Saturday, January 10, 2009

सभ्यता का एक मापदंड वहाँ नारी की दशा है

समाज में सभ्यता का एक मापदंड वहाँ नारी की दशा है। लगभग दो शताब्दियों से स्त्री-स्वतंत्रता की आवाज संसार में उठ रही है। पर भिन्न सामाजिक प्रणालियों में प्राचीन काल से उसकी दशा क्या चली आई?

अनेक पुरूषर-आक्रांत सभ्यताओं में लोग स्त्री को संपत्ति समझते थे। अफ्रीका के भागों में वधू की खरीद होती है और इसके लिए वरपक्ष को मूल्य चुकाना पड़ता है। सामी सभ्यताओं में उसे अनेक निर्योग्यताओं से जूझना पड़ता रहा है, जो आज तक हैं। यह आदम और हव्वा, सामी सभ्यताओं में प्रचलित कहानी की देन है जो नारी के जीवन को तथा प्रसूति को भगवान के आदेश की अवहेलना कर अर्जित सेब खाने को प्रेरित करने के कारण शापग्रस्त करार देती है। वरदान ही शाप बन गया।

विक्रमी संवत् की सातवीं शताब्दी में ईसाई जगत ने एक बृहत् सम्मेलन किया (मैकन : सन् ५८५)। प्रश्न था, नारी मनुष्य है अथवा पशु? बाइबिल के अनुसार उसकी निर्मित आदमी की पसली से हुई। इसलिए सभी ने कहा, उसे मनुष्य की श्रेणी में कैसे रख सकते हैं ? तब तक किसी ने याद दिलाई,
'तो फिर ईसा की माता मरियम को क्या (पशु) कहा जाय?'

तब यह सम्मेलन अनिर्णय में भंग हो गया। पर यह प्रश्न खलता रहा और अनेक सम्मेलन बुलाए गए। तब कहीं संवत् की उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी के संधिकाल में इस पर ईसाइयों का पुन: बृहत् सम्मेलन हुआ। अंत में उन्होंने निर्णय लिया कि
'ईसाई नारी को मानव की श्रेणी में रख सकते हैं; पर अन्य सभी स्त्रियाँ पशु की श्रेणी में आती हैं, अर्थात वे मनुष्य की संपत्ति मात्र हैं।'

ईसाई जगत में इसके बाद ही नारी की मुक्ति का द्वार कुछ खुल पाया।

ईसाई विधि में विवाह होने पर स्त्री की कुल संपत्ति उसके पति की हो जाती थी, क्योंकि वह स्वयं पति की संपत्ति थी। यही कारण था कि ईसाई देशों में उन्नीसवीं सदी तक विवाहित स्त्री को उधार कोई वस्तु, बिना पति के कहे, बेचता न था; क्योंकि उससे दाम वसूल ही नहीं हो सकते थे । इंग्लैंड में विवाहित स्त्री को संपत्ति रखने का अधिकार पहले-पहल सन् १८७० में 'विवाहित महिला संपत्ति अधिनियम' (Married Women's Property Act, 1870) द्वारा प्राप्त हुए। नेपोलियन संहिता (Napoleonic Code) के अंतर्गत फ्रांस और यूरोप के उससे प्रभावित देशों में स्त्री का संपत्ति पर धारणाधिकार सीमित चला आता है। उसके अन्य अधिकार भी पुरूष की तुलना में सदा कम थे। तलाक के मामलों में समान अधिकार तो आज भी नहीं हैं। रोजगार, नियोजन, वेतन, मजदूरी, उद्योग-धंधा, व्यवसाय, वृत्ति और शासन-सभी में नारी की सहभागिता और हिस्सेदारी बहुत कम है। इस भूमिका में इंग्लैंड और अमेरिका में संवत् की बीसवीं सदी तक न्यायालयों ने स्त्री को 'व्यक्ति' मानने तथा वकील के रूप में पंजीकृत करने से इनकार किया।

