शुक्रवार, फ़रवरी 20, 2009

गणतंत्र की प्रथा प्राचीन भारत से शुरू हुई

सामाजिक जीवन की चौथी मूल धारणा उन राजनीतिक विचारों को लेकर है, जिन्हे 'प्रजातंत्र' (Democracy) के नाम से जाना जाता है। सामाजिक व्यवस्था का अनिवार्य अंग राजनीतिक ढाँचा भी है। मध्य युग में सामी सभ्यता सारे यूरोप, पश्चिम एशिया, पूर्वी तथा उत्तरी अफ्रीका में छा गयी। उनका राजनीतिक जीवन जिस पद्घति से परिचित था, अर्थात पादशाही या एक व्यक्ति के वंशानुवंश शासन (वही बादशाह तथा वही पंथगुरू, खलीफा) का बोलबाला रहा। और किसी प्रकार के प्रजातंत्र में स्वल्प संक्रमण ने विकृतियाँ उत्पन्न कीं, तानाशाहों का निर्माण किया और एक भ्रांत धारणा को जन्म दिया कि ये प्रजातंत्र की पद्घतियाँ किसी आधुनिक युग की देन हैं।


 शकुंतला, दुष्यंत को पत्र लिखते हुऐ जिनके पुत्र भरत जिसके नाम पर अपने देश का नाम पड़ा राजा रवी वर्मा का चित्र विकिपीडिया से 

परंतु भारतीय समाज प्राचीन काल में एक ही प्रकार की राजनीतिक रचना जानता था, जिसे 'गणतंत्र' कहते थे। व्यक्ति और उसके कुटुंब से लेकर मानवमात्र तक सभी बाड़ों को तोड़ता एक विशाल संगठन, 'वसुधैव कुटुंबकम्' का सपना भारत ने देखा था। उसे चरितार्थ करने का माध्यम यह गणतंत्र पद्घति थी। सुदूर अतीत, आज के विचारकों के अनुसार सामाजिक जीवन के प्रारंभ में ऎसी रचना उनके लिए आश्चर्य का विषय है।  इसके इतने प्रकार के प्रयोग हैं, जिनसे सर्वसाधारण का सीधा नाता शासन से ही नहीं, सामूहिक सांस्कृतिक जीवन से जुड़ता है, जिसमें वे सहभागी बनते हैं।

भारत में सदा से राज्य-व्यवस्था के अनेक प्रयोग होते आए। आज तक हिंदू के राज्य-संबंधी संवैधानिक विचारों का क्रमबद्घ इतिहास नहीं लिखा जा सका। पर प्राचीन हिंदू धर्मशास्त्रों में इस देश के विक्रम पूर्व के ३००० वर्षों में 'गणतंत्र' के सतत विकास का दृश्य देख सकते हैं। उस पर किसी आधुनिक देश को गर्व हो सकता है।


०१ - कुरितियां क्यों बनी
०२ - प्रथम विधि प्रणेता - मनु
०३ - मनु स्मृति और बाद में जोड़े गये श्लोक
०४ - समता और इसका सही अर्थ
०५ - सभ्यता का एक मापदंड वहाँ नारी की दशा है
०६ - अन्य देशों में मानवाधिकार और स्वत्व
०७ - भारतीय विधि ने दास प्रथा कभी नहीं मानी
०८ - विधि का विकास स्थिति (या पद) से संविदा की ओर हुआ है
०९  गणतंत्र की प्रथा प्राचीन भारत से शुरू हुई

रविवार, फ़रवरी 08, 2009

विधि का विकास स्थिति (या पद) से संविदा की ओर हुआ है

इसी प्रकार 'जल' तो प्राणिमात्र को देना होगा। प्यासे को ना नहीं करेंगे, क्योंकि यह उसका स्वत्व है। यही कारण है कि जल का मूल्य अथवा प्रतिदान नहीं लिया जाता था। कोई नगरपालिका अथवा शासन जल-कर (water rate) नहीं लगा सकता था। इसीलिए कुएँ, बावली और पशुओं के लिए सड़कों के किनारे चरही आदि बनाना पुण्य का कार्य है।




