Sunday, December 13, 2009

योरोपीय सभ्यता के 'द्रविड़'

इसी प्रकार प्राचीन सेल्टिक सभ्यता के दिशा-निर्देशकों को 'द्रविड' (Druids)  के नाम से जाना जाता है। भारत के ब्राम्हणों में एक वर्ग द्राविड़ कहलाता है (देखें- ब्राह्मणों का वर्गीकरण 'पंचगौड़'  एवं 'पंचद्राविड़', पृष्ठ ४३)। 'द्रविड़' (अथवा 'द्रुइड') का सेल्टिक भाषा में अर्थ है- 'बलूत वृक्ष का जाननहार' (Knowing the oak tree) । यह बलूत वृक्ष वहाँ ज्ञानवृक्ष है जैसे भारत में पीपल या बोधिवृक्ष। वैसे 'द्रविड़' (द्र= द्रष्टा, विद् अथवा विर्= जानकार) (द्रुइड) प्राचीन सेल्टिक सभ्यता का ज्ञानी वर्ग था। ये साधारणतया बलूत के जंगलों में घूमते और पुजारी एवं अध्यापक के रूप में कार्य करते थे। ये प्राचीन सेल्टिक सभ्यता के संरक्षक थे। जनता के सभी वर्ग उनका बड़ा सम्मान करते थे। वे ही सार्वजनिक अथवा व्यक्तिगत, सभी प्रकार के विवादों में न्यायकर्ता भी थे। वे अपराधियों को दंड भी दे सकते थे। वे युद्घ में भाग नहीं लेते थे, न सरकार को कोई कर देते थे।



न्यायधीश के कपड़ों में एक द्रविड़

वर्ष में एक बार ये द्रविड़ आल्पस पर्वत के उत्तर-पूर्व में किसी पवित्र स्थल पर इकट्ठा होते थे। ये वार्षिक सम्मेलन गाल (Gaul)  देश में होते, जहाँ अनातोलिया से लेकर आयरलैंड तक के द्रविड़ इकट्ठा होकर अपना प्रमुख चुनते। वहीं सब प्रतिनिधियों के बीच नीति विषयक बातें होती थीं। समस्त विवादों का, जो उन्हें सौंपे जाते, वे निर्णय करते थे। ये वैसे ही सम्मेलन थे जैसे भारत में कुंभ मेले के अवसर पर होते थे। वे साधारणतया अपने कर्मकांड एवं पठन-पाठन बस्ती से दूर निर्जन जंगल में करते। द्रविड़ आत्मा की अनश्वरता और पुनर्जन्म पर विश्वास करते थे और मानते थे कि आत्मा एक शरीर से नवीन कलेवर में प्रवेश करती है। 'ये 'त्रिमूर्ति' को मानते थे। एक, ब्रह्मा जिन्होंने विश्व का निर्माण किया; दूसरे, ब्रेश्चेन (Braschen) यानी विष्णु, जो विश्व के पालनकर्ता हैं और तीसरे, महदिया (Mahaddia) यानी  महादेव, जो संहारकर्ता हैं।' इन देवमूर्तियों का वे पूजन भी करते थे। आंग्ल विश्वकोश के अनुसार- 'बहुत से विद्वान यह विश्वास करते हैं कि भारत के हिंदु ब्राह्मण और पश्चिमी प्राचीन सभ्यता के सेल्टिक 'द्रविड़' एक ही हिंदु-यूरोपीय पुरोहित वर्ग के अवशेष हैं।'