पर मुसलिम जगत में स्त्री की दयनीय दशा का संसार में सानी नहीं है। यह सत्य है कि मुसलिम विधि में कुछ स्त्री संबंधियों को दायाधिकार मिलना अनिवार्य हो गया; पर पुरूष संबंधियों के सामने उसे आधे का अधिकार मिला और उसके जीवन में छा गया एक घोर आवरण, जिसने उसकी स्वतंत्रता हर ली। जीवन में मानो बेड़ियाँ पड़ गई और वह बुरके की कारा में आबद्घ हो गई। आंग्ल विश्वकोश (Encyclopedia Brittanica) के अनुसार, मुसलिम देशों में महिलाओं की श्रमिकों में, उद्योग-धंधों में, सार्वजनिक जीवन और कार्यों में, देश के निर्णयों में, कला-विज्ञान-दर्शन-शिक्षा आदि के विस्तृत क्षेत्रों में सहभागिता नगण्य है। उन्हें सामान्य नागरिक अधिकार भी प्राप्त नहीं होते। इन देशों में अथवा जहाँ भी मुसलिम आबादी है, बच्चों की दर प्रति विवाहित स्त्री छह से आठ बच्चे हैं, जबकि अनेक देशों और दूसरे समाजों में यह दर एक या दो के आसपास है। जैसे केवल पुरूष के उपभोग अथवा घर के कामकाज के लिए दासी का जीवन उनका हो।

इस मुसलिम व्यक्तिगत विधि में उनकी दशा सबसे गई-गुजरी है। पति चाहे जितने विवाह करके (कुरान में वर्णित चार विवाह केवल लाक्षणिक हैं) पत्नी का घर में आबद्घ जीवन दूभर और अर्थहीन बना सकता है। जब चाहे बिना पत्नी के किसी कसूर के, बिना उसे बताए, अपनी स्वेच्छाचारिता में केवल तीन बार उस जादुई शब्द का प्रयोग कर अथवा एक बार ही कहकर कि तुझे तीन बार तलाक देता हूँ, उसे 'तलाक' दे समता है। तब बिना किसी गुजारे के बेसहारा उसे घर से निकलकर सड़क पर खड़ा होना पड़ता है। पति का कोई उत्तरदायित्व शेष नहीं रहता। ये कानून विवाहिता नारी की स्थिति साधारण दासी से भी बदतर बना देते हैं। इस सबने नारी जीवन में कितनी विडंबना भर दी है।

ऎसे ही विचार कार्ल मार्क्स के 'साम्यवादी घोषणापत्र' (Communist Manifesto) में हैं। कौटुंबिक संबंधों को 'बुर्जुआ बकवास' बताकर वह घोषणा करता है कि 'नारी उत्पादन की मशीन समझी जाती है और पूँजीवादी समाज में 'संपत्ति', इसलिए जब सभी उत्पादन के साधन समाज के हो जाएँगे तब नारी का भी खुला साझा समूह बनेगा। इसलिए विवाह प्रथा त्याज्य है।'

यूरोप व संयुक्त राज्य अमेरिका में उन्नीसवीं शताब्दी में, जब ज्ञानोदय (enlightenment) का प्रारंभ कहा जाता है, स्त्री-स्वतंत्रता का आंदोलन फूट निकता उस समय अनेक विचारकों की रचनाएँ स्त्रियों के अधिकारों के बारे में लिखी गईं। उनमें मेरी वोज्सटेनक्राफ्ट की 'स्त्री अधिकारों का संरक्षण' (A Vindication of the Rights of Women) प्रसिद्घ है। स्त्री-स्वतंत्रता के आंदोलन में अग्रणी रहने के बाद भी वह अंग्रेजी के प्रसिद्घ कवि शैली (Shelly) की पत्नी और इस रूप में एक कुशल तथा आदर्श गृहिणीं थी। स्त्री-स्वातंत्र्य के विरोधियों के इस तर्क का कि
'स्त्रियाँ स्वतंत्रता पाकर बिगड़ जाती हैं'

यह एक व्यावहारिक उत्तर था। वास्तव में उन्नीसवीं तथा बीसवीं सदी के साहित्य ने इसे आकार और रूप-रंग दिया; पर दो शताब्दी बाद भी यह कार्य अधूरा है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने अंतरराष्ट्रीय महिला वर्ष १९७५ में मनाया। पर आज भी इस विषय में सामी सभ्यता की काली छाया संसार पर मँडरा रही है। भारतीय संविधान की उद्घोषणा के बाद भी, कि कानून में लिंग के आधार पर द्वेषपूर्ण विभेद नहीं होगा, इस प्रकार के घनघोर विभेद मुसलिम विधि के कुछ भाग में प्रचलित हैं। आश्चर्य है कि सुधार के पट बंद करने की कट्टरपंथियों (fundamentalists) की चीख-पुकार सभी विवेक को ग्रस लेती है और एक जन-वातोन्माद (mass hysteria) उत्पन्न करती है।

