शनिवार, नवंबर 18, 2006

भौतिक जगत और मानव-१

कालचक्र: सभ्यता की कहानी
संक्षेप में
प्रस्तावना

वसंत ऋतु की यह सुहावनी अँधेरी रात्रि। आओ, बाहर निकलकर देखें। अभी आठ बजे हैं और रात्रि प्रारंभ हुई है। सारे आकाश में तारे छिटके हुए हैं। यह अनंताकाश और इसमें टिमटिमाते आसमानी दीपक, इन्‍होंने कितनी सुंदर कवि- कल्‍पनाओं को जन्‍म दिया है। प्राचीन काल में हमारे पूर्वजों ने इस आकाश के गोले यानी खगोल (celestial sphere) को देखा था और इसमें चित्रित अनेक तारा समूह, जिन्‍हें उन्‍होंने नक्षत्र (constellation) की शंज्ञा दी, देखकर भिन्न-भिन्न आकारों की कल्पनाऍं की थीं। उन्हीं आकारों से या उनमें स्थित प्रमुख तारे के नाम से ये नक्षत्र पुकारे जाने लगे। तारे और नक्षत्रों के ये नाम भारतीय ब्रम्हांडिकी (Cosmology) की देन है।

जैसे-जैसे पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है, तारे पूर्व से पश्चिम की ओर चक्कर काटते दिखाई पड़ते हैं। आकाश में रविमार्ग अर्थात पृथ्वी का केन्द्र, जिस समतल में सूर्य के चारों ओर घूमता है, उसका खगोल (आकाशीय गोले) पर प्रक्षेपण ‘क्रांतिवृत्त’ कहलाता है। इस आकाशीय मार्ग (क्रांतिवृत्त) को १२ बराबर भागों में बॉंटा गया है, जिन्हें राशियां कहते हैं। पूरे वृत्त में ३६० अंश होते हैं, इसलिए प्रत्‍येक राशि ३० अंश की है। यह क्रांतिवृत्‍त २७ नक्षत्रों से गुजरता है और इस प्रकार एक राशि में सवा दो नक्षत्र हैं। ये सभी भारतीय गणनाऍं हैं।

अभी आकाशमंडल के शिरोबिंदु से दक्षिण-पश्चिम में मृगशिरा नक्षत्र (Orion)है, जो आकाश के सबसे मनोहर दृश्यों में से एक है। इसे देहात में ‘हिरना-हिरनी’ कहते हैं। इसमें तीन तारों का एक कटिबंध है और उत्‍तर की ओर है एक लाल तारा ‘आर्द्रा’, तथा दक्षिण में एक चमकदार नीला तारा। कटिबंध एवं पश्चिम के तारे मानो मृग का सिर है और लटकते तीन तारे खूँटा और रस्सी हैं, जिससे वह मृग बंधा है। यह रस्सी खूँटे की रेखा दक्षिण क्षितिज को दक्षिणी बिंदु पर काटती है। इसके पूर्व मिथुन राशि में दो चमकते तारे हैं—‘पुनर्वसु’ एवं ‘कस्तूरी’। उसके पूर्व कर्क राशि में ‘पुष्य’ और ‘अश्लेषा’ हैं तथा उसके भी पूर्व सिंह राशि में ‘मघा’ तारे का उदय हो चुका है। मृगशिरा नक्षत्र के पश्चिम में है रोहिणी नक्षत्र तथा उसी नाम का तारा। उसके पश्चिम दिख रही हैं कृत्तिकाऍं (Pleiades), छोटे-छोटे तारों से भरा एक छोटा सा लंबा-तिकोना पुंज, जिसे देहात में ‘कचबचिया’ कहते हैं। इन्‍हें छोड़ उत्‍तर की ओर दृष्टि डालें तो ध्रुव तारा है और उसके कुछ दूर पूर्व में उदित हुए सप्तर्षि, जिन्हें पहले ऋक्ष ( इसी से अंग्रेजी में Great Bear) कहते थे। इनका चौखटा ऊपर निकल आया है और तीन तारों के हत्थे का अंतिम तारा उदित होने जा रहा है। हत्थे के बीच का तारा ‘वसिष्ठ’ है। उसी के बिल्‍कुल समीप बहुत मद्धिम ‘अरूंधति’ है। चौखटे के ऊपरी दो तारे सीधे ध्रुव तारे की ओर इंगित करते हैं। ध्रुव तारे से नीचे क्षितिज की ओर सप्तर्षि के आकार की ही ऋक्षी (Little Bear) है, जिसके हत्थे का अंतिम तारा ध्रुव है। वैसे ही प्रभात में पॉंच बजे शीर्ष स्थान से कुछ पश्चिम दो ज्वलंत तारे ‘स्वाति’ एवं ‘चित्रा’ क्रमश: थोड़ा उत्तर व दक्षिण में दिखाई देंगे। शीर्ष स्थान के आसपास ‘विशाखा’ नक्षत्र के चार तारे मिलेंगे और पूर्व-दक्षिणी आकाश में वह बिच्छू की शक्ल, वृश्चिक राशि। इस बिच्छू के डंक का चमकीला तारा ‘मूल नीचे की ओर है पर आकाश में सबसे चमकदार तारा ‘ज्येष्ठा’ पास अपनी लाल छवि दिखा रहा है। उसके पश्चिम, जहाँ से बिच्छू के मुख के पंजे प्रारंभ होते हैं, है ‘अनुराधा’।

