Sunday, August 30, 2009

आर्यान (ईरान)

प्राचीन काल में भारत और ईरान (प्राचीन नाम आर्यान : आर्य देश) की सभ्यताओं का सहोदर नामा रहा है। वहाँ के खुर्द (Kurd) लोगों में आज भी एक कहावत प्रचलित है-'खुर्दी हिंदी भ्रा' (खुर्दी हिंदी भाई) ये अपने आपको आर्यों की छोटी शाखा 'खुर्दी' कहते हैं। सात-साठ सौ वर्ष पहले ये मुसलमान हो गए; पर अग्नि को साक्षी मान विवाह-पद्घति बहुत दिनों तक चलती रही। ईरान भारत के पारसी समाज का भी मूल स्थान है। इसका उत्तरी भाग कैकेय प्रदेश है और दक्षिणी 'एलम', जहाँ की कभी राजधानी 'सुसा' नगरी थी (यहां देखें)। ईरान की इस प्राचीन आर्य सभ्यता का (जिसे इतिहासकार इंडो-यूरोपियन भी कहते हैं) भारत से ऐसा सादृश्य था कि कुछ पुरातत्वज्ञों ने अनुमान लगाया था कि आर्य कश्यप सागर तथा अरल सागर के बीच अथवा वक्षु नदी (Oxus) के आसपास के निवासी रहे होंगे, जहाँ से वे ईरान और भारत में फैले। बृहत्तर भारत, गांधार जिसका भाग था और जो उत्तर अरल सागर तक फैला था, की सीमा से लगा हुआ यह ईरान नाम का प्राचीन आर्य देश ही है। यह स्पष्ट है कि प्राचीन काल में भारत से लगे इस देश की सभ्यता एवं संस्कृति, उनके रीति-रिवाज, उनके आचार-व्यवहार और नैतिक, सामाजिक एवं धार्मिक विचार सभी भारत से प्रभावित थे।

अमृत-मंथन की कथा के संदर्भ में 'सुर' और 'असुर' शब्दों की विवेचना (यहां देखें) की गयी है। ऋग्वेद में ये दोनों शब्द देवताओं के अर्थ में प्रयुक्त हुए हैं। पहले प्राकृतिक शक्तियों (सूर्य, वायु, अग्नि, आकाश तथा इंद्र आदि) 'सुरों' से ऋद्घि-सिद्घि की याचना की है। बाद में अमूर्त देवताओं की कल्पना है, जिन्हें 'असुर' संज्ञा दी। कालांतर में देवों के उपासक और असुरों के उपासक- दो संप्रदाय हो गए। संभवतया असुरों के उपासक लौकिक उन्नति (और विज्ञान) की ओर अधिक ध्यान देते थे, जबकि देवों के उपासक आध्यात्मिक पहल (मानविकी) पर। यह 'असुर' ही फारसी में 'अहुर' है। उनके प्रमुख देवता 'अहुर-मज्दा' हैं। पारसी धार्मिक साहित्य 'जेंदावेस्ता' (संस्कृत : छंद-व्यवस्था) (Zenda-vesta)  के प्राचीन 'यष्ट' भाग ऋग्वैदिक मंत्रों की छाया समान हैं। मूल फारसी और संस्कृत मंत्रों को, उच्चारण और लिपि की भिन्नता दुर्लक्ष्य कर, देखा जा सकता है। फारसी और संस्कृत भाषाएँ एक ही कुटुंब की हैं। उच्चारण तथा अपूर्ण (अरबी) लिपि अपनाने से भाष्य में अंतर आया। इतिहास बताता है कि मूल 'जेंदावेस्ता' लोप होने पर उनके पैगंबर 'जरथ्रुष्ट्' (Zorathrusthra) ने उसका पुनर्निमाण अपने उपदेशों को मिलाकर किया। वह भी जल गया और अब कुछ अंश नई मिलावट लिये शेष हैं (यहां देखें)।

विक्रम संवत् पूर्व से ईरानी अपने को आर्य कहते चले आए हैं। उनकी पवित्र पुस्तक 'जेंदावेस्ता' में भी उन्हें आर्य कहा गया। उनके देवता, सामाजिक जीवन तथा जरथ्रुष्ट् के विचार भारत के वैदिक आर्यों के समान हैं। ऋग्वेद तथा अवेस्ता दोनों ही 'वरूण' को देवताओं में बड़ा मानते थे। दोनों में वरूण ने 'मित्र' (सूर्य) को, जिसे ईरान में 'मिथ्र' कहते थे, प्रतिनिधि बनाया। 'मागी' ( उस समय का पुजारी वर्ग) से ईरानियों ने अग्नि-पूजा सीखी। उसे वेदी पर सदा प्रज्वलित रखना और यज्ञ (यरन) प्रमुख धार्मिक कर्तव्य बना। ऎसे ही 'यिम' ('यम') उनका मृत्यु का देवता था जो कर्मों का लेखा-जोखा रखता और पापियों को दंड देता। उसी प्रकार जनेऊ (कस्सी) (जो वहाँ कमर में पहना जाता था) धारण करने की प्रथा थी।ईरान के नगरों का नियोजन भी सारस्वत सभ्यता के समान था। उनकी यह सभ्यता (और धर्म) सारस्वत अथवा वैदिक आर्यों की सभ्यता ही उन परिस्थितियों में थी।


प्राचीन सभ्यताएँ और साम्राज्य

०१ - सभ्यताएँ और साम्राज्य
०२ - सभ्यता का आदि देश
०३ - सारस्वती नदी व प्राचीनतम सभ्यता
०४ - सारस्वत सभ्यता
०५ - सारस्वत सभ्यता का अवसान
०६ - सुमेर
०७ - सुमेर व भारत
०८ - अक्कादी
०९ - बैबिलोनिया
१० - कस्सी व मितन्नी आर्य
११ - असुर जाति
१२ -  आर्यान (ईरान)

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