यही हाल नारी-मताधिकार के बारे में ईसाई और मुसलिम जगत का है। यह समस्या राष्ट्रीय एवं स्वायत्तशासी इकाइयों में भी पुरूषों के समान उसे मत देने के अधिकार की है। भारत के प्राचीन गणराज्यों में स्त्री-पुरूष दोनों को मत के और उस समय की सभा एवं समिति में भाग लेने के समान अधिकार थे। यह सभा एवं समिति सामाजिक (सांस्कृतिक) तथा धार्मिक अथवा दर्शन जैसे विषयों पर शास्त्रार्थ भी करती थीं। उसमें पुरूष एवं स्त्री दोनों ही भाग लेते थे। यहाँ तक कि खेल-कूद, अस्त्र-शस्त्र प्रतियोगिता में भी स्त्रियों के भाग लेने का वर्णन मिलता है। जब अंग्रेज भारत में आए तब भारतीयों को संपत्ति के अधिकार पर सीमित मताधिकार स्थानिक इकाइयों और विधानसभा के लिए मिले। उस समय भी भारत में स्त्री के साथ कोई भेदभाव न था और दोनों के समान अधिकार थे। यह गणतंत्र की स्त्री-पुरूष के लिए समान मताधिकार की परंपरा आदि काल से आज तक यहाँ चलती आई।

पर मुसलिम और ईसाई जगत में स्त्री को प्राचीन काल में किसी प्रकार का मताधिकार न था। मुसलिम जगत में कुछ देशों में (उदाहरणार्थ सऊदी अरब और फारस की खाड़ी के अरब देशों में) उन्हें आज भी मत देने का अधिकार नहीं है। एक शताब्दी के संघर्ष के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका में मत देने का अधिकार नारी को सन् १९२० में मिला। इंग्लैंड में आंशिक/पूर्णरूप से सन् १९१८/१९२८ में। इसी प्रकार यूरोप के कुछ अन्य देशों में प्रथम महायुद्घ के आसपास ही मताधिकार मिला। पर फ्रांस, इटली, रूमानिया, यूगोस्लाविया में द्वितीय महायुद्घ के बाद ही नारी को मताधिकार प्राप्त हुए और स्विट्जरलैंड में सन् १९७१ में। आश्चर्य यही कि कभी-कभी भारत को, जहाँ प्राचीन काल से चली आई स्त्री-स्वातंत्र्य की परंपरा है, ऎसे देश जिनके द्वारा स्त्री के अधिकारों की सदा अवहेलनाहुई, इसी स्त्री-स्वातंत्र्य के नाम पर आँखें दिखाते हैं।

एक बार शिकागो नगर में एक भारतीय मूल के निवासी के घर जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उनकी पुत्री, जो स्नातक कक्षा में पढ़ती थी, ने कहा,
'मैं भारत कभी नहीं जाऊँगी। वहाँ लड़कियों पर अत्याचार करते हैं।'
इस भ्रामक जानकारी का स्त्रोत पूछने पर उसने बताया,
'यह अमेरिकी दूरदर्शन कहता है।'
मैंने पूछा,
'तुमने इंदिरा गांधी का नाम सुना है?'
उसके 'हाँ' कहने पर कि वह भारत की प्रधानमंत्री हैं, मैंने पूछा,
'क्या तुम उसकी तरह शक्तिशाली, दृढ़ इच्छा-शक्ति का कोई दूसरा प्रधानमंत्री बता सकती हो ?'
उत्तर था, 'नहीं।'
'तो फिर कैसे कहती हो कि भारत में स्त्री के साथ दुर्व्यवहार होता है ? जो देश इंदिरा सरीखी प्रधानमंत्री दे सकता है वहाँ नारी कभी पददलित होगी?'
मैंने कहा,
'मानव प्रकृति सब जगह समान है। हर जगह अच्छे और बुरे लोग हैं। पर भारत में स्त्री-स्वतंत्रता की गौरवशाली परंपरा रही है। बीच के सहस्त्र वर्षों का गुलामी और उसके विरूद्घ संघर्ष का काल आया, जिसमें विकृतियाँ उत्पन्न हुई। पर भारत एकमात्र ऎसी प्राचीन सभ्यता है जहाँ स्त्री की स्वतंत्रता का भाव साधारण रीति से संस्कृति में पगा।'

