Sunday, April 05, 2009

यूरोप में गणतंत्र या फिर प्रजातंत्र

यूरोप के सद्य: युग में गणतंत्र (उसे वे प्रजातंत्र कहते हैं) के कुछ प्रयोग हुए हैं। इंगलैंड में इसका जन्म हिंसा में और फ्रांस में भयंकर रक्त-क्रांति में हुआ। कहा जाता है, 'फ्रांस की राज्य-क्रांति ने अपने नेताओं को खा डाला।' और उसीसे नेपोलियन का जन्म हुआ, जिसने अपने को 'सम्राट' घोषित किया। और इसीमें हिटलर, मुसोलिनी एवं स्टालिन सरीखे तानाशाहों का जन्म हुआ। कैसे उत्पन्न हुआ यह प्रजातंत्र का विरोधाभास ?

आज प्रजातंत्र का अर्थ दो परस्पर विरोधी धारणाओं के बीच झूल रहा है। एक सामान्य अर्थ 'प्रशासनिक कार्यों में जनता का सहभागी होना' है। ऎसा तंत्र जिसमें राज्य के क्रिया-कलापों का संचालन वहाँ के नागरिकों द्वारा हो। इसका अर्थ ग्राम, नगर और छोटे-छोटे क्षेत्र- सभी को स्वायत्त शासन प्राप्त होना है। अर्थात राज्य के कार्य में सामान्य जन की सहभागिता। पर एक दूसरा अर्थ भी तथाकथित समाजवादी देश करते हैं। इस व्यवस्था में जनता को मताधिकार दिए जाने के राग अलापे जाते हैं कि उसे 'अधिकार' है कि निश्चित अवधि में एक बार मतदान करे। इसके बाद चुने गये जन-प्रतिनिधि शासन की सारी क्रिया संभालते हैं। मत देने के बाद जनता के अधिकारों की इतिश्री हो जाती है। जन-प्रतिनिधि हैं शासक और शेष हैं शासित समाज, उनकी प्रजा, जिसका मत देने के अतिरिक्त शासन में अधिकार या उससे संबंध नहीं। अनेक बार इस तरह के प्रजातंत्र में चुनाव की एक ही सूची 'शासक' चुनने की रहती है। मतदाता को सूची के लिए 'हाँ' अथवा 'ना' करना पड़ता है। न दूसरा प्रतियोगी, न विकल्प की सूची। वाह रे चुनाव !

इस प्रकार साम्यवादी अथवा यूरोपीय समाजवादी देशों में प्रजातंत्र का अर्थ उलट गया है। वहाँ उसका अर्थ है, 'सरकार का जनता के कार्यों में सहभागी होना।' 'राष्ट्रीयकरण' के शब्द-जाल के पीछे सरकारीकरण की धूम मच गयी। राज्य एक सर्वग्रासी दानव के समान उठ खड़ा हुआ। उसने नागरिक अधिकारों को लीला, जनता के कार्यों का अपहरण तथा स्वायत्त शासन का तिरस्कार किया। यह समाजवाद की यूरोपीय कल्पनाओं की देन है।

वहाँ समाजवाद का जन्म भौतिकवादी दर्शन में हुआ। इस दर्शन में यदि 'सुख' को किसी गणितीय सूत्र में रखना हो तो कहेंगे 'सुख = उपलब्धि + आवश्यकता।' संसार में उपलब्धियाँ कम हैं तथा आवश्यकताएँ अधिक और सुरसा की तरह मुँह फैलाए जा रही हैं। इसलिए यदि सुख प्राप्त करना है तो (उपलब्धियों के) उत्पादन तथा वितरण पर समाज का और इसलिए सरकार का नियंत्रण हो। यह साधारणतया संभव नहीं तो फिर उसका एकाधिकार चाहिए। इस प्रकार यूरोपीय समाजवाद का अर्थ केवल उत्पादन और वितरण के साधनों पर अनंततोगत्वा सरकार का, और इस प्रकार जिस गुट की सरकार घटनावश बने, उसका एकाधिकार है।

