Sunday, July 11, 2010

इस्लाम व ईसाई आक्रमण

परन्तु यह सब कालांतर में नष्ट हो गया। यह सत्य है कि जहाँ मंगोल (मुगल) आक्रमण भारत में बाद में आया वहाँ कुबलई खाँ के  आक्रमण ने पहले ही दक्षिण-पूर्व एशिया में ध्वंस बरपा। उत्तरी चंपा पर चीन का कुछ काल तक अधिकार चलने पर भी इन हिंदु राज्यों की जनता ने पुन: कुछ सीमा तक उसका निराकरण किया। और दक्षिण-पूर्व के हिन्द द्वीप समूह ने तो चीन की नौसेना के एक बड़े अंश को जावा के पास जल-समाधि दिला दी। इसके बाद अरब के आक्रमण का भयानक खतरा आया इसलाम के रूप में। सरल और निष्कपट लोग छल के शिकार बने। पर भारत की सर्व कल्याण की इच्छा रखने वाली और हर प्रकार के विचारों की आश्रय-प्रदात्री संस्कृति ने उसे भी मानवता का एक रूप समझकर स्थान दिया। उन्हें अपनी श्रद्घा के अनुकूल रहने की, अपने पंथ की रीति का पालन करने की स्वतंत्रता दी। परंतु अनेक स्थानों पर वे विदेशी हस्तक बने। प्रदत्त स्वतंत्रता का दुरूपयोग किया। बाह्य निष्ठाएँ जगाईं और धीरे-धीरे मलयेशिया एवं पूर्वी हिंद द्वीप समूह मुसलिम बहुल हो गए।


कंबोडिया के राजा: नोरोदम - चित्र विकिपीडिया से
उनके पीछे अनेक देशों से आए ईसाई। जहाँ-जहाँ यूरोपीय (ईसाई) बए, उनके आगे चले पादरी। सबसे पहले क्रूरकर्मा पुर्तगाली कंबुज एवं लव देश पहुँचे। लव देश में पुर्तगालियों ने भयंकर अत्याचार किए। उसके बाद सोलहवीं सदी में भिन्न-भिन्न यूरोपीय देशों से, व्यापार करने के बहाने, नौसेना सहित वहाँ पहुँचे अंग्रेज, डच और फ्रांसीसी। उनके साथ मानवता की खाल ओढ़े आया ईसाई चर्च और तथाकथित लोकोपकार कार्य। 'स्याम' (थाईलैंड) को छोड़कर सभी देश उनकी सर्वग्रासी साम्राज्यवादी भूख के ग्रास बने। राजा नोरोदम (नरोत्तम) के समय फ्रांसीसी साम्राज्य पूर्ण हो गया।

इनके अत्याचारों से तंग हो जनता साम्यवाद की ओर आकर्षित हूयी। तब जो कुछ बचा था उसको कंबुज, लव देश और चंपा (वियतनाम) में आए साम्यवाद के आक्रमण ने नष्ट कर दिया। साम्यवादी सरकारों ने वहाँ की भारतीय संस्कृति के अवशेषों को कुचला। मनमाने आदेशों से उनके प्राचीन काल से चलते आए जीवन के समूल विनाश का यत्न किया। मंदिर एवं विहार, अमूल्य शिल्प और कलाकृतियाँ नष्ट कर पुजारियों और बौद्घ भिक्षुओं को बलात् श्रम में जोता। साहित्य, परंपराएँ एवं संस्कृति- सभी उनके कोपभाजन बने।

मानव सभ्यता के हतभाग्य के ये सब निमित्त मात्र थे। मूल कारण शरद हेबालकर ने निम्न शब्दों में वर्णित किया है,

'सैकड़ों  वर्षों से भरत-भूमि के पुत्र इन हिंदु राज्यों में जाते रहते थे। वे ज्ञान, विज्ञान, पराक्रम लेकर जाते थे। पर दसवीं सदी के बाद स्वयं भारत इसलाम के आक्रमण का प्रतिकार करने में व्यस्त हो गया। धर्म, संस्कृति, भूमि, समाज आदि पर सर्वकष आक्रमणों से भारत ही घायल व व्याकुल था। एक भयंकर ग्लानि से वह ग्रस्त था।-- और जब चैतन्य का यह स्त्रोत ही बंद हो गया तो नहरों में चैतन्य का प्रवाह कहाँ से आता ? और उस चैतन्य के अभाव में यदि उन नहरों के आसपास के प्रदेश सूख बए तो क्या आश्चर्य ?' 
मानव सभ्यता की सबसे बड़ी त्रासदी थी भारत में विदेशी शासन।

प्राचीन सभ्यताएँ और साम्राज्य
०१ - सभ्यताएँ और साम्राज्य
०२ - सभ्यता का आदि देश
०३ - सारस्वती नदी व प्राचीनतम सभ्यता
०४ - सारस्वत सभ्यता
०५ - सारस्वत सभ्यता का अवसान
०६ - सुमेर
०७ - सुमेर व भारत
०८ - अक्कादी
०९ - बैबिलोनिया
१० - कस्सी व मितन्नी आर्य
११ - असुर जाति
१२ -  आर्यान (ईरान)
१३ - ईरान और अलक्षेन्द्र (सिकन्दर)
१४ - अलक्षेन्द्र और भारत
१५ - भारत से उत्तर-पश्चिम के व्यापारिक मार्ग
१६ - भूमध्य सागरीय सभ्यताएँ
१७ - मिस्र सभ्यता का मूल्यांकन
१८ - पुलस्तिन् के यहूदी
१९ - यहूदी और बौद्ध मत
२० - जाति संहार के बाद इस्रायल का पुनर्निर्माण
२१ - एजियन सभ्यताएँ व सम्राज्य
२२ - फणीश अथवा पणि
२३ - योरोप की सेल्टिक सभ्यता
२४ -  योरोपीय सभ्यता के 'द्रविड़'
२५ - ईसाई चर्च द्वारा प्राचीन यरोपीय सभ्यताओं का विनाश
२६ - यूनान
२७ - मखदूनिया
२८ - ईसा मसीह का अवतरण
२९ - ईसाई चर्च
३० - रोमन साम्राज्य
३१ - उत्तर दिशा का रेशमी मार्ग
३२ -  मंगोलिया
३३ - चीन
३४ - चीन को भारत की देन 
३५ - अगस्त्य मुनि और हिन्दु महासागर
३६ -  ब्रम्ह देश 
३७ - दक्षिण-पूर्व एशिया
३८ - लघु भारत 
३९ - अंग्कोर थोम व जन-जीवन
४० - श्याम और लव देश
४१ - मलय देश और पूर्वी हिन्दु द्वीप समूह
४२ - चीन का आक्रमण और निराकरण
४३ - इस्लाम व ईसाई आक्रमण

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