पर नारी को लेकर मनुस्मृति के बारे में अनेक विवाद खड़े किए जाते हैं। मनु ने मनुस्मृति में 'स्त्री' को मान-सम्मान का उच्च स्थान दिया है। उसे 'गृहलक्ष्मी', 'गृहशोभा' आदि कहकर पुकारा (अध्याय ९, श्लोक २५ व ९/२८) और पिता, भाई एवं पति को उनका समादर-सत्कार करने के लिए कहा (३/५५)। उनको सदा प्रसन्न रखने का आदेश दिया (३/५९)। कहा कि उनकी प्रसन्नता में कुटुंब का कल्याण है(३/६०) और उनकी अप्रसन्नता कुटुंब के विनाश का कारण बनती है(३/५७)। जहाँ उन्हें प्रसन्न रखा जाता है वहाँ सभी 'देवता' अर्थात दिव्य गुण निवास करते हैं। वे गृह-स्वामिनी हैं (९/११, ५/१५०)। स्त्रियों को कोई दमनपूर्वक नहीं रख सकता (९/१०)। वे स्वयं अपनी रक्षा करने में समर्थ हैं और उसी से सुरक्षित हैं (९/१२)। मनु ने पुरूष एवं स्त्री में कोई पक्षपात नहीं किया। कभी स्त्री को पुरूष की दासी या उसके अधीन नहीं माना। सदा कहा कि स्त्री-पुरूष मिलकर रहें (९/१०) और कभी न बिछुड़ें (९/१०२)। वेदों में साधारण धर्मकार्य का अनुष्ठान भी पत्नी के साथ करने का विधान है (९/९६)। राम ने वनवासिनी सीता की स्वर्ण प्रतिमा बनाकर यज्ञ किया था। स्त्री के लिए मार्ग छोड़ने को कहा (२/११३, १३८)। पत्नी पर झूठा दोषारोपण और अपशब्द कहना, उससे झगड़ा करना दंडनीय बताया (८/१८०)।

सभी धार्मिक कार्यों में स्त्री-पुरूष का समान अधिकार वेदों में माना गया है। संस्कारों के विधान स्त्री-पुरूष के लिए समान है। गुरूकुलवास, वेदाध्ययन एवं यज्ञोपवीत धारण करना आदि सभी स्त्री-पुरूष के लिए समान रीति से वेदसम्मत हैं। ऋग्वेद में लगभग तीस स्त्री ऋषियों का वर्णन आता है (अदिति, लोपामुद्रा आदि)। वैसे ही उपनिषदों में गार्गी, मैत्रेयी आदि ब्रम्हवादिनी स्त्रियों का वर्णन आता है। मनु ने धर्मशास्त्रों को वेद पर आधारित कहा है, इसलिए उसमें वेद के विरूद्घ कोई बात कहा जाना तर्कसम्मत नहीं है।

महर्षि दयानंद की प्रेरणा से आर्यसमाज द्वारा 'मनुस्मृति' पर शोध हुआ है। वे उन श्लोकों को प्रक्षिप्त, बाद में जोड़े गए तथा मनु की मूल धारणा के विपरीत कहते हैं जो स्त्रियों के प्रति संकीर्ण और निम्न दृष्टिकोण प्रदर्शित करते हैं। ऎसे ही एक श्लोक में कहा गया--' न स्त्री स्वातन्त्रयमर्हति' (९/१३) है। यह श्लोक मनु की धारणाओं और अन्य श्लोकों से अंतर्विरोध होने के कारण शोध-संस्करण इसे प्रक्षिप्त मानते हैं। मनु ने कभी स्त्री की स्वतंत्रता हरने की बात नहीं की, वरन् पुरूष-स्त्री दोनों के लिए एक ही और समान व्यवस्था दी है।