इलाहाबाद संगम से जमुना पुल

इसी प्रकार यह 'धरती', रहने के लिए भूमि की घोंषणा है, और 'आकाश' एक छत या आश्रय की। प्राणिमात्र ने पृथ्वी पर जन्म पाया है, इसलिए उसे धरती, रहने का स्थान देना ही होगा। उसके प्राकृतिक वास को छीनेंगे नहीं। सभी वन्य पशुओं के लिए उनका प्राकृतिक वास मानव को छोड़ना होगा। यह सबके सह-अस्तित्व की कल्पना है। मानव ने भी जन्म लिया है, इसलिए उसे २ X३ मीटर धरती तो देनी ही होगी और एक छाजन से पूर्ण आश्रय-स्थान (आकाश)।


हैनरी मैन का यह चित्र  विकिपीडिया से

उन्नीसवीं शताब्दी में विधिशास्त्र की एक पुस्तक आई जिसने यूरोपीय विचार में एक परिवर्तन का सूत्रपात किया। यह हेनरी मेन (Henry James Sumner Maine) की 'प्राचीन विधि' (Ancient law)  थी। आज उस पुस्तक की अनेक बातों को अर्द्घ-सत्य कहकर चुनौती दी गयी है। पर कभी उसके वाक्य कि 'विधि का विकास स्थिति (या पद) (status) से संविदा (contract) की ओर हुआ  है' ने यूरोपीय चिंतन को नई दिशा दी थी। शायद स्वत्व की अपूर्ण कल्पना ही 'स्टेटस' शब्द में प्रकट हुई।  पर भारत की प्राचीन विधि में कोरा 'स्टेटस' कोई अधिकार प्रदान नहीं करता। उसके साथ स्वत्व जुड़ा होने के कारण अनायास ही वे प्राप्त होते हैं।

जिस संस्कृति ने ऎसी उदात्त भावना उपजाई और प्रारंभ से जहाँ विधि में प्राणिमात्र के स्वत्व को  स्थान दिया और उसे अहरणीय बताया, उसी में मानव जाति का और फिर इस ग्रह का भविष्य सुरक्षित है। यह मानव को प्राणिमात्र से और फिर प्रकृति से जोड़ता है।


इस चिट्ठी के चित्र विकिपीडिया के सौजन्य से हैं।
०१ - कुरितियां क्यों बनी
०२ - प्रथम विधि प्रणेता - मनु
०३ - मनु स्मृति और बाद में जोड़े गये श्लोक
०४ - समता और इसका सही अर्थ
०५ - सभ्यता का एक मापदंड वहाँ नारी की दशा है
०६ - अन्य देशों में मानवाधिकार और स्वत्व
०७ - भारतीय विधि ने दास प्रथा कभी नहीं मानी
०८-  विधि का विकास स्थिति (या पद) से संविदा की ओर हुआ  है

रविवार, फ़रवरी 01, 2009

भारतीय विधि ने दास प्रथा कभी नहीं मानी

द्वितीय महायुद्घ के बाद धीरे-धीरे एशिया-अफ्रीका के देश स्वतंत्र हुए और संसार के जीवन में बदलाव आया। मानव जाति मुसलिम और यूरोपीय साम्राज्यवाद के अवशिष्ट चिन्हों से अभी पूरी तौर पर उबर नहीं पाई है। आज भी शोषण तथा उत्पीड़न से मुक्ति का आंदोलन कुछ सीमा तक है। पर दास प्रथा (slavery) का नागपाश क्या कभी भारत की धरती पर था, जहाँ प्राणिमात्र के प्रथम स्वत्व 'मुक्त वायु' का उच्चरण हुआ ? जहाँ अरब या यूरोपीय जैसी साम्राज्य-लिप्सा नहीं रही?

युरोप में दास बाज़ार का एक चित्र


यूरोपीय इतिहासकार इसके उत्तर में आर्यों का इस धरती पर उपनिवेश बसाना और जैसे पापकर्म यूरोप के लोगों ने किए थे उसी तरह के कर्म इस देश के लोगों पर थोपते हैं। पर यदि संपूर्ण सोच का आधार गलत है तो उसके निकाले गए अनुमान असत्य ही होंगे। यह आर्यों का बाहर से आना और तथाकथित आदिवासियों से युद्घ आदि को आज पुरातत्वज्ञ कपोल-कल्पित कहते हैं। इसी प्रकार जब वर्ण कर्मणा था, जन्मना नहीं और सब श्रेष्ठ गुण-कर्म द्वारा इच्छित वर्ण प्राप्त कर सकते थे तब दासता की प्रथा का प्रश्न ही नहीं उठता। मानव-मूल्यों की जहाँ प्रतिष्ठा हुई, ऎसी अकेली प्राचीन सभ्यता भारत में रही। संसार में यह अनूठी सभ्यता चली आई, जो दास प्रथा से अछूती थी।
१३वीं शताब्दी येमन में दास बाज़ार का एक दृश्य