इस प्रकार की व्यवस्था में वस्तुएँ कम तथा उपभोग की लालसा अधिक होने के कारण सभी की इच्छा-पूर्ति असंभव है। यह मानकर कि 'अधिक - से- अधिक लोगों का अधिक -से- अधिक भला' (Greatest good of the greatest number) के रूप में प्रजातंत्र की परिभाषा आई। यह आधुनिक प्रजातंत्र का एक बोध वाक्य कहा जाता है। साबरमती आश्रम में गांधी जी का एक उद्घरण उत्कीर्ण है- 'मेरा (उक्त) सिद्घांत पर विश्वास नहीं है। नग्नता में इसका अर्थ है-इक्यावन प्रतिशत के कल्पित लक्ष्य को पाने के लिए उनचास प्रतिशत के हितों की बलि दी जा सकती है, दी जानी चाहिए। यह निर्दय सिद्घांत है, जिसने मानवता को चोट पहुँचाई है। सच्चा गौरवशाली मानवीय सिद्घांत है- सबका अधिकतम भला।' यही भारतीय समाज-दर्शन है, जिसका बोध वाक्य है-'सर्वेपि सन्तु सुखिन:'।


Tammany Hall on East 14th Street, NYC, between...

'प्रजातंत्र' की यूरोपीय पद्घतियों के दोष राजनीति की पुस्तकों में उल्लिखित हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका में एक 'तम्मनी हाल संस्कृति' (Tammany Hall Culture) का उदय हुआ। एक आदिवासी, बुद्घिमान तथा परोपकारी शासक 'तम्मनंद' के नाम पर यह न्यूयार्क का भवन कालांतर में राजनीतिक दादागिरी और भ्रष्टाचार का पर्याय बना। विशिष्ट पदों का सृजन, जिसमें अपने राजनीतिक छुटभैयों को स्थान मिले, अपने समर्थकों को अनुदान के नाम पर सरकारी खैरात, अपनों को कुरसी पर रखने के लिए तरह-तरह के हथकंडे और सरकारी शक्ति तथा धन का प्रयोग, अपराधियों का संरक्षण और उनका अपने दल के लिए दुरूपयोग, अपने को सत्ता में रखले के लिए समाज को शतखंड-खंडित करने और उनके छोटे-छोटे अंशों के स्वार्थ जगाने का उपक्रम, सत्ता का अपने स्वार्थ के लिए दुरूपयोग तथा अपना मत-बैंक (vote bank) बनाने के लिए छोटे समुदायों की अलग पहचान बनवाने का देशद्रोह, ये सब ऎसी 'राजनीतिक मशीन' के कारनामे हैं।

कहाँ यह और कहाँ वह संस्कृति, जो एकात्म मानववाद की शिला पर समरस जीवन का निर्माण करे; और उसके द्वारा उपजाया गणतंत्र, जहाँ छोटी-छोटी व्यावसायिक अथवा भिन्न वर्गों की स्वायत्तशासी इकाइयाँ और फिर 'पौर' एवं 'जानपद' शासन के कार्यों में जन-जन की सहभागिता लें! बंधुत्व जिसमें रंग भरे। ऎसा व्यक्ति से लेकर समष्टि तक एक समाज-जीवन खड़ा करने में भारत के गणतंत्र के प्रयोग संसार को दिशा दे सकते हैं। कुटुंब की नींव पर खड़ा मानवता का जीवन शायद 'वसुधैव कुटुंबकम्' को चरितार्थ कर सके।


०१ - कुरितियां क्यों बनी
०२ - प्रथम विधि प्रणेता - मनु
०३ - मनु स्मृति और बाद में जोड़े गये श्लोक
०४ - समता और इसका सही अर्थ
०५ - सभ्यता का एक मापदंड वहाँ नारी की दशा है
०६- प्राचीन भारत में मानवाधिकार
०७ - अन्य देशों में मानवाधिकार और स्वत्व
०८ - भारतीय विधि ने दास प्रथा कभी नहीं मानी
०९ - विधि का विकास स्थिति (या पद) से संविदा की ओर हुआ है
१० - गणतंत्र की प्रथा प्राचीन भारत से शुरू हुई
११ - प्राचीन भारत में, संविधान, समिति, और सभा
१२ - प्राचीन भारत में समिति, सभा और गणतंत्र में सम्बन्ध
१३ - बुद्ध और भिक्खु संघ
१४ - प्राचीन ग्रंथों में गणराज्य का महत्व और भारत में गणराज्य की पुन:स्थापना
१५- यूरोप में गणतंत्र या फिर प्रजातंत्र




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1 comment:

  1. बहुत ही ज्ञानवर्धक एवं विचारोत्तेजक लेख!

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