रात्रि को मृगशिरा के दक्षिण में जिसका आभास-सा दिखेगा, वह गरमी में और भी स्पष्ट, आकाशगंगा की ‘दूध धारा’ (the Milky Way) है। अगणित तारे इस आकाशीय दूध धारा के अंदर दिखते हैं। आकाश गंगा में फैले अगणित तारापुंज हमारी नीहारिका (Galaxy) बनाते हैं। कैसा है यह रंगमंच, जिसके अनंताकाश के धूल के एक कण के समान इस पृथ्वी के अंदर जीवन का उदय हुआ, जिसकी यह कहानी है।

यह नीहारिका [‘दूध धारा’ (the Milky Way)] अधिकांशत: आकाश या शून्यता है, जिसमें अचानक कहीं छोटे से जलते प्रकाश-कण के समान विशाल और लगभग अपरिमित दूरी के बाद तारे मिल जाते हैं। जिस प्रकाश की गति लगभग तीन लाख किलोमीटर प्रति सेकेंड है उसे भी निकटस्थ तारे से पृथ्वी तक आने में साढ़े चार वर्ष और दूर के तारों से तो लाखों वर्ष लगते हैं। कहते हैं कि हमारी नीहारिका एक-दूसरे से ढकी दो तश्तरियों के समान एक दीर्घवृत्तज (ellipsoid) है, जिसके किनारे आकाश गंगा के रूप में दिखते हैं। इसी से संस्कृत में इसे ‘ब्रम्हांड’ कहा गया। आज विज्ञान कहता है कि इन तारों का रहस्य मानव उसी प्रकार जान रहा है जैसे सागर तट पर बालू के कुछ लोकोक्ति कण उसके हाथ पड़ गए हों। इससे समझ सकते हैं कि भारतीय ब्रम्हांडिकी की देन कितनी बड़ी है।

उन [तारों] की दूरी का पता लगाना भी ‘लंबन सिद्धांत’ (parallax) पर आधारित है। रेलगाड़ी में हम यात्रा कर रहे हों तो खिड़की से दिखता है कि पास के पेड़, खंभे या मकान हमारे विरूद्ध दौड़ रहे हैं, और दूर की वस्तुऍं हमारी ही दिशा में। पृथ्वी भी वर्ष में दो बार—अर्थात२२ जून को, जब दिन सबसे बड़ा तथा रात्रि सबसे छोटी होती है और २२ दिसंबर को, जब दिन सबसे छोटा और रात्रि सबसे बड़ी होती है - अपने सूर्य के चारों ओर दीर्घवृत्त कक्षा के दो दूरस्थ बिंदुओं (पात: elliptical nodes)पर रहती है। इन दोनों बिंदुओं से तारों का लंबन नापकर उनकी दूरी की गणना की गई। भारतीय गणितज्ञ भी इस सिद्धांत से भलीभांति परिचित थे।

कुछ युग्म तारे (double stars) हैं। एक भीमकाय तारे के साथ एक वामन तारा एक-दूसरे का चक्कर काट रहे हैं। उभयनिष्ठ परिभ्रमण में जब भीमकाय सूर्य तारे और पृथ्वी के बीच यह काला एवं अंध वामन तारा आ जाता है तो प्रकाश कुछ धीमा पड़ जाता है। यह काला वामन भीमकाय सूर्य की तुलना में सदा बहुत छोटा, पर अत्यधिक सघन होता है। सप्तर्षि मंडल में उल्लिखित वसिष्ठ और अरूंधति (वसिष्ठ पृथ्वी के पास एवं अरूंधति बहुत दूर), दोनों ऐसे ही युग्म तारे हैं।