चंद्रगुप्त के दरबार में यूनान के राजदूत मेगस्थनीज (Megasthenese) ने लिखा है कि भारत में सभी स्वतंत्र हैं और कोई दास नहीं। ऎसा ही चीनी यात्रियों ने वर्णन किया है। चाणक्य ने कहा,
'आर्य (यहाँ के नागरिकों का सामान्य संबोधन ) कभी दास नहीं होता।'
चंद्र गुप्त मौर्य के राज्य का एक दृश्य

'दास' शब्द दो अर्थों में प्रयोग किया जाता रहा है। इसका एक अर्थ भृत्य (नौकर) भी है। अर्थशास्त्र में चाणक्य ने इस प्रकार के लोगों के साथ उदारता बरतने के लिए कहा। अनेक ग्रंथों में भृत्य, जो उचित मूल्य लेकर किसी परिवार की सेवा करता है, के अर्थ में ही 'दास' शब्द का प्रयोग हुआ है, गुलाम के अर्थ में नहीं। द्यूत में हार जाने पर अथवा ऋण अदा करने के लिए अपनी सेवाएँ कुछ कालावधि के लिए समर्पित करने का उल्लेख प्राचीन साहित्य में है। पर कोई अपनी संतान बेच नहीं सकता था। न युद्घबंदी, न मनुष्य बिकते थे। उसके लिए कठोर दंड का विधान था। दास का कोई हीन, अधिकार-शून्य वर्ग न था, जो दूसरे की संपत्ति हो और इसलिए स्वयं संपत्ति न रख सकता हो, अथवा जिसे अन्य नागरिकों की भाँति स्वतंत्रता का पूर्ण अधिकार न हो। जातक तथा अन्य साहित्य में स्वयं की इच्छा से बने इस प्रकार के दास (भृत्य) का उल्लेख है। मनु ने इसी प्रकार के 'दास' (भृत्य) को अपने स्वामी, अर्थात नियोजक (employer) के परिवार का सदस्य माना और वैसा ही महत्व दिया है। इनके हित की रक्षा, इनकी तथा इनके बच्चों की उसी प्रकार की शिक्षा का प्रावधान किया जैसा परिवार के सदस्यों के लिए था। 'अमरकोश' में 'दास' और उसके पर्यायवाची शब्द सभी 'सेवक' के समानार्थी हैं, जो अपनी इच्छा से उचित मूल्य लेकर सेवाकार्य करते हैं। भारतीय जीवन में अरब और यूरोपीय देशों की गुलाम बनाने वाली दास प्रथा कभी नहीं आई। मनुष्मृति के अष्ट्म अध्याय के अंत में श्लोक ४१० से ४२० को विषय, प्रसंग-विरोध, भिन्न शैली तथा अंतर्विरोध के कारण अनुसंधानात्मक संस्करण प्रक्षिप्त मानते हैं।


ऎसा इस स्वतंत्रता का व्याप था, जो सारे भारतीय चिंतन पर छाया। पर जब आक्रमणकारी भारत में आए तब उन्होंने (अपनी दास प्रथा के समान ही), जिन लोगों ने धर्म-परिवर्तन से इनकार किया, उन्हें अपमानित करने के लिए गंदगी ढोने आदि के काम करवाए। इस प्रकार जिन्हें घृणास्पद कार्य करने के लिए विवश किया गया, बाद में उनका एक अलग वर्ग बना। जो आक्रमणकारी लुटेरे बनकर आए थे युद्घबंदी बनाकर ले गए, जिनका क्रय-विक्रय उनके देश के बाजारों में होता रहा। पर भारतीय विधि ने दास प्रथा कभी नहीं मानी।


