Sunday, February 07, 2010

उत्तर दिशा का रेशमी मार्ग

अब भारतीय संस्कृति के उत्तर दिशा की ओर जाने वाले रेशमी मार्ग (silk route) की चर्चा। दुर्गम पहाड़ों और अनजाने क्षेत्र से होकर भारत के पुत्रों ने पीढ़ियाँ खपाकर भारतीय संस्कृति के श्रेष्ठ जीवन का संदेश यहाँ पहुँचाया। गांधार (कंधार), कपिशा (काबुल) और उसे स्नान कराती कुंभा (काबुल) नदी भारत के अंग थे। यहाँ विष्णु, लक्ष्मी, इंद्र, शिव-पार्वती, गणेश एवं कार्तिकेय की मूर्तियाँ मिलती हैं। गांधार प्रदेश के 'तोकी' एवं 'गोमेल' दर्रों का उल्लेख वेद में है और भारत की नदियों-सरस्वती, सरयू, गोमती एवं कुंभा- का प्राचीन ईरानी धर्मग्रंथ 'जेंदावेस्ता' में। आज बौद्घ स्तूप और बुद्घ की व अन्य मूर्तियाँ भग्नावस्था में इस क्षेत्र में बिखरी हैं। यहीं से उत्तरी मंगोलिया होकर साइबेरिया (शिविर देश) (Siberia) (जहाँ शंकु सरीखे मकान एक शिविर का आभास देते हैं) और चीन जाने के मार्ग थे।

नीले रंग से पानी में और लाल रंग से जमीन पर, रेशमी मार्ग - चित्र विकिपीडिया के सौजन्य से। 

कभी इस मार्ग में हिंदु राज्य थे। उनका वर्णन और उत्खनन में प्राप्त अवशेषों की कहानी शरद हेबालकर की पुस्तक 'भारतीय संस्कृति का विश्व-संचार' में दी गयी है। उनके अनुसार चीनी यात्री ह्वेनसांग ने खोतान के राजा विजयकीर्ति का वर्णन किया है, जिसके 'सैकड़ों विहारों में सहस्त्रावधि भिक्षु रहते हैं। यहाँ का हिंदु राजा भगवान बुद्घ का चौदह दिवसीय समारोह मनाता है, जिसमें बुद्घ की स्वर्ण प्रतिमा की शोभा-यात्रा निकलती है।' ऎसे ही 'शैलराज देश' (काशगर) और  उसके उत्तर 'कूच' देश के हिंदु राजाओं की कीर्ति वर्णित है। ब्राम्ही लिपि में लिखे गए नाटक, काव्य, दर्शन एवं धर्मग्रंथ अनुवाद सहित यहां मिले और प्राचीन सारस्वत सभ्यता के वास्तुशास्त्र के अनुसार निर्मित नगर तथा उपयोग की वस्तुएँ, गौतम बुद्घ के जीवन के भित्तिचित्र, जैसे अजंता एलोरा में, और गुफा में अंकित जातक कथाओं के प्रसंग।

एक समय डा. रघुबीर, जो भारत की संविधान सभा के सदस्य थे तथा बाद में भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष हुए, एक खोज यात्रा में साम्यवादी रूस के साइबेरिया प्रदेश गए। वहाँ सोवियत सरकार उन्हें संसार के सबसे वृद्घ व्यक्ति से भेंट कराने बैकाल झील के उत्तर में एक गांव में ले गयी। उसने 'भारत' नाम न सुना था। पर जब इन्होंने बताया कि वे काशी से आए हैं तो उस सौ वर्ष से अधिक वृद्घ ने पीछे हटकर साष्टांग दंडवत् किया। इनके कहने पर कि
'आप यह क्या करते हैं? आप तो मेरे पिता और बाबा के समान हैं।'
वृद्घ ने इतना ही कहा,
'मेरे पूर्वजों ने बताया था कि काशी से कोई आए तो इसी प्रकार साष्टांग प्रणाम करना चाहिए।'
कठोर साम्यवादी अनुशासन के बलपूर्वक एक साँचे में ढालने के प्रयत्न को नकारता कैसा प्राचीन स्मृति का झोंका आया।


प्राचीन सभ्यताएँ और साम्राज्य
०१ - सभ्यताएँ और साम्राज्य
०२ - सभ्यता का आदि देश
०३ - सारस्वती नदी व प्राचीनतम सभ्यता
०४ - सारस्वत सभ्यता
०५ - सारस्वत सभ्यता का अवसान
०६ - सुमेर
०७ - सुमेर व भारत
०८ - अक्कादी
०९ - बैबिलोनिया
१० - कस्सी व मितन्नी आर्य
११ - असुर जाति
१२ -  आर्यान (ईरान)
१३ - ईरान और अलक्षेन्द्र (सिकन्दर)
१४ - अलक्षेन्द्र और भारत
१५ - भारत से उत्तर-पश्चिम के व्यापारिक मार्ग
१६ - भूमध्य सागरीय सभ्यताएँ
१७ - मिस्र सभ्यता का मूल्यांकन
१८ - पुलस्तिन् के यहूदी
१९ - यहूदी और बौद्ध मत
२० - जाति संहार के बाद इस्रायल का पुनर्निर्माण
२१ - एजियन सभ्यताएँ व सम्राज्य
२२ - फणीश अथवा पणि
२३ - योरोप की सेल्टिक सभ्यता
२४ -  योरोपीय सभ्यता के 'द्रविड़'
२५ - ईसाई चर्च द्वारा प्राचीन यरोपीय सभ्यताओं का विनाश
२६ - यूनान
२७ - मखदूनिया
२८ - ईसा मसीह का अवतरण
२९ - ईसाई चर्च
३० - रोमन साम्राज्य
३१ - उत्तर दिशा का रेशमी मार्ग

1 comment:

  1. बढिया ऐतिहासिक जानकारी
    लेकिन अब तो सब बन्द हो चुका है

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