कहीं-कहीं अपारदर्शी भीमकाय काले गड्ढे आकाश में दिखाई पड़ते हैं। ये काले छिद्र (black holes) (या ‘कालछिद्र’ इन्हें कहें क्या ?) संभवतया ऐसे पदार्थ या तारे हैं जो प्रकाश-कण को भी आकर्षित करते हैं, अर्थात प्रकाश-कण (photons) उससे बाहर नहीं निकल सकते। कहते हैं कि इन तारों की एक चम्मच धूलि इतनी सघन है कि वह इस पृथ्वी के लाखों टन द्रव्यमान (mass) के बराबर है। इन ‘कालछिद्रों’ के अंदर कैसा पदार्थ है, हम नहीं जानते।किस भयंकर ऊर्जा-विस्फोट के दाब ने परमाणु की नाभि (nucleus) और विद्युत कणों (electrons) को इस प्रकार पीस डाला कि ऐसे अति विशाल घनत्व के पदार्थ का सृजन हुआ? वहॉं पर भौतिक नियम, जैसे हम जानते हैं, क्या उसी प्रकार क्रिया करते हैं ? और ‘काल’ की गति वहॉं क्या है, कौन जाने।

हम जानते हैं कि संसार में निरपेक्ष स्थिरता या गति नहीं है। सभी सापेक्ष र्है। आकाशीय पिंडों में कोई ऐसा नहीं जिसे हम स्थिर निर्देश बिंदु मान सकें। यह प़ृथ्‍वी अपने अक्ष पर घूम रही है, जिससे दिन-रात बनते हैं। यह सूर्य के चारों ओर अपनी कक्षा में घूमती है। इसका अक्ष भ्रमण कक्षा के समतल पर लंब (perpendicular) नहीं, पर लगभग २३.२७ अंश का कोण बनाता है। इससे ऋतुओं का सृजन होता है। यजुर्वेद (२००० संवत पूर्व) के अध्याय 3 की कंडिका छह में कहा गया है- ‘यह पृथ्वी अपनी कक्षा में सूर्य के चारों ओर अंतरिक्ष में घूमती है जिससे ऋतुऍं उत्पन्न होती हैं।‘ इसी प्रकार सभी ग्रह सूर्य के चारों ओर घूम रहे हैं। उनकी कक्षाओं में भी कोणीय गति है। इनके अक्ष भी कहीं-कहीं टेढ़े नाचते हुए लट्टू के अक्ष की भॉंति घूमते हैं।

सूर्य सौरमंडल सहित अपनी नीहारिका, आकाशगंगा में अनजाने पथ का पथिक है। यह नीहारिका भी घूम रही है अनजाने केंद्र के चारों ओर। संभवतया यह केंद्र ऋग्‍वैदिक ‘वरूण’ है। लगभग ८० करोड़ सूर्य इस नीहारिका में है। तारे, जो शताब्दियों के खगोलीय वेध के बाद ऊपरी तौर पर स्थिर दिखते हैं, अज्ञात पथ पर चल रहे हैं। इन हलचलों के गड़बड़झाले के बीच कौन कह सकता है, क्या गतिमान है और क्या स्थिर। सभी गति सापेक्ष हैं और सारा ब्रम्हाण्ड आंदोलित है।

गुरूत्वाकर्षण, जो पदार्थ मात्र का गुण है,सदा से वैज्ञानिकों के लिये एक पहेली रहा है। वैशेषिक दर्शन (२००० विक्रमी पूर्व) में इसका उल्लेख आया है। आज भी यह पहेली अनबूझी है और प्रकृति का यह नियम है, कहकर हमने छुट्टी पा ली है। पर हम जानते हैं कि चुंबकीय या विद्युतीय आकर्षण (attraction) और अपकर्षण (repulsion) दोनों होते हैं। गुरूत्‍वाकर्षण और त्वरित गति (acceleration) दोनों के प्रभाव समान हैं। अत: ऐसे ही क्या कहीं कोई विलोम-द्रव्‍य (anti-matter) है, जिसका प्रभाव अपकर्षण होगा ? यह जादुई द्रव्य अभी मिला नहीं।

साधारणतया पृथ्वी पर हम आकाशीय समष्टि (space) की तीन विमाओं (dimensions) का जगत जानते हैं; पर सापेक्षिकता सिद्धांत इसमें एक नई दिशा, विमा जोड़ देता है ‘समय’ (time) की। इस दिक-काल (space-time) के चतुर्विमीय ताने-बाने में यह संसार बुना हुआ है। गतिमान जगत में कहीं पर भी समय निर्धारण करने पर ही हमें किसी ( आकाशीय) पिंड की सही स्थिति का ज्ञान हो सकता है। पर ‘काल’ विचित्र विमा है। समष्टि की तीन विमाओं में आगे-पीछे, ऊपर-नीचे, सभी ओर जा सकते हैं; पर ‘काल’ या ‘समय’ सदैव एक ओर प्रवाहित होता है। यह अटल है। बीता हुआ समय फिर कभी वापस नहीं आता। (चाहे जैसी कल्पनाऍं विज्ञान कहानियॉं कर लें।) उसकी यह कैसी अक्षय,अनंत गति है, कौन सा भयानक रहस्य इसमें बँधा है? इसने प्राचीन काल से दार्शनिकों को विमोहित किया है। आज तक इसकी गुत्थी पर जितना विचार हुआ, यह उतनी ही उलझती गयी। ‘काल’ के मूलभूत स्वरूप के बारे में उसकी प्रकृति एवं क्रियाओं पर सोचते हुये भारतीय चिन्तकों ने भौतिकी ( Physics) से पराभौतिकी (Metaphysics) में अतिक्रमण किया है। अंततोगत्वा यह कोरे सिद्धान्तवाद के कल्पना विलास में विलीन हो जाता है। पर इतिहास समय के साथ ग्रथित है।