इस प्राणिमात्र की दैहिक स्वतंत्रता के प्रथम स्वत्व के अंदर जो मानव-मूल्य प्रतिष्ठित हैं वे भारतीय सभ्यता की अमूल्य देन हैं।


इस चिट्ठी के चित्र विकिपीडिया के सौजन्य से हैं।

०१ - कुरितियां क्यों बनी
०२ - प्रथम विधि प्रणेता - मनु
०३ - मनु स्मृति और बाद में जोड़े गये श्लोक
०४ - समता और इसका सही अर्थ
०५ - सभ्यता का एक मापदंड वहाँ नारी की दशा है
०६ - अन्य देशों में मानवाधिकार और स्वत्व
०७ - भारतीय विधि ने दास प्रथा कभी नहीं मानी

सोमवार, जनवरी 26, 2009

अन्य देशों में मानवाधिकार और स्वत्व

इस स्वत्व के साथ जुड़ा है व्यक्तिगत स्वतंत्रता का प्रश्न। पश्चिम एशिया, अफ्रीका और यूरोप की सभी प्राचीन सभ्यताओं में मानव समाज के कलंक 'दासता' (slavery) की भयावह प्रथा प्रचलित थी। विशेष रीति से जो साम्राज्य एवं सभ्यताएँ तलवार के बल से कायम हुईं, टिकीं और बड़ी बनीं, उनमें इस अत्याचारी प्रथा का नंगा नाच देखा जा सकता है। दासों (गुलामों) के व्यापक  शोषण एवं उत्पीड़न से, उनके पसीने एवं रक्त से, कम-अधिक मात्रा में सने हैं इन सभ्यताओं के रंगमहल। उसी से बनी पश्चिमी जीवन की इमारत। अरब और मुसलिम जगत, यूनान, रोम, भूमध्य सागर के चारों ओर के अन्य देशों में और अंत में यूरोपीय देशों की उपनिवेश तथा साम्राज्य-लिप्सा द्वारा पश्चिमी एशिया, यूरोप, अफ्रीका और उत्तरी एवं दक्षिणी अमेरिका में इस घोर गर्हित प्रथा की काली घटा छाई।


कबीलों का सादा जीवन (जैसा आस्ट्रेलिया और अमेरिका के आदिम निवासियों में पाया गया) दास प्रथा से अपरिचित था। पर पश्चिमी सभ्यता में संघर्ष तथा युद्घ आया और तज्जनित कृषि एवं उद्योंगों में श्रमिकों की आवश्यकता। तब युद्घबंदियों का मजदूर के रूप में उपयोग प्रारंभ हुआ। संभवतया उसी में इस निंदनीय प्रथा का जन्म उस समाज में हुआ जहाँ बर्बर अवस्था से उबरना न हो सका था, न सामाजिक जीवन-दर्शन उत्पन्न हुआ, न मानव-मूल्यों की कल्पना आई।


दास पाने का प्रमुख स्त्रोत युद्घबंदी थे। इसके अतिरिक्त दीन माता-पिता कभी नितांत विपत्ति अथवा संकट में अपनी संतान को, या ऋण चुका सकने में असमर्थ व्यक्ति अपने को दास के रूप में उपस्थित करता था। दासों का क्रय-विक्रय यूनान, साइप्रस, रोम, अरब और पश्चि के बाजारों में साधारण घटना थी। यहाँ एशियाई, अफ्रीकी तथा यूरोपीय दासों का सौदा होता था। यूनान में दास बहुत बड़ा संख्या में थे। कहते हैं, अकेले एथेंस में उनकी संख्या स्वतंत्र नागरिकों से अधिक थी। होमर के महाकाव्य 'इलियड' तथा 'ओडेसी' में उनका वर्णन आता है।


