Wednesday, July 11, 2007

भौतिक जगत और मानव-१३

कालचक्र: सभ्यता की कहानी
संक्षेप में
प्रस्तावना
भौतिक जगत और मानव-१
भौतिक जगत और मानव-२
भौतिक जगत और मानव-३
भौतिक जगत और मानव-४
भौतिक जगत और मानव-५
भौतिक जगत और मानव-६
भौतिक जगत और मानव-७
१० भौतिक जगत और मानव-८
११ भौतिक जगत और मानव-९
१२ भौतिक जगत और मानव-१०
१३ भौतिक जगत और मानव-११
१४ भौतिक जगत और मानव-१२
१५ भौतिक जगत और मानव-१३

जो उष्ण छिछले सागर के अंदर छोटे से कंपन से लेकर जीव की विकास यात्रा मानव तक आई, वह विकास शारीरिक संरचना और मस्तिष्क में ही नहीं, किंतु प्रवृत्ति, मन तथा भावों के निर्माण में भी हुआ।

जिस प्रकार का विकास कीटों में हुआ वह अन्यत्र नहीं दिखता। मक्खी की एक ऑंख में लगभग एक लाख ऑंखें होती हैं। इन दो लाख ऑंखों से वह चारों ओर देख सकती है। एक कीड़ा अपने से हजार गुना बोझ उठा कसता है। अपनी ऊँचाई-लंबाई से सैकड़ों गुना ऊँचा या दूर कूद सकता है। कैसी अंगो की श्रेष्ठता, कितनी कार्यक्षमता! फिर प्रकृति ने एक और प्रयोग किया कि कीटवंश, उनका समूह एक स्वचालित इकाई की भॉंति कार्य करे। सामूहिकता में शायद सृष्टि का परमोद्देश्य पूरा हो। कीटों के अंदर रची हुई एक मूल अंत:प्रवृत्ति है, जिसके वशीभूत हो वे कार्य करते हैं। इसके कारण लाखों जीव एक साथ, शायद बिना भाव के (?) रह सके। कीटवंशों की बस्तियॉं बनीं। उनका सामूहिक जीवन सर्वस्व बन गया और कीट की विशेषता छोड़ वैयक्तिक गुणों का ह्रास हुआ। इससे मूल जैविक प्रेरणा समाप्त हो गई। प्रारंभिक कम्युनिस्ट साहित्य में इसे समाजवादी जीवन का उत्कृष्ट उदाहरण कहा जाता रहा। इस प्रकार मिलकर सामूहिक, किंतु यंत्रवत कार्य से आगे का विकास बंद हो जाता है। कीट आज भी हमारे बीच विद्यमान हैं। पर पचास करोड़ वर्षों से इनका विकास रूक गया।

रीढ़धारी जतुओं में मछली, उभयचर, सरीसृप, पक्षी एवं स्तनपायी हैं। पहले चार अंडज हैं, पर स्तनपायी पिंडज हैं। प्रथम तीन साधारणतया एक ही बार में हजारों अंडे देते हैं, एक अटल, अंधी, अचेतन प्रवृत्ति के वश होकर। पर मॉं जानती नहीं कि अंडे कहॉं दिए हैं और कभी-कभी वह अपने ही अंडे खा जाती है। लगभग सात करोड़ वर्ष पूर्व प्रकृति ने जो नया प्रयोग किया कि संघर्षमय संसार में शायद शक्तिशाली जीव अधिक टिकेगा, इसलिए विशालकाय दॉंत-नख तथा जिरहबख्तरयुक्त दानवासुर बनाए। वे भी नष्ट हो गए।

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