सूर्य, जिसे हमने जीवन का दाता कहा, अनन्य ऊर्जा केन्द्र है। यह पीला तारा है, तारों के विकास-क्रम में प्रौढ़। यह पृथ्‍वी से लगभग १५ करोड़ किलो मीटर दूर एक आग का गोला है, जहां तप्त-दीप्त धातुओं के वाष्प बादल हिरण्यगर्भ में घुमड़ते रहते हैं। वहाँ से प्रकाश की किरण को पृथ्वी पर आने में लगभग 9 मिनट लगते हैं। सौरमंडल में सूर्य के प्रकाश से आलोकित दस ग्रह एवं अनेक ग्रहिकाऍं हैं, जो दीर्घवृत्त (ellipse) कक्षा में उसकी नाभि पर स्थित सूर्य की परिक्रमा कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त हैं अंतरिक्ष से प्रेत की भॉंति पूँछ फटकारते कभी-कभार आने वाले और आदि मानव को भय-विकंपित करने वाले धूमकेतु या पुच्छल तारे।

अंतरिक्ष कैसी विस्तृत शून्यता से व्याप्त है, यह एक नमूना खड़ा करने से समझ में आ सकता है। यदि पृथ्वी की कल्पना ढाई सेंटीमीटर व्यास की एक छोटी गेंद से करें तो सूर्य २८० सेंटीमीटर व्यास का एक गोला उस ढाई सेंटीमीटर की पृथ्वी से २९,४४३ सेंटीमीटर दूर होगा। इसी प्रकार दो मटर के दानों के समान ग्रह बुध (Mercury) एवं शुक्र (Venus) ११,३४० तथा २१,२१४ सेंटीमीटर दूर होंगे। पृथ्वी की कक्षा के बाहर लाल ग्रह मंगल (Mars), नील ग्रह बृहस्पति (Jupiter), वलयित शनि (Saturn), उरण ( Uranus), वरूण ( Neptune), हर्षल ( Herschell) तथा यम (Pluto) उससे क्रमश: ४४६, १,५८८, २,८०४, ५,६४१, ८,८३९, १०,००० (?) तथा १२,४६२ मीटर दूरी पर होंगे। चंद्रमा उपग्रह पृथ्वी से ३६ सेंटीमीटर की दूरी पर मटर के एक छोटे दाने के समान रहेगा। और कुछ अन्य ग्रहिकाएँ, जो लाल ग्रह मंगल एवं नीलग्रह बृहस्पति के बीच सूर्य का चक्कर लगाती हैं, केवल धूलि कणों के समान दिखेंगी। निकटस्थ तारा तो इस पैमाने पर ६४,४०० किलोमीटर दूर होगा और बहुतांश तारे इस छोटे नमूने में करोडों किलोमीटर दूर होंगे। बीच में और चारों ओर मुँह बाए मानो समष्टि की अगाध शून्यता खड़ी है—निष्प्राण, निर्जीव, ठंडी, केवल रिक्तता। कैसा आश्चर्य है कि इस रिक्तता, अर्थात शून्य आकाश और अंतरिक्ष का भाव सुदूर अतीत में भारतीय चिंतकों के मन में आया।

यह संसार, चराचर सृष्टि कैसे आई, यह गुत्थी आज भी रहस्य की अभेद्य चादर ओढ़े खड़ी है। भारतीय दर्शन का कहना है कि जब संसार में एक ही तत्व था तब वह जाना ही नहीं जा सकता था। ऐसी दशा में न जाननेवाला कोई था, न जो जानी जाय वह वस्तु थी। ब्रम्हांडिकी का आदि सूत्र नासदीय सूक्त है - ‘नासदासीन्नो सदासीत्तदानीम‘। तब कोई अस्तित्व (existence) न था, इसलिये अनस्तित्व (non-existence) भी न था।‘ उस साम्यावस्‍था में आदि पदार्थ (primordial matter) में असंतुलन (imbalance) उत्पन्न होने के कारण भिन्न-भिन्न पदार्थ या पिंड निर्मित हुये। इसी से सृष्टि उत्पन्न हुई (‘सदेव सौम्‍य ! इदमग्रमासीत’)। जब विमोचन होता है तो सृष्टि होती है और जब संकोचन होता है, सब कुछ किसी नैसर्गिक प्रचंड शक्ति के दबाव से सूक्ष्म बनाता है तो प्रलय। आज कुछ वैज्ञानिक विश्वास करते हैं कि ब्रम्हांड किसी मध्यमान के दोनों ओर स्पंदित है और इस समय विस्तार की अवस्था में है। जड़ जगत के निर्माण की यह परिकल्पना (hypothesis) आज भी अपने ढंग की अनूठी है।