रोम साम्राज्य का प्रारंभ तथा प्रसार सैन्य बल पर हुआ था। वहाँ दास प्रथा पराकाष्ठा पर पहुँची। इस प्रथा के नियम रोमन विधि के विशिष्ट अंग थे। जिस कार्थेज (Carthage) को फणीशियों ( Phoenicians) (संभवतया यह पुराणों में वर्णित पणि या नाग जाति है) ने उत्तरी अफ्रीका के सुरक्षित तट पर विक्रम पूर्व नौवीं-आठवीं शताब्दी में बसाया, उसके साथ युद्घ-श्रंखला के चलते रोम में श्रमिकों की कमी हो गई। तब युद्घबंदियों से दासों की भाँति काम करवाने से यह प्रथा निर्ममता के शिखर छूने लगी। कहते हैं, उस समय कुछ प्रमुख बाजारों में दस हजार दासों का प्रतिदिन सौदा होता था। मनोरंजन के लिए भी दासों को शस्त्रों से अथवा कठघरे में रखे बए हिंस्र पशु से युद्घ करना पड़ता था, जिनमें घायल होना एवं मृत्यु साधारण बात थी।


ऎसी दशा में विक्रम संवत् पूर्व प्रथम शताब्दी में रोम के विरूद्घ दास-विद्रोह प्रारंभ हुए। एक समय दक्षिण इटली दासों के हाथ में चला गया। इधर साम्राज्य का विस्तार और उसके लिए युद्घ बंद हो गए। तब दासों का मिलना कम हो गया। रोमन साम्राज्य के पतन का प्रमुख कारण यह दास प्रथा कही जाती है। दास का अपने उत्पीड़न के आधार पर खड़ी व्यवस्था से कोई लगाव न था। रोमन साम्राज्य के समाप्त होते ही दास प्राप्त करने के लिए छापे तथा आक्रमण कम हो गए और दास प्रथा में कमी आई।


पर यूरोप में यह दास प्रथा चौदहवीं शताब्दी तक सामान्यतया चलती रही। अब दास अधिकांशत: 'स्लाव' (Slav); देश से मिलते थे। इसी से अंग्रेजी में दासता के लिए 'स्लेवरी' शब्द प्रयोग होता है। चौदहवीं शताब्दी के समीप पश्चिमी एशिया तथा पूर्वी यूरोप में पुन: युद्घ की छाया मँडराई। इसके कारण पश्चिमी यूरोप को युद्घबंदी दास के रूप में प्राप्त होने लगे। ये बंदी 'यीशु के शत्रु' समझे जाते थे और निरंकुश अत्याचारों के शिकार बनते। पादरियों की सेवा के लिए गिरनाघर में जो दास रखे जाते थे उनकी सबसे बदतर दुर्दशा थी। अरब देश तो सदा से अफ्रीकी दासों का व्यापार करते थे। पैगंबर ने गुलामों के साथ सहृदयता दिखाने की सलाह दी। पर व्यवहार में घोर कट्टरपन ने उलटा उन्हें नारकीय जीवन बिताने पर विवश किया। अरब का यह इसलामी कालखंड अधिकांशत: युद्घ की भट्ठी में जलता रहा। उनके साम्राज्य-प्रसार ने दासता को हवा दी। दास व्यापार पुन: बड़ी मात्रा में चालू हुआ।


जब यूरोप निवासियों का औपनिवेशिक युग प्रारंभ हुआ तब दास प्रथा में और बढ़ोत्तरी हो गई। पुर्तगाली अफ्रीकी दासों के व्यापार में अरबों से लोहा लेने लगे। नई दुनिया की खोज के बाद पश्चिमी द्वीप समूह, मेक्सिको और मेक्सिको की खाड़ी के क्षेत्र तथा पूर्व-उत्तरी अमेरिका का पूर्व-दक्षिण तट, पूरू, ब्राजील तथा अन्य देशों में यूरोपवासियों ने बड़े-बड़े क्षेत्र अपने कब्जे में कर लिये। वहाँ गन्ना, कपास, तंबाकू आदि और खाद्यान्नों की विस्तृत खेती के लिए श्रमिक चाहिए थे। उसकी पूर्ति पहले छापा मारकर वहाँ के आदिम निवासियों को दास बनाकर की, जिनको उनके खेतों से अथवा प्रदेश से निकाल दिया; उनके स्त्री-बच्चों को बाजारों में बेचा। अनेक आदिम जातियों का नाम इस प्रक्रिया में मिट गया। इन ईसाई 'सभ्य' लोगों के लिए इन 'धर्मभ्रष्ट'  लोगों को 'सच्चा धर्म' दिखाने का एकमेव मार्ग इन्हें दास बनाना था। यूरोप निवासियों के अत्याचारों की कहानी अमेरिकी मूल जातियों के ह्रास तथा समूल वंश-नाश ने लिखी है।


