Sunday, January 03, 2010

मखदूनिया

मखदूनिया (Macedonia) के लोग भाषा एवं जाति की दृष्टि से यूनानी थे, पर सांस्कृतिक दृष्टि से पिछड़े तथा अर्द्घ-बर्बर। एक समय आया जब सिकंदर के पिता फिलिप ने, और उसकी मृत्यु के बाद सिकंदर ने सारा यूनान और एथेंस शस्त्रों के बल पर जीता। सिकंदर के विश्व-विजय के स्वप्न ने यूनान के स्वर्ण युग पर अपनी काली छाया डालनी प्रारंभ की, जिससे उस समय के विज्ञान, समाजशास्त्र, कला, साहित्य, सभी पर धीरे-धीरे ग्रहण लगना प्रारंभ हो चला। शस्त्रों की झनझन सांस्कृतिक जीवन के अवसासन का द्वार खटखटा रही थी। इसके बाद मानो मखदूनिया के युद्घोन्माद के सम्मुख एथेंस और उसके साथ यूनान समर्पित हो गया।



प्लेटो और अरस्तू

सिकंदर के विश्व-विजय अभियान के प्रारंभ की एक कहानी है। सिकंदर के पिता फिलिप ने एथेंस की अकादमी से अरस्तू (Aristotle) को बुलाकर सिकंदर का शिक्षक नियुक्त किया था। कहते हैं, जब सिकंदर की महत्वाकांक्षा अरस्तू को पता चली और सिकंदर उससे अभियान की सफलता के लिए शुभकामनाएँ प्राप्त करने गया तो गुरू ने कहा,
'भारत जाते हो तो जाओ, पर वहाँ से अपने गुरू के लिए लाना गंगाजल, जो अमृत के समान पवित्र है और लाना 'गीता' की पवित्र पुस्तक। वह देश दार्शनिकों एवं ज्ञानियों की खान है; हो सके तो किसी ज्ञानी को आदर से साथ लाना।' 
यूनान में उस महिमामय देश भारत का पता था; सर्वसाधारण का विश्वास था कि गंगा की भूमि इस पृथ्वी का स्वर्ग है। इसीलिए वह अंत है, उसके बाद कुछ नहीं। यवन इतिहासकारों ने अरस्तू की इस उक्ति को सिकंदर और पुरू की संधि का कारण बताया। कहते हैं, जब सिकंदर ज्ञानी व्यक्ति की खोज में एक विद्वान के पास ले जाया गया तो वह धूप का सेवन कर रहे थे। 'विश्व-विजयी सिकंदर' के रूप में परिचय के बाद सिकंदर ने कहा कि वह उन्हें अपार धन-दौलत, सभी वस्तुएँ दे सकता है, यदि वह उसके साथ चलें। इस पर ज्ञानी ने इतना ही कहा,
'भगवान की दी हुयी यह धूप छोड़कर एक तरफ हट जाओ। इससे अधिक मुझे कुछ नहीं चाहिए।'
यह है दोनों संस्कृतियों के दृष्टिकोण का अंतर।

सिकंदर की मृत्यु के पश्चात उसके गुरू अरस्तू को भी सुकरात की तरह नवयुवकों को भड़काने के आरोप में मृत्युदंड मिला। उसने भागकर अपनी जान बचाई; पर कुछ दिनों बाद यह दार्शनिक भी चल बसा। 'अकादमी' समाप्तप्राय हो गयी। यवन सभ्यता को रोम की साम्राज्य-लिप्सा लील गयी। 

इसके बाद रोमन साम्राज्य का उदय हुआ। मखदूनिया के युद्घोन्मादजनित जीवन तथा उसके साम्राज्य का भी पतन हुआ और वह रोम का शिकार बना। रोम का साम्राज्य और अरब प्रायद्वीप का जीवन तथा यवन व मखदूनिया, सभी गुलामी प्रथा पर आधारित थे। रोमन सभ्यता के बारे में विस्त़ृत विचार करने के लिए ईसाई पंथ के उदय एवं प्रारम्भिक अवस्था को जानना आवश्यक है।

इस चिट्ठी का चित्र विकिपीडिया के सौजन्य से। 

प्राचीन सभ्यताएँ और साम्राज्य
०१ - सभ्यताएँ और साम्राज्य
०२ - सभ्यता का आदि देश
०३ - सारस्वती नदी व प्राचीनतम सभ्यता
०४ - सारस्वत सभ्यता
०५ - सारस्वत सभ्यता का अवसान
०६ - सुमेर
०७ - सुमेर व भारत
०८ - अक्कादी
०९ - बैबिलोनिया
१० - कस्सी व मितन्नी आर्य
११ - असुर जाति
१२ -  आर्यान (ईरान)
१३ - ईरान और अलक्षेन्द्र (सिकन्दर)
१४ - अलक्षेन्द्र और भारत
१५ - भारत से उत्तर-पश्चिम के व्यापारिक मार्ग
१६ - भूमध्य सागरीय सभ्यताएँ
१७ - मिस्र सभ्यता का मूल्यांकन
१८ - पुलस्तिन् के यहूदी
१९ - यहूदी और बौद्ध मत
२० - जाति संहार के बाद इस्रायल का पुनर्निर्माण
२१ - एजियन सभ्यताएँ व सम्राज्य
२२ - फणीश अथवा पणि
२३ - योरोप की सेल्टिक सभ्यता
२४ -  योरोपीय सभ्यता के 'द्रविड़'
२५ - ईसाई चर्च द्वारा प्राचीन यरोपीय सभ्यताओं का विनाश
२६ - यूनान
२७ - मखदूनिया

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