फिर भी इतने क्षेपक कालांतर में मनुस्मृति में जोड़े गए, जिन्होंने समाज में स्त्री की दशा पर प्रश्नचिन्ह लगाना प्रारंभ किया। इसे मूल रूप में सामी सभ्यता का टकराव कह सकते हैं। (वैसे मनुस्मृति सार्वभौमिक विधि-संकलन होने के कारण उसमें स्वाभाविक ढंग से कुछ अन्य सभ्यताओं की रीतियों का वर्णन आ सकता है।) ऎसा प्रसंग बहुविवाह की प्रथा को लेकर है। किसी समय समझा जाता था कि शायद बहुपति की प्रथा कबीलों में साधारण व्यवहार रहा होगा; पर अब इस पर कोई समाजशास्त्री विश्वास नहीं करता। किंतु बहुपत्नी की प्रथा अनेक प्राचीन सभ्यताओं में मिलती है।

मनु ने सब स्थानों पर पत्नी के लिए सदा एकवचन का प्रयोग किया है, द्विवचन या बहुवचन का नहीं। जब यह बात एक वकील सम्मेलन में मैंने कही तो लोगों ने पूछा कि इसका निष्कर्ष? मैंने कहा कि संभवतया मनु ने कभी नहीं सोचा था कि एक पत्नी के रहते अन्य से विवाह हो सकता है। तब तो एक वकील ने कहा,
'वाह, राजा दशरथ के तीन रानियाँ थीं।'
मैंने कहा,
'कौन आदर्श हैं, दशरथ या राम ? आपने राम के एक-पत्नीव्रत की बात क्यों न सोची ?'
पर यह प्रश्न को टरकाना था। अत: मैंने बताया,
'प्राचीन भारतीय विधि में राजा के लिए भी विधि का पालन अनिवार्य था, वह अपने देश में एक ही कन्या से विवाह कर सकता था। पर विदेश में राजनयिक संबंध स्थापित करने के लिए दूसरे देश की कन्या से विवाह करने की छूट थी। राजा दशरथ की एक पत्नी कोशल प्रदेश की कन्या कौशल्या थी। उनका दूसरा विवाह सुमात्रा (पूर्वी हिंद द्वीप-समूह) की पुत्री सुमित्रा से हुआ था और तीसरा विवाह कैकय देश (Caucasus) की पुत्री कैकेयी से।'
पुराण में इसकी कथा वर्णित है।

फिर भी पुराणों में वर्णित अनेक गाथाओं में एक से अधिक पत्नियों का वर्णन आता है। इनमें से बहुत सी प्रतीक अथवा रूपक कथाएँ हैं, जो कल्पना-जगत में स्त्री-पुरूष की गाथा बन गई। कुछ अन्योक्ति भी हैं। जैसे द्रौपदी के पाँच पतियों की गाथा है। मेरे बाबाजी, जिन्होंने रामायण तथा महाभारत काल का इतिहास लिखने का प्रयत्न किया, ने एक बार महाभारत के मूल श्लोक दिखाकर कहा था कि वह अर्जुन की ही पत्नी थी। स्त्री कोई संपत्ति नहीं थी, जिसको माता कुंती बाँटने का आदेश दिया हो। यही बात द्रौपदी ने धृतराष्ट्र की सभा में कही,
'स्त्री या बहू किसी की संपत्ति नहीं है, जो दाँव पर लगाई जा सके।'
यह बात मान्य हुई।

स्त्री-स्वातंत्र्य की यदि छवि देखनी हो तो भारत के सुदूर पूर्व के राज्यों के पुराने मातृप्रधान समाज में अथवा ब्रम्हदेश (म्याँमार) के कुछ पहले के जीवन में देखें। कहा जाता है कि इतिहास में ब्रम्हदेश के बराबर स्त्रियों को स्वतंत्रता किसी अन्य देश में नहीं रही। इसकी कुछ झलक शरच्चंद चट्टोपाध्याय के उस देश से संबंधित उपन्यासों में देखी जा सकती ह। वहाँ जो बर्मी बौद्घ विधि (Burmese Budhist law) प्रचलित थी, उसमें विवाह और तलाक के नियम सरलतम थे; पर वैवाहिक विश्वासघात (marital infidelity) अनजाना था। बाद में जब अराकान में मुसलमान बसे और उन्होंने बर्मी स्त्रियों से विवाह किया तब समस्या उठी। बर्मी स्त्रियों ने पुरूषों के समान अधिकार चाहे। तब वहाँ दंगे प्रारंभ हुए। यह स्पष्ट है कि स्त्री-स्वातंत्र्य और वैवाहिक विश्वासघात में कोई संबंध नहीं है।