सोलहवीं शताब्दी में अफ्रीकी दासों का अमेरिका में आयात प्रारंभ हुआ। इन हब्शियों को जहाजों में जानवरों की तरह ठूसकर समुद्र पार अमेरिका ले जाया जाता था। वहाँ उन्हें बेचकर वस्तुएँ और सोने से लदे जहाज यूरोत आते। मानव का क्रय ही यूरोप और अमेरिका की लौकिक समृद्घि की कहानी है। परंतु इससे इस भयानक अत्याचार का पूरा व्याप प्रकट नहीं होता। दासों के आवास से घुड़साल अच्छी; उनका आधा पेट भोजन और काम के समय पूरी टोली पर गोरे पर्यवेक्षक के कोड़े! दास प्रथा का दु:ख-दर्द तो आंशिक रूप से श्रीमती हैरियट स्टोई की पुस्तक 'टाम काका की कुटिया' ('Uncle Tom's Cabin': Harriet Beecher Stowe)  पढ़कर समझ सकते हैं। कहते हैं कि इसी पुस्तक के कारण संयुक्त राज्य अमेरिका का गृहयुद्घ हुआ। अब्राहम लिंकन ने (जो उस समय वहाँ के राज्याध्यक्ष थे) कहा, 'यदि दास प्रथा पाप नहीं है तो संसार में कुछ भी पाप नहीं।' फ्रांस की राज्यक्रांति के नारों के कारण भी यूरोप का वातावरण बदल रहा था। ऎसे समय में भीषण गृहयुद्घ में वह देश संयुक्त बच सका।


पर यूरोपीय साम्राज्यवाद दास प्रथा के नए रूप लेकर आया। भारत से बड़ी मात्रा में अनुबंध के अंतर्गत गिरमिटिया कहकर श्रमिकों को अनेक प्रकार के लालच दे, प्रशांत तथा हिंद महासागर के द्वीपों में और अफ्रीका में भेजना प्रारंभ हुआ। वहाँ उनके कोई अधिकार न थे। वे केवल उन अधिकारों का उपभोग कर सकते थे जो उनके स्वामी उन्हें देते थे। उनके रीति-रिवाज, यहाँ तक कि भारत में हुआ विवाह भी अमान्य था। पति पत्नी से, भाई भाई से, माता-पिता संतानों से अलग, करार के अंतर्गत स्वामी की इच्छानुसार रखे जा सकते थे। वेतन जब चाहा, फर्जी त्रुटि दिखाकर काटा जा सकता था। अपनी मातृभूमि से दूर गुलाम देश के इन निवासियों की दशा 'दास' के समान थी। तब वैसी ही एक नाटक की पुस्तक 'कुली प्रथा अथवा बीसवीं सदी की गुलामी' आई। यह पुस्तक हिंदी की प्रसिद्घ कवयित्री सुभद्राकुमारी चौहान के पति श्री लक्ष्मणसिंह चौहान ने लिखी थी। प्रकाशित होने के कुछ दिन बाद वह जब्त हो गई। पर यह 'गिरमिटिया' नामक कुली प्रथा प्रथम महायुद्घ के समीप बंद हो गई।

इस चिट्ठी के चित्र विकिपीडिया के सौजन्य से हैं।
०१ - कुरितियां क्यों बनी
०२ - प्रथम विधि प्रणेता - मनु
०३ - मनु स्मृति और बाद में जोड़े गये श्लोक
०४ - समता और इसका सही अर्थ
०५ - सभ्यता का एक मापदंड वहाँ नारी की दशा है
०६ - अन्य देशों में मानवाधिकार और स्वत्व  




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मंगलवार, जनवरी 20, 2009

प्राचीन भारत में मानवाधिकार

तीसरी बुनियादी धारणा मानव-मूल्यों को लेकर है। आज सारे संसार में मानवाधिकार (human rights) को लेकर बतंगड़ खड़ा किया जाता है और इसकी होड़ में कुछ देश शायद जानबूझकर या अपप्रचार के शिकार बनकर अपनी स्वार्थ-पूर्ति में दादागिरी का दृश्य उपस्थित करते हैं। खोखले दावों की प्रतीति भी उन्हें नहीं होती। प्राणिमात्र के 'स्वत्व' की भारतीय विचारधारा के संदर्भ में इसे समझना आवश्यक है।