रविवार, अक्टूबर 29, 2006

प्रस्तावना ... कालचक्र: सभ्यता की कहानी

कालचक्र: सभ्यता की कहानी
संक्षेप में

भारत में आपात-स्थिति के घने अंधकार में मेरी निरूद्धि के समय एक दिन पुत्री जया भेंट करने आयी। कहने लगी, ‘
’हमारे बचपन में आप हमको अपने छोटे बाबाजी द्वारा वर्णित प्रसंग कभी बताते थे। वे कहानियां हम सबको भाती थीं। आजकल वकालत के व्यस्त जीवन से कुछ छुट्टी मिली। अब वे कथायें लिख लें।‘’
इस प्रकार प्रारंभ हुई मानव के विचारों की, संस्कृति की यह गाथा, जो पुस्तकाकार में प्रस्तुत है। सामान्य पाठक के लिये यह कहानी के रूप में ( और इसलिए बहुत सी तिथियों एवं संदर्भो का उल्लेख न करते हुए) लिखी गई है।

मेरे छोटे बाबाजी, चौ. धनराज सिंहजी, इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्रतिष्ठापूर्वक स्नातक परीक्षा पास करने के बाद आगरा में उस विद्यालय के प्रथम प्रधानाचार्य बने, जो अब बलवंत राजपूत कालेज, आगरा के नाम से जाना जाता है। दो वर्ष के बाद उनकी सीधी नियुक्ति प्रांतीय प्रशासनिक सेवा में हो गई। पुरातत्व उनकी अभिरूचि का विषय था, उनका व्यासंग भी कह सकते हैं। जिस जिले में तैनाती हुई, वहां के पुरातत्व स्थल उन्होंने खोजे, उनकी कहानियां जानीं। सरकारी सेवा से अवकाश के बाद उनका पूरा समय इस अध्ययन में बीता। सभी पुराण, वेद, प्राचीन सभ्यताओं की दंतकथाएं एवं कहावतें, संसार के मानचित्र में फैले भारत का स्मरण दिलाते अवशिष्ट चिन्‍ह। आश्चर्य कि भाषा-शास्त्र के माध्‍यम से वे पुरातत्व के विद्यार्थी बने और अनेक देशों की पौराणिक आख्यायिकाओं और दंतकथाओं के अंदर ऐतिहासिक विषय-वस्तु खोजने का नियम निकाला और रामायण एवं महाभारत काल का एक ऐतिहासिक ढाँचा खड़ा करने का प्रयत्न किया। वे कहा करते थे कि इनमें अनेक स्थानों एवं घटनाओं का वर्णन बृहत्तर भारत ही नहीं, उसके बाहर का हो सकता है, इसलिए संसार के रंगमंच पर उनकी लीलास्थली खोजें।

उनके भाषा-विज्ञान और फिर पुरातत्व में धँसने का संदर्भ दूसरे अध्याय में है। उन्होंने कई सहस्त्र अंग्रेजी और हिन्दी अथवा ठेठ देहाती, एक ही ध्वनि के, पर्यायवाची शब्द खोज निकाले। उनके पास लगभग नब्बे वर्ष पुरानी जागतिक महायुद्ध के पहले की भू-चित्रावली (एटलस) थी। उसमें वर्णित स्थानों, नदियों, पर्वतों के संस्कृत नाम उन्होंने निकाले तथा वहां की किंवदंतियों और जनश्रुतियों से उन्हें प्रमाणित किया। उनकी दुर्लभ हस्तलिपियां कुछ शोधछात्र ले गए और दुर्भाग्यवश कालांतर में वे विलीन हो गईं। उनके साथ बृहत्तर भारत में छितरा महाभारत एवं रामायण काल के इतिहास का ढाँचा भी खो गया। जो उनके लिखे नोट, स्मरण-पत्रक आदि हैं, उनके आधार पर पुन: आज प्राचीन सभ्यताओं का इतिहास लिखने का कार्य कोई न कर सका।