ऎसा दूसरा प्रसंग, जिसे विधि में 'स्त्री के सीमित अधिकार' कहा जाता है, को लेकर है। इसे अंग्रेजों के राज्यकाल में वोमेंस इस्टेट ( women's estate) अथवा विडोज़ इस्टेट ( widow's estate) कहा जाता था। इस परिसीमित अधिकार को व्यक्त करता संस्कृत में अथवा प्राचीन धर्मशास्त्र में कोई शब्द नहीं है। यह सत्य है कि दाय का अधिकार, जहाँ पुत्री दूसरे परिवार में जाती थी, उसे पुत्र एवं पत्नी के बाद मिलता था। पर मनु ने कहा,
'जैसी अपनी आत्मा है वैसा ही पुत्र होता है और पुत्र जैसी ही पुत्री। उस आत्मा रूप पुत्री के रहते कोई दूसरा धन को कैसे पा सकता है ?' (मनुस्मृति, ९/१३०)। '
निरूक्त' में कहा गया,
'धर्मानुसार पुत्र एवं पुत्री दोनों का समान भाव से दाय में अधिकार है, यह मान्यता सृष्टि के आदि में मनु ने व्यक्त की है।'
यही मिताक्षरा का वचन है।

इसी प्रकार मनु ने पत्नी को अर्द्घांगिनी कहा। बृहस्पति ने कहा,
'वेद, स्मृति और रीति, सभी कहते हैं कि पत्नी पति की अर्द्घांगिनी है। अत: जब तक अर्द्घ भाग जीवित है, दाय का अधिकारी दूसरा कोई नहीं हो सकता।'
मनु ने माता के रहते पिता की जायदाद का पुत्रों में बँटवारा अमान्य किया। स्त्री-धन की सदा से मान्यता थी। मनुस्मृति (९/१९४) में छह प्रकार की स्त्री-धन गिनाया गया है; पर सभी मानते हैं कि ये केवल उदाहरण मात्र हैं। इसमें पति और माता-पिता द्वारा प्रदत्त धन भी हैं। नारद स्मृति में पति से प्राप्त दाय को स्त्री-धन कहा गया। जो विधि में दाय की अधिकारिणी थी और पुत्र के न रहने पर एकमात्र वारिस, यह कैसे हुआ कि दाय में प्राप्त संपत्ति (जायदाद) की वह एक प्रकार से संरक्षिका रह गई और उसके हस्तांतरण के अधिकार छिन गए ?

डा. नरेशचंद्र सेनगुप्त ने अपनी पुस्तक 'प्राचीन भारतीय विधि की विकास यात्रा (Evolution of Ancient Indian Law: Tagore Law Lectures) में पत्नी एवं पुत्री को वारिस घोषित करने का उल्लेख करने के बाद कहा,
'इन स्मृतिकारों के मस्तिष्क में इन वारिसों के बीच दाय में प्राप्त संपत्ति (जायदाद) में उनके अधिकारों को लेकर विभेद करने का विचार कभी उत्पन्न नहीं हुआ।'
मिताक्षरा में विज्ञानेश्वर ने जोर देकर वकालत की कि
'स्त्री-धन में वह सब संपत्ति आती है जो स्त्री को किसी भी तरीके से प्राप्त हुई हो।'
डा. सेनगुप्त ने लिखा,
'इतिहास साक्षी है कि जब विधवा का दायाधिकार माना गया तब विधि-प्रणेताओं ने कभी न सोचा था कि विधवा के दायाधिकार पुरूष उत्तराधिकारियों (वारिस) से भिन्न होंगें।'