मानवाधिकारों के पश्चिमी विचारों के मूल में एक मनोग्रंथि है। वहाँ सभी अधिकारों की चर्चा करते हैं। कानून की आवश्यकता के बारे में उनकी साधारण मान्यता है कि मानवाधिकार और समूह अर्थात समाज के अधिकारों में कोई विरोध है, इसलिए कानून के मूल में ऎसी धारणा पर यूरोपीय समाजवाद या साम्यवादी विचार दर्शन खड़ा है। पर हिंदु विधि एवं दर्शन का मूलभूत विश्वास है कि व्यक्ति और समाज ( जिसका वह एक घटक है) के अधिकारों में कोई अंतर्निहित प्रतिकूलता नहीं है। दोनों परस्परावलंबी हैं। सामाजिक विकास का मूलाधार उसके घटकों का विकास है, और मानव जीवन के गुणों के विकास के लिए व्यक्तिगत स्वतंत्रता अनिवार्य है। पर दूसरी ओर मनुष्य की सार्थकता समाज में है।

इससे भी बढ़कर हिंदु जीवन एवं दर्शन का विश्वास है कि मानव-मूल्यों के अनुरूप प्राणिमात्र के स्वत्व की रक्षा होनी चाहिए। यही नहीं, सभी प्राणियों व मानव का प्रकृति के साथ सामंजस्य होना चाहिए। यह पर्यावरण के संरक्षण का मूल मंत्र है।

प्राचीन भारतीय विधि में 'स्वत्व' शब्द का प्रयोग होता है। साधारणतया इसे 'अधिकार' का समानार्थी मानते हैं। पर इस शब्द का जोड़ शायद संसार की किसी भाषा में नहीं है। व्युत्पत्ति की दृष्टि से इसका अर्थ होता है, 'जो तुमको देय या तुम्हारा प्राप्य है' अर्थात वही तुम्हारा 'स्वत्व' है। यह तुम्हारा अधिकार नहीं, पर स्वत्व होने के नाते सभी को वह तुमको देना होगा। स्वत्व उन सबके कर्तव्य से, जो तुम्हारे संबंध में आएँ, जुड़ा दायित्व है। यह अधिकारों को दूसरी ओर से देखने का उपक्रम है; एक अनूठी भारतीय कल्पना।

प्राचीन विधि में मुक्त वायु, जल, धरती और आकाश प्राणिमात्र के 'स्वत्व' कहे गए हैं। यह प्रत्येक प्राणी को दिया जाता है, क्योंकि उसने इस पृथ्वी पर जन्म लिया है। इसको 'ना' नहीं करेंगे। यह स्वत्व प्राणों से जुड़ा है; जीवन में व्याप्त है। उसे अलग नहीं किया जा सकता। पिंड जहाँ बना है वहाँ उसका स्वत्व है। यह किसी के द्वारा प्रदत्त नहीं, और इसलिए किसी के द्वारा छीना भी नहीं जा सकता । अधिकार राजसत्ता तथा अंतरराष्ट्रीय समझौते के द्वारा प्रतिबंधित किए जा सकते हैं; पर 'स्वत्व' न तो प्राधिकार (Privilege) है, न नैसर्गिक अधिकार, क्योंकि वह अहरणीय है।

'मुक्त वायु' दैहिक स्वतंत्रता की कल्पना है। मेरे बचपन में मेरी माँ गाय को दुहने के समय के अतिरिक्त बाँधकर रखना गर्हित समझती थीं। उसे बाड़े में, जिसके किनारे गोशाला का छप्परयुक्त कमरा था, छोड़ देते थे। केवल अपराधी को ही निरूद्घ किया जा सकता था। पालतू चिड़ियों और पशुओं को पिंजरे या कठघरे में बंद रखना नीच कर्म माना गया।


०१ - कुरितियां क्यों बनी
०२ - प्रथम विधि प्रणेता - मनु
०३ - मनु स्मृति और बाद में जोड़े गये श्लोक
०४ - समता और इसका सही अर्थ
०५ - सभ्यता का एक मापदंड वहाँ नारी की दशा है
०६- प्राचीन भारत में मानवाधिकार

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