मेरे विद्यार्थी जीवन में कभी-कभी वे दूर देशों की, प्राचीन सभ्यताओं की कहानियॉं सुनाते, पर हम सब सुनी-अनसुनी कर देते। हममें धैर्य कहॉं। एक बार ‘मत्स्यपुराण’ से उन्होंने बताना शुरू किया, जब माया नगरी ( हरिद्वार) में प्रभात होता है तो कुबेर की नगरी मेंदोपहर और सुषा नगरी में रात्रि का तीसरा प्रहर। फिर पूछा, क्या आधुनिक बीजिंग कुबेर की नगरी हो सकती है ? ईरान की सुषा नगरी की जानकारी हमें है, जिसके ध्वंसावशेष एक बड़े क्षेत्र में फैले हैं। उन्‍होंने संसार भर में पुराणों मेंउल्लिखित नगरों को खोजा। कितने ही ऐतिहासिक नगर पुरानी भू-चित्रावली में भारत के बाहर दिखाए।

बाद में जब मैं प्रयाग उच्च न्यायालय में वकालत करने आया, उसके कुछ वर्ष बाद एक दिन उन्होंने मुझसे कहा,
‘’देखो, मैंने एक बड़ी गलती की थी। एक बार विदेशी पुरातत्वशास्‍त्री (संभवतया वैदेल के कोई शिष्य) मिलने आए थे। वह अनेक बातें पूछते रहे। मैंने उन्हें यह सोचकर अपना शोधकार्य एवं उसके परिणाम नहीं बताए कि वे उसका कहीं दुरूपयोग न करें। परंतु यह ठीक न था। बाद में लगा, केवल विदेशी होने से शंका करना भारतीयत्व नहीं। मुझे बताना चाहिए था।‘’
भारतीय दृष्टि से संपूर्ण ज्ञान जनता की संपत्ति है।

जब बांदा में वकालत करता था तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आया। तब मुझे एक नई दृष्टि मिली। जो बाबाजी कहते थे और जिसमें कुछ को उनकी सनक समझता था, वह नए ढंग से समझ में आने लगा। और फिर सन १९३५ के संघशिक्षा वर्ग में एक प्रारंभिक विषय मुझे पकड़ा दिया गया । उसे उपयुक्त शीर्षक के अभाव में मैंने प्रारंभ किया-‘ भारत की यशोगाथा संसार के इतिहास ने गाई है।‘ इस पुस्तक की भूमि बाबाजी ने बनाई तो बीज उस बौद्धिक में निहित था।

आपात स्थिति की काली रात्रि समाप्त हुयी। पर जिस तरह के भाषण, घटनाऍं एवं दंगे देश-विभाजन के पहले थे, अब उन्हें पुन: उभरते देखता हूँ। यह अत्यंत क्लेशदायी है और जब राजनेता क्षुद्र स्वार्थो के लिए देश, धर्म एवं संस्कृति की बलि चढ़ाने को तैयार होते हैं, जनता को धोखा देते हैं तो मन और भी विषाद से भर जाता है। वे चार अध्याय लिखे रह गये। लेकिन अब एक बार पुन: मन में उसे पूरा करने का विचार उठा। साथ ही इतिहास का सही मूल्‍यांकन, जो मैंने सन १९३२ से लेकर १९५० के उतार-चढ़ाव और भारत के विभाजन की विभीषिका में देखा है, तथा भारतीय जनमानस पर उसका जो प्रभाव पड़ा उसे लिपिबद्ध करने की इच्छा हुई। पर स्वतंत्रता के सघर्ष में जो अर्थ हम अनेक शब्दों के समझते थे और जो आकांक्षाऍं थीं, वे आज तोड़-मरोड़कर बदली जा रही हैं। पुरानी पुस्तकों में जो लिखा था, कहीं-कहीं राजनीति से प्रेरित होकर उनके पाठ बदल दिए गए हैं। मेरे विद्यार्थी जीवन में, जिन पुस्तकों ने देश को दिशा दी,वे पुस्तकें आज लुप्त हो गई। उनका स्थान सप्रयोजन लिखी गई झूठी पुस्तकों ने ले लिया है। आज ‘धर्म’ को ‘मजहब’ के अर्थ में प्रयोग करते हैं और एक ‘छद्म पंथनिरपेक्षता’ का बोलबाला है। मजहब (पंथ) एवं संस्‍कृति जैसी भिन्न कल्पनाओं को जानबूझकर भ्रमित कर एकाकार करने का प्रयास! शब्दों का सही अर्थ पहचानना आज की महती आवश्यकता है।