सेल्टिक सभ्यता के द्रविड़ (द्रुइड) के बारे में विद्वानों ने प्रारंभिक खोजों में 'उनके समय, उनकी दंतकथाओं, मान्यताओं, धारणाओं आदि के अध्ययन से यही निष्कर्ष निकाला कि वे भारत से आए दार्शनिक पुरोहित थे। वे भारत के ब्राह्मण थे, जो उत्तर में साइबेरिया ('शिविर' देश) से लेकर सुदूर पश्चिम आयरलैंड तक पहुँचे, जिन्होंने भारतीय सभ्यता को पश्चिम के सुदूर छोर तक पहुँचाया।' श्री पुरूषोत्तम नागेश ओक ने अपनी पुस्तक 'वैदिक विश्व-राष्ट्र का इतिहास' (देखें- अध्याय २३ और २४), जहाँ से ऊपर के उद्घरण हैं, में सेल्टिक सभ्यता के 'द्रविड़' (द्रुइड) का बड़ा विशद वर्णन उस विषय के शोधग्रंथों के आधार पर किया है। उन्होंने 'द्रविड़' भारत के उन ज्ञानी तथा साहसी पुत्रों को कहा जो सारे संसार में 'आर्य संस्कृति के अधीक्षक' बनकर फैले।

उनके अनुसार-'सारे मानवों को सम्मिलित करने वाले वैदिक समाज के विश्व भर के अधीक्षक, निरीक्षक, व्यवस्थापक, जो ऋषि-मुनि वर्ग होता था, उसे 'द्रविड़' की संज्ञा मिली थी। वैदिक सामाजिक जीवन सुसंगठित रूप से चलता रहे, यह उनकी जिम्मेदारी थी। वे उस समाज के पुरोहित, अध्यापक, गुरू, गणितज्ञ, वैज्ञानिक, पंचांगकर्ता, खगोल ज्योतिषी, भविष्यवेत्ता, मंत्रद्रष्टा, वंदपाठी, धार्मिक क्रियाओं की परिपाटी चलाने वाले; प्रयश्चित आदि का निर्णय लेने वाले गुरूजन थे।... यूरोप में उस शब्द का उच्चारण 'द्रुइड' रूढ़ है।'

इस चिट्ठी का चित्र विकिपीडिया के सौजन्य से। 

प्राचीन सभ्यताएँ और साम्राज्य

०१ - सभ्यताएँ और साम्राज्य
०२ - सभ्यता का आदि देश
०३ - सारस्वती नदी व प्राचीनतम सभ्यता
०४ - सारस्वत सभ्यता
०५ - सारस्वत सभ्यता का अवसान
०६ - सुमेर
०७ - सुमेर व भारत
०८ - अक्कादी
०९ - बैबिलोनिया
१० - कस्सी व मितन्नी आर्य
११ - असुर जाति
१२ -  आर्यान (ईरान)
१३ - ईरान और अलक्षेन्द्र (सिकन्दर)
१४ - अलक्षेन्द्र और भारत
१५ - भारत से उत्तर-पश्चिम के व्यापारिक मार्ग
१६ - भूमध्य सागरीय सभ्यताएँ
१७ - मिस्र सभ्यता का मूल्यांकन
१८ - पुलस्तिन् के यहूदी
१९ - यहूदी और बौद्ध मत
२० - जाति संहार के बाद इस्रायल का पुनर्निर्माण
२१ - एजियन सभ्यताएँ व सम्राज्य
२२ - फणीश अथवा पणि
२३ - योरोप की सेल्टिक सभ्यता
२४ -  योरोपीय सभ्यता के 'द्रविड़'

2 comments:

  1. अति उत्तम । मेरे लिए यह जानकारी बिल्कुल नई किंतु मेरी धारणा के अनुरूप है।

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  2. आदरणीय वीरेन्द्र भाईसाहब जी ,
    आपकी समस्त श्रृंखला का मैं अनुग्रहित पाठक हूँ.मेरी यह योग्यता नहीं की मैं अपना ज्ञान वर्धन करने के अलावा किसी लेख पर विवेचनात्मक टिप्पणी कर पाता .लेकिन यह टिप्पणी इसलिए कर रहा हूँ की अपना आभार प्रदर्शन कर सकूं.मेरा मानना है की पाठ्यक्रमों में परोसा गया इतिहास , अघोषित उद्देश में ,प्रायोजित किया गया साम्राज्यवादी और आरोपित है .कारन समझा जा सकता है . एक तठस्त सत्यपूर्ण विवेचना ,मीमांसा सहित आपके लेखन में साफ़ झलकती है.इसी को इतिहास कहा जा सकता है .आप को नमन .

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