Sunday, March 21, 2010

चीन

प्रागैतिहासिक युग में चीन में सिया (Hsia) व शांग (Shang) वंशों का राज्य कहा जाता है। किसी बड़े कार्य को प्रारंभ करते समय पशुबलि तथा नरबलि दी जाती थी। राजघराने के व्यक्ति के शरीरांत पर उसके शव के साथ सुविधापूर्वक जीने की वस्तुएँ, भोजन तथा पेय, यहाँ तक कि उसके गुलामों को भी जीवित दफना दिया जाता था। अंत में युद्घ एवं अत्याचारों से विवश हो गुलामों ने विद्रोह किया। महलों में आग लगा दी। तब विक्रम संवत् पूर्व दसवीं शताब्दी में पश्चिम से आए नए वंश का शासन प्रारंभ हुआ। सामाजिक जीवन में बहुदेववाद तथा बलि के साथ चीन के तौर-तरीके विचित्र थे। कृषक एवं उच्च वर्ग (अर्थात सामंत, राजकर्मचारी, पुजारी आदि) के जीवन में बहुत बड़ा अंतर था। ऐसे समय में बौद्घ मत चीन में आया।

कन्फूसियस का चित्र के विकिपीडिया के सोजन्य से
इस बहुदेववादी चीन में प्रचलित जीवन के बीच संभवतया भारत से संबंध होने पर दो सुधारवादी धाराएँ आईं। एक कन्फूसियस (Confucius: चीनी नाम कुंग फू जू Kung Fu Tzu) संप्रदाय  और दूसरा ताओ (Tao) । दोनों के प्रणेता समकालीन और विक्रम संवत् पूर्व पाँचवीं शताब्दी के एक ही राज्य के कहे जाते हैं। कन्फूसियस कर्मकांड विरोधी थे। उन्होंने अपने आश्रम में काव्य, इतिहास, सामाजिक उत्सव तथा संगीत की शिक्षा देना प्रारंभ किया। परलोक एवं दर्शन के स्थान पर साहित्य, नैतिक जीवन, ईमानदारी और आचार-व्यवहार की शिक्षा दी। कहा, 'राज्य का मूल आधार जनता का समर्थन है जो राजा के चरित्र, सुशासन तथा प्राचीन परंपराओं का पालन करने पर निर्भर है।' 'ताओ' का शाब्दिक अर्थ है 'मार्ग'। 'ली' या 'लाओत्जे' (= वृद्घ गुरू) ने 'ताओ' शब्द का उपयोग एक शास्वत प्राकृतिक तत्व के रूप में किया था, जिसके अनुरूप चलना है। प्राकृतिक मार्ग से हटकर सब कृत्रिम नियम आदि स्वतंत्रता का हनन है। उन्होंने कहा, 
'जो तोको काँटा बुवै ताहि बोय तू फूल।'

उसके बाद चीन में एक और विविक्त और अलगाव का अध्याय प्रारंभ हुआ। तब उत्तर में लगभग ३००० किलोमीटर लंबी 'चीन की महान दीवार' निर्मित हुयी। तत्कालीन सम्राट यिंग चेंग ने इस धमंड में कि 'इतिहास उसी से प्रारंभ होता है', अतीत के सब चिन्ह मिटाने का आदेश दिया। सभी पुस्तकें और लिखित लकड़ी व बाँस की पाटियाँ जला दी गयीं। विद्वानों एवं दार्शनिकों को मरवा डाला अथवा जीवित दफना दिया। विदेशों से संबंध-विच्छेद कर सोचा कि पहले की सभी विचारधाराओं का अंत हो गया। इस पार्थक्य की कालरात्रि के बाद जब कन्फूसियस और ताओ के विचारों का स्मरण प्रारंभ हुआ तो उनके साथ बौद्घ मत भी लहलहा उठा।

प्राचीन सभ्यताएँ और साम्राज्य
०१ - सभ्यताएँ और साम्राज्य
०२ - सभ्यता का आदि देश
०३ - सारस्वती नदी व प्राचीनतम सभ्यता
०४ - सारस्वत सभ्यता
०५ - सारस्वत सभ्यता का अवसान
०६ - सुमेर
०७ - सुमेर व भारत
०८ - अक्कादी
०९ - बैबिलोनिया
१० - कस्सी व मितन्नी आर्य
११ - असुर जाति
१२ -  आर्यान (ईरान)
१३ - ईरान और अलक्षेन्द्र (सिकन्दर)
१४ - अलक्षेन्द्र और भारत
१५ - भारत से उत्तर-पश्चिम के व्यापारिक मार्ग
१६ - भूमध्य सागरीय सभ्यताएँ
१७ - मिस्र सभ्यता का मूल्यांकन
१८ - पुलस्तिन् के यहूदी
१९ - यहूदी और बौद्ध मत
२० - जाति संहार के बाद इस्रायल का पुनर्निर्माण
२१ - एजियन सभ्यताएँ व सम्राज्य
२२ - फणीश अथवा पणि
२३ - योरोप की सेल्टिक सभ्यता
२४ -  योरोपीय सभ्यता के 'द्रविड़'
२५ - ईसाई चर्च द्वारा प्राचीन यरोपीय सभ्यताओं का विनाश
२६ - यूनान
२७ - मखदूनिया
२८ - ईसा मसीह का अवतरण
२९ - ईसाई चर्च
३० - रोमन साम्राज्य
३१ - उत्तर दिशा का रेशमी मार्ग
३२ -  मंगोलिया
३३- चीन

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