ऐतिहासिक दृष्टि से इस संस्कृति के प्रवाह को देखें। आज वास्तव में जो मानव संस्‍कृति है, जिसने सभी प्राचीन संस्कृतियों को कुछ-न-कुछ दिया, उसे कुछ पंथ एवं नेता तिरस्कृत करने में जुटे हैं। यह मानवता के समक्ष खतरे की घंटी है। वैज्ञानिक सोच वैचारिक स्वतंत्रता के अंदर ही पनप सकता है। ऐसी वैचारिक स्वतंत्रता की आधारशिला है- सहिष्णुता, सहअस्तित्व की भावना, छोटे-से छोटे वर्ग या क्षेत्र की स्वायत्ता और विचारों का समादर करते हुए तर्क पर आधारित जीवन। इसी में श्रेष्ठ कला, विज्ञान और दर्शन का तथा इनसे परिपूरित जीवन का सृजन होता है। पर जो धर्मांन्तरित करने वाले पंथ हैं उनका दुराग्रह आज मानवता के लिए विपदा उत्पन्न करता है। परंतु आश्चर्य कि उलटा चोर कोतवाल को डांटे वाली कहावत ही चरितार्थ होती दिखती है।

जो मानवता के पुजारी हैं, उनको इतिहास के परिप्रेक्ष्य में यह बात समझनी चाहिए। युगाब्द ५१०० की नई शती में प्रवेश कर रही दुनिया को सत्य का, मानव संस्कृति का प्रकाश चाहिए। यह मेरे बस की बात नहीं। केवल मन की अभिलाषा है कि ऐसे अनेक जीवन-निर्माण हों, जो राक्षसी वृत्तियों पर विजय प्राप्त कर मानव को सच्ची राह दिखा सकें।

इसमें आए उद्धरणों को छोड़कर बाकी विचार मेरे हैं। उन्हें किसी संस्था, दल, आंदोलन या कार्य पर आरोपित न किया जाय, यही निवेदन है। छोटे कलेवर में बात संघनित करने के कारण सरलीकरण हुआ होगा, बहुत सी बातें छूट भी गई होंगी। उनके लिए क्षमाप्रार्थी हूं। यह जनभावनाओं की, समाज के विचारों की कहानी है, इतिहास नहीं।

ऊपर छोटे बाबाजी एवं बेटी जया का स्मरण किया है। पर उन सबका, जिनकी पुस्तकों और लेखों से उद्धरण लिये, किन शब्दों में कृतज्ञता प्रकट करूँ ? उससे भी बढ़कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अधिकारियों एवं अनगिनत कार्यकर्ताओं का किस प्रकार आभार व्यक्त करूँ, जिनसे खेल में, बातों में, बौद्धिक संवाद में और दिन-प्रतिदिन के कार्य में मानवता की और विज्ञान की दृष्टि पाई। अपने मित्रों एवं आलोचकों को भी प्रत्यक्ष धन्यवाद देता हूँ। दीनदयाल शोध संस्थान के अध्यक्ष मा. लक्ष्मण श्रीकृष्ण भिड़े के प्रोत्साहन और पथ-प्रदर्शन के बिना यह पुस्तक अपूर्ण रहती। प्रयाग उच्‍च न्‍यायालय के विस्तृत गलियारे का और वहां प्रतिदिन कंधे से कंधा मिलाकर मित्रों के परस्पर मिलन, जहां से विधि की अंतर्दृष्टि प्राप्त हुई, का योगदान भी सहर्ष स्वीकार करता हूँ। अपने कार्यालय के कर्मचारियों, विशेषकर काटा-कूटी से भरी पांडुलिपि का संगणक पर टंकन करने के लिए संगमलाल का भी आभारी हूँ।

भगवान करें, हमारे नवयुवकों में वह दृष्टि जागे, जो देश की संजीवनी है।

वीरेंद्रकुमार सिंह चौधरी
३७, ताशकंत मार्ग,
प्रयाग-२११००१

गुरुवार, अक्टूबर 26, 2006

कालचक्र: सभ्यता की कहानी - संक्षेप में

वीरेन्द्र भाईसाहब की पुस्तकों में सबसे पहले हम उनकी पुस्तक 'कालचक्र - सभ्यता की कहानी' इस चिट्ठे पर पोस्ट करेंगे।

सभ्यता की यह कहानी सृष्टि के विचारों से लेकर साम्राज्यों और युद्ध के उतार-चढ़ाव के बीच होकर आधुनिक वैचारिक आंदोलनों तक की गाथा है। इसका रंगमंच संपूर्ण जगत है। कैसे मानव जीवन में विचार उत्पन्न हुये? कैसे उसने कुटुंब के रूप में रहना सीखा? कैसे साम्राज्य-लालसा के साथ तथाकथित सभ्यताओं का संघर्ष हुआ? और अब हम नई सदी की दहलीज पर आकर खड़े हैं। कौन से विचार हैं जिन्होंने मानव को भिन्न देशों में व भिन्न समय में आलोडित किया, कैसे संस्कृति उपलाई—का यह सरल बोधगम्य विवेचन है।