पर उन कारणों की कल्पना की जा सकती है जिनसे विधवा के ही नहीं, पुत्री के भी अधिकार सीमित हो गए। विदेशी आक्रमणों के कारण एक उथल-पुथल मची। महिलाओं पर पड़ती उनकी कुदृष्टि के प्रभाव का आंशिक निराकरण यह था। स्त्री तो लौटकर आने नहीं पाएगी, तब उस विदेशी राज्य के समय संपत्ति के प्रत्यावर्तन का सिद्घान्त आया। जो जायदाद उसे पति से मिली थी वह पतिकुल को और जो पिता से मिली थी वह पितृकुल को लौट जाएगी। यह व्यवस्था (जो मुसलिम शासकों के समय के बंगाल में की गयी) विदेशी आक्रमण तथा सामी सभ्यता के संघातों का परिणाम थी। अंग्रेजी राज्य के साथ आई उनकी नजीरों के अनुसार न्याय करने की परिपाटी। इससे कानून जीवाश्म बन गया और स्वाभाविक विकास अवरूद्घ हो गया। इस प्रकार हिंदू विधि में स्त्री के दाय में परिसीमित अधिकार (वीमेंस इस्टेट) की प्रस्तर-मूर्ति खड़ी हुयी, जो हटए न हटी। संघर्ष काल का यह नियम हमारे स्मृतिकारों की देन नहीं, न मनु की। यह प्रिवी काउंसिल की देन है। यह उनकी देन है जिनके यहाँ नारी कभी 'संपत्ति' समझी जाती थी, 'व्यक्ति' नहीं। इसके लिए श्री बी.एन.राउ की अध्यक्षता में जो समिति बनी उसने स्त्री को दाय में पूर्ण स्वामिनी होने की व्यवस्था रखी। उन्होंने आलोचकों को उत्तर देते हुए कहा,
'यही हमारे स्मृतिकारों की प्राचीन व्यवस्था थी।'
आज पुन: यह लागू हुई है।

अपवाद एवं विकृतियाँ, जो समाज में यदा-कदा अथवा व्यक्ति के जीवन में दिखती हैं, उनसे समाज का मूल्यांकन नहीं होता। इंग्लैंड के जीवन में एक समय था जब गाँव में प्लेग आया तो बड़ी-बूढ़ी औरत को ( कि उसने चुड़ैल बनकर प्लेग बुलाया) जीवित जला दिया। फ्रांस में जान (जिसको मरणोपरांत 'संत जान' की उपाधि दी) को उदार कहलाने वाले कैथोलिक पंथ के ठेकेदारों ने जीवित रहते खंभे से बाँधकर जला डाला। मुसलिम शासकों के अत्याचारों, जनसंहार की गाथाएँ भारत में बिखरी पड़ी हैं। चित्तौड़गढ़ की पद्मिनी और चौदह सहस्त्र (?) स्त्रियों के जीवित अग्नि में समर्पण सरीखी लोमहर्षक घटनाएँ कम हैं क्या (?) और आज भी दासी के रूप में घरों में काम करने के लिए गरीब माँ-बाप की पुत्रियों को भारत से अरब देशों में भेजने का धंधा नहीं चलता (?) अंग्रेजी मानसिकता के शिकार व्यक्ति भारत की शाश्वत मूल धारा को नहीं देख पाते। ये इस सौ करोड़ के देश में कहीं भी किसी अपवाद घटना को ले, अतिरंजित कर, संपूर्ण समाज को बदनाम करते हैं। जैसे उनका कार्य निर्मल धारा छोड़ केवल बगल की क्षुद्र एवं क्षणिक गंदी नाली की समीक्षा हो।


०१ - कुरितियां क्यों बनी
०२ - प्रथम विधि प्रणेता - मनु
०३ - मनु स्मृति और बाद में जोड़े गये श्लोक
०४ - समता और इसका सही अर्थ
०५ - सभ्यता का एक मापदंड वहाँ नारी की दशा है


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2 comments:

  1. बहुत प्रभावित करता विद्वता पूर्ण आलेख ! कृपा कर ऐसे आलेखों को दो भागों में बाँट कर प्रकाशित किया करें जिससे पूरे धयान से पढने में सुविधा हों -कम समय लगे !
    और हाँ ,जहां तक मुझे याद है शेली की पत्नी मेरी शेली थीं -वोल्स्तान्क्राफ्त उनकी मां थीं .
    (स्त्री-स्वतंत्रता के आंदोलन में अग्रणी रहने के बाद भी वह अंग्रेजी के प्रसिद्घ कवि शैली (Shelly) की पत्नी और इस रूप में एक कुशल तथा आदर्श गृहिणीं थी।)

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  2. आजकल भारतीय मिडिया हिन्दु धर्म और संस्क्र्ती के खिलाफ़ एकेश्वर वादियो का हथियार बन गया हे. वह कोइ भी मौका हिन्दु धर्म व संस्क्रती को बदनाम करने का छोड नही रहा हे .
    आपका प्रयास सराहनीय तो हे पर वह शायद हिन्दु (भारतिय ) संस्क्रती को बचाने के लीये प्रयाप्त न हो

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