Thursday, July 26, 2007

भौतिक जगत और मानव-१५

कालचक्र: सभ्यता की कहानी
संक्षेप में
प्रस्तावना
भौतिक जगत और मानव-१
भौतिक जगत और मानव-२
भौतिक जगत और मानव-३
भौतिक जगत और मानव-४
भौतिक जगत और मानव-५
भौतिक जगत और मानव-६
भौतिक जगत और मानव-७
१० भौतिक जगत और मानव-८
११ भौतिक जगत और मानव-९
१२ भौतिक जगत और मानव-१०
१३ भौतिक जगत और मानव-११
१४ भौतिक जगत और मानव-१२
१५ भौतिक जगत और मानव-१३
१६ भौतिक जगत और मानव-१४

१७ भौतिक जगत और मानव-१५
इस विकास-क्रम के पीछे कोई प्रयोजन है क्‍या ? प्रकृति का कौन सा गूढ़ महोद्देश्‍य इसके पीछे है ? यहॉं दो मत हैं। हमने बर्नार्ड शॉ (Bernard Shaw) का नाटक ‘पुन: मेथुसला की ओर’ ( Back to Methuselah) और उसकी भूमिका पढ़ी होगी। कैसे एक जीवन शक्ति (élan vital) विकास-क्रम को आगे बढ़ाती है। एक पुरातत्‍वज्ञ एरिक वान दानिकन की पुस्‍तक ‘देवताओं के रथ’ ( Erich von Daniken: Chariots of he Gods? Unsolved Mysteries of the Past) का प्रश्‍न है, क्‍या अंतरिक्ष के किसी दूसरे ग्रह के प्रबुद्ध जीव या देवताओंने इस विकास-धारा को दिशा दी ? इस पुस्‍तक में महाभारत की कुंती की कथा का उल्‍लेख है, जब उसने देवताओं का आह्वान कर तेजस्‍वी पुत्रमॉंगे।

जिस प्रका बच्‍चे के अंग-प्रत्‍यंग उसके माता-पिता तथा उनके पीढियों पुराने पूर्वजों पर निर्भर करते हैं उसी प्रकार वह उनके मनोभावों से प्रभावित संभावनाओं (potentialities) को लेकर पैदा होता है। कर्मवाद का आधार यही है कि हमारा आचरण आने वाले वंशानुवंश को प्रभावित करता है। अत्‍यंत प्राचीन काल में भारतीय दर्शन में कर्मवाद के आधार पर जिस सोद्देश्‍य विकास की बात कही गई,उसकेबारे में जीव विज्ञान अभी दुविधा में है। आज के वैज्ञानिक विकास को आकस्मिक एवं निष्‍प्रयोजन समझते हैं, मानों यह संयोगवश चल रहा हो। जैसे कोई एक अंध प्रेरणा अललटप्‍पू हर दिशा में दौड़ती हो और अवरोध आने पर उधर जाना बंद कर नई अनजानी जगह से किसी दूसरी दिशा मे फूट निकलती हो।

2 comments:

  1. Uttam likha hai.

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  2. हांलाकि पहले के भाग नहीं पढ़े फिर भी जानकारी अच्छी है.. पहले वाले भी पढते हैं.

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