वैज्ञानिक और तार्किक दृष्टिकोण से लिखी कई यह पुस्तक आज के युग की विचारधराओं का इतिहास व उनकी पृष्टभूमि ही नहीं, वरन उस संघर्ष की और उसमें खपते लोगों की भी कहानी है, जिन्होंने युद्ध के नगाड़ों के बीच मानव सभ्यता व उसके मूल्यों को जीवित रखा, जो साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं के बीच विस्मृत हो जाते हैं।

प्राचीन भारतीय चिंतन को विशद करता यह ग्रंथ मानव संस्कृति के प्रवाह को विज्ञान व मानविकी के स्तरों में स्पष्ट करता है और जन-जीवन से लेकर राष्ट्र-जीवन को प्रेरणा देने वाला है। इसलिये यह विश्व विजय का स्वप्न सँजोए, क्रूरता भरे अध्यायों का तथा साम्राज्यों की नामावली व उनके संवत्सर का क्रम प्रकट करता इतिहास न होकर मानव जीवन की,उसके विचारों की कहानी है। जहां यह पुस्तक विद्यार्थियों के लिए जिज्ञासा और अधिक जानने की प्रेरणा देती है वहां साधारण पाठक के लिए अपने और मानव संस्कृति के विषय में एक उपन्यास की तरह रूचिकर ढंग से आधुनिक खोजों को उजागर करती है। पुरातत‍व से लेकर आधुनिक विज्ञान तक की विकास यात्रा इसकी परिधि है।

सोमवार, अक्टूबर 23, 2006

वीरेन्द्र भाईसाहब: एक परिचय

श्री वीरेन्द्र कुमार सिंह चौधरी, इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वरिष्ट अधिवक्ता हैं और कृष्णा वीरेन्द्र न्यास के अध्यक्ष हैं। आपने हिन्दी और अंग्रेजी की कई पुस्तकें लिखी हैं।

आपका जन्म, २ सितंबर, १९२० को बाँदा ( उ.प्र.) के एक प्रसिद्ध समाजसेवी और स्‍वतंत्रता संग्राम से जुड़े परिवार में हुआ। ऐसे परिवार के संस्कारों की छाप उनके लेखों तथा उनकी पुस्तकों में प्रतिबिंबित है।

उत्कृष्ट विद्यार्थी जीवन और एम.ए., एल.एल.बी. पास करने के बाद पिता के आग्रह पर १९४१ में बॉंदा में वकालत प्रारंभ की। सन १९४२ के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में कांग्रेसजन व अंग्रेजी शासन के कोपभाजन बने लोगों के वकील के रूप में नाम कमाया। सन १९५० से इलाहाबाद आकर उच्च न्यायालय में वकालत प्रारंभ की। बाद में वे यहीं वरिष्ठ अधिवक्ता बने और कुछ वर्ष उत्तर प्रदेश के महाधिवक‍ता भी रहे। उनकी अंग्रेजी में लिखी कानून की अनेक पुस्तकें प्रसिद्ध हैं।


(वीरेन्द्र भाईसाहब और उनकी पत्नी कृष्णा)


आपात स्थिति की निरूद्धि के समय हिंदी भाषा में लिखना प्रारंभ किया। इस समय सरल-सुबोध भाषा में सर्वसाधारण के लिए लिखे गए प्रतिदिन के जीवन में उठते विधिशास्त्र के गहन विषयों पर आपके हिन्दी में लेखों के दो संग्रह ‘विधि के दर्पण में : सामयिक और सनातन प्रश्न’ और ‘मुसलिम विधि : एक परिचय’ प्रकाशित है। इन पुस्तकों ने हिंदी जगत के लिए एक नया आयाम खोला। इसके अतिरिक्त उनके विद्यार्थी जीवन या उसके तुरंत बाद लिखे गए समस्यामूलक चार एकांकी नाटकों का संग्रह ‘बीते समय की प्रतिध्‍वनि’ भी प्रकाशित है, जो हिंदी नाटक के लिए वैज्ञानिक पृ‍ष्ठभूमि में एक नई दिशा है। हिन्दी में आपकी दो और पुस्तकें 'कालचक्र: सभ्यता की कहानी' और 'कालचक्र: उत्तर कथा' हैं। आपके, अंग्रेजी में उच्चतम न्यायालय के कुछ एतिहासिक कहे जाने वाले निर्णयों की, समालोचना लेखों का संग्रह 'आइवरी टावर: फिफटीन इयर्स आफ दि सुप्रीम कोर्ट' के शीर्षक से छपा है। आने वाले समय में यह पुस्तकें इस चिट्ठे पर प्रकाशित की जायंगी और सबसे पहले 'कालचक्र: सभ्यता की कहानी'।