर देता है। इसी से भागवत पुराण में कहा गया कि वह अपने तर्कों द्वारा लोगों को मोहित कर लेंगे। उन्होंने अपनी पालनकर्त्री मौसी महाप्रजापति गौतमी और आनंद के कहने पर स्त्रियों को भी संघ में स्थान दिया और भिक्षुणी संघ बना। सभी वर्णों (जातियों) और वर्गों के लोगों को उन्होंने अपना शिष्य बनाया। विद्या प्राप्त तथा आचरण-शुद्घ व्यक्ति ही उनके समक्ष ब्राम्हण कहलाने का अधिकारी था। उन्होंने समाज में जाति-पांत के परे समता की प्रतिष्ठा की। कहा, 'अपराध का दमन केवल दंड देने से नहीं होता। दरिद्रता अनैतिकता और अपराध को जन्म देती है। आर्थिक दशा तथा मन का सुधार अपराध का स्थायी उपाय है।' उनके लिए आंतरिक ज्ञान तथा परसेवा ही परमार्थ बना।

निर्वाण के पहले चातुर्मास में वे बीमार पड़े। आनंद की शंका पर उन्होंने कहा,
'मैंने धर्म का उपदेश दिया। अब अस्सी वर्ष की आयु में मेरी इच्छा आगे संघ का नेतृत्व करने की नहीं।'
अंत में पावा ग्राम में वे रक्तातिसार से ग्रसित हुए। बीमारी में ही वे कुशीनगर के लिए चल पड़े और उसके पास शालवन में लेट गए। वहीं अंतिम उपदेश दिया। भिक्षुओं से कहा,
'मैंने जो शिक्षा दी तथा 'धर्म' (सिद्घांत) बताया, आगे वही तुम्हारा शासक होगा।'
गणतंत्र पद्घति के अनुसार उन्हें कार्य करने को कहा। छोटे-मोटे परिवर्तन करने की छूट संघ को दी और कुछ दशा में ब्रम्हदंड का भी विधान किया। उन्होंने तीन बार पूछा,
'कोई शंका है क्या, जिसका निराकरण मुझसे चाहते हो?'
सबके चुप रहने पर उन्होंने कहा,
'सब अनित्य है। धर्म (उद्देश्य) को अध्यवसायपूर्वक प्राप्त करो।'

अंग्रेजी में, गौतम बुद्ध की जीवनी यहां सुने।
यह दोनो चित्र विकिपीडिया से और उसी के शर्तों में प्रकाशित हैं।

कालचक्र: सभ्यता की कहानी
०१- रूपक कथाऍं वेद एवं उपनिषद् के अर्थ समझाने के लिए लिखी गईं
०२- सृष्टि की दार्शनिक भूमिका
०३ वाराह अवतार
०४ जल-प्‍लावन की गाथा
०५ देवासुर संग्राम की भूमिका
०६ अमृत-मंथन कथा की सार्थकता
०७ कच्‍छप अवतार
०८ शिव पुराण - कथा
०९ हिरण्‍यकशिपु और प्रहलाद
१० वामन अवतार और बलि
११ राजा, क्षत्रिय, और पृथ्वी की कथा
१२ गंगावतरण - भारतीय पौराणिक इतिहास की सबसे महत्‍वपूर्ण कथा
१३ परशुराम अवतार
१४ त्रेता युग
१५ राम कथा
१६ कृष्ण लीला
१७ कृष्ण की सोलह हजार एक सौ रानियों
२० बौद्ध धर्म
२१ जैन धर्म
२२ सिद्धार्त से गौतम बुद्ध तक का सफर
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2 comments:

  1. बहुत सुंदर वर्णन किया है । एक बार फ़िर उस महान आत्मा की याद हो आई है । बुद्ध एक धर्मगुरु कम और वैज्ञानिक अधिक थे । उनका विशुद्ध दार्शनिक चिंतन व्यव्हार की कसौटी पर भी एकदम खरा उतरता है । अगर हम उसे अपने जीवन में न उतार पायें तो ये हमरी ही निर्बलता है। भारत से बौद्ध धर्म का लुप्त हो जाना एक अच्छा सूचक है , क्योंकि अब हम बुध को एक दार्शनिक चिन्तक की तरह स्वीकार कर सकेंगे । अब बुध की पहुँच सभी तक है ,और वो भी किसी धर्म(संप्रदाय ) के दायरे में बंधे बिना ।बुध को आधुनिक कलाकारों और चिंतकों ने अपनी रचनाओं में खूब स्थान दिया है। यह एक अच्छा संकेत है ।बुध सत्य के लिए थे ।सत्य का अनुरागी बुध से हमेशा प्रेम करेगा। मेरा मन भी उस महात्मा के प्रेम से सराबोर है।

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  2. गौतम बुद्ध के बारे में हम क्या कह सकते हैं.... वो तो करुना के सागर हैं

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