Monday, March 02, 2009

प्राचीन भारत में, संविधान, समिति, और सभा

अनेक प्रकार के संविधानों का वर्णन प्राचीन ग्रंथों में आता है। इनमें से कुछ का वर्णन किया जा सकता है; जैसे भौज्य संविधान, जहाँ गुणों पर चयनित अनेक नेता मिलकर राज्य की सर्वप्रभुता का उपभोग करते थे। ये सामूहिक नेतृत्व के प्रयोग थे। यह नेतृत्व वंशानुगत न था। ऎसे यादव थे जिनकी द्वारका थी। काठियावाड़ में अनेक भोज राज्य प्रसिद्घ थे। ऎसा ही 'राष्ट्रिका' का संविधान था। वहाँ नेता चुने जाते थे। चुनाव के बाद वे सामूहिक रूप में राज्य की सर्वोच्च सत्ता सँभालते थे। द्वैराज्य का अर्थ 'दो का शासन' है, जैसे महाभारत में 'अवंती' का वर्णन है। इस प्रकार का संविधान निराला था। पश्चिमी दार्शनिकों के अनुसार संप्रभुता अविभाज्य है। शायद भारत में जहाँ मिताक्षरा के सम्मिलित कुटुंब की कल्पना है, इस प्रकार दो शासकों का देश, जिनमें अधिकारों का बँटवारा न हो, चल सकता था। 'अराजक' राज्य अथवा 'वैराज्य' में कोई शासक न था। कुछ पश्चिमी विद्वान कहते हैं कि ऎसा राज्य आदर्श है, जहाँ शासक न हो, अर्थात धर्म (कानून) का राज्य हो। पर महाभारत ने इस तरह के राज्य की हँसी उड़ाई है। कहा,

'लोगों को अपनी गलती का पता चल गया कि कानून का पालन बिना शास्ति के नहीं हो सकता।'
युवराज द्वारा शासित राज्य भी थे। 'विरूद्घ-रज्जानि' वे थे, जहाँ एक दल का शासन था। परंतु इन सब संविधानों में व्याप्त था गणराज्य, जहाँ गण (मत गिनकर) शासन हो।

वैदिक समय के राज्य की संप्रभुता-संपन्न सभा को 'समिति' (सम् + इति= सम्मिलन) कहा जाता था। सभी नागरिकों की यह समिति एक निश्चित काल के लिए 'राजन्' का चयन करती थी। वह राज्य के मामलों में विचार-विमर्श ही नहीं वरन् विद्वत् परिषद् के समान सास्कृतिक या शास्त्रीय मसलों पर भी चर्चा करती थी तथा व्यवस्था देती थी। उस समय की संवैधानिक उन्नति का अनुमान समितियों में होने वाले वाद-विवाद के स्तर से लगाया जा सकता है और उसके ईशान (अध्यक्ष)  तथा प्रत्येक के वहाँ बोलने के, मुक्त अभिव्यक्ति के अधिकार से। कालांतर में राष्ट्र के सभी लोग समिति में बैठें, यह व्यावहारिक न रह गया। इसीलिए कहीं-कहीं 'ग्रामणी' (ग्राम अथवा नगर का नेता) का उल्लेख आता है। गाँव के संवैधानिक गठन की यह कुंजी थी और कभी गाँव उसी के नाम से पुकारा जाता था। धीरे-धीरे समिति के गठन का आधार ग्राम बन गया। यह चुनाव-क्षेत्र का पर्याय था।

परंतु बाद में जब एक अर्थ में राजतंत्र आया, उसे अब सीमित राजतंत्र कहेंगे, तब समिति का स्थान 'जानपद' (राज्य सभा) तथा 'पौर' (राजधानी की अथवा नगर सभा) ने ले लिया। इस राजतंत्र की भी विचित्र कहानी तथा गठन दिखता है। इस कालखंड में सम्राट् कोई रहा हो, पर उसकी राजधानी और उसके आसपास का क्षेत्र छोड़कर उसके अधिराज्य के प्राय: सभी प्रदेश स्वायत्तशासी गणराज्य थे। (जैसे दशरथ के सम्राट् होने पर भी उनका शासन अयोध्या तक सीमित था और राम के साथ शिक्षा प्राप्त चुने गये निषादराज भी थे।) इसी से जानपद तथा पौर का महत्व बढ़ गया।



०१ - कुरितियां क्यों बनी
०२ - प्रथम विधि प्रणेता - मनु
०३ - मनु स्मृति और बाद में जोड़े गये श्लोक
०४ - समता और इसका सही अर्थ
०५ - सभ्यता का एक मापदंड वहाँ नारी की दशा है
०६ - अन्य देशों में मानवाधिकार और स्वत्व
०७ - भारतीय विधि ने दास प्रथा कभी नहीं मानी
०८ - विधि का विकास स्थिति (या पद) से संविदा की ओर हुआ है
०९ - गणतंत्र की प्रथा प्राचीन भारत से शुरू हुई
१० -  प्राचीन भारत में, संविधान, समिति, और सभा

2 comments:

  1. सुन्दर जानकारी. मगर विस्तार की जरूरत. रोचक विषय है, कृपया विस्तार से बताएं.

    ReplyDelete
  2. Excellent! This article provides the crux of undistorted cultural and political history of India.

    Here I beg to refer Valmikiya Ramayan, Bal Kaand chapter 1 verse 96 wherein it has been said that "Ram will establish the states (Rajvanshas) multiplying hundred times than existing ones". From verse 50 of Ayodhya kaand it appears that territory of central Kosal was neighboring to Sringaverpur. Kishkindha was ruled by Bali but when Bali asked the justification for his assassination, Ram said : Bharat is king of whole earth and by his order I am performing my duty to protect the dharma -(Verses 6 to 11, 23 and 25 of chapter 18 of kishkindha kaand). There are several other references indicating that a system like federal rule was prevalent in ancient period. The ultimate test of recognition or support of the central power or chief king was ashwamedh yagya.
    - Dr. Vasishtha Narayan Tripathi, Advocate, chamber No. 34A, High Court Allahabad.

    ReplyDelete